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Thursday, May 7, 2020

अष्टकवर्ग - परिचय (भाग - 1)

ज्योतिष में फलादेश के निमित्त विभिन्न पद्धतियां प्रचलित हैं लेकिन उन सभी में पराशरोक्त (लघुपाराशरी) सिद्धान्त तथा पाराशरी महादशा ही प्रमुख हैं। यद्यपि महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा, प्राणदशा आदि इसके सूक्ष्म से सूक्ष्म विभाजन हैं - जिससे दशा समय को दिनों तथा घंटों तक में विभाजित कर सूक्ष्म फलादेश कहा जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद फलादेश सही घटित नहीं होता। वास्तव में ज्योतिष की "अष्टकवर्ग" और "गोचर" पद्धतियां इस दृष्टि से अपना विशेष महत्व रखती हैं। ज्योतिष के फलित सूत्रों के अपेक्षाकृत "अष्टकवर्ग" का सिद्धान्त बहुत ही स्पष्ट और युक्ति संगत है कि कोई भी ग्रह उच्च का, स्वक्षेत्री, केन्द्रादि बलयुक्त, योग कारक ही क्यों न हो, यदि वह अष्टकवर्ग में दुर्बल है तो शुभफल दे पाने में समर्थ नहीं होता। इसके विपरीत षष्ठ, अष्टम, व्यय आदि दुष्ट स्थानों में स्थित, नीच शत्रुक्षेत्री अदि ग्रह भी शुभ फल दे सकते हैं यदि वे अष्टकवर्ग में बली हों।

अष्टकवर्ग का मुख्य आधार यह है कि जन्म के समय या गोचर में ग्रहों की जो परस्पर सापेक्ष स्थिति होती है, उसी के अनुसार फल के शुभत्व या अशुभत्व का निर्णय होता है। सामान्यतः होरा में (कुंडली में) प्रत्येक ग्रह का भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होगा, अब एक ग्रह दूसरे ग्रह की स्थिति से कितना प्रभावित होगा - इसका थोड़ा बहुत विचार दृष्टि से हो सकता है। अष्टकवर्ग में प्रत्येक ग्रह की परस्पर सापेक्ष स्थिति को देखकर उसके शुभाशुभ फल का सही निर्णय किया जा सकता है।

बृहत्पराशर होराशास्त्र के पूर्वखण्ड में महर्षि पराशर ने ग्रहों के समग्र प्रभावों की व्याख्या की है जो ग्रहों की विभिन्न भावों में स्थिति के कारण उत्पन्न होता है। उत्तरखण्ड में अष्टकवर्ग पर अध्याय है, जिसके प्रारम्भ में स्वयं पराशर और उनके शिष्य मैत्रेय के मध्य संवाद दिया गया है :-

कलौ पापरतानां च मन्दा बुद्धिर्यतोनृणाम्।
अतोऽल्पबुद्धिगम्यं यत् शास्त्रमेतद् वदस्व ।।३।। 

तत्तत्कालग्रह स्थित्या मानवनां परिस्फुटम्।
सुख दुःखपरिज्ञानमायुषोनिर्णयं तथा ।।४।।  
बृहत्पराशर होराशास्त्र, अध्याय ६८ 

मैत्रेय अपने गुरु से निवेदन करते हैं - कलियुग में पाप कर्म निरत मनुष्यों की बुद्धि चूंकि मन्द हो जाती है अतः अल्प बुद्धि से भी जो शास्त्रानुशासन हो कृपया वह बताएं , जिससे मनुष्यों को उस समय की ग्रह स्थिति से सुस्पष्ट रूप में सुख-दुःख के पूर्ण ज्ञान तथा आयु का निर्णय हो सके।

अष्टकवर्ग विधि का तर्काधार समझाते हुए महर्षि पराशर कहते हैं :-

"जिस तरह विभिन्न भावों में ग्रहों की स्थिति के प्रभाव का आकलन जन्म-लग्न और चंद्रमा से किया जाता है, उसी तरह दूसरे ग्रहों को भी लग्न की तरह मानकर और उनसे भावों को गिनते हुए भी फलों का आकलन करना चाहिए। इस तरह सात ग्रहों (राहु और केतु को छोड़कर) और लग्न से प्राप्त प्रभावों से ही पूरा चित्र स्पष्ट होता है। जब सातों ग्रहों और लग्न के समग्र प्रभावों को एक साथ आँका जाये तो वह अष्टकवर्ग विश्लेषण कहलाता है"।

भारतीय ज्योतिष में किसी भी कुंडली के फलकथन के लिए प्राचीन काल से ही अनेक विद्याओं का प्रयोग किया जाता रहा है। होराशास्त्र के महर्षियों ने सभी प्रकार के कर्मों से उत्पन्न होने वाले शुभ या अशुभ फलों को जानने के लिए जिस पद्धति का विकास किया उसे 'अष्टकवर्ग' कहा गया है। अष्टकवर्ग के ज्ञान से मनुष्य के समस्त कर्मजनित शुभ या अशुभ फल को वैज्ञानिक ढंग से जाना जा सकता है।

अष्टकवर्ग की सहायता से फलादेश को अत्यन्त सूक्ष्मता प्रदान की जाती है। व्यष्टि व समष्टि के अपूर्व समन्वय का सिद्धान्त इस पद्धति से देखा जा सकता है। उदहारण के लिए कोई ग्रह शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होकर स्वराशि, उच्चराशि या मित्रादि की राशि में स्थित हो तो अपने भाव से सम्बन्धित फलों की वृद्धि करेगा, यह एक सामान्य सिद्धांत है। लेकिन कितनी वृद्धि करेगा?  कुल शुभ व अशुभ फल का अनुपात क्या होगा? इस विषय में अष्टकवर्ग पद्धति ही निर्णायक मानी गयी है। इसकी सहायता से आयु, धन, विद्या, बुद्धि व सुखादि का विशेष निर्णय किया जाता है।

अष्टकवर्ग ही एक ऐसी पद्धति है जिसमें ग्रहों के परस्पर संबंधों को प्रभावशाली ढंग से एक सूत्र में पिरोया गया है। एक ग्रह अपने बल के अनुसार ही कार्य करेगा। इसको मापने की अन्य विधियाँ अपने में विशिष्ट अर्थ रखती हैं परन्तु  इन सभी में एक तथ्य को भुला दिया जाता है कि कोई भी ग्रह शून्य में क्रियाशील नहीं होता है, शेष ग्रह भी आगे-पीछे, निरन्तर क्रियारत होते हैं। इसलिए, कोई भी ग्रह उतना ही कार्य कर पाता ह, जितना अन्य ग्रह उसके लिए संभव बनाते हैं। दूसरे ग्रह या तो उसके काम में सहयोग करते हैं या विरोध। इस तरह से जातक सभी ग्रहों के सामूहिक फल भोगता है। यह केवल अष्टकवर्ग से ही कहा जा सकता है कि यदि किसी राशि में बृहस्पति के पास ७ भिन्नाष्टक और ४२ सर्वाष्टक बिंदुओं का बल है तब इसका अर्थ है कि सभी ग्रहों ने मिलकर बृहस्पति में इतनी अधिक मात्रा में सार्थक बल का विनियोग किया है।

अष्टकवर्ग पर किये गये शोधों से पता चला है कि यदि फलकथन के लिए प्रयोग किये जाने वाली अन्य विद्याओं के साथ-साथ अष्टकवर्ग में प्रयुक्त सर्वाष्टकवर्ग का भी उपयोग किया जाये तो सही निर्णय तक पहुँचने में मदद मिल सकती है।

ग्रहों के विभिन्न राशियों में भ्रमण करने से व्यक्ति विशेष पर शुभाशुभ प्रभाव गोचर फल कहलाता है। इसका विचार जन्म राशि से किया जाता है। वैसे ही अन्य ग्रहों और लग्न से गोचर विचार को अष्टक वर्ग विचार कहा जाता है। अष्टक का अर्थ होता है आठ जिनमे सात ग्रह और जन्म लग्न सम्मिलित हैं। अष्टकवर्ग में राहू-केतु  को छोड़कर शेष सात ग्रह और लग्न सहित आठ को महत्व दिया गया है।

यह सातों ग्रह हर समय गतिमान रहकर अपनी स्थिति बदलते रहते हैं जो शुभ भी हो सकती हैं और अशुभ भी। प्रत्येक ग्रह अपना प्रभाव किसी निश्चित दूरी से दूसरे स्थान पर डालता है।  यदि कोई ग्रह शुभ स्थान व् शुभ योगों में होकर भी शुभ फल नहीं देता हो तो इसका कारण अष्टकवर्ग से सरलता से जाना जा सकता है। जैसे अगर कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में २५ से कम बिंदुओं पर होगा तो अपना शुभ प्रभाव नहीं दे पायेगा।आठों (सात ग्रह और लग्न) से विचार करने पर कोई भी ग्रह अधिक के दृष्टिकोण से शुभ हो तो शुभ और अगर अशुभ हो तो अशुभ। इन प्रभावों को अष्टकवर्ग में महत्व देकर फलित करने की एक सरल विधि तैयार की गयी है। यही अष्टक वर्ग विचार कहलाता है।

वाराहमिहिर के पुत्र पृथुयशो ने भी अपनी पुस्तक होरसारा में लिखा है, "गोचर के द्वारा सामान्य परिणामों को जाना जा सकता है परन्तु सूक्ष्म और शुद्ध परिणाम अष्टकवर्ग के द्वारा ही प्राप्त किये जा सकते हैं।"

सर्वप्रथम पारिभाषिक शब्दों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है:-
  1. रेखा (|) के चार पर्यायवाची शब्द  रेखा, स्थान, फल और कला हैं। बिंदु () के भी चार पर्याय शब्द हैं - करण, बिंदु, दाय और अक्ष। अष्टकवर्ग द्वारा फलादेश जानते समय देखा जाता है कि वहां पर कितनी रेखाएं और बिंदु हैं? शुभफल को प्रायः रेखा (|) से और अशुभफल को बिंदु () से व्यक्त किया जाता है। रेखा और बिंदु केवल शुभ या अशुभ फल के प्रतीक हैं इनमें शुभ या अशुभ फल निहित नहीं है। सूचना के लिए दक्षिण भारत में शुभफल का द्योतक बिंदु को माना जाता है। रेखा को शुभफल की द्योतक और बिंदु को अशुभफल का द्योतक मानते हुए यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के जन्म समय उसकी कुंडली में जिस राशि को रेखाएं प्राप्त हों और उस स्थान पर ग्रह भी हों तो शुभफल होता है। इसी तरह से किसी राशि में बिंदु हों तथा रेखा न हों तो अशुभ फल होता है। किसी राशि में बिंदु और रेखा समान (४-४) संख्या में हों और उसमें साथ ही ग्रह भी विद्यमान हों तो उसका सम (मिश्रित) फल होता है। यदि किसी स्थान पर कुछ भी न हो तो सामान्य (सम) फल होता है।
  2. भिन्नाष्टक वर्ग या सभी सातों ग्रहों का अष्टकवर्ग।
  3. सर्वाष्टकवर्ग - बारहों भावों के प्रत्येक भाव में बिंदुओं का कुल योग। सभी ग्रहों  द्वारा  अपने-अपने भिन्नाष्टक वर्ग में किसी विशेष राशि में दिए गए बिंदुओं का कुल योग एक अन्य वर्ग या कुंडली में दर्शाया जाता है, जिसे सर्वाष्टक वर्ग कहते हैं। 
  4. प्रस्तार चक्र - सारणीबद्ध रूप में यह बारह राशियों में सभी बिंदुओं का कुल योग है।
शुभाशुभ फल का विशेष विचार करने के लिए जन्म लग्न से या चन्द्रमा से जो ग्रह उपचय (वृद्धि) यानि कुंडली के ३, ६, १०, ११वें स्थानों में हों तथा स्वराशि, सवोच्च राशि, मित्र राशि या मूल त्रिकोण राशि में हो तो उसका अष्टक वर्ग जनित फल यदि शुभ हो तो पूर्ण जानना चाहिए। यदि उक्त परिस्थितयों में अशुभ अष्टक वर्ग जन्य फल हो तो अशुभ फल की मात्रा मध्यम होती है। यदि कोई ग्रह जन्म लग्न या चन्द्र से पीड़ा स्थान यानि अपचय (१, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२वें) में स्थित हो तो उसका शुभ फल अल्प होता है तथा अशुभ फल अधिक होता है।

सामान्यतः रेखायुक्त होना शुभ फलदायी होता है किन्तु रेखायुक्त ग्रह भी यदि उपचय स्थान में और स्वोच्चादि राशि में स्थित होगा तो उसका पूर्ण और वैसे ही अपचय स्थानों में होने पर शुभ फल कम हो जाएगा। यही क्रम अशुभ फल के सन्दर्भ में भी अपनाना चाहिए। उपचय स्थानगत ग्रह का फल मध्यम और अपचय स्थानगत ग्रह का अशुभ फल अधिक होता है।

उक्त शुभाशुभ फल अपने दशा परिपाक काल में अथवा गोचर काल में प्रतिफलित होगा। जन्म समय में जो ग्रह बली हो तो गोचर में अपने अष्टक वर्ग जनित फल को और अधिक पुष्ट करके प्रदान करेगा। इसी प्रकार निर्बल ग्रह अपने फल को अपुष्ट रूप से प्रदान करेगा। फल चाहे शुभ या अशुभ कैसा भी हो उसके पुष्टत्व और अपुष्टत्व का विवेक ग्रह के बलाबल के आधार पर करना चाहिए। यदि पूर्ण मंडल वाला चन्द्रमा भी बलहीन होगा तो अवश्य ही अन्य बलहीन ग्रहों की तरह अशुभ फल ही देगा।जन्म के समय जो ग्रह युद्ध में पराजित, अस्तंगत, कम रश्मियों वाला, नीचराशि में स्थित, शत्रुस्थानगत, शत्रुग्रह से दृष्ट और अल्प बिम्ब वाला होगा, वह अष्टक वर्ग जन्य अशुभ फल को अधिक परिपुष्ट करके प्रदान करेगा।

अष्टकवर्ग (भाग - 2)

सर्वाष्टकवर्ग  

सर्वाष्टकवर्ग का विश्लेषण ग्रहों के विश्लेषण जितना ही आवश्यक है। सर्वाष्टकवर्ग फलित ज्योतिष में भविष्य - कथन के लिए प्रामाणिक ही नहीं अपितु विश्वसनीय भी है।

किसी भी भाव में २५ से कम बिंदु अनुकूल परिणाम देने में समर्थ नहीं होते। अगर बिंदुओं की संख्या ३० से अधिक हो तो शुभ परिणाम अपेक्षित हैं। अगर किसी भी भाव में बिंदुओं की संख्या ३० से अधिक हो तो उस भाव का परिणाम पूर्ण रूप से प्राप्त किया जा सकता है। उच्च राशि, त्रिकोण, उपचय आदि कम बिंदुओं में  होने से प्रभावहीन या निष्फल हो जाते हैं।


कुल ३३७ सर्वाष्टक बिंदुओं को १२ से भाग देने पर औसत लगभग २८ आता है। अतः २८ वह औसत अंक है जिससे तुलना करने पर किसी भाव में बिंदुओं का कम या अधिक होना माना जा सकता है। 

सामान्य सिद्धांत  
  1. कोई  भी राशि या भाव जहाँ २८ से अधिक बिंदु हों, शुभ फल देगा। जितने अधिक बिंदु होंगे फल उतना ही अच्छा होगा। इसके विपरीत उन भाव या राशियों में जिनमे २८ से कम बिंदु होंगे, अशुभ फल मिलेंगे। व्यवहार में २५ से ३० के बीच बिंदुओं को सामान्य फलदायी ही माना जाता है। दूसरे शब्दों में यही कहा जायेगा कि यदि बिंदु ३० से ऊपर हों तभी कोई भाव/राशि विशेष शुभ फल देगी।
  2. वह ग्रह प्रभावित हो जाता है जो भाव/राशि में स्थित है जहां बिंदु कम हैं , चाहे वह स्थान उसका उच्च, स्वक्षेत्री, केन्द्र या त्रिकोण ही क्यों न हो, और चाहे वह लग्न से उपचय (३, ६, १०, ११) स्थानों में ही क्यों न स्थित हो। तात्पर्य यह है कि इस ग्रह को अन्य ग्रहों से समर्थन नहीं मिल रहा।
  3. इसके विपरीत वे ग्रह भी शुभ फल देंगे जो अपने नीच स्थानों में अथवा दुःस्थानों, जैसे ६, ८, १२ में हों, किंतु वहां बिंदु अधिक हों। कुछ विद्वानों का मत इससे भिन्न हैं।
  4.  यदि नवें, दसवें, ग्यारहवें और लग्न - इन सभी में ३० से अधिक बिंदु हों तो जातक का जीवन समृद्धिपूर्ण होगा। इसके विपरीत यदि इन भावों में २५ से कम बिंदु हों तो जातक को रोग और बेबसी की ज़िन्दगी भोगनी पड़ेगी।
  5. यदि ग्यारहवें घर में दसवें घर से ज़्यादा बिंदु हों और ग्यारहवें घर में बारहवें घर से ज़्यादा, साथ ही लग्न में बारहवें घर से ज़्यादा बिंदु हो तो जातक सुख-समृद्धि का जीवन भोगेगा।
  6. जातक भिखारी का जीवन जियेगा यदि लग्न, नवम, दशम और एकादश स्थानों में मात्र २१ या २२ या और कम बिंदु हों और त्रिकोण स्थानों में अशुभ ग्रह बैठे हों। 
  7. यदि चन्द्रमा सूर्य से निकट होने के कारण पक्षबल से रहित हो, चन्द्र राशि के स्वामी के पास कम बिंदु (जैसे २२) हों और उसे शनि देखता हो तो जातक पर दुष्टात्माओं का प्रभाव रहेगा। यदि राहु भी चन्द्रमा पर प्रभाव डाल रहा हो तो इस परिणाम में कोई संशय नहीं रहेगा।
  8. जब-जब कोई अशुभ ग्रह ऐसे भाव पर गोचर वश विचरण करेगा जिसमे २१ से कम बिंदु हों तो उस भाव से संबंधित फलों की हानि होगी।
  9. इसके विपरीत, जब कोई ग्रह किसी ऐसे घर में विचरण करता है जहाँ ३० से अधिक बिंदु हों तो उस भाव से संबंधित शुभ फल मिलेंगे जो उस ग्रह के कारकत्व और और संबंधित कुंडली में उसे प्राप्त भाव विशेष के स्वामित्व के अनुरूप होंगे।
  10. इसी तरह ग्रह जिन राशियों के स्वामी होते हैं और जिन राशियों/भावों में वे स्थित होते हैं, उन स्थानों से संबंधित अच्छे फल वे अपनी दशा-अन्तर्दशा में देंगे। सूक्ष्मतर विश्लेषण के लिए दशा-स्वामी के भिन्नाष्टक वर्ग का अध्ययन करना चाहिये।
  11. जिस भाव में ३० से अधिक बिंदु हों और एक साथ कई ग्रह उसमें गोचरवश विचरण कर रहे हों तो उस अवधि में वे उस भाव के शुभ फलों को कई गुणा कर देंगे। फलों का स्वरुप इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित भाव कौन सा है और गोचर के ग्रहों का मूल लग्न में स्थान कहाँ है और उनके कारकत्व क्या है।
  12. जब (किसी विशेष दिन) उस राशि का उदय हो रहा हो जिसमें न्यूनतम बिंदु हैं और उस दिन चिकित्सकों से सलाह करके रोग का उपचार प्रारम्भ किया जाये तो जल्दी स्वास्थ्य-लाभ मिलने की संभावना होती है। उसी तरह उस समय में यदि ऋण लिया जाये तो उसे चुकाने की क्षमता भी जल्दी ही अर्जित हो जाती है।
  13. किसी विवाह के सुखी और सफल होने के लिए वर और वधू की चन्द्र राशियों के बिंदु एक दूसरे की जन्म कुंडलियों में ३० से अधिक होने चाहियें।
  14. जन्म लग्न एवं उससे दूसरे, चौथे, नवें, दसवें और ग्यारहवें भाव के बिंदुओं का योग करें। यदि यह योग १६४ से अधिक है तो जातक समृद्ध होगा। संख्या १६४ को 'वित्ताय' कहते हैं जो वित्तीय समृद्धि का द्योतक है।
  15.  इसी तरह छठे, आठवें और बारहवें घर के बिंदुओं का योग करें। यदि यह योग ७६ से काम आये तो आय व्यय से अधिक होगी। संख्या ७६ को तीर्थ का नाम दिया गया है।
  16. प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम एवं दशम भाव के बिंदुओं का योग करें। ये भाव जातक में अंतर्मुखी प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह योग यदि शेष छः भावों (बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के द्योतक) के बिंदु योग से अधिक है तो जातक संतोषी जीव होगा और ज्ञान-ध्यान, सत्कर्म और दान-पुण्य से आतंरिक शांति पायेगा। विपरीत स्थिति में जातक हमेशा अपने से बाहर सुख ढूंढेगा जिसके कारण उसका मन लालच, छल-कपट, झूठे दिखावे और अहंकार से ग्रस्त रहेगा। 
  17. कुंडली के बारह भावों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है। (क) बंधु - प्रथम, पंचम एवं नवम भाव  (ख) सेवक - द्वितीय, षष्ठ एवं दशम भाव (ग) पोषक - तृतीय, सप्तम एवं एकादश भाव (घ) घटक - चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव। 

तीव्र फलोदय का सिद्धांत :- 

विभिन्न भावों में सर्वाष्टक बिंदुओं की तुलना करें। यदि घर में न्यूनतम बिंदु हैं और उससे अगले घर में अधिकतम, तो जातक जीवन में अचानक ऊपर उठेगा। यदि दोनों अंकों में अंतर काफी ज़्यादा हुआ तो जातक उतनी ही अधिक तीव्र उन्नति का अनुभव करेगा। इसके विपरीत यदि एक घर से दूसरे घर में अधिकतम बिंदुओं से न्यूनतम बिंदुओं की गिरावट हो तो जातक जीवन के किसी या कुछ क्षेत्रों में हानि का सामना करेगा। जहाँ इन घरों में न्यूनतम और अधिकतम बिंदुओं का अंतर मामूली होगा वहां जातक करीब-करीब एक-सी और धीमी प्रगति का अनुभव करेगा। यदि इस तरह के तीव्र अंतर कई भावों के बीच होंगे तो जातक का सारा जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहेगा - यानि कभी राजा तो कभी रंक।

त्वरित भविष्यवाणियों के लिए सर्वाष्टकवर्ग विधि का एक सिद्धान्त अत्यंत लोकप्रिय है :-
  1. यदि एकादश भाव में दशम भाव से अधिक बिंदु हो तो जातक अपेक्षाकृत कम प्रयासों से अधिक लाभ पाएगा। मुख्यतः लग्न से एकादश भाव के सन्दर्भ में यह नियम लागू किया जाता है, लेकिन अन्य भावों से एकादश भाव के संदर्भ में भी इस नियम का उपयोग किया जा सकता है। 
  2. अगर इस स्थिति के विपरीत जातक का बारहवां भाव दूसरे भाव से अधिक प्रबल हो तो इसका अभिप्राय आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में यही होगा कि वह अपने पारिवारिक व्यवसाय में न लग कर, विदेश में अपना भाग्य आजमायेगा और वहां उस पर लक्ष्मी की कृपा होगी। कौन सा परिणाम कहाँ लागू होगा, यह देखने के लिये जन्म कुंडली में दूसरे योगों को भी देखना होगा।
  3. यदि बारहवें भाव में ग्यारहवें से अधिक अंक हों तो इसका अभिप्राय कोई एक हो सकता है, जैसे (क) आय से अधिक व्यय, जिसका परिणाम होगा कर्ज में डूबना  (ख) विदेशी स्रोतों से आय, यह स्थिति उन लोगों की जन्म कुंडलियों में देखी जाती है जिनके सितारे मातृभूमि से बाहर किसी देश में चमकते हैं। ऐसे में चतुर्थ भाव और उसके स्वामी का का किंचित पीड़ित होना लगभग अनिवार्य होता है।
  4. यदि दूसरे भाव में बारहवें भाव से अधिक बिंदु हों तो जातक में आमोद-प्रमोद पर व्यय करने के बजाय धन को जोड़ने की प्रवृत्ति अधिक होगी। ऐसे लोग कभी जल्दबाज़ी में ख़रीदारी नहीं करते बल्कि बारीकी से मोलभाव करते हैं। दो स्थानों के बिंदुओं में अंतर जितना ज़्यादा होगा यह प्रवृत्ति उतनी ही उत्कृष्ट रूप से सामने आयेगी।

Wednesday, March 27, 2019

ज्योतिष शास्त्र के कुछ अन्य सांकेतिक शब्द

ज्योतिष शास्त्र के कुछ सांकेतिक शब्दों का एक लेख सितम्बर २०१५, में भी प्रकाशित किया जा चुका है। यह लेख उसी का विस्तार है जिसमें कुछ अन्य पारिभाषिक शब्दों की चर्चा की गई है। इससे भारतीय ज्योतिष को ना केवल समझने और जानने में सहजता का अनुभव होगा अपितु  कुंडली बनाने और उसका फलादेश करने में भी सहायता होगी :-

इष्टकाल - सूर्योदय से जन्मकाल तक के घट्यादि काल को इष्टकाल कहा जाता है।

सूर्योदय - यह समय हर स्थान के लिए भिन्न होता है अतः इसे हम पंचांग से जान सकते हैं जहाँ यह स्थानीय, मानक अथवा दोनों का ही उपलब्ध रहता है। 

जन्म समय - यह जातक के जन्म का समय होता है। इसे घण्टा-मिनट में व्यवहार किया जाता है।

घटी - घटी, दण्ड, घड़ी, नाड़ी आदि तुल्यार्थ बोधक शब्द हैं। एक अहोरात्र में ६० घड़ी माना गया है। अतः १ घंटे में २.३० घटी/पल होता है। ६० विपल का एक पल, ६० पल की एक घड़ी, ६० घड़ी का एक अहोरात्र होता है।

भयात - यह नक्षत्र का वह समय है जो नक्षत्र के प्रारम्भ काल से जातक के जन्म काल तक व्यतीत होता है।

भभोग - यह नक्षत्र के सम्पूर्ण स्पष्ट भोग काल का नाम है।

ग्रहस्पष्ट - जन्म या प्रश्न के समय ग्रहों की आकाशीय वास्तविक स्थिति, जो राशि, अंश, कला, विकला अदि के रूप में साधन करनी होती है।

मध्यम मान - स्पष्ट मानों का माध्य अर्थात् औसत मान को कहा जाता है। जैसे तिथि का औसत भोगमान ६० घड़ी, वैसे ही नक्षत्र, योग आदि का भी तुल्य ही औसत भोग मान होता है।

सावन दिन या वार - सूर्योदय से अन्यतम सूर्योदय तक के काल को सावन दिन या वार कहा जाता है, जिसे ही लोग रवि, सोम अदि सात वारों के नाम से जानते हैं।

भाव - जन्म कुंडली में १२ भाव होते हैं जिन्हें क्रम से तनु, धन, सहज, सुख, सुत, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय और व्यय कहा जाता है।

लग्न - इसे जन्म लग्न भी कहते हैं। यह कुंडली का पहला भाव होता है। जन्म के समय पूर्व क्षितिज में जो राशि प्रथम उदित होती है उसे लग्न कहा जाता है।

लग्न-स्पष्ट - लग्न के जितने राशि, अंश, कला, विकला आदि पर जन्म हो, उसे लग्न स्पष्ट कहते हैं।

क्रांतिवृत्त - इसे राशि-मंडल भी कहते हैं। आकाश गोल में अपनी गति से चलने का जो सूर्य का मार्ग है, उसी को क्रांतिवृत्त कहा जाता है।

मानक समय - सम्प्रति यूरोप महादेशीय ग्रीनविच नाम के स्थान से गुजरती भूमध्य रेखा से पूर्व ८२/३० अंश-कला रेखांश के स्थानिक समय को सम्पूर्ण भारत के लिए मानक समय (स्टैण्डर्ड टाईम) माना गया है।

स्थानिक समय - जब जिस स्थान के खमध्य में सूर्य, भ्रमण वश पहुँचता है, वह उस स्थान का दिनार्द्ध होता है। जिसे दिन-मध्य भी कहा जाता है। दिन-मध्य से पूर्व सूर्योदय तथा बाद में सूर्यास्त होता है। दिन मध्य या दिनार्द्ध का दो गुणा दिनमान और दिनमान का पाँचवाँ भाग स्थानिक सूर्यास्त घण्टा-मिनट होता है।सूर्यास्त काल को १२ में से निकाल देने पर सूर्योदय घण्टा-मिनट हो जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पंचांग में इन्हे (दिनमान, सूर्योदय व सूर्यास्त को लिखने की परम्परा है।) यह प्रत्येक स्थान का भिन्न होता है। इसलिए ऐसे समय को स्थानिक समय (Local Time) कहा जाता है।

रेखांश - ग्रीनविच नामक स्थान को सम्प्रति भूमध्य माना गया है और भूमध्य रेखा पर जो स्थान जिस अंश-कला पर स्थित होता है, सम्पूर्ण विश्व के उस-उस स्थान का उसे रेखांश कहा जाता है। इस प्रकार ग्रीनविच को भूमध्य के 0 अंश पर स्थित मानकर उससे पूर्व और पश्चिम में स्थित स्थानों का रेखांश सर्वेक्षण द्वारा नियत कर मानचित्र में विधिवत् दर्शाया गया रहता है।

अक्षांश - भूगोल ध्रुवों द्वारा दो भागों में विभक्त माना गया है - एक उत्तरी और दूसरी दक्षिणी। ध्रुव से ९० अंश की दूरी पर निरक्ष देश स्थित माना गया है। मानचित्र में प्रायः तिरछी रेखाओं द्वारा अक्षांश का संज्ञापन करते हुए उत्तर तथा दक्षिण स्थान का प्रदर्शन किया हुआ रहता है। इसका उपयोग दो स्थानों के दक्षिणोत्तर अन्तरांश को जानने के लिए किया जाता है। निरक्ष देश पर से गई हुई रेखावृत्त विषुवत् वृत्त कहलाती है, जिससे भूगोल उत्तर अक्षांश और दक्षिण अक्षांश सम्बन्धी देशों में बँटा हुआ माना जाता है।

चरान्तर साधन - जन्म स्थान और पंचांग स्थान के चरों का अंतर चरान्तर होता है। अतः दोनों स्थानों का चर साधन करना पड़ता है। जन्म स्थान का चर अधिक होने पर चरान्तर घन अन्यथा ऋण जानना चाहिए अथवा घन या ऋण चरान्तर का निर्णय इस प्रकार करना चाहिए - जन्म स्थान के अक्षांश से पंचांग स्थान का अक्षांश कम हो तथा उत्तराक्रान्ति हो, तो घन चरान्तर, इसी तरह जन्मस्थान के अक्षांश से पंचांग स्थान का अक्षांश अधिक और दक्षिणक्रान्ति हो, तो भी घन चरान्तर जानना चाहिए बाकि अन्य स्थितियों में चरान्तर ऋण होगा।

अयनांश  - पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करने के साथ-साथ अपनी धुरी पर भी लट्टू की तरह घूमती रहती है। जिसके फलस्वरूप इसकी धुरी के केन्द्र बिंदु एक जगह स्थिर नहीं रहते हैं, अपितु एक प्रकार का वृत्त बनाते हैं। यह प्रतिवर्ष करीब-करीब ५० विकला से अधिक के हिसाब से पूर्व स्थान से खिसकते हैं और ३६० अंश की पूर्ण परिक्रमा २५,८०० वर्षों में पूरी करते हैं।    

Friday, December 30, 2016

षोडश योग

षोडश योगों के विचार के बिना वर्ष कुंडली का अध्ययन अधूरा ही रहता है। षोडश यानि सोलह योगों का निर्माण लग्नेश तथा कर्मेश की पारस्परिक स्थिति के आधार पर बनता है। वर्ष लग्न पद्धति मूलतः यवनों में प्रचलित थी। उन्हीं के द्वारा भारत में लाई जाने के कारण इन योगों के नाम अरबी-फ़ारसी भाषा के ही हैं।
वर्ष कुंडली में निम्न सोलह योग बहुत ही महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं:-
इक्कबाल योग  - यदि वर्षकुण्डली में सभी ग्रह केन्द्र (१, ४, ७, १०) तथा पणफर (२, ५, ८, ११) स्थानों में (अष्टम स्थान को छोड़कर) पड़े हों यानि ३, ६, ८, ९, व १२वें स्थान में कोई ग्रह न हो तो इक्कबाल योग होता है। यह योग सुख, यश, धन, प्रगति, संतान-प्राप्ति एवं भाग्यवृद्धि का परिचायक है।

इन्दुवार योग - वर्षकुण्डली में सभी ग्रह आपोक्लिम (३, ६, ९, १२) स्थानों में हों तो इन्दुवार योग होता है। इस योग के होने से सामान्य सुख की प्राप्ति होती है, परन्तु वर्ष-भर चिंता व परेशानी बनी रहती है। 

इत्थशाल योग - इस योग को समझने के लिए ग्रहों की गति एवं राशिगत अंशों पर ध्यान देना होगा। कुछ ग्रह शीघ्रगामी होते हैं तो कुछ मंदगति। मंदगति ग्रह के राशिगत अंश अधिक हों और शीघ्रगति ग्रह के अंश कम हों, वर्ष के मध्य किसी भी समय शीघ्रगति ग्रह अधिक अंश चल कर मन्दगति ग्रह के अंश के बराबर जायें तो इस प्रकार शीघ्रगति ग्रह मंदगति ग्रह को उसके अंश के बराबर पहुँच कर उसे अपना तेज देता है। इसे इत्थशाल योग कहते हैं।  
 
उदहारण - सूर्य ३ राशि ८ अंश तथा मंगल ३ राशि १२ अंश पर हैं, सूर्य १ दिन में १ अंश चलता है। मान लीजिये मंगल की उस समय की चाल ४५ कला प्रतिदिन है। १६ दिन में सूर्य १६ अंश चल कर ३ राशि २४ अंश हो जायेगा तथा मंगल १६ दिन में १६ x ४५ = ७२० कला या १२ अंश आगे बढ़कर ३ राशि २४ अंश हो जायेगा। 
 
परन्तु इत्थशाल योग में कुछ दशाएं आवश्यक हैं -
 
क)  दोनों ग्रहों में से एक लग्नेश होना चाहिये।
ख) दोनों ग्रह एक-दूसरे को देखते हों। 
ग) दोनों ग्रह दीप्तांश के भीतर हों। 
 
दोनों  ग्रहों में मूलतः ३० कला से कम का अंतर हो तो पूर्ण इत्थशाल योग बनता है। लग्नेश का प्रत्येक भाव के स्वामी के साथ इत्थशाल हो सकता है। जिस भावेश (कार्येश) का लग्नेश के साथ इत्थशाल होगा, उस भाव का फल वर्ष में अवश्य घटित होगा। षष्ठेश, अष्टमेश, तथा द्वादशेश का लग्नेश से इत्थशाल हो तो वर्ष में इन भावों से सम्बन्धित अशुभ घटनाएं (रोग, मृत्यु, व्यय, शत्रुभय) अधिक होंगी। इसके विपरीत द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश, व एकादशेश से इत्थशाल होना शुभ है। 
 
इसराफ़ योग - यह इत्थशाल योग से विपरीत है। इसके अन्तर्गत तीन आवश्यक दशाएं तो वे ही हैं जो इत्थशाल योग में हैं परन्तु तीव्रगामी ग्रह के अंश मन्द ग्रह से अधिक होते हैं, जिससे तीव्रगामी ग्रह मन्दगति ग्रह से अधिक दूर होता चला जाता है। अशुभ भावों के स्वामी से इसराफ़ योग शुभ होता है क्योंकि इसराफ़ योग अशुभ भावों के अशुभ फल की हानि (नष्ट) करता है, जैसे रोग-हानि, मृत्यु-हानि व व्यय-हानि यानि रोग न हो, मृत्यु न हो, व्यय न हो आदि। शुभ भावों के स्वामी से भी इसराफ़ योग इतना हानिकारक नहीं है। 
 
नक्त योग - जिस भाव के सम्बन्ध में विचार करना हो, उस भाव का स्वामी (कार्येश) व लग्नेश एक-दूसरे को न देखते हों, परन्तु इन दोनों के बीच में एक तीव्रगामी ग्रह हो, जो दोनों को देखता हो, बीच वाला ग्रह पीछे वाले ग्रह से तेज ले कर आगे वाले ग्रह को देता है। इस योग को नक्त योग कहते हैं। इससे कार्यसिद्धि किसी अन्य व्यक्ति के सहयोग से होती है। 
 
यमय योग - इस योग में लग्नेश व कार्येश दीप्तांश के भीतर हो, पर दृष्टि न हो। इन दोनों के बीच में तीसरा मंद ग्रह हो, जो दोनों को देखता हो। यह मंद ग्रह पीछे वाले ग्रह से तेज लेकर आगे वाले ग्रह को देता है। इससे भी कार्य तीसरे व्यक्ति के सहयोग से होता है। 
 
मणऊ योग - लग्नेश व कार्येश के इत्थशाल में बाधा डालने वाला योग मणऊ योग है। शनि या मंगल, जिसकी दोनों में से एक पर शत्रु दृष्टि हो तथा उनके दीप्तांश के भीतर हो तो यह पाप ग्रह इत्थशाल योग में खलनायक का कार्य करता है। यह योग अशुभ एवं कार्यनाशक है। 
 
कम्बूल योग - जब लग्नेश व कार्येश का इत्थशाल हो और चंद्रमा दोनों में से किसी एक से भी इत्थशाल करे तो कम्बूल योग होता है। यदि दोनों ग्रह उच्च या स्वराशिस्थ हों तो उत्तम कम्बूल योग तथा दोनों नीच या शत्रुक्षेत्री हों तो अधम कम्बूल योग, परन्तु एक उच्च या स्वक्षेत्री और एक नीच या शत्रुक्षेत्री और एक नीच या शत्रुक्षेत्री हो तो माध्यम कम्बूल योग होता है। 
उत्तम कम्बूल  योग लग्नेश और कार्येश के इत्थशाल योग के शुभ फल की वृद्धि करता है। 
 
गैर कम्बूल योग -  जब चन्द्रमा लग्नेश कार्येश को नहीं देखता हो, अपनी राशि के अंतिम अंशों में हो और अपनी राशि में जाकर किसी अन्य (गैर) बली ग्रह से कम्बूल करे तो गैर कम्बूल योग होता है। यह योग भी तीसरे व्यक्ति की सहायता से कार्यसाधक है। 
 
खल्लासर योग - लग्नेश और कार्येश में इत्थशाल हो, पर चन्द्रमा शून्यमार्गी (वह ग्रह जो न उच्च का है न नीच का, न शुभ ग्रह दृष्ट हो न ही अशुभ ग्रह दृष्ट हो न मित्र ग्रही हो और न शत्रु ग्रही हो, यानि एकाकी असम्बद्ध हो) हो, लग्नेश या कार्येश से कम्बूल न करे और न ही किसी अन्य ग्रह से गैर कम्बूल करे तो या योग खल्लासर कहलाता है। यह योग कार्य को बिगाड़ने वाला होता है। 
 
रद्द योग - यदि लग्नेश अथवा कार्येश जिनका इत्थशाल हो, वक्री, अस्तंगत, नीच अथवा ६, ८, १२वें घर का स्वामी हो तो वह कार्य को नष्ट (रद्द) करता है। यह योग प्राणघातक, शत्रुओं को बढ़ाने वाला एवं उन्नति में बाधक है। 
 
दुफालि कुत्थ योग - इत्थशाल करने वाले लग्नेश व कार्येश में से मंदगति ग्रह बली (उच्च, स्वराशिस्थ, वर्गोत्तम) हो, पर तीव्रगामी ग्रह में ये गुण न हो (निर्बल हो) तो यह योग होता है। इसमें भी कार्यसिद्धि होती है, पर सफलता की गति धीमी होती है। 
 
दुत्थ कुत्थीर योग - यदि लग्नेश व कार्येश में इत्थशाल होते हुए भी दोनों निर्बल हों तो दुत्थ कुत्थीर योग होता है। इसमें भी तीसरे व्यक्ति की सहायता से कार्य होता है।  
 
तम्बीर योग - जब लग्नेश व कार्येश में इत्थशाल न हो, उनमें से एक ग्रह राशि के अंतिम अंशों में रह कर अगली राशि में किसी बली ग्रह से इत्थशाल करे तो तम्बीर योग होता है। इससे वर्ष में सुख-शान्ति बढ़ती है। 
 
कुत्थ योग - वर्षकुण्डली में जब लग्नेश व कार्येश केन्द्र तथा पणफर में स्थित हो, पंचवर्गी तथा हर्ष बल के अनुसार बली हो तो कुत्थ योग होता है। इस योग से वर्ष में सफलता, उन्नति तथा हर्ष होता है। 
 
दुरुफ योग - यह कुत्थ योग से विपरीत है। जब वर्षकुण्डली में सभी ग्रह आपोक्लिम में स्थित हों या पंचवर्गी हर्ष बल के अनुसार निर्बल हों तो दुरुफ योग होता है। यह योग वर्ष भर संताप देने वाला, कष्टदायक तथा प्राणघातक है।
इस प्रकार वर्षकुंडली का फलादेश करते समय उक्त सोलह योगों पर विचार करना भी आवश्यक है। 

यह अनमोल कृति ज्योतिष के विद्वान "श्री रघुनन्दनप्रसाद जी" की अनमोल कृति है जिसका प्रकाशन इस ब्लॉग के पड़ने वालों के ज्योतिष-ज्ञान में वृद्धि के लिए किया गया है। 

Sunday, August 14, 2016

ग्रहों की अवस्थाएं

राशि, अंशों, भावों तथा पारस्परिक सम्बन्धों के अनुसार ग्रहों की भिन्न-भिन्न प्रकार से अवस्थाएं मानी गयी हैं। ग्रह अपनी अवस्थानुसार ही फल देते हैं। ग्रहों की अवस्था का वर्गीकरण निम्नानुसार है:-

१. अंशों के आधार पर अवस्था 

अंशों के आधार पर ग्रहों को पांच आयुवर्गों में बांटा गया है। विषम राशियों में बढ़ते हुए अंशों में बालक से मृत तथा सम राशियों में घटते हुए अंशों में बालक से मृत के क्रम में ग्रहों की आयु मानी गयी है। 

क)  ग्रह विषम राशियों में ६° तक बालक, ६° से १२° तक कुमार, १२° से १८° तक युवा, १८° से २४° तक वृद्ध तथा २४° से ३०° तक मृत अवस्था में रहता है। 

ख) ग्रह सम राशियों में ३०° से २४° तक बालक, २४° से १८° तक कुमार, १८° से १२° तक युवा, १२° से ६° तक वृद्ध तथा ६° से नीचे मृत अवस्था में होता है। 

इस वर्गीकरण को नीचे दिये गए चक्र में दर्शाया गया है :-


बाल्यावस्था में ग्रह का फल कम, कुमारावस्था में आधा, युवावस्था में पूर्ण, वृद्धावस्था में कम तथा मृतावस्था में नगण्य रहता है। 

२. चैतन्यता के आधार पर अवस्था 

क)
 विषम राशि में ग्रह १०° तक जागृत, १०° से २०° तक स्वप्न तथा २०° से ३०° तक सुषुप्तावस्था में रहते हैं।

ख)  सम राशि में ग्रह १०° तक सुषुप्त, १०° से २०° तक स्वप्न तथा २०° से ३०° तक जागृत अवस्था में रहता है।


ग्रह की जागृत अवस्था कार्यसिद्धि करती है, स्वप्नावस्था मध्यम फल देती है तथा सुषुप्तावस्था निष्फल होती है।

३. दीप्ति के अनुसार अवस्था

क)  दीप्त - उच्च राशिस्थ ग्रह दीप्त कहलाता है। जिसका फल कार्यसिद्धि है।

ख ) स्वस्थ - स्वगृही ग्रह स्वस्थ होता है, जिसका फल लक्ष्मी व कीर्ति प्राप्ति है।

ग) मुदित - मित्रक्षेत्री ग्रह मुदित होता है, जो आनन्द देता है।

घ) दीन - नीच राशिस्थ ग्रह दीन होता है, जो कष्टदायक होता है।

ड़ ) सुप्त - शत्रुक्षेत्री ग्रह सुप्त होता है, जिसका फल शत्रु से भय होता है।

च) निपीड़ित - जो ग्रह किसी अन्य ग्रह से अंशो में पराजित हो जाये उसे निपीड़ित कहते हैं, यानि एक ग्रह की गति तीव्र हो तथा वह किसी दूसरे ग्रह से कम अंशों पर उसी राशि में हो, परन्तु गति वाला ग्रह उस ग्रह के बराबर अंशों में आगे आकर बढ़ जाए तो पीछे रहने वाला ग्रह पराजित अथवा निपीड़ित ग्रह कहलाता है, जिसका फल धनहानि है।

छ) हीन - नीच अंशोन्मुखी ग्रह हीन कहलाता है, जिसका फल धनहानि है।

ज) सुवीर्य - उच्च अंशोन्मुखी ग्रह सुवीर्य कहलाता है, जो सम्पत्ति वृद्धि करता है।

झ) मुषित - अस्त होने वाले ग्रह को मुषित कहते हैं, जिसका फल कार्यनाश है।

ञ) अधिवीर्य - शुभ वर्ग में अच्छी कांति वाले ग्रह को अधिवीर्य कहते हैं, जिसका फल कार्यसिद्धि है।

४. क्षेत्र, युति तथा दृष्टि के आधार पर अवस्था 

क) लज्जित - पंचम स्थान में राहु-केतु के साथ अथवा सूर्य, शनि या मंगल के साथ अन्य ग्रह लज्जित होता है।

ख ) गर्वित - उच्च राशि या मूल त्रिकोण का ग्रह गर्वित होता है।

ग) क्षुधित - शत्रु के घर में, शत्रु से युक्त अथवा दृष्ट अथवा शनि से दृष्ट ग्रह क्षुधित होता है।

घ) तृषित - जल राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) में शत्रु से दृष्ट, परन्तु शुभ ग्रह से दृष्ट न हो तो ग्रह तृषित कहलाता है।

ड़ ) मुदित - मित्र के घर में, मित्र से युक्त, अथवा दृष्ट अथवा गुरु से युक्त ग्रह मुदित कहलाता है।

च) क्षोभित - सूर्य से युक्त, पाप या शत्रु से दृष्ट ग्रह क्षोभित कहलाता है।

फल -

क) जिस भाव में क्षुधित या क्षोभित ग्रह हों उस भाव की हानि करते हैं।

ख) गर्वित या मुदित ग्रह भाव की वृद्धि करते हैं।

ग) यदि कर्म स्थान में क्षोभित, क्षुधित, तृषित अथवा लज्जित ग्रह हों तो जातक दरिद्र तथा दुःखी होता है।

घ) पंचम स्थान में लज्जित ग्रह संतान नष्ट करता है।

ड़) सप्तम स्थान में क्षोभित, क्षुधित अथवा तृषित ग्रह पत्नी का नाश करता है।

कुल मिला कर गर्वित व मुदित ग्रह एक प्रकार से सुख देते हैं, जबकि लज्जित, क्षुधित, तृषित एवं क्षोभित ग्रह कष्ट देने वाले होते हैं। 

५. सूर्य से दूरी के अनुसार अवस्था 

क) अस्तंगत - सूर्य से युक्त ग्रह (राहु केतु को छोड़कर) अस्त कहलाते हैं। चंद्रमा सूर्य से १२°, मंगल १०°, वक्री बुध १२°, मार्गी बुध १४°, गुरु ११°,  वक्री शुक्र ८°, मार्गी शुक्र १०° तथा शनि १५° की दूरी तक सूर्य की प्रखर किरणों के कारण अस्तंगत होते हैं। ऐसे ग्रहों को मुषित कहते हैं।

ख ) उदयी - सूर्य से उपरोक्त अंशों से अधिक दूर हो जाने पर ग्रह उदय हो जाते हैं।

पूर्वोदयी -  जो ग्रह सूर्य से धीमा हो तथा सूर्य से अंशों में कम हो उसका उदय पूर्व में होता है।

पश्चिमोदयी - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा तीव्र हों तथा सूर्य से अधिक अंशों पर हो, उसका उदय पश्चिम से होता है।

पूर्वास्त - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा तीव्र हों और सूर्य से कम अंशों में हों, उसका अस्त पूर्व में होता है।

पश्चिमास्त - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा धीमा हो और सूर्य से अधिक अंशों में हों, उस ग्रह का अस्त पश्चिम में होता है।

६. गति के अनुसार अवस्था - 

क) सूर्य तथा चंद्रमा सदैव मार्गी रहते हैं। मेष से वृषभ, मिथुन आदि के क्रम में चलने वाले।

ख) राहु और केतु सदैव वक्री रहते हैं। मिथुन से वृषभ आदि के क्रम में चलने वाले।

ग) शेष ग्रह मंगल, बुध, गुरु व शनि सामान्यतः मार्गी होते हैं पर बीच-बीच में वक्री भी हो जाते हैं।

घ) इन ग्रहों की गति  मार्गी से वक्री तथा मार्गी से वक्री होते समय अति मंद हो जाती है।

ड़) यह ग्रह वक्री होने के कुछ दिन पहले व कुछ दिन बाद तक स्थिर दिखाई पड़ते हैं।

इनकी वक्री व स्थिर होने की अवधि निम्नानुसार है:-


वास्तव में कोई ग्रह वक्री या स्थिर नहीं होता  है। पृथ्वी तथा उस ग्रह की पारस्परिक गतियां तथा सूर्य के संदर्भ में उस ग्रह की सापेक्ष स्थिति के सम्मिलित प्रभाव में ऐसा लगता है मानो कोई ग्रह ठहर गया हो या उल्टा चलने लग गया हो।

७, सूर्य से भावों की दूरी के अनुसार अवस्था - 

क ) सूर्य से दूसरे स्थान पर ग्रहों की गति तीव्र हो जाती है।

ख ) सूर्य से तीसरे स्थान पर सम तथा चौथे स्थान पर गति मंद हो जाती है।

ग)  सूर्य से पांचवे व छठे स्थान पर ग्रह वक्री हो जाता है।

घ)  सूर्य से सातवें व आठवें स्थान पर ग्रह अतिवक्री हो जाता है।

ड़ ) सूर्य से नवें व दसवें स्थान पर ग्रह मार्गी हो जाता है।

च)  सूर्य से ग्यारहवें व बारहवें स्थान पर ग्रह पुनः तीव्र हो जाता है।

 क्रूर ग्रह वक्री  होने पर अधिक क्रूर फल देते हैं, परन्तु सौम्य ग्रह वक्री होने पर अति शुभ फल देते हैं। 

Wednesday, August 3, 2016

शनि, राहु और केतु - परिचय


शनि -

शनि का व्यास १,२०,००० किलोमीटर, परिभ्रमण काल १० घंटे ३८ मिनट तथा परिक्रमण काल २९. ४६ वर्ष है। शनि के चारों ओर ७ प्रकाशमान छल्ले हैं।  शनि ग्रह से विचित्र संगीत की भिनभिनाहट की ध्वनि की खोज की गयी है। इसके १७ उपग्रह हैं। शनि एक राशि पर ढ़ाई (२½) वर्ष रहता है।  शनि काला, तमोगुणी, वायु तत्त्व, स्त्री नपुंसक पाप ग्रह है। यह पश्चिम दिशा, संकर जातियों तथा शिशिर ऋतु का स्वामी है। यह  एक ठंडा व शुष्क ग्रह है। शनि अंधकार, दुर्भाग्य, हानि तथा संकट का प्रतीक है, परन्तु इसके बलवान होने पर यह विपत्तियां कम हो जाती हैं।  शनि वायु का अधिपति तथा विपत्ति का अधिष्ठाता है। प्राचीन काल में Satan (शैतान) या Satar (शातिर) के नाम पर इसका नाम Saturn (शनि) पड़ा है। कान, दांत, अस्थियों, वायु रोग व स्नायु से सम्बन्धित रोगों विचार शनि से किया जाता है। अंग्रेज़ी शिक्षा, आयु, जीवन, मृत्यु, शारीरिक बल, उदारता, विपत्ति, प्रभुता, ऐश्वर्य, मोक्ष, जमीन-जायदाद, खानों तथा छठे, आठवें, दसवें व बारहवें भाव का कारक शनि है। बुध और शुक्र शनि के मित्र, गुरु सम, तथा सूर्य, चंद्र और मंगल शत्रु हैं।  शनि तुला राशि में 1°  से 20° तक उच्च, परन्तु  20° पर परमोच्च, मेष राशि में 1° से 20° तक नीच, परन्तु 20° पर परमनीच, कुम्भ राशि में 1° से 20° तक मूलत्रिकोण में व कुम्भ में ही 20° से 30° तक स्वगृही है। यह मकर व कुम्भ राशियों का स्वामी है। इसकी पूर्ण दृष्टि तीसरी, सातवीं तथा दसवीं हैं। 

राहु (Dragon's Head or Ascending Node of the Moon)

चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के साथ 5° का कोण बनाती हुई पृथ्वी की कक्षा को दो विपरीत स्थानों पर काटती है। इन दोनों कटान बिंदुओं को ज्योतिष में छाया ग्रह माना गया है। जिस कटान बिंदु से चंद्रमा पृथ्वी के कक्षा तल से ऊपर आता है, वह राहु (Dragon's Head or Ascending Node of the Moon) कहलाता है। जिस कटान बिंदु से चंद्रमा पृथ्वी के कक्षा ताल से नीचे उतरता है वह केतु (Dragon's Tail or Descending Node of the Moon) कहलाता है। यह दोनों बिंदु एक-दूसरे से 180° दूर है तथा विपरीत दिशा में सरकते हुए दिखाई देते हैं।  यह १८ वर्ष में पुनः उसी स्थान पर आ जाते हैं। पृथ्वी, चंद्रमा व सूर्य के इन बिंदुओं को सीध में आने तथा 5° के कोण का अंतर कम हो जाने पर ग्रहण होते हैं। इसीलिए कहा जाता है राहु चंद्रमा को ग्रस्ता है। राहु तमोगुणी, कृष्णवर्णी तथा पाप ग्रह है। यह कुंडली में जिस स्थान पर बैठता है, उसकी प्रगति को रोकता है। राहु मद का अधिष्ठाता है। राहु लगभग १८ माह तक एक राशि पर रहता है। यह सदैव वक्री रहता है तथा प्रत्येक राशि में इसके अंश कम होते जाते हैं। मिथुन राशि में उच्च 20° पर परमोच्च, धनु राशि में नीच 20° पर परमनीच तथा कुम्भ के 6° तक मूल त्रिकोण में होता है। शुक्र तथा शनि राहु के मित्र तथा सूर्य, चंद्रमा व मंगल शत्रु हैं। इसकी पूर्ण दृष्टि पांचवी, सातवीं, नवीं व बारहवीं है। 

केतु (Dragon's Tail or Descending Node of the Moon) - 

केतु सदैव राहु से 180° दूर रहता है। इसके अंश, कला और विकला समान रहते हैं। केतु धब्बेदार काले रंग का तमोगुणी पाप ग्रह है। हाथ, पैर, पेट व चर्म रोगों का विचार केतु से किया जाता है। केतु धनु राशि में उच्च 20° पर परमोच्च, मिथुन राशि में नीच 20° पर परम नीच तथा सिंह राशि में 6° तक मूल त्रिकोण में होता है। यह भी राहु की तरह वक्री ग्रह है। सिरविहीन होने के कारण यह दृष्टिविहीन भी है। कुछ विद्वान राहु की दृष्टि के समान ही केतु की दृष्टि भी मानते हैं। 

Thursday, July 28, 2016

शनि की साढ़ेसाती एवं ढैय्या

ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। 
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरं ॥ 

शनि ग्रह का भ्रमण, जब साढ़ेसाती की परिधि के भीतर साढ़े सात वर्षों के लिए प्रवेश करता है अथवा करने वाला होता है, तभी इस विषय का ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों को एक अप्रत्याशित भय, भ्रांति तथा भ्रम प्रकंपित करने लगता है। शनि समय के संचालक हैं परंतु इसे भ्रम और भ्रांति ही समझ जाना चाहिए कि शनि की साढ़ेसाती अपार कष्ट देने वाली होती है। 

शनि एक राशि पर ढ़ाई वर्ष के लगभग रहते हैं। शनि की गोचर गति सबसे कम हैं जिस कारण से यह मन्दतम ग्रह कहलाते हैं। इनकी अधिकतम दैनिक गति ७ कला तथा वक्री से मार्गी या मार्गी से वक्री होते समय न्यूनतम गति १ कला प्रतिदिन भी हो सकती है। 

शनि की साढ़ेसाती व ढैया 

साढ़ेसाती

चंद्र लग्न से द्वादश भाव में शनि के आने से शनि की तीसरी पूर्ण दृष्टि द्वितीय (धन) भाव पर, सप्तम दृष्टि षष्ठ (रिपु/यश) भाव तथा दशम दृष्टि नवम (भाग्य व धर्म) भाव पर पड़ती है। लग्न के दोनों ओर द्वादश एवं द्वितीय भाव शनि के दुष्प्रभाव से ग्रसित होने से उनके बीच स्थित लग्न भी दूषित हो जाता है। धन, यश तथा आय भाव तो शनि के कुप्रभाव में आ ही जाते हैं और लग्न के दूषित होने से तन, मन एवं सम्मान पर भी कुप्रभाव पड़ता है। इसी कारण साढ़ेसाती जातक के लिए बहुत कष्टदायक होती है। 


इसी प्रकार चंद्र लग्न में शनि के आने पर शनि की तीसरी दृष्टि पराक्रम भाव पर, सप्तम दृष्टि सप्तम भाव पर तथा दशम दृष्टि दशम (कर्म एवं पिता) भाव पर पड़ती है, जिससे क्रमशः पराक्रम (भ्राता), पत्नी एवं कर्म (पिता) के भाव बिगड़ जाते हैं। 


जब शनि जन्म राशि से द्वितीय भाव में आता है तब शनि की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ, अष्टम व एकादश भावों पर पड़ती है जो क्रमशः सुख, माता, संपत्ति भाव, आयु भाव तथा लाभ भाव हैं। शनि के जन्म राशि से द्वितीय होने से ये तीनो भाव बिगड़ जाते हैं।  


इस प्रकार  साढ़े सात वर्षों में अधिकांश भावों से संबंधित हानि होती है। 

ढैया 

जन्म राशि से शनि के चतुर्थ या अष्टम स्थान पर आने पर छोटी साढ़ेसाती या ढैया होती है। चतुर्थ शनि होने से शनि की तीसरी पूर्ण दृष्टि षष्ठम भाव पर, सप्तम पूर्ण दृष्टि दशम भाव पर तथा दशम पूर्ण दृष्टि लग्न पर पड़ती है, जिससे इन भावों की हानि होती है। इसी प्रकार शनि के जन्म राशि से अष्टम होने से तृतीय पूर्ण दृष्टि दशम पर, सप्तम पूर्ण दृष्टि द्वितीय पर तथा दशम पूर्ण दृष्टि पंचम भाव पर पड़ती है। अतः क्रमशः कर्म, धन तथा संतान पक्ष दुष्ट प्रभाव में आ जाते हैं। कर्क राशि वाले जातक को तुला (चतुर्थ) तथा कुम्भ (अष्टम) राशि में शनि रहते ढैया होगी। 

दक्षिण भारत (विशेष रूप से कर्नाटक) में साढ़ेसाती से भी अधिक दुष्ट प्रभाव पंचम शनि को मानते हैं।  चंद्र लग्न से पंचम (पुत्र भाव) शनि की पूर्ण दृष्टि सप्तम, एकादश व द्वितीय भावों पर पड़ती है। यदि इस अवधि में शनि नीच, अस्तंगत, शत्रुक्षेत्री तथा पाप ग्रह से युक्त व दृष्ट हो तो अत्यंत वैभवशाली व्यक्तियों को भी फूटे मटके में खाना खिलाता है। 

शनि की साढ़ेसाती सभी के लिए अनिष्टकारक नहीं 

शनि की साढ़ेसाती या ढैया सभी व्यक्तियों के लिए अथवा पूरी अवधि के लिए अनिष्टकारक नहीं होती है।  शनि के गोचर विचार की एक विधा यह भी है कि शनि के साढ़ेसाती या ढैया में प्रवेश करते समय चंद्रमा किस राशि में है, इसका प्रभाव शनि के प्रभाव पर पड़ता है। इसे शनि का चरण विचार कहते हैं।  

यदि शनि के साढ़ेसाती या ढैया में प्रवेश करते समय चंद्रमा जन्म राशि से १, ६ या ११वें स्थान (राशि) में हो तो स्वर्णपाद साढ़ेसाती कहलाती है। यदि चंद्रमा २, ५ या  ९ में हो तो रजतपाद तथा यदि ३, ७ या १० में हो तो ताम्रपाद और ४, ८ या १२ में होने पर लौहपाद साढ़ेसाती कहलाती है। 

स्वर्णपाद पर साढ़ेसाती प्रारम्भ हो तो सब प्रकार का सुख मिलता है। रजतपाद में भाग्य अच्छा रहता है।  ताम्रपाद में सामान्य स्थिति रहती है तथा लौहपाद साढ़ेसाती में धन का नाश होता है। 

साढ़ेसाती अवधि में शनि जिन राशियों में से गुजरेगा उनके नक्षत्रों के स्वामियों के साथ यदि शनि की मित्रता या समता है तो शनि अधिक हानि नहीं करेगा। यदि उन नक्षत्रों के स्वामियों से शनि की शत्रुता है तो अधिक हानि करेगा। 

यदि जन्मकुंडली में शनि उच्च, स्वराशि या मित्रराशि में हों तो ६, ८ या १२ (दुःस्थानों) में स्थित होते हुए भी शनि हानिकारक नहीं होता। परंतु शनि नीच राशिस्थ, अस्तंगत या शत्रुक्षेत्री होने पर अधिक अशुभ फल देता है। इसी प्रकार गोचर में भी उच्च अथवा नीच राशिस्थ होने पर भी फल में अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि शनि पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो उसका फल अधिक अशुभ होता है। इसके विपरीत यदि उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उसके अशुभ फल में कमी आ जाती है। 

साढ़ेसाती जातक को प्रायः हानि ही करती है किसी को प्रारंभ में, किसी को मध्य में तो  किसी को अंत में। 

Wednesday, July 27, 2016

उच्च-नीच ग्रह

ग्रहों के उच्च-नीच  के बोध से कुंडली का फलादेश स्पष्ट रूप से किया जा सकता है। प्रायः उच्च का ग्रह शुभ फल और नीच का ग्रह अशुभ फल प्रदान करता है।


Friday, July 15, 2016

Introduction to the Charts

Main Chart Horoscope


The Rashi chart which is known as birth chart or natal chart can be drawn in many ways. North Indian Style is drawn as under:-


This is the best form of drawing a chart as it provides a very easy comprehension of the chart at a mere glimpse. It shows angles/planets placed in angles without enumeration. 

Angular houses (Kendra Sthanas) 1, 4, 7, 10 have been marked hereunder:-


Malefic Houses (Duh Sthanas) (6, 8, 12) - It shows whether any planet is posited in the malefic houses. The Sixth, Eighth and Twelfth houses in a chart are known as Malefic houses. Malefic houses have been marked hereunder :-



Trines (Trikona Sthanas) 1, 5, 9 - It shows the placement of planets in trines, if any, at a mere glimpse. The trinal position have been shown as under:-


Even reckoning of the aspects is very easy in this form of a birth chart. The houses are always fixed and are shown below:-


The lordship of the houses is reckoned from the placement of a sign in a particular house. In the following chart, for example, the sign Taurus rises in the ascendant. The counting of houses is done in an anti clockwise direction. 


As the sign Leo is placed in the fourth house, Sun will be the lord of the fourth house.  


General Significations of the Houses



Body Parts Ruled By the Various Houses



Relations Ruled By Various Houses


Sunday, January 31, 2016

ज्योतिष में पागलपन के विभिन्न रूप

ज्योतिष सम्बन्धी निम्नलिखित योगों से पागलपन के विभिन्न रूपों का पता चलता है :-
  1. वातोन्माद - निम्नलिखितलक्षणों से इसका पता लगाया जा सकता है :- जैसे हमेशा हँसते रहना, अक्सर ताली बजाते रहना, जोर से बोलना, नाचते रहना, चीख़ना, पैर हिलाते रहना और हाथ मरोड़ना।   शरीर तांबे के रंग का, नरम और रक्तिम हो जाता है। खाया हुआ खाना पच जाने के बाद वह अशान्त हो जाता है। 
  2. पित्तोन्माद - सभी से घृणा करना, धृष्ट, हमेशा गुस्से में रहना, गाली गलौच करना, खाने और पानी पीने में हमेशा आगे, बहुत क्रोधित, शरीर पीला पड़ जाता है परन्तु जब दौरा पड़ता है तो शरीर गर्म हो जाता है। 
  3. कफोन्माद - एकांत और स्त्री पसंद, प्रत्येक वस्तु के लिए  विरक्ति, थोड़ा सोना, मुँँह से हमेशा कफ निकलना, उँगलियों के नाख़ून पीले और सफ़ेद पड़ जाते हैं। 
  4. सन्निपातोन्माद - ऊपर दिए गए लक्षण मिश्रित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं। उत्पीड़न से मुक्ति के लिए सन्निपात सन्निपात असंभव है। 
निम्नलिखित  आठ ग्रह योगों द्वारा ऊपर के सभी प्रकार के पागलपन को सुनिश्चित किया जा सकता है :-
  1. लग्न में बृहस्पति और सप्तम में शनि हो। 
  2. लग्न में बृहस्पति और सप्तम में मंगल हो। 
  3. लग्न में शनि और सप्तम, पंचम या नवम में मंगल हो। 
  4. चन्द्रमा और बुध दोनों एक साथ लग्न में स्थित हों। 
  5. क्षीण चन्द्रमा और शनि १२वें भाव हों। 
  6. बुरे ग्रह से युक्त क्षीण चन्द्रमा पाँचवे, आठवें या नौवें भाव में स्थित हो।
  7. बुरे ग्रह के साथ युक्त गुलिका सप्तम भाव में हो और 
  8. बुरे ग्रह के साथ बुध तीसरे, छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो। 
ऐसा कहा जाता है कि वात्त, पित्त और कफोन्माद उच्चित मात्रा में अौषधि के प्रयोग से ठीक हो सकता है परन्तु सन्निपातोन्माद के बारें में यह कहा जाता है कि मांत्रिक उपचार, जप, होम, यंत्र पहनने के सिवाए यह ठीक होने योग्य नहीं है। 

यदि चन्द्रमा, शुक्र और अष्टमेश बुरे स्थान में स्थित हो तो यह अनुमान लगाया जाता है कि भोजन के अनियमित प्रयोग के कारण उन्माद है। यदि उपरोक ग्रह राहु, केतु या गुलिका के साथ हों तो पागलपन अस्वास्थ्य कर भोजन के कारण है। यदि मंगल पांचवें भाव में हो तो पागलपन का कारण अधिक क्रोध होता है; किसी अन्य बुरे ग्रह से अधिक भय का  पता लगता है।  यदि नवम भाव में बुरे ग्रह हों तो गुरु या महान लोगों के अभिशाप के कारण पागलपन होता है।

Saturday, December 12, 2015

ज्योतिष और कामकला (मेष, वृषभ, मिथुन)

ज्योतिष प्रत्येक मनुष्य के क्रिया-कलाप का दर्पण है। ज्योतिष में ही चरित्र का स्पष्ट चित्रण प्राप्त होता है। जीवन में कामकला या सेक्स का अपना महत्त्व है। ज्योतिष में इस बात को समझा गया है और बिच्छू (वृश्चिक) का निवास गुप्तांग ही निर्धारित किया गया है। राशि के वर्गीकरण में ही हमारे पूर्वजों द्वारा इसकी व्याख्या कर दी गयी है। अपनी राशि के अनुसार इस विधि को अपनाकर प्रत्येक जातक अपना दाम्पत्य जीवन सुखमय बना सकता है। प्रत्येक राशि के अनुसार इसका ज्योतिषसम्मत विवरण प्रस्तुत है। 

मेष - इस राशि की स्त्री कुंडली दशा अनुकूल हो तो प्रायः वैशाख (अप्रैल-मई) में गर्भाधान करती है। इस अवधि में इसमें वासना की मात्र भी ज़्यादा होती है। इसकी ऋतु ग्रीष्म है। प्रायः गर्भाधान और प्रसव का इस राशि की स्त्री का यही समय है। यह राशि पृष्ठोदय है। पृष्ठोदय यानि रात्रि में बली। इस स्त्री को रात में ही मैथुन सुख अच्छा लगता है। दिन के समय में किया गया मैथुन इसको अप्रिय होता है। उसमें यह रस नहीं लेती।  यह राशि चतुष्पदी है। अतः इसे चौपाये आसन में या पृष्ठ भाग से किये गये मैथुन में विशेष सुख मिलता है और यह तृप्ति का अनुभव करती है। इस राशि का निवास वन है अतएव इसे सर्वथा एकान्त पसंद है। घर में कोई जागता रहेगा, भले ही न देख सके पर उसे इसका आभास होगा तो मैं खट्टा हो जाता है। इस राशि के ललाट पर बार-बार चुम्बन कर पुरुष इसे बहुत उत्तेजित कर सकता है। अगर यह ठंडी पड़ी होगी तो उपर्युक्त अनुकूल वातावरण पाकर पति को चरम सुख प्रदान करेगी। राशि चर होने से इसका शरीर आघातों द्वारा या कंधे पकड़कर, निरंतर स्तन मंथन करके हिलाते (चलायमान) रहना चाहिए। इस राशि के पुरुष को भी इसी प्रकार की लीला में सुख मिलता है। अतएव अन्य राशि की स्त्री को इसके साथ समझौता-सामंजस्य कायम कर लेना चाहिये।
राशि क्षत्रिय होने के कारण इस राशि के स्त्री-पुरुषों को 'युद्ध की स्थिति में विशेष सुख मिलता है। अपने संपूर्ण तैयार हथियारों के साथ एक-दूसरे पर हमला होना, इनका विशेष गुण है। एक-दूसरे को पराजित करने की प्रतिद्वन्दिता  भी विद्यमान रहती है। तत्त्व अग्नि होने के कारण इनको पसीना बहुत जल्दी आता है और यह शीघ्र गरम (उत्तेजित) हो जाते हैं। कृत्तिका नक्षत्र का केवल प्रथम चरण (अ) होने के कारण इनका मैथुन कर्म बहुत काम विकृत होता है। प्रायः शुचिता का ध्यान रखते हैं। अश्विनी और भरणी के पूरे चार चरण होने के कारण कुशलतापूर्वक और दृढ़ता के साथ वह मैथुन कर्म करते हैं।
इस राशि के जातक (स्त्री-पुरुष) दोनों अश्लील वार्ता कम करते हैं और गंभीरता को ओढ़े रहते हैं। मैथुन से पूर्व, मैथुन के समय, मैथुन के उपरान्त किसी प्रकार के विकृत शब्द नहीं निकालते हैं। इनकी क्रिया सीत्कारहीन होती है। ध्वनि नहीं करते हैं। बंद कमरे के बाहर कान लगाकर कोई सुनना चाहे तो उसको आभास भी नहीं हो सकता कि भीतर क्या हो रहा है।
इस क्रिया के पूर्व आलिंगन-चुम्बन प्रायः कामचलाऊ ही करते हैं। समाप्ति पर चुपचाप हट जाते हैं। फिर भी कुछ ऐसा व्यवहार हो जाता है कि इस बात का अनुमान करना कठिन है कि अभी कुछ हुआ है। यह एकदम सामान्य हो जाते हैं।
इस राशि की स्त्री को मैथुन क्रिया के दौरान धूम्रपान करना अच्छा नहीं लगता है और न ही वह धूम्रपान करना पसंद करती है। वैसे यह बड़े सुरुचिपूर्ण और स्वच्छ ढंग से इस क्रिया को करते हैं। इस स्त्री के केश, रोम अगर शरीर पर हों तो बहुत मुलायम होते हैं। आकृति भेड़ होने के कारण स्त्री की त्वचा सुचिक्कण होती है और वह क्रिया के समय भेड़ के समान सीधेपन का व्यवहार करती है। वैसे इस स्त्री के उत्तेजना केन्द्र ललाट के अलावा अन्य स्थान पर भी हो सकते हैं, पर सिर के नीचे नहीं होंगे - पलक, कपोल, होंठ, नासिका, कर्ण, केश, भौंहे  इत्यादि इस भाग में पुरुष स्वयं पता कर सकता है।

वृषभ - इस राशि की आकृति बैल के समान है। इस राशि के जातक में ज्येष्ठ (मई-जून) में अधिक वासना रहती है। स्त्रियों में गर्भाधान या प्रसव का माह यही है। ज्येष्ठ इस राशि का माह होने में ऐसा होना स्वाभाविक है। यह एक स्थिर राशि है। इस कारण से इस राशि के स्त्री पुरुष स्थिर भाव से मैथुन करते हैं। एक ही आसन में रहते हैं। बार-बार स्थिति बदलना अच्छा नहीं लगता। इस कारण जब भिन्न राशि की स्त्री या पुरुष बार-बार स्थिति बदलता है तो इस राशि के जातक को नागवार लगता है। यह राशि भी पृष्ठोदय की है। जिस कारण से रात्रिकालीन सम्भोग ही इनको प्रिय है।  निवास स्थान खेत या मैदान होने के कारण इनको खुले में ज़्यादा सुख मिलता है। कमरे की खिड़की आदि अवश्य खुली रखेंगे। तत्त्व पृथ्वी होने के कारण बिस्तर पर कम, जमीन या फर्श पर अथवा नंगी भूमि पर इनको बड़ा सुख मिलता है।
इस राशि के स्त्री-पुरुष का उत्तेजना केंद्र चेहरा या गले में कही भी हो सकता है। प्रायः कंधे पर दाँतों के इस्तेमाल से भी सुख मिलता है। इस राशि का पुरुष प्रायः इस क्रिया में अपनी पत्नी के कंधो को मजबूती से पकड़ता है। चुम्बन प्रयोग से जिस स्थान के स्पर्श से जातक आकुल-व्याकुल हो जाये वाही उत्तेजना स्थल हो सकता है। प्रायः इस राशि की स्त्रियों के कुचाग्र चूसने पर वह शीघ्र उत्तेजित और स्खलित होती हैं।
राशि ब्राह्मण होने से उसकी क्रिया शांत, हौले-हौले चलती है। मारकाट/युद्ध वाली दशा नहीं रहा करती है। मेष राशि के ही समान इस राशि वालों को अपनी दिशा पूर्व की और मुख करके इस कार्य को करना चहिये। इनका भी पद चतुष्पद है। इनका यह कर्म बड़ा प्यार-भरा और धीमी गति से (बैल गति) चलता है। पहले, क्रिया के दौरान और अंत में आलिंगन-चुम्बन बराबर करते हैं। इस राशि के जातक के नथुने क्रियारत दशा में तेजी के साथ फूलते और चिपकते हैं। बैल का यह गुण अवश्य होता है। साथ ही यह लम्बी-लम्बी सांसें छोड़ते हैं।
नक्षत्र गुण (कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा) चंचलता, पर सुंदरता के साथ धैर्य के साथ क्रिया करते हैं। कृतिका के ३ चरण के कारण इनकी इस क्रिया में थोड़ी अशुचिता (मेष से कुछ अधिक) होती है। इसके बावजूद यह पवित्रता का ध्यान रखते हैं। कार्य समाप्ति के उपरान्त इस राशि का जातक (स्त्री हो या पुरुष) लंबी-लंबी सांसें अवश्य छोड़ता है। काफी समय तक हांफता है। इस राशि के पुरुष को अपने पौरुष पर बड़ा घमंड होता है तथा घनिष्ठ मित्रों के सम्मुख अपना पौरुष खूब बढ़ा-चढ़ा कर बतलाता है और नाना प्रकार की ढींगे हांकता है। इस राशि की स्त्री भी अपने पति के सभी गुण बढ़ा-चढ़ा कर सहेलियों से बतलाती है।
इस राशि के जातक गुप्तेंद्रिय और मुख का प्रायः संबंध बना लेते हैं। यह इनकी आकृति का स्वभाव है। यह सहजता के साथ इस क्रिया को करते हैं। सामान्यतः यह परस्पर पूर्ण तृप्त होकर ही विलग होते हैं। भिन्न राशि के मिलान के बावजूद इस राशि के साथ दूसरी राशि का चतुराई के साथ मेल बैठ जाता है। इनको नृत्य-गायन का विशेष शौक स्वयं करने या देखने का होता है। इस  गुण का उपयोग यह क्रिया के पूर्व अवश्य करते हैं।  प्रायः रेडियो ही चालू कर देते हैं। ऐसे अवसर पर इनको संगीतमय वातावरण विशेष प्रिय लगता है। इस राशि के जातकों की स्खलन की मात्र भी रुक-रूक कर अधिक होती है। इस राशि का मैथुन जीवन प्रायः सुखद रहता है। पत्नी इस राशि के पुरुष से संतुष्ट रहती है और स्त्री वृषभ हो, पुरुष अन्य राशि का हो तो अपना तालमेल बैठा लेती है। अनुकूल बना लेना इस राशि का स्वभाव है।
प्रायः यह देर तक इस क्रिया को पूरे सुख के साथ करते हैं। इनमें हड़बड़ी या जल्दबाज़ी नहीं होती है। लिंग से यह स्त्री है, पर अपने में पूरा पौरुष रखती है।

मिथुन - ज्योतिष गणना में इस राशि का निवास गाँव या शयनकक्ष माना गया है। लिंग नर है।  द्विस्वभाव है। तत्त्व आकाश है। उभयोदय है। जाति वैश्य है। दिशा दक्षिण-पूर्व है। इन गुणों के कारण इस राशि का मैथुन विचित्रतापूर्ण होता है। इस राशि का उत्तेजना केंद्र गले और बाहों में कही भी हो सकता है। बांहे सहलाने/पकड़ने या दबाने से इनको सुख मिलता है और उत्तेजित होते हैं। दक्षिण-पूर्व दिशा में मुख करके संयोग करने से यह अपना सुख बढ़ा सकते हैं। दिन-रात यह राशि बली है (उभयोदय) अतएव रात दिन कभी भी इनको मैथुन में सुख ही मिलता है। शयनकक्ष में बिस्तर जरूरी है। यह कुछ न कुछ बिछा ज़रूर लेते हैं। नंगी पृथ्वी पर मैथुन करना इनको पसंद नहीं है। यह शयनकक्ष में या कहीं भी मैथुन कर सकते हैं। इनको इस बात की चिंता नहीं होती है कि कोई देख रहा है।
अपने द्विस्वभाव के कारण इनका मैथुन चंचल होता है। मैथुन के दौरान यह पल-पल अपनी स्थिति बदलते रहते हैं। तत्त्व आकाश होने के कारण यह हवाई पुल मैथुन में बाँधा करते हैं। जाति वैश्य कारण इनके मैथुन में वणिक वृत्ति (बनियापन) होती है। वेश्यागामी होने पर पूरी कीमत उसके शरीर से वसूल लेंगे। जब भी कोई नयी वास्तु या सामग्री पत्नी/प्रेमिका को देंगे, उतने ही मूल्य का, ज़्यादा कीमती होने पर कठोर और देर तक, काम कीमती होने पर कुछ देर, साधारण मैथुन अवश्य करेंगे। उसी दिन इस राशि के जातक अपना मूल्य वसूल लेंगे। छोड़ने वाले नहीं हैं। मृगशिरा, आद्रा, पुनर्वसु नक्षत्रों के प्रभाव के कारण चंचलता, पापी और भोगी के पल्ले पड़ने का योग बनता है। चंचलता के साथ पापमय ढंग से यह भोग करते है। इनकी कामवासना मेष-वृषभ से ज़्यादा होती है। कामुकता के कारण इनके प्रेम सम्बन्ध टूट जाया करते हैं।
इस राशि का माह आषाढ़ (जून-जुलाई) है तथा ऋतु शरद है। गुण रजोगुण है।  ज़्यादा कामुकता पायी जाती है।
इस राशि का जातक मौन मैथुन नहीं करता है। (वीणावदन करती आकृति, एक युवती) इसके मैथुन में नाना प्रकार की ध्वनियों, सीत्कारें, थपथपाहट होती है ताकि राशि गुण (शयनकक्ष, गाँव) होने से (गांव वाले दूसरे लोग भी सुन ले) प्रभाव पड़ता है। व्यर्थ ध्वनियां बेहद करते हैं, जो सरलता से सुनाई पड़  जाती है। प्रारंभिक क्रिया के दौरान, अंत में इनका प्रेमालाप, प्रेम क्रियाएँ चलती रहती हैं। इसके लिए लोकलाज नहीं के बराबर होती है।
यह अपनी प्रेमिका/प्रेमी, पत्नी/पति से बहुत प्यार करते हैं और बड़ी भावुकता के साथ प्यार करते हैं। जल्दी छोड़ते नहीं है। मैथुन प्रेमालाप के समय के मध्य आंसू, मुस्कान का मेल बराबर होता है। अभी आंसूं बहाया, अगले पल मुस्कराया; इनको  अस\\संतोष नहीं होता। यह विवाह के प्रारंभिक दिनों में रात-दिन मिलकर चार-पांच-सात बार भोग कर डालते हैं। सबके देखते-देखते दरवाजा बंद कर क्रिया शुरू कर देंगे। इनको यह अहसास नहीं  होता है कि परिवार के अन्य सदस्य क्या सोच रहे होंगे। निर्लज्जता इनके मैथुन का गुण है।
काफी उम्र तक यह भोगी होते हैं। इस राशि की स्त्रियों का मासिक धर्म ४८/५२ के आसपास निष्क्रिय होता है। पुरुष ६०/६५ तक क्रियाशील रहता है।
प्रायः इस राशि की महिला अपने पति को अपना उत्तेजना केंद्र बतला देती है। आमतौर पर इसका दाम्पत्य जीवन सुखद होता है परन्तु कामुकता के कारण दूसरा पक्ष यदा-कदा बहुत घबरा जाता है और कलह की पैदाइश होने लगती है। इस राशि के जातक की संतान भी ज़्यादा होती है।

यह जानकारी ज्योतिष के विद्वान पंडित श्री राकेश शास्त्री जी की अनमोल कृति है। आशा है यह हम सभी का  मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होगी और हम सभी इस जानकारी से लाभ प्राप्त कर सकेंगे। 

ज्योतिष और कामकला (कर्क, सिंह और कन्या)

कर्क - आकृति से केकड़ा होने के कारण इस राशि के जातकों की त्वचा प्रायः मोटी होती है। शरीर और प्रभाव से यह मोटी खाल के ही होते हैं। लिंग स्त्री होने के बावजूद इस राशि के पुरुषों में पौरुष और स्त्रियों में सहनशक्ति गजब की होती है। इस राशि की महिला कठोरतम मैथुन और प्राणान्तक बलात्कार करने के बावजूद 'उफ़' या अन्य राशि की महिलाओं की तरह हाय-तौबा बिलकुल भी नहीं करती हैं। सब खामोशी के साथ बर्दाश्त कर लेती हैं। अपशब्द, गाली-गलौच और मारपीट का इस पर प्रभाव नहीं होता है। अपनी मर्ज़ी के बिना यह टस से मस नहीं हो  सकती है।
यह चलायमान (चर) राशि होने के कारण चंचल (केकड़ा होने के कारण) कठोरतम मैथुनप्रिय  होता है और रात्रि बली (पृष्ठोदय) होने के कारण रात्रि में इसे बड़ा सुख मिलता है। पद इसका कीट है, अतएव रेंगकर (लम्बा होकर) मैथुन करना पसंद करता है। इसकी सबसे ज़्यादा कामवासना का समय श्रावण (जुलाई-अगस्त) है। इसी माह प्रायः गर्भाधान या प्रसव करती है। पूर्णिमा की रात अपने ग्रह देवता चन्द्रमा के कारण इस राशि की वासना अवश्य जागती है। इसकी कामोत्तेजना और स्खलन के बिंदु स्तन हैं। उनका मर्दन-चुम्बन, पान इसको उत्तेजना  देते हैं और स्खलित करा देते हैं। निवास तालाब/झील होने के कारण इस राशि के स्त्री/पुरुष नदी/जलाशय के पास बसे आवासों/नगरों में अत्यंत सुख पाते हैं। ऐसे स्थानों की इस राशि की महिलाओं में भी कामवासना ज़्यादा होती है।
कीट में गणना के कारण सभी प्रकार का चलायमान मैथुन सभी आसनों में करना स्वभाव होता है। अत्यंत क्रूर-कठोरतम मैथुन होता है। इस राशि के पुरुष के मैथुन से स्त्री पनाह मांगती है और स्त्री से पुरुष को पसीना आ जाता है। इसे संतुष्ट करने में लोहे के चने चबाने पड़ते हैं। जाति से ब्राह्मण होने के बावजूद इसके मैथुन में अपने स्वभाव कीट के कारण शुचिता नहीं होती है। गंदे ढंग से प्रायः मैथुन करता है। मैथुन के समय गति केकड़े के समान, पर अत्यंत कठोर होती है। अपनी चंचलता और कठोरता के कारण विपरीत लिंगी का कचूमर निकाल देते हैं। अन्धकार इनको प्रिय होता है  करते समय ध्वनि नहीं करते हैं। इनकी धड़कने चर्म सीमा पर होती हैं और हाँफते बहुत हैं। इनका मैथुन पूर्ण तृप्तिदायक होता है।
अपने नक्षत्रों के कारण इस कार्य में क्रूर, भोगी और हर प्रकार से रूचि रखते हैं। इस राशि के स्त्री/पुरुष इस क्रिया के दौरान अपनी गर्दन अवश्य सिकोड़ते  या चलायमान करते हैं। यह उनका एक विशेष गुण होता है। अपने जल तत्त्व के कारण विशेष गरम नहीं होती और पसीना कम निकलता है। दक्षिण दिशा में मुख करके मैथुन कर इस राशि के जातक और भी सुख उठा सकते हैं। प्रेम के मामले में यह पक्के होते हैं और निभाते हैं।
मैथुन के समय यह जरा सी बात पर चिढ़ जाते हैं और क्रिया रोक देते हैं। किसी प्रकार का व्यवधान इनको पसंद नहीं है। मैथुन से पूर्व, मैथुन के समय या बाद में कुछ न कुछ खाने-पीने की इनकी आदत होती है।  मुंह चलता रहता है। इनमें स्तंभन शक्ति ज़्यादा होती है। प्रायः शरीर सिकोड़कर केकड़े के समान आकृति बनाकर यह संभोग करते हैं। बीच-बीच में रुक जाया करते हैं। इस क्रिया में सबसे ज़्यादा समय इस राशि के जातकों को ही लगता है। संतान भी अधिक उत्पन्न करते हैं। इस राशि के जातक प्रायः बेहद भावुक होते हैं। मैथुन के समय अन्य भावुकता-भरी क्रीड़ाएं और खूब प्यार करते हैं। प्यार से अपने प्रिय को तर-बतर कर देते हैं। स्खलन इनका कम मात्र में होता है, यह बिना रुके होता है और मैथुन के उपरान्त भी यह शीघ्र अलग नहीं होते। स्खलित होकर उसी अवस्था में देर तक पड़े  रहते हैं।
सामान्य तौर पर इनका दाम्पत्य जीवन का यह पक्ष मधुर होता है, पर क्रोधी स्वभाव के कारण मन उखड गया तो फिर वह हफ़्तों मैथुन नहीं करते हैं। दाम्पत्य जीवन सामान्यतः सुखमय होता है पर अपनी इस कामलीला के कारण तनाव और तलाक भी इसी राशि में सबसे ज़्यादा होते हैं।

सिंह - यह राशि सब राशियों में तेजस्वी है। इसका आकार सिंह के समान है और ग्रहाधिपति सूर्य है। सूर्य के गणपति स्वयं ब्रह्मा/रूद्र हैं। इस राशि के जातक अत्यंत तेजस्वी और सुडौल होते हैं। बलिष्ठता तथा सीमा तानकर चलना इसका गुण है। स्त्रियों की आँखें हीरे के समान, कमर सिंह की कमर के समान पतली और लचकदार होती है। विश्व  की सुन्दरतम महिलाओं की राशि लगभग यही है। इस राशि के जातकों में भाद्रमास (अगस्त-सितम्बर) में वासना ज़्यादा रहती है। महिलाओं के गर्भवती होने, प्रसूता  होने का समय यही माह अधिकतर होता है।
इस राशि के जातकों की कामोत्तेजना का क्षेत्रपट है। प्रायः गुदगुदी से इनको कामोत्तेजना होने लगती है। इनकी कमर दोनों और से पकड़कर मैथुन करने से इनको सुख मिलता है। जाति से क्षत्रिय और स्थिर गुण के कारन एक आसन में ही घोर युद्ध करना इनका स्वभाव है। इस राशि का पुरूष हड्डियां तोड़ कर रख देता है। इसका तत्त्व अग्नि होने से इस राशि में प्रचंड काम होता है तथा पसीने से लथपथ होने के बावजूद जब तक शिकार तोड़ कर नहीं रख देगा, तब तक रुकता नहीं है। इस राशि का पुरूष अपनी पत्नी को पूर्ण रूप से संतुष्ट करने की क्षमता रखता है। प्रचंड भोगी होने के बावजूद इसकी सन्तान अल्प होती है।  निवास पर्वत की गुफ़ा होने के कारण एकदम गुफ़ा जैसे स्थान, अन्धकार, खिड़की-दरवाज़े सब बंद ही इसको सुख देते हैं। शीर्षोदय राशि होने के कारण दिन के समय ही 'शिकार' करना इनको बहुत अच्छा लगता है। दक्षिण की और मुंह करके विशेष सुख पाता है।
सांसें कम से कम लेते हैं। हिलना-डुलना पसंद नही। बस, एक सुर में प्रबल रूप से क्रियारत हैं। यह शीघ्र उत्तेजित होता है और स्त्री को देखकर यकायक टूट पड़ता है। इसकी पत्नी तक नहीं भांप सकती कि वह कब टूट पड़ेगा और झपाटे से तोड़कर रख देगा। हौले-हौले या धैर्य का व्यवहार यह नहीं करता। इसका झपट्टा शेर के समान होता है। यह अपना मैथुन हमेशा बलात्कार से शुरू करता है। अपने नक्षत्रों के कारण प्रबल भोगी और क्रूर होता है। वैसे यह जितेन्द्रिय अधिक होता है। मैथुन काम करता है पर जब करता है छक्के छुड़ा देता है। इस राशि की महिला का सेक्स अत्यंत प्रबल होता है। प्रायः इस राशि के स्त्री-पुरूष नोच-खसोट करते हैं। इस राशि के जातक के ही मैथुन में सबसे अधिक नखदंत क्षत होते हैं। राशि चतुष्पदी है। अतएव इसे पशुवत् आसन ही प्रिय है। उकड़ू बैठना बहुत प्रिय है। इस राशि का पुरूष बैठकर ही क्रियारत होना पसंद करता है। क्रिया के दौरान यदा-कदा सिंह के समान गुर्राने के स्वर अवश्य निकालते हैं।  चरम सीमा पर अचानक ध्वनियां करते हैं। इस राशि का मैथुन सबसे अधिक ध्वनिमय होता है। शेर की दहाड़ जैसे चारों और गूंजती है, इसी प्रकार इनका मैथुन कमरे से टकराता है।
पहले, दौरान या अंत में यह विशेष लाड़-प्यार नहीं करते। शिकार किया, झपट्टे से चबाया और फ़ेंक दिया। यह तुरंत अलग हो जाया करते हैं। क्षत्रिय स्वभाव के कारण 'खून ख़राबी' ज़रूर करेंगे। स्वछता प्रिय होते हैं।  प्रकृतिसम्मत क्रियाओं के अतिरिक्त अन्य प्रकार की क्रियाओं में इनकी रूचि नहीं होती है। पेटू होने के कारण बिना खाये-पिये यह मैथुन नहीं करते हैं। मैथुन के उपरान्त कुछ-न-कुछ खाना इनका स्वभाव है।
अवैध संबंध के मामले में यह कम रूचि रखते हैं। एक ही शिकार से अपना पेट भर लेते हैं। वृद्धावस्था में भी यह नहीं मानते हैं। अपने मरने तक इनमे सेक्स बना रहता है। इस महिला का मासिक भी ५५/५६ की आयु के आसपास ही समाप्त होता है। अपने क्रूर स्वभाव, लिंग नर होने के कारण इस राशि की महिला अत्यंत उग्र होती है। तृप्ति न होने पर वह गुस्से से भर जाती हैं और हाथ-पैर पटकती हैं, अशक्त पति की यह पिटाई भी कर देती हैं।  दाम्पत्य जीवन में यह पति से डरती नहीं हैं। इस राशि का पुरूष भी अपनी पत्नी की पिटाई कर देता है।  इसके बावजूद इनका मौन जीवन सामान्यतः सुखद ही होता है। वृश्चिक और सिंह का जोड़ा ही सर्वोत्तम माना गया है। बाकी तो किसी प्रकार निर्वाह कर जाते हैं।

कन्या - इस राशि का शरीर अंग कमर है। अतः इस राशि के स्त्री-पुरुषों की कामोत्तेजना का क्षेत्र कमर है। स्त्री के कूल्हे या कमर (बायां भाग) पकड़ने-सहलाने से इनकी कामोत्तेजना  जागती है। कमर पकड़कर, उकड़ू बैठकर मैथुन करना इस राशि के पुरूषों का स्वाभाव होता है। तत्त्व पृथ्वी, निवास हरियाली, जल से भीगी जमीन, द्विपद, शीर्षोदय, जाती शूद्र, लिंग स्त्री है। इस कारण नंगी जमीन पर सामान्यतः मानवोचित सम्भोगप्रिय होता है।दिन में विशेष सुख मिलता है। लिंग स्त्री होने के कारण इनमें  विशेष कामवासना नहीं होती है।
यह एक अत्यन्त कोमल राशि मानी गयी है। इस कारण सामान्य स्त्री गुण वाले पुरूष को भी लोग कन्या राशि कहकर उसका मज़ाक उड़ाते हैं।
इस राशि के पुरूषों में स्त्रीत्व की अधिकता होती है। जनानापन, अतएव अधिकतर नपुंसक, संभोग असमर्थ, शीघ्र पतन के शिकार रहते हैं। इस राशि का पुरूष पौरुष की कमी के कारण प्रायः अपनी स्त्री/प्रेमिका को संतुष्ट नहीं कर पाता है। इस राशि के लोग ही अधिकतर हिजड़े होते हैं। इस राशि के जातक का स्वभाव बड़ा ही कोमल होता है। बहुत ही नाज़ुक-मिज़ाजी के साथ यह सम्भोग करते हैं। कोई उठा-पटक, बलात्कार, शोरशराबा, आवाज़ें नहीं।
इस राशि की महिलायें अधिकतर ठंडी होती हैं। मैथुन में इनको किसी प्रकार की रूचि नहीं होती है। वृश्चिक, कर्क या सिंह से पाला पड़ जाने पर वह सूख कर काँटा हो जाती हैं। अपने ठंडेपन के कारण यह अरुचि दिखलाती हैं। इस राशि की महिलाएं प्रेमपत्र लिखने में दीर्घसूत्री और अत्यंत संक्षिप्त होती हैं।  बनाव-श्रृंगार में रूचि रखती हैं पर मैथुन अश्लीलता में नहीं। दक्षिण-पश्चिम दिशा में सिर कर ज़्यादा सुख मिलता है। गर्भ धारण और कुछ ज़्यादा कामुकता का माह आश्विन (सितम्बर-अक्टूबर) है। इस माह में गर्भ धारण या प्रसव करती हैं। हाँ, रिमझिम बरसते पानी में इनको उत्तेजना मिलती है अथवा हरियाली बिखरी पाकर मैथुनातुर होती है। इनकी कमर की लचक बहुत आकर्षक होती है।
चुपचाप संभोग करना और द्विस्वभाव के कारण कभी इधर, कभी उधर खिसकना, उलटना, पलटना इनकी आदत होती है। रात्रि-दीप की लौ के समान हौले-हौले लहराती है। बस एक-दो फूँक में बुझ (ठंडी) जाती हैं। इनका क्रिया-कलाप क्षणिक होता है। मैथुन के पूर्व, अंत में या मैथुन के दौरान यह उत्तेजना तो बहुत दिखलाती है पर करते कुछ नहीं बनता।
इनका सेक्स जीवन असंतुष्ट, नाना प्रकार की बाधाओं और रोगों से पीड़ित होता है। प्रेम में भी डरपोक होते हैं। इस राशि की स्त्रियों के तलुवे लाल और पैर बहुत सुन्दर होते हैं। उनका आकार प्रायः 'कमल' के समान होता है।
मैथुन में विरक्ति और सबसे अशक्त मैथुन करने वाली एक मात्र यही राशि है और सबमें तो इनको रस मिलेगा पर मैथुन के नाम पर दिल खट्टा कर लेते हैं। सबसे मरियल क़िस्म होती है। लड़कियों के बीच उठना, बैठना और उनसे बात करना अच्छा लगता है तथा स्त्रियोंचित कार्यों में बड़ी रूचि रखते हैं।
इस राशि में स्त्री तत्त्व की अधिकता के कारण दांपत्य जीवन कोई विशेष सुखमय नहीं हो पाता है। बस, दिन ज़िन्दगी के काट जाते हैं। इस राशि के स्त्री-पुरुष सेक्स के मामले में ठन्डे होते हैं।

यह जानकारी ज्योतिष के विद्वान पंडित श्री राकेश शास्त्री जी की अनमोल कृति है। आशा है यह हम सभी का  मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होगी और हम सभी इस जानकारी से लाभ प्राप्त कर सकेंगे। 

ज्योतिष और कामकला (तुला, वृश्चिक और धनु)

तुला - बड़ी संयमित और संतुलित सेक्स जीवन जीने वाली यह राशि है। इसकी कामोत्तेजना का क्षेत्र नाभि है। नाभि में अंगुली डालने या गुदगुदाने पर स्त्री काम पीड़ित तथा स्खलित हो जाती है। तत्त्व इसका आकाश है। अतएव घुटन-भरे वातावरण में किये गए संभोग में न ही इसे आनंद प्राप्त होता है और न ही इसे यह पसंद है। राशि रूप चर है। अतएव मैथुन अस्थिर रूप में करता है। राशि शीर्षोदय होने से दिन में विशेष सुख मिलता है। पश्चिम की ओर मुख करने से ज़्यादा सुख मिलता है। 
इस राशि के स्त्री-पुरुष दोनों का सेक्स अत्यंत नपा-तुला होता है। पूर्ण रूप से एक-दूसरे को संतुष्ट करते हैं। जाति वैश्य होने से इनके संभोग में शालीनता होती है। द्विपद होने से मानवोचित संभोग लीला करते हैं। इस राशि की स्त्री अपने प्रेमी/पति से जबरदस्त प्यार करने वाली होती है। वह अत्यंत चरित्रवान, पतिव्रता, आज्ञाकारिणी होती है। अपना सारा कार्य संतुलित ढंग से करती है। तुला राशि की महिला प्रायः घर को स्वर्ग बना देती है। इस राशि की महिलाएं काफी बुद्धिमान भी होती हैं। निवासस्थान बाज़ार/हाट होने के कारण घूमना-फिरना बहुत पसंद होता है। रंग रंग-बिरंगा है। इस कारण बनाव-श्रृंगार में विशेष रूचि रखते हैं। इस राशि की महिला को पति की उपस्थिति में (परदेस न गया हो) बिना श्रृंगार के देख पाना मुश्किल है। अपने श्रृंगार का हमेशा ध्यान रखती है।
इस राशि के पुरूष का भी वही व्यवहार होता है। बड़ा नाप-जोख़ कर मैथुन करता है। परिवार नियोजन का प्रबल अनुगामी होता है। कामुकता उचित मात्रा में रहती है। इसका माह कार्तिक (अक्टूबर/नवंबर) है। प्रायः प्रसव व गर्भधारण इसी माह में होता है।
इसका चिन्ह (सौरमण्डलीय आकार) तुला (तराजू) होने के कारण प्यार में सौदा करना इसका एक स्वभाव होता है। प्रायः यह मैथुन से पूर्व चुम्बन-आलिंगन की बाज़ी लगाया करती है। प्रेमिका/पत्नी के साथ या प्रेमी/पति के साथ। द्यूत-क्रीड़ा (जुआ) खेलना, बाजी लगाना इसको बड़ा पसंद आता है। इसमें स्वार्थी भाव ज़्यादा होते हैं। मैथुन करते समय केवल आवश्यक/अनिवार्य ध्वनियां होती हैं तथा उचित समय पर मैथुन करता है। पूर्व में कुछ मनोरंजन और समाप्ति पर प्रायः एक-दूसरे को ठगते हैं। इस राशि की महिला अपने पति से संभोग समाप्त के उपरान्त कुछ न कुछ फरियाद अवश्य करेगी। ........... यह ला दो.......... वह ला दो।  पुरुष भी कुछ न कुछ मांग बैठता है। इस राशि के जातक साफ़-सुथरा और स्तरीय मैथुन करना पसंद करते हैं।
वायु तत्त्व के कारण मैथुन की नाना प्रकार की हवाई कल्पनाएँ प्रेमिका/प्रेमी के ख्याल में डूबकर करते हैं, पर कामयाब एक भी नहीं होती है।  अपना मैथुन किसी पर प्रकट नहीं होने देते हैं। बहुत गोपनीय ढंग से इस कार्य को करते हैं।
तुला राशि की महिला भाग्यशाली होती है। वह अपने पति के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला देती है। रंक से राजा बना देती है। राशि योग बैठ गया तो तुला राशि के पति-पत्नी का सेक्स और दांपत्य जीवन अत्यंत ही सुखमय होता है। पति-पत्नी एक आदर्श जोड़ी माने जाते हैं। कलह से सर्वथा पर रहते हैं तथा बड़ा ही संतुलित जीवन-यापन करते हैं। हर परिस्थिति के अनुकूल अपने को बना लेते हैं।
राशि योग न बैठने पर भी तालमेल बिठा लेते हैं और जीवन की गाड़ी को खींच ही ले जाते हैं। सब प्रकार की राशियों में तुला एक आदर्श राशि है।

वृश्चिक - यह बिच्छू के समान डंक मारने वाली राशि है।  इस राशि का पुरूष हमेशा बिच्छू के डंक जैसी पीड़ा देने के समान अपना मैथुन शुरू कर देता है। स्त्री के साथ कब वह क्रीड़ा कर दे कहा नहीं जा सकता। एक प्रकार से अपना हर संभोग यह बलात्कार से शुरू करता है। इस राशि की महिला भी ऐसा ही व्यवहार ज़्यादातर पसंद करती है। इसका निवास स्वयं गुप्तांग (योनि, इंद्रिय, नितम्ब, गुदा) है, इस कारण इन्ही क्षेत्रों में इनकी उत्तेजना का भी निवास है। इन्ही अंगों को सहलाने या चुम्बन से इनको उत्तेजना मिलती है।
बिलकुल घुटन-भरे वातावरण में मैथुनप्रिय है। राशि कीट है। निम्न स्तरीय मैथुन है। स्वभाव नर है। अस्थिर रूप से मैथुन करते हैं। पश्चिम की ओर मुख करने में ज़्यादा सुख मिलता है। जाति ब्राह्मण है परन्तु गंदगी प्रिय है।
इस राशि के पुरूषों की कामना बहुत जहरीली होती है। प्रायः टांगें उठा कर काफी देर तक क्रियारत रहते हैं। इस राशि के स्त्री की वासना शांत होने में काफी समय लगता है। तत्त्व जल है। योनि कीट है। इस कारण स्खलन बहुत होता है। इस राशि के महिला का मासिक धर्म  अधिक रक्त स्राव करता है। मार्गशीर्ष (नवंबर-दिसंबर) में इस राशि के स्त्री-पुरूष की कामुकता बढ़ जाती है। इस समय गर्भाधान होता है या प्रसव होता है। वृश्चिक राशि के पुरूष का मैथुन कर्क-मकर राशि की ही महिला झेल सकती है अथवा कुंभ सिंह की, पर अन्य राशि की महिला को बराबर इस राशि के पुरूष के मैथुन से कष्ट होगा।
वृश्चिक राशि की महिला अगर कन्या राशि के पुरूष के पल्ले पड़ गयी तो कन्या राशि का पुरुष पनाह मांग जाएगा।
अपनी कामुकता के साथ इस राशि के स्त्री-पुरुष मैथुन के दौरान डंक (व्यंग्य-बाण) अवश्य मारेंगे। ऐसा व्यंग्य बाण मार देंगे कि मैथुन का सारा सुख जाता रहेगा और कलह की शुरुआत हो जाएगी। मैथुन से पूर्व इस राशि के स्त्री-पुरूष को अपनी पति-पत्नी के गुप्तांगों से खेलने का शौक होता है तथा दर्पण में या ऐसे आसनों में जिसमें अंगों की कर्म लीला दिखाई पड़े, में इनको बड़ा आनंद आता है। एक-दूसरे के गुप्तांगों की क्रिया देखकर मैथुन करना इस राशि का स्वभाव होता है तथा ध्वनियां बराबर करते रहते हैं। इनको लोकलाज का भय नहीं होता है। मैथुन की समाप्ति पर यह तुरंत अलग हो जाते हैं।
उलटा चलने से बिच्छू स्वभाव के कारण इस राशि का जातक विपरीत रति में बड़ा सुख पाता है और सबसे प्रिय आसन मानता है। पुरूष में पूर्ण पौरुष और स्त्री में पूर्ण स्त्रीत्व होता है। दांपत्य जीवन सुखमय तो रहता है पर अपने बिच्छू स्वभाव के कारण कलह बराबर  होती है। पर पुरूष/स्त्री सम्बन्ध सरलता से बनते हैं पर स्त्री का सम्बन्ध टूट जाता है। उसका स्वभाव बड़ा बाधक बनता है। लाल कपड़ों से भी इनको बड़ी उत्तेजना मिलती है। लाल ब्रा, कला पेटीकोट, लाल चूड़ियाँ, माथे पर लाल बिंदिया, महाबर हाथ-पैरों का, मांग का सिन्दूर - सब कुछ इनको उत्तेजना देता है।
इस राशि का पुरूष प्रायः मासिक धर्म/गर्भावस्था में भी अपनी पत्नी को नहीं छोड़ता है। इस राशि के जातक में समलैंगिक मैथुन की भी तीव्र भावना होती है। कुल मिलाकर प्रचंड संभोग के साथ यह अपना दाम्पत्य जीवन पूरा कर लेता है। वृश्चिक राशि के संतान ज़्यादा होती है।

धनु - यह राशि मैथुन के सम्बन्ध में एकदम 'युद्धस्थल' है। द्विपद, चतुष्पद दोनों हैं। हर तरह से मारकाट करती और अपने धनु से बराबर बाण बरसाती है। इसके अंधाधुंध तीरों की मार से विपरीत पक्ष घबरा जाता है। इसकी जंघाएं शेर की रान के समान बलिष्ठ होती हैं और रात्रिकालीन क्रिया पसंद हैं। प्रायः बड़ा समय इस राशि के जातक को लगता है।
वर्ण क्षत्रिय और स्वभाव क्रूर है। इस कारण बहुत निर्भयता के साथ व्यवहार करता है। मैथुन के समय बिना रक्तपात किए मन नहीं भरता। इसका अंग जांघ है। अतएव यहीं स्पर्श से इसका काम जागता है। इस राशि के जातक का अपनी जांघ में बड़ी गुदगुदी लगती है।
जातक बड़ा कामुक और उत्तेजक मैथुन करता है। इसको गोपनीयता पसंद नहीं है। खुलकर यह लड़ाई लड़ता है। इसका तत्त्व अग्नि है। इस कारण यह हर समय 'गरम' रहता है। विवाह के बाद रात-दिन वह इसी में रूचि रखता है। कई-कई बार अपना धनु संभालता है। यह थकता नहीं है और होंठों से नाना प्रकार की ध्वनियाँ हुंकार के समान निकालता है।
इस राशि की स्त्री में भी वासना अधिक होती है। अपने प्रेमी/पति से यह तीर के समान टकराती है और अपने हाव-भाव से हर पल चुनौती देती है। परपुरूषगामी प्रायः नहीं होती है। पर असंतुष्ट होने पर नफ़रत करने लगती है। उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।  उत्तर-पश्चिम दिशा में अपना रुख कर वह जातक विशेष सुख पाता है।
इस राशि का पुरूष प्रायः परस्त्रीगामी होता है। इसके बावजूद अपनी स्त्री से विशेष लगाव रखता है। इस राशि के संतान काफी होती है। स्वभाव में उग्रता के कारण प्रायः पति-पत्नी में खिंचाव सा रहता है। यह राशि तुनकमिज़ाज़ है।
इसकी कामुकता दिसंबर-जनवरी (पौष) माह में अधिक बढ़ जाती है। प्रसव/गर्भाधान का यही माह है। इस राशि को पीला रंग पसंद है और पीले वस्त्रों से बड़ी उत्तेजना मिलती है। पीट वर्णीय (सोने की चमक) वाली स्त्रियों पर वह जातक विशेष रूचि रखता है। इस राशि की महिला का गुप्त प्रेम प्रायः प्रकट नहीं होता है। मैथुन से पूर्व या मैथुन के समय अथवा बाद में इस राशि के जातक कोई क्रीड़ा नहीं करते हैं। हाँ, दन्त-नख का भी खूब प्रयोग करते हैं।
इस राशि के जातक स्त्री-पुरूष का मैथुन बड़ा कठोर होता है। पसीने से लथपथ हो जाने के बाद भी नहीं रुकता है। अपनी पूर्ण संतुष्टि करने के बाद ही एक-दूसरे के पास से हटते हैं। इनकी यह विशेषता है। आपस में प्रगाढ़ प्यार भी होता है।
इस राशि के जातक प्रायः भाग्यशाली होते हैं। अतएव दाम्पत्य जीवन में आर्थिक कठिनाई बहुत काम आती है। सुखमय जीवन होता है पर विपरीत साथी इसके मैथुन से दुःखी रहता है। इस राशि का मैथुन नीच ग्रहों की छाया में अत्यन्त विकृत और घृणित हो जाया करता है। फलतः कलह, वाद-विवाद बढ़ता है। इस राशि के जातक पुरूष को स्त्री बड़ी कठिनता से संभाल पाती है। फिर भी जीवन की गाड़ी दोनों ढकेलकर ले ही जाती हैं।

यह जानकारी ज्योतिष के विद्वान पंडित श्री राकेश शास्त्री जी की अनमोल कृति है। आशा है यह हम सभी का  मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होगी और हम सभी इस जानकारी से लाभ प्राप्त कर सकेंगे।