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Saturday, May 9, 2020

देवपूजन में कुछ विचारणीय तथ्य

  1. देवपूजा में पुष्प अधोमुख कर न चढ़ायें। वे जैसे उत्पन्न होते हैं वैसे ही चढ़ायें। बिल्वपत्र को उल्टा करके (अधोमुख) चढ़ायें तथा कुशा के अग्रभाग से देवताओं पर जल न छिड़कें। 
  2. धोती में रखा हुआ और जल में डुबाया हुआ पुष्प देवगण ग्रहण नहीं करते हैं। 
  3. भगवन शंकर को कुन्द, श्रीविष्णु को धतूरा, देवी को आक तथा मदार और सूर्य को तगर का पुष्प नहीं चढ़ाना चाहिए। 
  4. श्री विष्णु को चावल, गणेश को तुलसी, दुर्गा को दूर्वा और सूर्य को बिल्वपत्र न चढ़ायें। 
  5. देवताओं के प्रीत्यर्थ प्रज्ज्वलित दीपक को बुझाना नहीं चाहिए। 
  6. हाथ में धारण किये गये पुष्प, ताम्रपात्र में रखा गया चन्दन और चर्मपात्र में रखा गया गंगा जल अपवित्र हो जाता है। 
  7. दीपक को दीपक से जलाने पर मनुष्य दरिद्र और रोगी होता है। 
  8. एक हाथ से प्रणाम करने तथा एक प्रदक्षिणा करने से पुण्य नष्ट होता है। केवल चंडी और विनायक की एक ही प्रदक्षिणा का विधान मिलता है। 
  9. मांगलिक कार्यों में दूसरों की पहनी हुई अंगूठी धारण नहीं करनी चाहिए। 
  10. सभी पूजाक्रमों में पत्नी को दक्षिण (दाहिने) में बैठने का विधान है किन्तु अभिषेक और विप्रपादप्रक्षालन तथा सिन्दूर दान के समय वाम भाग में अर्धांगिनी के बैठने का विधान शास्त्र सम्मत है। 
  11. स्त्री आचमन के स्थान पर जल से नेत्रों को पोंछ ले।
  12. स्त्रियों के बायें हाथ में ही रक्षा सूत्र बाँधने के शास्त्रीय विधान है। 
  13. यज्ञ के अंत में पान-सुपारी अक्षत आदि सहित घृत से भरे हुए नारियल को पीले वस्त्र में लपेट कर रक्षासूत्र एवं माला आदि से वेष्ठित कर पंचोपचार से पूजन कर पूर्णाहुति दें।  किन्तु वैवाहिक होम में और घर के भीतर नित्य होम में पूर्णाहुति न दें। 
  14. शनिवार, मंगलवार, बुधवार एवं शुक्रवार को लक्ष्मी की पूजा प्रारम्भ न करें।
  15. स्कन्द पुराण के अनुसार लक्ष्मी प्राप्ति के लिए पौष शुक्ल दशमी, चैत्र शुक्ल पञ्चमी तथा श्रावण की पूर्णिमा को लक्ष्मी का अनुष्ठान एवं पूजन करने से अभीष्ट की उपलब्धि होती है।

Tuesday, April 26, 2016

अनिष्ट ग्रहों की शान्ति के लिए उपयोगी रत्न (नग) एवं उपरत्न

शुभ ग्रहों के प्रभाव में वृद्धि और अनिष्ट ग्रहों के कुप्रभाव के निवारण हेतु उपयुक्त ग्रह रत्न (नग) धारण करने अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होते हैं। अपनी जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों की स्थिति एवं अपनी राशि के अनुसार ही उपयुक्त रत्न (नग) का चयन करना चाहिए अन्यथा कई बार लाभ की अपेक्षा ग़लत नग धारण करने से हानि की सम्भावना हो जाती है। इसलिए इन्हे धारण करने से पूर्व यदि सुयोग्य ज्योतिषी से परामर्श कर लिया जाये तो लाभप्रद होगा। 

रत्न धारण करने की विधि उपयोग आदि का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है:-

सूर्य रत्न माणिक (RUBY)

संस्कृत में इसे माणिक्य, पद्मराग, हिंदी में माणक, मानिक तथा अंग्रेज़ी भाषा में रूबी कहते हैं। सूर्य रत्न होने से इस ग्रह रत्न के अधिष्ठाता सूर्यदेव हैं।  

पहचान विधि - असली माणिक्य लाल सुर्ख वर्ण का पारदर्शी, स्निग्ध-कान्तियुक्त और वजन में कुछ भारीपन लिए हुआ होता है। हथेली में रखने से हलकी ऊष्णता एवं सामान्य से कुछ अधिक वजन का अनुभव होता है। काँच के पात्र में रखने से इसकी हल्की लाल किरणें चारों तरफ़ से निकलती दिखाई देंगी। गाय के दूध में असली माणिक्य रखा जाये तो दूध का रंग गुलाबी दिखलाई देगा। अतएव असली एवं शुद्ध माणिक स्निग्ध, चिकना, कांतियुक्त, पानीदार, भारीपन लिए तथा कनेर पुष्प जैसे लाल वर्ण का होना चाहिए। 

धारण विधि - माणिक्य रत्न रविवार को सूर्य की होरा में, कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, रविपुष्य योग में सोने अथवा ताँबे की अंगूठी में जड़वा कर तथा सूर्य के बीजमंत्रों द्वारा अंगूठी अभिमंत्रित करके अनामिका ऊँगली में धारण करनी चाहिये। इसका वजन ३, ५, ७ अथवा ९  रत्ती के क्रम से होना चाहिए। 

सूर्य बीज मंत्र - ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः 

धारण करने के उपरान्त गायत्री मंत्र की ३ माला का पाठ, हवन एवं सूर्य भगवान को विधिपूर्वक अर्घ्य प्रदान करना तथा ताम्र बर्तन, कनक, नारियल, मानक, गुड़, लाल वस्त्रादि जैसी सूर्य से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करना चाहिए। 

विधिपूर्वक माणिक्य धारण करने से राजकीय क्षेत्रों में प्रतिष्ठा, भाग्योन्नति, पुत्र संतान लाभ, तेजबल में वृद्धि कारक तथा हृदय रोग, चक्षुरोग, रक्त विकार, शरीर दौर्बल्यादि में लाभकारी होता है। 

मेष, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक एवं धनु राशि अथवा इसी लग्न वालो को माणिक धारण करना शुभ लाभप्रद रहता है। जिनकी चन्द्र कुंडली में सूर्य योगकारक होता हुआ भी प्रभावी न  हो रहा  हो उनके लिए भी माणिक धारण करना शुभ रहता है।

चन्द्र रत्न मोती (PEARL)

संस्कृत में इसे मौक्तिक, मुक्तक, चन्द्रमणि, इत्यादि, हिंदी-पंजाबी में मोती तथा अंग्रेज़ी भाषा में पर्ल (Pearl) कहा जाता है।  मोती या मुक्त रत्न का स्वामी चन्द्रमा है।   

पहचान विधि - शुद्ध एवं श्रेष्ठ मोती गोल, श्वेत, उज्ज्वल, चिकना, चन्द्रमा के समान कान्तियुक्त, निर्मल एवं हल्कापन लिए होता है।

परीक्षा  - (१) गोमूत्र को किसी मिट्टी के बर्तन में डालकर उसमें मोती रात भर रखें यदि वह अखण्डित रहे तो मोती को शुद्ध समझें। (२) पानी से भरे शीशे के गिलास में मोती डाल दें यदि पानी से किरणें सी निकलती दिखाई पड़े तो मोती असली जानें। शुद्ध मोती के अभाव में चन्द्रकांत मणि अथवा सफ़ेद पुखराज धारण किया जा सकता है।

असली शुद्ध मोती धारण करने से मानसिक शक्ति का विकास, शारीरिक सौंदर्य की वृद्धि, स्त्री एवं धनादि सुखों की प्राप्ति होती है। इसका प्रयोग स्मरणशक्ति में भी वृद्धिकारक होता है।

रोग शान्ति - चिकित्सा शास्त्र में भी मोती या मुक्ता भस्म का उपयोग मानसिक रोगों, मूर्छा-मिर्गी, उन्माद, रक्तचाप, उदर-विकार, पथरी तथा दन्त रोगादि में होता है। 

धारण विधि - मोती चांदी की अंगूठी में शुक्ल पक्ष के सोमवार को, पूर्णिमा को, चन्द्रमा की होरा में गंगा जल, कच्चे दूध में स्नान करवाते हुए चन्द्र के बीज मंत्र - ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः का ११००० की संख्या में जाप करने के उपरान्त धारण करना चाहिए। तदुपरांत चावल, चीनी, क्षीर, श्वेत फल एवं वस्त्रादि का दान करना शुभ होगा।

मोती २, ४, ६ अथवा ११ रत्ती का अनामिका या कनिष्ठिका अंगुली में हस्त, रोहिणी अथवा श्रवण नक्षत्र में सुयोग्य ज्योतिषी द्वारा बताए गए मुहूर्त्त में धारण करनी चाहिए। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक तथा मीन राशि/लग्न वालों को मोती शुभ रहता है।

चन्द्रमा का उपरत्न - चन्द्रकांत मणि (Moon Light Stone) - यह उपरत्न चाँदी जैसी चमक लिए हुए मोती रत्न के अभाव में उसका पूरक माना जाता है। इसको हिलाने से इस पर एक दूधिया जैसी प्रकाश रेखा चमकती है। यह रत्न भी मानसिक शान्ति, प्रेरणा, स्मरण शक्ति में वृद्धि तथा प्रेम में सफलता प्रदान करता है। लाभ की दृष्टि से चंद्रकांत मणि मलाई के रंग का (सफ़ेद और पीले के बीच का) उत्तम माना जाता है। इसे चाँदी में ही धारण करना चाहिए।

मंगल - रत्न मूंगा (CORAL)

संस्कृत में इसे प्रवाल, अंगारकमणि तथा अंग्रेज़ी भाषा में कोरल (Coral) कहा जाता है।  मूंगा मुख्यत: लाल, सिंधूरी, हिंगुल एवं गेरूआ वर्ण का होता है।    

पहचान विधि - गोल, चिकना, चमकदार एवं औसत से अधिक वजनी, सिंधूरी एवं शिंगरफ से मिलते जुलते रंग का मूंगा श्रेष्ठ माना जाता है। इसका स्वामी ग्रह मंगल है।

परीक्षा  - (१) असली मूंगे को ख़ून में डाल दिया जाये तो इसके चारों और गाढ़ा रक्त जमा होने लगता है। (२) असली मूंगा यदि गौ के दूध में डाल दिया जाए तो उसमें लाल रंग की झाई सी दिखने लगती है।

श्रेष्ठ जाति का मूंगा धारण करने से भूमि, पुत्र, एवं भ्रातृ सुख, नीरोगता आदि की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त रक्त-विकार, भूत-प्रेत बाधा, दुर्बलता, मन्दाग्नि, हृदय रोग, वायु-कफादि विकार, पेट विकारादि में मूंगे की भस्म अथवा पिष्टी का प्रयोग किया जाता है। मेष, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर, कुम्भ व मीन राशि एवं लग्न वालों को  सुयोग्य ज्योतिषी के परामर्शनुसार धारण करना लाभप्रद होगा। 

धारण विधि - शुक्ल पक्ष के मंगलवार को प्रातः मंगल की होरा में मृगशिर, चित्रा या घनिष्ठा नक्षत्र एवं मेष, मकर या वृश्चिक के चन्द्रमा कालीन सोने या ताँबे की अंगूठी में जड़वा कर बीज मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करके अनामिका अंगुली में ६, ८, १० या १२ रत्ती के वजन में धारण करना शुभ रहता है। धारण करने के उपरान्त मंगल स्तोत्र एवं मंगल ग्रह का दान शुभ होता है।

भौम बीज मंत्र - ॐ क्रां  क्रीं क्रौं सः भौमाय  नमः

शारीरिक स्वास्थ्य एवं कुंडली में मंगल नीच राशिस्थ हो तो सफ़ेद मूँगा भी धारण किया जा सकता है।

बुध रत्न पन्ना (EMERALD)

पन्ना बुध तरह का मुख्य रत्न है। संस्कृत में इसे मरकतमणि, अशमगर्भ, सौपर्णी हरितमणि, फ़ारसी ज़बान में जमरूद व  अंग्रेज़ी भाषा में इमराल्ड (Emerald) कहा जाता है।  पन्ना हरे रंग, स्वच्छ, पारदर्शी, कोमल, चिकना व चमकदार होता है। 

परीक्षा  - (१) शीशे के गिलास में साफ़ पानी और पन्ना डाल दिया जाये तो हरी किरणें निकलती दिखाई देंगी। (२) असली पन्ने को हाथ में लेने पर वह हल्का, कोमल व आँखों को शीतलता प्रदान करता है।

गुण - पन्ना धारण करने से बुद्धि तीव्र एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है। विद्या, बुद्धि, धन एवं व्यापर में वृद्धि के लिए लाभप्रद माना जाता है। पन्ना सुख एवं आरोग्यदायक भी है। यह रत्न जादू टोने, रक्त विकार, पथरी, बहुमूत्र, नेत्र रोग, दमा, गुर्दे के विकार, पाण्डु, मानसिक विकलतादि रोगों में लाभकारी माना जाता है। 

धारण विधि - यह नग शुक्ल पक्ष के बुधवार को अश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती, पू.फा. अथवा पुष्य नक्षत्रों में अथवा बुध की होरा में सोने की अंगूठी में दाएं हाथ की कनिष्ठिका (छोटी) अंगुली में बुध ग्रह के बीज मंत्र से अभिमंत्रित करते हुए धारण करना चाहिए। इसका वजन ३, ६, ७ रत्ती होना चाहिए।

बुध बीज मंत्र - ॐ ब्रां  ब्रीं  ब्रौं सः बुधाय  नमः

वृष, मिथुन, सिंह, कन्या, मकर व मीन राशि वालों को विशेष लाभप्रद रहता है।

गुरु रत्न पुखराज (TOPAZ)

पुखराज गुरु (बृहस्पति) ग्रह का मुख्या रत्न है। संस्कृत में इसे पुष्प राजा, पीतस्फटिक, पीतमणि, हिंदी में पुखराज तथा अंग्रेज़ी भाषा में टोपाज़ (Topaz) कहते हैं।   

पहचान विधि - जो पुखराज स्पर्श में चिकना, हाथ में लेने पर कुछ भारी लगे, पारदर्शी, प्राकृतिक चमक से युक्त हो वह उत्तम कोटि का माना जाता है।

परीक्षा  - (१) जहाँ किसी विषैले कीड़े ने काटा हो, वहां पर असली पुखराज घिस कर लगाने से विष उतर जाता है। (२) कसौटी पर घिसने से इसकी चमक और अधिक बढ़ जाती है। (३) २४ घंटे दूध में रखने के बाद  यदि चमक में अंतर न पड़े तो पुखराज असली होगा। इत्यादि

गुण - पुखराज धारण करने से बल, बुद्धि, स्वास्थ्य एवं आयु की वृद्धि होती है। वैवाहिक सुख, पुत्र संतान कारक एवं धर्म-कर्म में प्रेरक होता है। प्रेत- बाधा का निवारण एवं स्त्री के विवाहसुख की बाधा को दूर करने में सहायक होता है।

औषधि प्रयोग - इसको वैद्य के परामर्शनुसार केवड़ा एवं शहदादि के साथ देने से पीलिया, तिल्ली, पाण्डु रोग, खांसी, दंतरोग, मुख की दुर्गन्ध, बवासीर, मन्दाग्नि, पित्त-ज्वरादि में लाभदायक होता है। 

धारण विधि - पुखराज रत्न ३, ५, ७, ९ या १२ रत्ती के वजन का सोने की अंगूठी में जड़वा कर तर्जनी अंगुली में धारण करें, स्वर्ण या ताम्र बर्तन में कच्चा दूध, गंगा जल, पीले पुष्पों से एवं "ॐ ऐं  क्लीं बृहस्पतये नमः " के बीज मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करके धारण करना चाहिए। मंत्र संख्या १९ हज़ार रहेगी।

यह नग शुक्ल पक्ष के गुरुवार की होरा में अथवा गुरुपुष्य योग में या पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्र नक्षत्र में एवं कर्क, धनु या मीन के चन्द्रमा कालीन मुहूर्त्त में धारण करना चाहिए।

पुखराज धनु, मीन राशि के अतिरिक्त मेष, कर्क, वृश्चिक राशि वालों को लाभप्रद रहता है। धारण करने के बाद गुरु से सम्बंधित वस्तुओं का दान करना शुभ होता है।

गुरु का उपरत्न - सुनैला - इसे पुखराज का उपरत्न माना जाता है। पुखराज मूल्यवान होने के कारण सुनैला को उसके पूरक के रूप में धारण किया जा सकता है। श्रेष्ठ सुनैला हल्के पीले रंग (सरसों के जैसा पीलापन) का होता है। कई बार पुखराज से अधिक पीलापन लिए होता है। धारण विधि पुखराज के समान ही होगी।

शुक्र रत्न हीरा (DIAMOND)

शुक्र ग्रह का मुख्य प्रतिनिधित्व "हीरा" है। संस्कृत में इसे वज्रमणि हिंदी में हीरा तथा अंग्रेज़ी भाषा में डायमंड (Diamond) कहते हैं।  हीरा अत्यन्त चमकदार प्रायः श्वेत वर्ण का होता है।   

पहचान विधि - अत्यन्त चमकदार, चिकना, कठोर, पारदर्शी एवं किरणों से युक्त हीरा असली होता है।

परीक्षा  - (१) हीरा गर्म पिघले हुए घी में डाल दिया जाए तो घी तुरंत जमने लगता है। (२) धूप में यदि हीरा रखा जाये तो उसमें से इंद्रधनुष जैसी किरणें दिखाई देती हैं। (३) तोतले बच्चे के मुंह में रखने से बच्चा ठीक से बोलने लगता है। (४) अँधेरे में जुगनू की भांति चमकता है।

गुण - हीरे में वशीकरण करने की विशेष शक्ति होती है। इसके पहनने से वंश-वृद्धि, धन-लक्ष्मी व संपत्ति की वृद्धि, स्त्री व संतान सुख की प्राप्ति व स्वास्थ्य में लाभ होता है। वैवाहिक सुख में भी वृद्धिकारक माना जाता है।

अौषधीय गुण - हीरे की भस्म शहद-मलाई आदि के साथ ग्रहण करने से अनेक रोगों में लाभ होता है। जैसे - दौर्बल्यता, नपुंसकता, वायु प्रकोप, मन्दाग्नि, वीर्य विकार, प्रमेह दोष, हृदय रोग, श्वेत प्रदर, विषैला व्रण, बच्चों में सुखा रोग, मानसिक कमज़ोरी इत्यादि अौषधि का सेवन वैद्य के परामर्शनुसार करना चाहिए।  

धारण विधि - शुकलपक्ष के शुक्रवार वाले दिन, शुक्र की होरा में, भरणी, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र एवं शुक्र, वृष, तुला या मीन राशिगत हो तो, एक रत्ती या इससे अधिक वजन का हीरा सोने की अंगूठी में जड़वा कर शुक्र के बीज मंत्र  "ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः" का १६ हज़ार की संख्या में जाप करके शुभ मुहूर्त्त में धारण करना चाहिये। हीरा मध्यमा अंगुली में धारण करना चाहिए। धारण करने के दिन शुक्र ग्रह से सम्बंधित वस्तुएँ जैसे दूध, चांदी, दही, मिश्री, चावल, श्वेत वस्त्र, चंदनादि का दान यथाशक्ति करना चाहिए।

हीरा धारण करने की तिथि से ७ वर्ष पर्यन्त प्रभावकारी बन रहता है। हीरा वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर, कुम्भ राशि वालों को लाभदायक रहता है।

शुक्र के उपरत्न - 

फ़िरोज़ा - नीले आकाशीय रंग जैसा यह नग शुक्र का उपरत्न माना गया है। यह रत्न भूत, प्रेत, दैवी आपदा तथा आने वाले कष्टों से धारक की रक्षा करता है। यदि इस रत्न को कोई भेंट स्वरूप प्राप्त करके पहनेगा तो अधिक प्रभावशाली रहेगा। हल्के-प्रखर चमकदार रंग वाला रत्न उत्तम होता है। कोई भी कष्ट या रोग आने से पहले यह  रत्न अपना रंग बदल लेता है। नेत्र रोग, सौंदर्य, सिर दर्द, विषादि रोगों में विशेष लाभकारी रहता है।

ओपल - यह भी शुक्र का अन्य उपरत्न है, इसको धारण करने से सदाचार, सद्चिंतन तथा धार्मिक कार्यों की ओर रुचि रहती है। अधिक लोकप्रिय नहीं है।

इनके अतिरिक्त शुक्र के अन्य भी बहुत से उपरत्न प्रचलित हैं। 


शनि रत्न नीलम (SAPPHIRE)

नीलम शनि ग्रह का मुख्य रत्न है। संस्कृत भाषा में इसे नील, नीलमणि, इंद्रनील हिंदी में नीलम तथा अंग्रेज़ी भाषा में सैफायर (Sapphire) कहते हैं।     

पहचान विधि - असली नीलम  चमकीला, चमकीला, चिकना, मोरपंख के समान वर्ण वाला, नीली किरणों से युक्त एवं पारदर्शी होगा।

परीक्षा  - (१) असली नीलम को दूध में डाल दिया जाये तो दूध का रंग नीला लगता है। (२) पानी से भरे कांच के गिलास में डाला जाये तो नीली किरणें दिखाई देंगी। (३) सूर्य की धूप में रखने से नीले रंग की किरणें दिखाई देंगी।

गुण - नीलम धारण करने से धन-धान्य, यश-कीर्ति, बुद्धि चातुर्य, सर्विस एवं व्यवसाय तथा वंश में वृद्धि होती है। स्वास्थ्य सुख का लाभ होता है।

नीलम  शनि साढ़े साती के अनिष्ट प्रभाव का निवारण करता है।  बहुधा नीलम चौबीस घंटे के भीतर ही प्रभाव करना शुरू कर देता है। यदि नीलम अनुकूल न बैठे तो भारी नुकसान की आशंका होती है। अतएव परीक्षा के तौर पर कम से कम ३ दिन तक पास रखने पर यदि बुरे स्वप्न आएं, रोग उत्पन्न हो या चेहरे की बनावट में अंतर आ जाये तो नीलम मत पहने।

रोग शान्ति - नीलम धारण करने या अौषधि रूप में ग्रहण करने से दमा, क्षय, कुष्ट रोग, हृदय रोग, अजीर्ण, ज्वर, खांसी, नेत्र रोग, मस्तिष्क विकार, कुष्ठ रोग, मूत्राशय सम्बन्धी रोगों में लाभकारी रहता है। 

धारण विधि - नीलम ५, ७, ९, १२ अथवा अधिक रत्ती के वजन का पंचधातु, लोहे अथवा सोने की अंगूठी में शनिवार को शनि की होरा में एवं पुष्य, उभा, चित्र, स्वा, धनि या शतभिषा नक्षत्रों में शनि के बीज मंत्र  "ॐ प्रां प्रीं प्रों सः शनये नमः" मन्त्र से २३००० की संख्या में अभिमंत्रित करके धारण करें। तत्पश्चात शनि की वस्तओं का दान दक्षिणा सहित करना कल्याणकारी होगा।

राहु रत्न गोमेद (HESSONITE)

गोमेद राहु ग्रह का मुख्य रत्न है। संस्कृत भाषा में इसे गोमेदक, पिगस्फटिक, पीतरक्तमणि, तमोमणि हिंदी में गोमेद तथा अंग्रेज़ी भाषा में हेसोनायट (Hessonite) कहते हैं।  

गोमेद का रंग गोमूत्र के समान हल्के पीले रंग का, कुछ लालिमा तथा श्यामवर्ण होता है। स्वच्छ, भारी, गोमेद उत्तम होता है तथा उसमें शहद के रंग की झाई भी दिखाई देती है। 

पहचान विधि - सामान्यतः गोमेद उल्लू अथवा बाज की आँख के समान होता है तथा गोमूत्र के समान, दल रहित यानि जो परतदार न होआ, ऐसे गोमेद उत्तम होंगे।

परीक्षा  - (१) शुद्ध गोमेद को  २४ घंटे तक गोमूत्र में रखने से गोमूत्र का रंग बदल जायेगा।

धारण विधि - गोमेद रत्न शनिवार को शनि की होरा में, स्वाति, शतभिषा, आद्रा अथवा रविपुष्य योग में पंचधातु अथवा लोहे की अंगुठी में जड़वाकर तथा राहु के बीज मंत्र द्वारा अंगुठी अभिमंत्रित करके दाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करनी चाहिए। इसका वजन ५, ७, ९ रत्ती का होना चाहिए।

राहु का बीज मंत्र - ॐ भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः 

धारण करने के उपरान्त बीज मंत्र का पाठ, हवन एवं सूर्य भगवान को अर्घ्य प्रदान कर नीले रंग का वस्त्र, कम्बल, तिल, बाजरा आदि दक्षिणा सहित दान करें।

विधिपूर्वक गोमेद धारण करने से अनेक प्रकार की बीमारियां नष्ट होती है, धन-संपत्ति-सुख-संतान वृद्धि, वकालत व राजपक्ष आदि की उन्नति के लिए अत्यन्त लाभकारी है। शत्रु-नाश हेतु भी इसका प्रयोग प्रभावी रहता है।

जिनकी जन्मकुंडली में राहु १, ४, ५, ७, ९, १०वें  भाव में हो, उन्हें गोमेद रत्न पहनना चाहिए। मकर लग्न वालों के लिए गोमेद शुभ होता है।

केतु रत्न लहसुनिया (CATS EYE)

केतु-रत्न  लहसुनिया को संस्कृत भाषा में वैदूर्य, विडालाक्ष तथा अंग्रेज़ी भाषा में केट्स ऑय स्टोन  (Cats Eye Stone) कहते हैं।  

यह नग अँधेरे में बिल्ली की आँखों के समान चमकता है। लहसुनिया ४ रंगों में पाया जाता है। काली तथा श्वेत आभा युक्त लहसुनिया जिस पर यज्ञोपवीत के समान तीन धारियाँ खिंची हों, स्वच्छ औसत से कुछ अधिक वजनी वह वैदूर्य ही उत्तम होता है। इसे सूत्रमणि भी कहते हैं। 

पहचान विधि - (१) असली लहसुनिया को यदि हड्डी के ऊपर रख दिया जाए तो वह २४ घंटे के भीतर हड्डी के आर-पार छेद कर देता है। (२) असली वैदूर्य में ढाई या तीन सफ़ेद सूत्र होते हैं, जो बीच में इधर-उधर घूमते हिलते रहते हैं। 

धारण विधि - लहसुनिया रत्न बुधवार के दिन अश्विनी, मघा, मुला नक्षत्रों में रविपुष्य योग में पंचधातु की अंगुठी में कनिष्ठका अंगुली में धारण करें। धारण करने से पूर्व केतु के बीज मंत्र द्वारा अंगुठी अभिमंत्रित करें। ५ रत्ती से कम वजन का नहीं होना चाहिए। प्रत्येक ३ वर्ष के बाद नई अंगूठी में लहसुनिया जड़वाकर उसे अभिमंत्रित कर धारण करना चाहिए।

केतु का बीज मंत्र - ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः 

रत्न धारण करने बाद बुधवार को ही किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को तिल, तेल, कम्बल, धूम्रवर्ण का वस्त्र, सप्तधान्य (अलग-अलग रूप में ) यथशक्ति दक्षिणा सहित दान करें।

विधिपूर्वक लहसुनिया धारण करने से भूत प्रेतादि की बाधा नहीं रहती है। संतान सुख, धन की वृद्धि एवं शत्रु व रोग नाश में सहायता प्रदान करता है। 

Sunday, March 1, 2015

आजीविका के उपाय

अपना अध्ययन पूरा  करने के पश्चात प्रत्येक व्यक्ति रोज़गार के अवसर ढूंढता है। जीवनयापन के लिए धन कमाना गृहस्ठ की अनिवार्यता है। कई लोगों को अच्छे अवसर मिल जाते हैं, कई लोग धन के अभाव में कष्ट उठाते हैं। कुछ सरल उपायों का अवलम्बन आप के भाग्य का द्वार खोल सकता है, इनका उल्लेख नीचे किया जा रहा है:-
  1. किसी व्यक्ति को व्यवसाय में निरन्तर घाटा लग रहा हो तो वह ४१ दिनों तक सूर्योदय से पूर्व बिल्व वृक्ष के नीचे बैठकर "श्री रमायै नमः" मंत्र का जाप करे तो व्यावसायिक बाधाएं दूर हो जायेंगी। 
  2. कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी के लिए प्रयत्न कर रहा है अथवा प्रतियोगी परीक्षाओं की  तैयारी कर रहा है तो उसे नरसिंहलक्ष्मी की उपासना करनी चाहिए। यह स्तोत्र 'स्तोत्र रत्नावली' पुस्तक में उपलब्ध है। इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन नरसिंहलक्ष्मी के छविचित्र के सम्मुख एक बार करना चाहिये।
  3. जो लोग भूमि एवं निर्माण के व्यवसाय से जुड़े हैं उन्हें उन्नति के लिए वराह भगवान की उपासना करनी चाहिये। भागवत के पंचम स्कन्ध में पृथ्वी देवी द्वारा की गयी भगवान वराह की स्तुति का प्रतिदिन उनके चित्र के समक्ष एक बार पाठ करना चाहिये। 
  4. जो व्यक्ति पहले से ही किसी पद पर कार्यरत हैं एवं पदोन्नति चाहता है तो उसे भगवान के पार्षद  'चक्रराज सुदर्शन' की स्तुति करनी चाहिये। दक्षिण भारत से प्रकाशित रामानुज सम्प्रदाय के स्तोत्र ग्रंथों में यह स्तुति उपलब्ध है। 
  5. कोई व्यक्ति व्यवसाय में निरंतर मेहनत कर रहा हो फिर भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही हो, कारोबारी सौदे  प्रायः बनते बनते बिगड़ जाते हों तो उसे भरत जी की उपासना करनी चाहिये। भरत जी का ऐसा चित्र सामने रखना चाहिए जिसमे भरत जी श्री राम जी की चरण पादुकाओं का पूजन कर रहे हों। 
                   "विश्व भरत पोषण कर जोई 
                            ताकर राम भरत अस होई"

            इस चौपाई के सवा लाख ४५ दिन में  करने पर अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।


यह लेख श्री मञ्जूषा पत्रिका में भरत शास्त्री जी द्वारा प्रकाशित किया गया था। अपने और पाठकों के कल्याणार्थ इस ब्लॉग में पुनः प्रकाशित कर रहा हूँ। आशा है पाठक इससे अवश्य लाभान्वित होंगे।

Saturday, December 13, 2014

ज्योतिष शास्त्र के अचूक उपाय

संसार में  बहुत से लोग हैं जिन्हे अपने जन्म समय, जन्म तिथि और जन्म स्थान के बारे में न तो पता है न ही उन्होंने कभी अपनी जन्मपत्रिका ही बनवाई  है।  ऐसी स्थिति में ज्योतिष विद्या मानव जीवन की अनेक समस्याओं का हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।  इस के उपायों के द्वारा बेहद अचूक परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

धन प्राप्ति के उपाय
  • नमक को कभी भी खुले बर्तन में न रखे। 
  • प्रतिदिन पीपल की जड़ में जल डालें। 
  • अपने घर के प्रत्येक दरवाज़े के कब्ज़े में तेल लगाये ताकि उनमें से 'चू चू'  की आवाज़ ना आये। 
  • भोजन तैयार करते समय पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकले। 
  • जब भी अपनी बहन या बुआ को घर पर आमंत्रित करें तो उसे खाली हाथ न भेजें । 
  • जब भी घर का फ़र्श साफ़ करें तो उसमे थोड़ा सा नमक मिला लें।

धन के ठहराव के लिए उपाय
  • नोटों की गिनती कभी भी उँगलियों पर थूक लगा कर न करें।
  • कभी भी सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू न लगाये। 
  • बुधवार के दिन किसी भी किन्नर को हैसियत दान दे कर उससे कुछ पैसे वापिस ले लें। 
  • बुधवार को किसी को भी पैसे उधार न दें।

शीघ्र विवाह हेतु उपाय 
  • हमेशा अपने से बड़े व्यक्तियों और बुज़ुर्गों का सम्मान करें। 
  • जब भी आप स्नान करें तो उसमें थोड़ा सा हल्दी पाउडर मिला लें। 
  • अगर हो  सके तो अपने घर पर एक खरगोश पाले और हर बुधवार को उसे हरी घास खाने को दें। 
  • नव-विवाहित व्यक्ति के पुराने वस्त्रों का उपयोग करें। 
  • देवगुरु बृहस्पति का  पूजन करें। 
  • जब कभी भी आप के माता-पिता आपके लिए वर देखने जाएं उस दिन लाल वस्त्र धारण करें और उनके वापिस लौटने तक अपने बाल खुले रखें। 
  • रात को सोने से पूर्व अपने सिर के पास आठ खजूर और प्रातःकाल उसे चलते पानी में बहा दें। 
  • शनिवार की रात्रि चौराहे पर नया बंद ताला चाभी के साथ रख आयें। 

सुखी विवाहित जीवन के लिए उपाय
  • अपने जीवन साथी को कम आय के लिए कभी भी ताने न मारें। 
  • प्रतिदिन प्रातः केले और पीपल के पेड़ का पूजन करें।
  • हमेशा अपना मासिक वेतन अपनी पत्नी को दें और उससे कह दें कि इसका उपयोग करने से पहले एक बार इसे तिजोरी में रख ले। 
  • अपनी पत्नी का सम्मान सदैव 'लक्ष्मी' की भाँति ही करें।
  • पति के भोजन करने के उपरान्त पत्नी को पति की जूठी  थाली में से कुछ भोजन ग्रहण करना चाहिए। 

बच्चों की शिक्षा सम्बन्धी कुछ उपाय 
  • बच्चों को ११ तुलसी-पत्र के रस में मिश्री मिलाकर दें इससे उनकी एकाग्रता में वृद्धि होगी। 
  • प्रतिदिन सूर्य भगवान को जल अर्पित करें। 
  • प्रतिदिन २१ बार गायत्री मंत्र का उच्चारण करें।
  • विद्यार्थी अपने अध्ययन कक्ष में विद्या की देवी माँ सरस्वती का चित्र लगायें। 
  • इमली की २२ पत्तियाँ लें उनमें से ११ पत्तियाँ सूर्य देवता को अर्पित कर दें और शेष अपनी पुस्तक में रख लें। 
  • रात्रि सोने से पूर्व ११ बार "ॐ ऐं  सरस्वत्यै नमः" मंत्र का उच्चारण करें। 
  • अपने अध्ययन कक्ष में हरे रंग के परदे लगायें।   

स्वयं में विश्वास उत्पन्न करने के लिए उपाय 
  • रविवार को लाल रंग के बैल को गुड़ खिलायें। 
  • अपने घर के मंदिर में लाल रंग के बैल का खिलौना रखें। 
  • प्रतिदिन अपने दांत फिटकरी पाउडर से साफ़ करें। 
  • शक्कर मिश्रित जल सूर्य भगवान को अर्पित करें। 

रोगों से छुटकारा पाने हेतु उपाय 
  • दवाइयाँ  शुरु करने से पहले उन्हें कुछ समय के लिए शिव मंदिर में रख दें। 
  • अपनी शयन करने की चारपाई के चारों पाँवों में चांदी की कील लगायें। 
  • जब भी जल पिएं उसमे थोड़ा सा गंगा जल दाल लें। 
  • प्रतिदिन प्रातः हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करें। 
  • अपने बुरे कर्मों के  पिता परमेश्वर से क्षमा याचना करें। 

व्यवसाय में वृद्धि हेतु उपचार
  • एक लाल रंग के कपड़े में थोड़ा सा लाल चन्दन पाउडर बांधे और उसे अपनी तिजोरी में रखें। 
  • अपने व्यवसाय में अपनी पत्नी को हिस्सेदार बनाये। 
  • आप अपने पहले ग्राहक से जो भी धनराशि कमाते हैं उसमें से कुछ धनराशि किसी जरूरतमंद को अवश्य दान करें। 
  • प्रातः अपने घर से आप जब व्यवसाय वाले स्थान पर जाने के लिए निकले तो रास्ते में कही और न रुक कर सीधा अपने व्यवसाय वाले स्थान पर ही जाएं ।

नौकरी प्राप्त करने हेतु उपाय 
  • "ॐ  श्रीं  श्रीं  क्री ग्लो गं गणपतये वर वरदाय मम  नमः" इस मंत्र का प्रतिदिन १०८ बार जप करें।
  • रोजगार हेतु साक्षात्कार के लिए जाते समय एक चम्मच दही-शक्कर खा कर जाएँ। 
  • साक्षात्कार के लिए घर से निकलते समय पहले दाहिना पैर बाहर  निकालें और अपने परिवार के सदस्य से आपके ऊपर से साबुत मूंग घुमा कर बाहर फैंकने  के लिए कहें। 
  • जब भी साक्षात्कार के लिये जायें तो जो भी मंदिर पहले आप के रास्ते में आये वहां पर नारियल चढ़ाये। 
  • शीघ्र नौकरी प्राप्त करने के लिए शनि सम्बन्धी कुछ उपाय करें। 

कर्ज़ से छुटकारा पाने हेतु उपाय
  • अपने घर और व्यवसाय के स्थान का मध्य स्थान खाली और साफ़ रखें।
  • अपने घर में ख़राब हुई वस्तुएँ जैसे बिजली का ख़राब सामान, ख़राब घड़ियाँ और अन्य ख़राब सामान न रखें। 
  • अपने ऋण के बारें में बार-बार बात न करें। 
  • अपने घर के गंदे जल का निकास उत्तर पूर्व की ओर रखें। 
  • अपने कर्मचारियों का ध्यान रखे और सम्मान करें। 
  • रविवार को प्रातः नदी में नारियल विसर्जित करें।

Monday, March 4, 2013

बुरी फेंग शुई का घर में प्रवेश कैसे होता है?

बुरी फेंग शुई का प्रवेश घर के अंदर, घर की संरचना तथा अनावश्यक वस्तुओं को रकने से भी होता है. वस्तुओं को ग़लत जगह रखने से भी बुरी फेंग शुई का प्रवेश होता है. बुरी फेंग शुई प्रवेश करने के कुछ उदाहरण इस प्रकार से हैं :-
  • मकान के मुख्य द्वार के आगे शौचालय या रसोईघर का दरवाजा होना 
  • मुख्य द्वार के आगे दीवार या खम्भा होना 
  • सोने वाले स्थान के उपर बीम होना 
  • मुख्य दीवार के आगे दर्पण होना 
  • घर के अंदर घुमावदार सीढ़ियाँ होना 
  • सबसे ऊपरी मंजिल के फ्लैट में रहना 
  • सूखे फूलों को घर में रखना 
  • अलमारी का दरवाजा खुला रखना 
  • शौचालय के दरवाजों को खुला रखना 
  • हिंसात्मक चित्र घर में लगाना 
  • शयन कक्ष में शीशा होना 
  • दरवाजे के सामने सिर या पैर कर के सोना 
  • शयन कक्ष में मछली घर होना 
  • झाड़ू को खुली जगह रखना 
  • अनावश्यक वस्तुओं को घर में रखना 
  • किचन में गैस का चूल्हा और सिंक का एक साथ होना 
  • चाकू, कैंची खुले रखना 
  • खुली खिड़की तथा दरवाजे की तरफ पीठ करके बैठना
  • नल की टंकी या टूटी से पानी का फालतू बहना 
  • फर्नीचर का तिकोना होना 
  • खाली दीवार की तरफ मुंह करके बैठना या सिर करके सोना 
  • फैक्स, टेलीफोन, कंप्यूटर का अनुचित स्थान पर होना 
  • टूटे हुए शीशे घर में रखना 
  • कैक्टस के पौधे घर के अंदर होना
  • डूबता जहाज़ या तिकोने पहाड़ों के चित्र का होना 
  • पलंग के अंदर अनावश्यक वस्तुएं संभाल कर रखना 

Wednesday, October 24, 2012

ग्रहों के वर्जित दान एवं कार्य

अक्सर अपने दैनिक जीवन में प्राय: हम एक कहावत विभिन्न अर्थों में सुनते हैं कि "नेकी कर दरिया में डाल" या नेकी करो और भूल जाओ. कभी-कभी अच्छे शब्दों में भी सुनते हैं, कि हम किसी के लिए कितना ही अच्छा क्यों न करें लेकिन बदले में हमेशा बुराई ही हाथ लगती है.

एक व्यक्ति किसी गरीब को भोजन कराता है, तो खाने वाला बीमार पड जाता है. किसी नें किसी को धन उधार दिया तो उसकी वसूली के समय देनदार नें कोई गलत कदम उठा लिया और बेचारा लेनदार बिना वजह मुसीबत में फँस गया. किसी की मदद करने चले तो उल्टा स्वयं ही अपने लिए मुसीबत मोल ले बैठे. अमूमन ऎसी सैकडों प्रकार की घटनायें आये दिन किसी न किसी प्रकार से किसी न किसी के साथ घटती ही रहती हैं.

दरअसल यह सब निर्भर करता है हमारी जन्मकुँडली में बैठे ग्रहों पर, जो यह संकेत करते हैं कि किस वस्तु का दान या त्याग करना अथवा कौन से कार्य हमारे लिए लाभदायक होगें और कौन सी चीजों के दान/त्याग अथवा कार्यों से हमें हानि का सामना करना पडेगा. इसकी जानकारी निम्नानुसार है.

जो ग्रह जन्मकुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, उनसे सम्बन्धित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए.

सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिँह राशि में होने पर अपनी स्वराशि का होता है.

अत: आपकी जन्मकुंडली में उक्त किसी राशि में हो तो:-

* लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें.

* गुड, आटा, गेहूँ, ताँबा आदि किसी को न दें.

* खानपान में नमक का सेवन कम करें. मीठे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए.

चन्द्र वृष राशि में उच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है. यदि आपकी जन्मकुंडली में ऎसी स्थिति में हो तो :-

* दूध, चावल, चाँदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें.

* माता अथवा मातातुल्य किसी स्त्री का कभी भूल से भी दिल न दुखायें अन्यथा मानसिक तनाव,   

  अनिद्रा एवं किसी मिथ्या आरोप का भाजन बनना पडेगा.

* किसी नल, टयूबवेल, कुआँ, तालाब अथवा प्याऊ निर्माण में कभी आर्थिक रूप से सहयोग न करें.

मंगल
मेष या वृश्चिक राशि में हो तो स्वराशि का तथा मकर राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--* मसूर की दाल, मिष्ठान अथवा अन्य किसी मीठे खाद्य पदार्थ का दान नहीं करना चाहिए.

* घर आये किसी मेहमान को कभी सौंफ खाने को न दें अन्यथा वह व्यक्ति कभी किसी अवसर पर आपके खिलाफ ही कडुवे वचनों का प्रयोग करेगा.

* किसी भी प्रकार का बासी भोजन (अधिक समय पूर्व पकाया हुआ) न तो स्वयं खायें और न ही किसी अन्य को खाने के लिए दें.


बुध मिथुन राशि में तो स्वगृही तथा कन्या राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में बुध उपरोक्त वर्णित किसी स्थिति में है तो :--* हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए.

* साबुत मूँग, पैन-पैन्सिल, पुस्तकें, मिट्टी का घडा, मशरूम आदि का दान न करें अन्यथा सदैव रोजगार और धन सम्बन्धी समस्यायें बनी रहेंगी.

* न तो घर में मछलियाँ पालें और न ही मछलियों को कभी दाना डालें.

बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में :--

* पीले रंग के पदार्थों का दान वर्जित है.

* सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुएं आदि का दान नहीं करना चाहिए. अन्यथा "घर का जोगी जोगडा, आन गाँव का सिद्ध" जैसी हालात होने लगेगी अर्थात मान-सम्मान में कमी रहेगी.

* घर में कभी कोई लतादार पौधा न लगायें.



शुक्र
जब जन्मपत्रिका में वृष या तुला राशि में हो स्वराशि तथा मीन राशि में हो तो उच्च भाव का होता है. अत ऎसी स्थिति में:--

* ऎसे व्यक्ति को श्वेत रंग के सुगन्धित पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यक्ति के भौतिक सुखों में न्यूनता पैदा होने लगती है.

* नवीन वस्त्र, फैशनेबल वस्तुएं, कास्मेटिक या अन्य सौन्दर्य वर्धक सामग्री, सुगन्धित द्रव्य, दही, मिश्री, मक्खन, शुद्ध घी, इलायची आदि का दान न करें अन्यथा अकस्मात हानि का सामना करना पडता है.


शनि
यदि मकर या कुम्भ राशि में हो तो स्वगृही होता है तथा तुलाराशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी दशा में :--

* काले रंग के पदार्थों का दान न करें.

* लोहा, लकडी और फर्नीचर, तेल या तैलीय सामग्री, बिल्डिंग मैटीरियल आदि का दान/त्याग न करें.


* भैंस अथवा काले रंग की गाय, काला कुत्ता आदि न पालें.

राहु यदि कन्या राशि में हो तो स्वराशि का तथा वृष (ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं मिथुन (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--

* नीले, भूरे रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए.

* मोरपंख, नीले वस्त्र, कोयला, जौं अथवा जौं से निर्मित पदार्थ आदि का दान किसी को न करें अन्यथा ऋण का भार चढने लगेगा.

* अन्न का कभी भूल से भी अनादर न करें और न ही भोजन करने के पश्चात थाली में झूठन छोडें.


केतु
यदि मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा वृश्चिक (ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं धनु (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में केतु उपरोक्त स्थिति में है तो :--

* घर में कभी पक्षी न पालें अन्यथा धन व्यर्थ के कामों में बर्बाद होता रहेगा.


* भूरे, चित्र-विचित्र रंग के वस्त्र, कम्बल, तिल या तिल से निर्मित पदार्थ आदि का दान नहीं करना चाहिए.

* नंगी आँखों से कभी सूर्य/चन्द्रग्रहण न देंखें अन्यथा नेत्र ज्योति मंद पड जाएगी अथवा अन्य किसी प्रकार का नेत्र सम्बन्धी विकार उत्पन होने लगेगा.


मकान की लग्न कुंडली

जिस प्रकार व्यक्ति पर ग्रह-गोचर की स्थिति का प्रभाव पड़ता है, उसी तरह मकान की कुंडली को भी ग्रह प्रभावित करते हैं। मकान की प्रतिकूल ग्रह स्थिति होने पर ग्रह शांति कराने से लाभ संभव है।


जिस प्रकार व्यक्ति की जन्म कुंडली होती है, उसी तरह मकान की भी जन्म कुंडली बनती है। भवन की जन्म कुंडली दो प्रकार की होती है। एक गृहारंभ के समय की तथा दूसरी गृह प्रवेश के समय की। जो संबंध शरीर और आत्मा का है अथवा जो कंप्यूटर की भाषा में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का है, वही गृहारंभ कुंडली और गृह प्रवेश की कुंडली का है।

भौगोलिक भूभाग का नाम देश है जो मूर्त होता है। अपने देश के प्रति जुड़ा रहना, वहां की नागरिकता होना यही राष्ट्रीयता है। इसका आधार राष्ट्र है। शरीर का ढांचा जो दिखाई देता है, वह मूर्त है। लेकिन चेतन धर्मा आत्मा अमूर्त है। कंप्यूटर में जो कुछ ढांचा दिखाई देता है, वह हार्डवेयर है तथा जो कार्यों को गति देता है, वह अमूर्त है- सॉफ्टवेयर कहलाता है। भवन के विषय में भी यही बात चरितार्थ होती है। कहावत है पुरूष मकान बनाता है और महिला उसे आशियाना [निवास] बनाती है।

जिस समय भवन की आधारशिला रखी जाती है, उस समय की लग्न कुंडली ही भवन की जन्म कुंडली है। उस कुंडली के अष्टम भाव से उस भवन की आयु का निर्णय किया जाता है। यदि उस कुंडली के अष्टम से मंगल का संबंध है तो अग्नि भय से भवन नष्ट होना संभव है। इसी प्रकार यदि अष्टम भाव से शुक्र चंद्र का संबंध हो और ये ग्रह निर्बल हों तो अधिक वर्षा के कारण मकान को क्षति होना संभव है। यदि अष्टम भाव पर शनि की दृष्टि हो तो तूफान के कारण मकान को क्षति होगी। अष्टम भाव से राहु का संबंध मकान पर अतृप्त आत्मा के प्रभाव की ओर संकेत करता है। अर्थात घर में पितर दोष होता है। कुंडली में पराक्रम भाव [तृतीय स्थान] धर्म भाव [नवम स्थान] एवं लाभ भाव [एकादश भाव] से सौम्य ग्रहों का संबंध मकान की सुख-समृद्धि कारक होने का संकेत है। संतान भाव [पंचम स्थान] और नवम भाव का सौम्य ग्रहों से संबंध वंशवृद्धि का सूचक है। भवन की कुंडली में केंद्र [1-4-7-10] त्रिकोण [5-9] एवं तृतीय एकादश भाव में से किसी भाव में बृहस्पति का होना मकान को सौभाग्यशाली बनाता है।

मकान के गृह प्रवेश के लग्न का अपना महžव है। लग्न, मकान में रहने वालों का जीवन कैसा समृद्धिशाली होगा, इस ओर संकेत करता है। यदि गृह प्रवेश कुंडली के लग्न का स्वामी अथवा दशम भाव का स्वामी छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो मकान का स्वामी अपने मकान का उपयोग नहीं कर पाता है या तो मकान किराए पर चलता है अथवा मकान मालिक के द्वारा मकान विक्रय कर दिया जाता है। यदि मंगल की दृष्टि लग्न पर हो अथवा मंगल का चतुर्थ भाव से संबंध हो तो गृह प्रवेश के पश्चात भी मकान में और निर्माण कार्य अतिशीघ्र कराया जाता है। यदि चतुर्थ भाव का संबंध शुक्र से हो तो गृह प्रवेश के थोड़े से ही अंतराल के पश्चात मकान मालिक को विशेष प्रकार के [अधिक सुविधायुक्त] वाहन का सुख प्राप्त होता है। गृह प्रवेश कुंडली में यदि बृहस्पति केंद्र अथवा त्रिकोण में हो तो गृह प्रवेश के पश्चात तेरह मास में उस घर में विवाह संपन्न होता है। यदि गृह प्रवेश लग्न से षष्ठ, अष्टम अथवा व्यय भाव में मकान मालिक का जन्म लग्न अथवा जन्म राशि हो तो क्रमश: विवाद-शत्रुता, लड़ाई-झगड़ा, शारीरिक कष्ट एवं आर्थिक संकट से मकान मालिक को गुजरना पड़ता है। गृह प्रवेश लग्न से अष्टम अथवा द्वादश भाव में राहु की स्थिति मकान में रहने वालों को पितर बाधा से पीडि़त करती है। जिस प्रकार व्यक्ति पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, उसी प्रकार मकान की कुंडली पर भी पाप ग्रहों का प्रभाव पड़ता है। ऎसी स्थिति में वास्तु शांति या ग्रह शांति कराने से लाभ होता है।



Tuesday, August 7, 2012

रत्न कौन सा धारण किया जाये?


रत्नों से संबंधित गलत धारणाएं
दुनिया भर में लोगों के द्वारा रत्न धारण करने का प्रचलन बहुत पुराना है तथा प्राचीन समयों से ही दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोग इनके प्रभाव के बारे में जानने अथवा न जानने के बावज़ूद भी इन्हें धारण करते रहे हैं। आज के युग में भी रत्न धारण करने का प्रचलन बहुत जोरों पर है तथा भारत जैसे देशों में जहां इन्हें ज्योतिष के प्रभावशाली उपायों और यंत्रों की तरह प्रयोग किया जाता है वहीं पर पश्चिमी देशों में रत्नों का प्रयोग अधिकतर आभूषणों की तरह किया जाता है। वहां के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के रत्नों की सुंदरता से मोहित होकर इनके प्रभाव जाने बिना ही इन्हें धारण कर लेते हैं। किन्तु भारत में रत्नों को अधिकतर ज्योतिष के उपाय के तौर पर तथा ज्योतिषियों के परामर्श के अनुसार ही धारण किया जाता है। किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के अनुसार उसके लिए उपयुक्त रत्न चुनने को लेकर दुनिया भर के ज्योतिषियों में अलग-अलग तरह के मत एवम धारणाएं प्रचलित हैं। आइए इन धारणाओं के बारे में तथा इनकी सत्यता एवम सार्थकता के बारे में चर्चा करते हैं।
सबसे पहले पश्चिमी देशों में प्रचलित धारणा के बारे में चर्चा करते हैं जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति की सूर्य राशि को देखकर उसके लिए उपयुक्त रत्न निर्धारित किए जाते हैं। इस धारणा के अनुसार एक ही सूर्य राशि वाले लोगों के लिए एक जैसे रत्न ही उपयुक्त होते हैं जो कि व्यवहारिकता की दृष्टि से बिल्कुल भी ठीक नहीं है। सूर्य एक राशि में लगभग एक मास तक स्थित रहते हैं तथा इस धारणा के अनुसार किसी एक मास विशेष में जन्में लोगों के लिए शुभ तथा अशुभ ग्रह समान ही होते हैं। इसका मतलब यह निकलता है कि प्रत्येक वर्ष किसी माह विशेष में जन्में लोगों के लिए शुभ या अशुभ फलदायी ग्रह एक जैसे ही होते हैं जो कि बिल्कुल भी व्यवहारिक नहीं है क्योंकि कुंडलियों में ग्रहों का स्वभाव तो आम तौर पर एक घंटे के लिए भी एक जैसा नहीं रहता फिर एक महीना तो बहुत लंबा समय है। इसलिए मेरे विचार में इस धारणा के अनुसार रत्न धारण नहीं करने चाहिएं।
इस धारणा से आगे निकली एक संशोधित धारणा के अनुसार किसी भी एक तिथि विशेष को जन्में लोगों को एक जैसे रत्न ही धारण करने चाहिएं। पहली धारणा की तरह इस धारणा के मूल में भी वही त्रुटी है। किसी भी एक दिन विशेष में दुनिया भर में कम से कम हज़ारों अलग-अलग प्रकार की किस्मत और ग्रहों वाले लोग जन्म लेते हैं तथा उन सबकी किस्मत तथा उनके लिए उपयुक्त रत्नों को एक जैसा मानना मेरे विचार से सर्वथा अनुचित है।
पश्चिमी देशों में प्रचलित कुछ धारणाओं पर चर्चा करने के पश्चात आइए अब भारतीय ज्योतिष में किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त रत्न निर्धारित करने को लेकर प्रचलित कुछ धारणाओं पर चर्चा करते हैं। सबसे पहले बात करते हैं ज्योतिषियों के एक बहुत बड़े वर्ग की जिनका यह मत है कि किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली में लग्न भाव में जो राशि स्थित है जो उस व्यक्ति का लग्न अथवा लग्न राशि  कहलाती है, उस राशि के स्वामी का रत्न कुंडली धारक के लिए सबसे उपयुक्त रहेगा। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में लग्न भाव यानि कि पहले भाव में मेष राशि स्थित है तो ऐसे व्यक्ति को मेष राशि के स्वामी अर्थात मंगल ग्रह का रत्न लाल मूंगा धारण करने से बहुत लाभ होगा। इन ज्योतिषियों की यह धारणा है कि किसी भी व्यक्ति की कुंडली में उसका लग्नेश अर्थात लग्न भाव में स्थित राशि का स्वामी ग्रह उस व्यक्ति के लिए सदा ही शुभ फलदायी होता है। यह धारणा भी तथ्यों तथा व्यवहारिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती तथा मेरे निजी अनुभव के अनुसार लगभग 50 से 60 प्रतिशत लोगों के लिए उनके लग्नेश का रत्न उपयुक्त नहीं होता तथा इसे धारण करने की स्थिति में अधिकतर यह कुंडली धारक का बहुत नुकसान कर देता है। इसलिए केवल इस धारणा के अनुसार उपयुक्त रत्न का निर्धारण उचित नहीं है।
ज्योतिषियों में प्रचलित एक और धारणा के अनुसार कुंडली धारक को उसकी कुंडली के अनुसार उसके वर्तमान समय में चल रही महादशा तथा अंतरदशा के स्वामी ग्रहों के रत्न धारण करने का परामर्श दिया जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के अनुसार उसके वर्तमान समय में शनि ग्रह की महादशा तथा बुध ग्रह की अंतरदशा चल रही है तो ज्योतिषियों का यह वर्ग इस व्यक्ति को शनि तथा बुध ग्रह के रत्न धारण करने का परामर्श देगा जिससे इनकी धारणा के अनुसार उस व्यक्ति को ग्रहों की इन दशाओं से लाभ प्राप्त होंगे। यह मत लाभकारी होने के साथ-साथ अति विनाशकारी भी हो सकता है। किसी भी शुभ या अशुभ फलदायी ग्रह का बल अपनी महादशा तथा अंतरदशा में बढ़ जाता है तथा किसी कुंडली विशेष में उस ग्रह द्वारा बनाए गए अच्छे या बुरे योग इस समय सबसे अधिक लाभ या हानि प्रदान करते हैं। अपनी दशाओं में चल रहे ग्रह अगर कुंडली धारक के लिए सकारात्मक हैं तो इनके रत्न धारण करने से इनके शुभ फलों में और वृद्दि हो जाती है, किन्तु यदि यह ग्रह कुंडली धारक के लिए नकारात्मक हैं तो इनके रत्न धारण करने से इनके अशुभ फलों में कई गुणा तक वृद्धि हो जाती है तथा ऐसी स्थिति में ये ग्रह कुंडली धारक को बहुत भारी तथा भयंकर नुकसान पहुंचा सकते हैं। मेरे पास अपनी कुंडली के विषय में परामर्श प्राप्त करने आए ऐसे ही एक व्यक्ति की उदाहरण मैं यहां पर दे रहा हूं।
यह सज्जन बहुत पीड़ित स्थिति में मेरे पास आए थे। इनकी कुंडली के अनुसार मंगल इनके लग्नेश थे तथा मेरे पास आने के समय इनकी कुंडली के अनुसार मंगल की महादशा चल रही थी। इन सज्जन ने अपने दायें हाथ की कनिष्का उंगली में लाल मूंगा धारण किया हुआ था। इनकी कुंडली का अध्ययन करने पर मैने देखा कि मंगल इनकी कुंडली में लग्नेश होने के बावजूद भी सबसे अधिक अशुभ फलदायी ग्रह थे तथा उपर से मगल की महादशा और इन सज्जन के हाथ में मंगल का रत्न, परिणाम तो भंयकर होने ही थे। इन सज्जन से पूछने पर इन्होने बताया कि जब से मंगल महाराज की महादशा इनकी कुंडली में शुरु हुई थी, इनके व्वयसाय में बहुत हानि हो रही थी तथा और भी कई तरह की परेशानियां आ रहीं थीं। फिर इन सज्जन ने किसी ज्योतिषि के परामर्श पर इन मुसीबतों से राहत पाने के लिए मंगल ग्रह का रत्न लाल मूंगा धारण कर लिया। मैने इन सज्ज्न को यह बताया कि आपकी कुंडली के अनुसार मंगल ग्रह का यह रत्न आपके लिए बिल्कुल भी शुभ नहीं है तथा यह रत्न आपको इस चल रहे समय के अनुसार किसी भारी नुकसान या विपत्ति में डाल सकता है। मेरे यह कहने पर इन सज्जन ने बताया कि यह रत्न इन्होंने लगभग 3 मास पूर्व धारण किया था तथा इसे धारण करने के दो मास पश्चात ही धन प्राप्ति के उद्देश्य से किसी आपराधिक संस्था ने इनका अपहरण कर लिया था तथा कितने ही दिन उनकी प्रताड़ना सहन करने के बाद इनके परिवार वालों ने किसी सम्पत्ति को गिरवी रखकर उस संस्था द्वारा मांगी गई धन राशि चुका कर इन्हें रिहा करवाया था। अब यह सज्जन भारी कर्जे के नीचे दबे थे तथा कैद के दौरान मिली प्रताड़ना के कारण इनका मानसिक संतुलन भी कुछ हद तक बिगड़ गया था।
मुख्य विषय पर वापिस आते हुए, ज्योतिषियों का एक और वर्ग किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त रत्न निर्धारित करने के लिए उपर बताई गई सभी धारणाओं से कहीं अधिक विनाशकारी धारणा में विश्वास रखता है। ज्योतिषियों का यह वर्ग मानता है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कुंडली के अनुसार केवल अशुभ फल प्रदान करने वाले ग्रहों के रत्न ही धारण करने चाहिएं। ज्योतिषियों के इस वर्ग का मानना है कि नकारात्मक ग्रहों के रत्न धारण करने से ये ग्रह सकारात्मक हो जाते हैं तथा कुंडली धारक को शुभ फल प्रदान करना शुरू कर देते हैं। क्योंकि मैं रत्नों की कार्यप्रणाली से संबंधित तथ्यों पर अपने पिछ्ले लेखों में विस्तारपूर्वक प्रकाश डाल चुका हूं, इसलिए यहां पर मैं अपने पाठकों को यही परामर्श दूंगा कि यदि आप में से किसी भी पाठक का संयोग ऐसे किसी ज्योतिषि से हो जाए जो आपको यह परामर्श दे कि आप अपनी कुंडली में अशुभ फल प्रदान करने वाले ग्रहों के रत्न धारण करें तो शीघ्र से शीघ्र ऐसे ज्योतिषि महाराज के स्थान से चले जाएं तथा भविष्य में फिर कभी इनके पास रत्न धारण करने संबंधी परामर्श प्राप्त करने न जाएं।
तब किन ग्रहों के रत्न पहने जाएँ?
सामान्यत: रत्नों के बारे में भ्रांति होती है जैसे विवाह न हो रहा हो तो पुखराज पहन लें, मांगलिक हो तो मूँगा पहन लें, गुस्सा आता हो तो मोती पहन लें। मगर कौन सा रत्न कब पहना जाए इसके लिए कुंडली का सूक्ष्म निरीक्षण जरूरी होता है। लग्न कुंडली, नवमांश, ग्रहों का बलाबल, दशा-महादशाएँ आदि सभी का अध्ययन करने के बाद ही रत्न पहनने की सलाह दी जाती है। यूँ ही रत्न पहन लेना नुकसानदायक हो सकता है।
मोती डिप्रेशन भी दे सकता है, मूँगा रक्तचाप गड़बड़ा सकता है और पुखराज अहंकार बढ़ा सकता है, पेट गड़बड़ कर सकता है।
सामान्यत: लग्न कुंडली के अनुसार कारक ग्रहों के (लग्न, पंचम, नवम ) रत्न पहने जा सकते हैं जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी होकर पाप प्रभाव में हो, अस्त हो या श‍त्रु क्षेत्री हो उन्हें प्रबल बनाने के लिए भी उनके रत्न पहनना प्रभाव देता है।
रत्न पहनने के लिए दशा-महादशाओं का अध्ययन भी जरूरी है। केंद्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (१, ५, ९) के स्वामी की ग्रह महादशा में उस ग्रह का रत्न पहनने से अधिक लाभ मिलता है।
3, 6, 8, 12 के स्वामी ग्रहों के रत्न नहीं पहनने चाहिए। इनको शांत रखने के लिए दान-मंत्र जाप का सहारा लेना चाहिए। रत्न निर्धारित करने के बाद उन्हें पहनने का भी विशेष तरीका होता है। रत्न अँगूठी या लॉकेट के रूप में निर्धारित धातु (सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल) में बनाए जाते हैं।
उस ग्रह के लिए निहित वार वाले दिन शुभ घड़ी में रत्न पहना जाता है। इसके पहले रत्न को दो दिन कच्चे दूध में भिगोकर रखें। शुभ घड़ी में उस ग्रह का मंत्र जाप करके रत्न को सिद्ध करें। (ये जाप 21 हजार से 1 लाख तक हो सकते हैं) तत्पश्चात इष्ट देव का स्मरण कर रत्न को धूप-दीप दिया तो उसे प्रसन्न मन से धारण करें। इस विधि से रत्न धारण करने से ही वह पूर्ण फल देता है। मंत्र जाप के लिए भी रत्न सिद्धि के लिए किसी ज्ञानी की मदद भी ली जा सकती है।
शनि और राहु के रत्न कुंडली के सूक्ष्म निरीक्षण के बाद ही पहनना चाहिए अन्यथा इनसे भयंकर नुकसान भी हो सकता है।
सार यह निकला जा सकता है कि रत्न केवल और केवल उसी ग्रह के लिए धारण करना चाहिए जो आपकी जन्म कुंडली में सकारात्मक अर्थात शुभ फलदायी हो रत्न केवल ऐसे ज्योतिषी के परामर्श पर ही धारण करने चाहिएं जो आपकी कुंडली का सही अध्ययन करने के बाद यह निर्णय लेने में सक्षम हो कि आपकी कुंडली के अनुसार आपके लिए शुभ फल प्रदान करने वाले ग्रह कौन से हैं तथा उनमें से किस ग्रह का रत्न धारण करना आपके लिए लाभदायक होगा।
नोट:- यह लेख जन कल्याण की भावना से किन्हीं महानुभावों ने प्रकाशित किये थे, उसी भावना का सम्मान करते हुए ब्लॉग पढ़ने वालों के लिए मैनें इसका अपने ब्लॉग में पुनः प्रकाशन किया है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इससे लाभ उठा सकें 

Friday, April 6, 2012

नाड़ी दोष परिहार

नक्षत्र मेलापक के अष्ट कूटों में नाड़ी सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह व्यक्ति के मन एवं मानसिक ऊर्जा की सूचक होती है। व्यक्ति के निजी सम्बन्ध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते है। जिन-जिन व्यक्तियों में भावनात्मक पूरकता होती है, उनके संबंधो में घनिष्टता और जिनमें भावनात्मक समानता, या प्रतिद्वंदिता होती है, उनके संबंधों में टकराव पाया जाता है

जैसे शरीर के वात, पित्त एवं कफ़, इन तीन दोषों की जानकारी उनकी कलाई पर चलने वाली नाड़ियों से प्राप्त की जाती है। उसी प्रकार अपरिचित व्यक्तियों के भावनात्मक लगाव की जानकारी आदि, मध्य एवं अंत्य नाड़ी के द्वारा मिलती है। वैदिक ज्योतिष के आचार्यों ने आदि, मध्य एवं अंत्य इन तीनो नाड़ियों को यथाक्रमेण, आवेग, उद्वेग एवं संवेग का सूचक माना है। कुछ अन्य आचार्यों का मत है कि तीनो  नाड़ियां, यथाक्रमेण, संकल्प, विकल्प एवं प्रतिक्रिया की सूचक होती हैं। मानवीय मन भी कुल मिलाकर संकल्प, विकल्प या प्रतिक्रिया ही करता है और व्यक्ति की मनोदशा का मूल्यांकन उसके आवेग, उद्वेग या संवेग के द्वारा होता है। इस प्रकार मेलापक में नाड़ी के माध्यम से जातक की मानसिकता, मनोदशा का मूल्यांकन किया जाता है। 

वैदिक ज्योतिष के मेलापक प्रकरण में गणदोष, भकूट दोष एवं नाड़ी दोष - इन तीनों को सावधिक महत्त्व दिया जाता है। यह इस बात से ही स्पष्ट है कि ये तीनों ३६ गुणों में से (६+७+८=२१) कुल २१ गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। शेष पाँचों कूट (वर्ण, वश्य, तारा, योनि एवं ग्रह मैत्री) १५ गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अकेली नाड़ी के ८ गुण होते हैं, जो वर्ण, वश्य आदि ८ कूटों कि तुन्लना में सर्वाधिक हैं। इसलिए नक्षत्र मेलापक में नाड़ी दोष एक महादोष माना जाता है। 

नाड़ी विचार - नाड़ी कूट में ३  नाड़ियां होती हैं आदि नाड़ी, मध्य नाड़ी एवं अंत्य नाड़ी। नक्षत्रों की संख्या २७ और  नाड़ियों की संख्या ३ होने के कारण प्रत्येक नाड़ी में ९-९ नक्षत्र आते हैं। व्यक्ति की नाड़ी का निश्चय उसके जन्म नक्षत्र के आधार पर किया जाता है।

नाड़ी दोष - जिस प्रकार वात प्रकृति के व्यक्ति के लिए वात गुण वाले पदार्थों का सेवन एवं वातावरण वर्जित होता है, अथवा कफ़ प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए कफ़ नाड़ी के चलने पर कफ़ प्रधान पदार्थों का सेवन एवं ठंडा वातावरण हानिकारक होता है, ठीक उसी प्रकार नक्षत्र  मेलापक में वर-वधू की एक समान नाड़ी का होना, उनके मानसिक और भावनात्मक ताल-मेल में हानिकारक होने के कारण, वर्जित माना गया है। तात्पर्य यह है कि लड़की-लड़के कि एक समान नाड़ियां हों तो उनका विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी मानसिकता के कारण, उनमें सामंजस्य होने कि सम्भावना अधिकतम पायी जाती है। इसलिए मेलापक  में आदि नाड़ी के साथ आदि का, मध्य नाड़ी के साथ मध्य का और अंत्य नाड़ी के साथ अंत्य का मेलापक वर्जित होता है, जबकि लड़की और लड़के को भिन्न-भिन्न नाड़ी होना उनके दांपत्य संबंधों में शुभता का द्योतक होता है।

जिस लड़की-लड़के का एक समान नक्षत्र हो, या एक समान राशि हो तो इस विशेष परिस्थिति में नाड़ी दोष प्रभावहीन हो जाता है जिसको नाड़ी दोष का परिहार कहते हैं। यह परिहार इन परिस्थितियों में होता है :-

यदि लड़की और लड़के का जन्म नक्षत्र एक ही हो, तो उन दोनों कि नाड़ी भी एक ही होगी और प्रथम दृष्टि मैं यह नाड़ी दोष प्रतीत होगा। किन्तु यदि एक ही नक्षत्र में उत्पन्न लड़की और लड़के के नक्षत्र के चरण भिन्न-भिन्न हों तो नाड़ी दोष कर परिहार हो जाता है। इसका कारण यह है कि एक समान नक्षत्र में उत्पन्न युगल के आठ कूटों में से सात कूट वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह-मैत्री, गण एवं भकुट शुभ एवं शुद्ध होते हैं। और एक समान नक्षत्र होने के कारण उनकी मानसिकता में आत्मीय भाव होता है। नक्षत्र के चरण भिन्न होने से नवमांश का भेद होने के कारण, उनमे पूरकता होती है। अतः इस स्थिति में उनके अहं के टकराव कि सम्भावना टल जाती है। परिणामस्वरूप एक नक्षत्र में भिन्न-भिन्न चरणों में उत्पन्न वर-वधु का, नाड़ी दोष होने पर भी विवाह किया जा सकता है।

नाड़ी के गुण - नक्षत्र मेलापक  में नाड़ी के ८ गुण होते हैं। यदि लड़के और लड़की कि भिन्न-भिन्न नाड़ी हो तो ८ गुण मिलते हैं और यदि उन दोनों कि एक समान नाड़ी हो तो गुण शून्य होता है। नाड़ी के गुणों कि जानकारी इस चक्र से की जा सकती है :-


उदाहरण मेलापक के प्रचलित उदाहरण में लड़की का जन्म उत्तराफाल्गुनी और लड़के का जन्म नक्षत्र पुष्य है। इसलिए, नियमानुसार लड़की की नाड़ी आदि और लड़की की नाड़ी मध्य है क्योंकि इन दोनों की नाडियाँ भिन्न-भिन्न हैं। अतः इस उदाहरण मैं नाड़ी दोष नहीं है और इनकी नाड़ियों के ८ गुण मिलते है। परिणामतः इनका विवाह किया जा सकता है।