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Monday, March 28, 2016

पञ्च महापुरुष योग

वाराहमिहिर की बृहत् संहिता में तथा ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थ फलदीपिका के योग अध्याय में निम्न श्लोक में पांच महापुरुष योगों का वर्णन किया गया है :- 

रूचक भद्रक हंसक मालवाः सशशका इति पंच च कीर्तिताः 
स्वभवनोच्चागतेषु चतुष्टये क्षितिसुतादिषु तान्  क्रमशौ वदेत्। 

अर्थात् पंच महापुरुष योग रूचक, भद्रक, हंसक, मालव्य और शश हैं जो क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि के जन्मपत्रिका में, केन्द्र में, स्वराशि अथवा उच्चराशि में स्थित होने पर बनते हैं।  

रूचक योग - जन्मकाल में मंगल बलवान होकर स्वराशि, मूल, त्रिकोण राशि का अथवा उच्च राशि का हो केन्द्र में गया हो तो रूचक योग होता है। रूचक योग में उत्पन्न जातक का शरीर मजबूत एवं प्रसिद्ध और प्राचीन ग्रन्थों का ज्ञाता होता है।  वह सम्पत्ति ऐश्वर्य कीर्ति से युत सुशील शास्त्री मन्त्री जप तप कर्त्ता परम्परा और परिपाटी के अनुसार राजा किंवा राजा के समान, श्रेष्ठ अत्यंत सुंदर कोमल, दाता, शत्रुओं को जीतने वाला सुखी, सेनापति, ७० वर्ष पर्यन्त जीवित रहने वाला होता है।  रूचक योग से जातक पर मंगल का प्रभाव होता है, वह लोगों का नेता होता है, वह कमान्डर होता है,  आक्रमणकारी होता है परन्तु देशभक्त शासक होता है या उसके बराबर होता है। 

भद्रक (भद्र) योग - बुध बलवान होकर स्वराशिस्थ मूल त्रिकोण राशि का किंवा उच्च राशि में केन्द्र में गया हो तो भद्रक नाम का योग बनता है। जो जातक इस योग में जन्म पाते हैं वह अल्पभाषी होते हैं। सिंह के समान मानी गजपति, पुष्ट जंघा और वक्षस्थल वाले गोलबाहु के, बंधुजनों पर उपकार करने वाले प्रज्ञा यश पित्तादि से युक्त राजा व राजा के समान होते हैं और ८० वर्ष पर्यन्त जीवित रहते हैं। इस योग में जातक के हाथ ज़्यादा लंबे होते हैं। बुध बुद्धि का कारक होता है और बुध के नैसर्गिक स्वभाव के साथ भद्रक योग का सम्बन्ध होता है। बुध का बली होना आवश्यक है अन्यथा यह योग मात्र विधितः होकर रह जायेगा। 

हंस योग - जन्मकाल में गुरु बलवान होकर स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि का किंवा उच्च राशि का केन्द्र में गया हो तो हंस योग होता है। दूसरे शब्दों में सभी द्विस्वभाव और चर राशियों अर्थात् मेष, कर्क, तुला और मकर में हंस योग संभव है। यहाँ पर यह मान लिया गया है कि लग्न भी एक केन्द्र है। अचर राशियों वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ में उत्पन्न व्यक्ति की कुंडली में हंस योग नहीं बन सकता क्योंकि  इन राशियों से केन्द्र में बृहस्पति की उच्च राशि या अपनी राशि नहीं आती है। इस योग का बल भी पहले की तरह  और बृहस्पति जिस केन्द्र  स्थित हैं उसके बल पर निर्भर करता है। स्पष्टतः दशम केन्द्र अधिक बली होता है। बृहस्पति का केन्द्राधिपति होना आवश्यक नहीं है किन्तु जब हंस योग बनता हो सामान्य सिद्धान्त का महत्त्व समाप्त हो जाता है। चूँकि बृहस्पति का केन्द्र में स्थित होना स्वक्षेत्रता के बराबर है और केन्द्र उसके उच्च स्थान के बराबर है और उच्च स्थान के द्वारा हंस योग अधिक अधिमान्य है क्योंकि बृहस्पति के चतुष्कोणी स्वामित्व के कारन बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। हंस योग की व्याख्या सावधानी पूर्वक करनी चाहिए क्योंकि इस योग वाला व्यक्ति चरित्रवान और महान नैतिक होता है। इस योग में जो जन्मते हैं वह रक्त वर्ण के होंठ के चम्पे की कली के समान, उन्नत नासिका, सुंदर चरण हंस के समान मंजुल स्वर, कफ़ प्रकृति के, गौर वर्ण के नाज़ुक स्त्री वाले सुंदर शास्त्रज्ञ निपुण सदाचार सम्पन्न ८० वर्ष पर्यन्त जीवित रहने वाले होते हैं। इस जातक के पैरों पर शंख, कमल, मछली और अंकुश का चिन्ह होगा। इस योग वाले जातक सौंदर्य प्रसाधन, फैशन, कलाकार, कवि, नाटककार, गुरु या समाजिक कार्यों से जुड़कर नाम व् यश कमाते हैं। 

मालव्य योग - शुक्र बलवान होकर स्व, उच्च, मूल त्रिकोण राशि में जाकर केन्द्र में गया हो तो मालव्य योग होता है।

मंत्रेश्वर जी के अनुसार :-

पुष्टाङ्गे धृतिमांधनी सुतवधु भाग्यान्वितो वर्धनो। 
मालव्ये सुखभुवसुवाहनयशा विद्वानप्रसन्नेंद्रिय॥   

मालव्य योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति आकर्षक, कांतिमान, पुष्ट शरीर वाला, धैर्यवान, विद्वान, प्रसन्नचित्त रहने वाला, सदैव वृद्धि को प्राप्त करने वाला, विवेकशील बुद्धि का धनी होता है। उसको समस्त ऐश्वर्य , धन संपत्ति, संतान सुख आदि सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। वह सौभाग्यशाली होता है, उसे भौतिक सुख आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। वाहनों का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है तथा उसकी कीर्ति और प्रसिद्धि सर्वत्र फैलती है। वह जन्मजात विद्वान होता है। सुबोध मति वाला और सुखों को आजीवन भोगने वाला होता है।

ज्योतिष ग्रन्थ बृहत्त पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार पांच महापुरूष अध्याय के अंतर्गत तीन श्लोक जन्मपत्रिका में स्थित मालव्य महापुरूष योग के गुणावगुणों की व्याख्या देते हैं कि मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति आकर्षक होंठ वाला, चन्द्र के समान कांति वाला, गौरवर्ण, मध्यम कद, धवल एवं स्वच्छ दंतावलियुक्त, हस्तिगर्जनायुक्त, लम्बी भुजाएं, दीर्घायु एवं भौतिक-सांसारिक सुखों को भोगते हुए जीवन व्यतीत करता है।

मालव्य योग तभी बन सकता है यदि शुक्र केंद्र भाव में उच्च का हो अथवा केंद्र भाव में अपनी ही राशि में स्थित हो। ग्रह मंडल की प्रत्येक राशि में मालव्य योग नहीं बन सकता है। शुक्र के स्वभाव के अनुसार मालव्य योग वाला जातक दृढ़ निश्चयी और काफी धनी होता है और पत्नी तथा बच्चों से सुख प्राप्त होता है, प्रसिद्धि की प्राप्ति होती है। शुक्र स्वामी, ऐंद्रिय सुख, संगीत, नृत्य, ललित कला, ऐशोआराम और भौतिक सुख का कारक होता है। स्वभावतः मालव्य योग से जातक का झुकाव शुक्र के फलों की ओर होता है परिणाम स्वरूप भौतिक सुख और आनन्द की तुलना में आध्यात्मिक प्रगति विपरीत होगी।

यदि हम मालव्य योग के धारक व्यक्ति की कुंडली का विश्लेषण करें तो स्वतः अनुमान लगा पाएंगे कि मालव्य योग व्यक्ति को किस  सीमा तक ऊँचाई देता है।  यद्यपि जन्मपत्रिका में केवल मात्र मालव्य योग ही श्रेष्ठता नहीं देता अपितु अन्य ग्रह स्थिति भी देखी जानी चाहिये परन्तु फिर भी इस योग में उत्पन्न व्यक्ति में शुक्र के विषयों के प्रति एक महान आकर्षण रहता है और वह इन्ही विषयों में से किसी एक में शुक्र का आशीर्वाद पाकर स्थापित हो जाता है। महापुरुष योग व्यक्ति के चरित्र का निर्धारण करते हुए क्षेत्र विशेष में श्रेष्ठतर पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करवाता है। मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति अति आधुनिक पद्धतियों का अनुसरण करते हुए संगीत, प्राचीन विद्याएं, प्रेम काव्य, प्रेम गीत, अभिनय आदि के क्षेत्र में पारंगत होकर प्रसिद्ध हो जाता है।

शश (शशक) योग - शनि बलवान होकर स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि में किंवा अपनी उच्च राशि में जाकर केंद्र में गया हो तो शश योग होता है। चर या स्थिर राशियों में जन्म होने शनि की कतिपय स्थिति के कारण शश योग बनता है। स्वभावतः द्विस्वभाव राशियों में यह योग नहीं बनता। शश योग होने पर जातक में शनि के नैसर्गिक गुण होते हैं। शनि कठोर, नीच, अपरिष्कृत और पापी ग्रह है और इन विशेषताओं के कारण शश योग के फल होते हैं। इसमें संदेह नहीं कि जातक प्रसिद्ध और सुखी होता है किन्तु उसका ऐंद्रिय विचार विकृत होता है। वह परस्त्री के साथ समागम करता है और दूसरे का धन लेने के लिए अनाचारी प्रयोग करता है। शश योग की व्याख्या करते समय चन्द्रमा की स्थिति पर विचार कर लेना चाहिए। यदि यह प्रकाशीय ग्रह बुरे प्रभावों से मुक्त है तो व्यक्ति दूसरों का धन नहीं लगा और ना ही कदाचारी होगा। जहाँ चन्द्रमा पर बुरे प्रभाव उ हो वहां शश योग के कारण बुरे प्रभाव सीमित होते हैं। इस योग में जातक राजा की तरह अपने जीवन को जीता है। इस योग में जातक सेनापति, धातुकर्मी, विनोदी, क्रूरबुद्धि, जंगल-पर्वत में घूमने वाला होता है। आँखों में क्रोध की ज्वाला चमकती है। ये जातक तेजस्वी, भ्रातृ प्रेमी, सुखी, शूरवीर, श्यामवर्ण, तेज़ दिमाग़ और स्त्री के प्रति अनुरक्त होते हैं। यह जातक वैज्ञानिक, निर्माणकर्त्ता, भूमि सम्बन्धित कार्यों में संलग्न, जासूस, वकील, तथा विशाल भूमि खण्ड के मालिक होते हैं। 

Tuesday, January 19, 2016

केमद्रुम योग

॥ केमद्रुमे मलिन दुःखितनीचनिस्वो नृपजोपी ॥

केमद्रुम योग में जन्म हो तो राजा के यहाँ  जन्म पाया हुआ मनुष्य भी मलिन स्वभाव का वा मैला रहने वाला, दुःखी नीच प्रकृति वाला नीच दर्जे का और निर्धन मनुष्य होता है अर्थात्  साधारण मनुष्य के भंग रहित यह योग हो तो वह दरिद्री हुए बिना नहीं रहता।
यदि चन्द्रमा के दोनों तरफ़ कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम योग बनता है। जिसके फलस्वरूप जातक गन्दा दुःखी, अनुचित काम करने वाला, ग़रीब, दूसरे पर निर्भर, दुष्ट और ठग होगा।
एक मान्यता यह भी है कि जन्म लग्न या चन्द्रमा से केन्द्र में ग्रह हों या चन्द्रमा किसी ग्रह से युक्त हो तो केमद्रुम योग नहीं बनता। कुछ अन्य का मत है कि योग केन्द्र और नवांश से बनते हैं जो कि सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। वाराहमिहिर इस बात पर जोर देते हैं कि राजकीय परिवारों में पैदा होने वाले जातकों की कुंडली में इस प्रकार के योग बनते हों तो उनके मामले में साधारण परिवारों में पैदा होने वाले जातकों की अपेक्षा अधिक दुर्भाग्य की भविष्यवाणी करनी चाहिये। दुःख का अर्थ शारीरिक तथा मानसिक दुःख होता  है। मूलतः नीच शब्द का प्रयोग किया जाता है और इससे ऐसे कार्यों का सम्बन्ध होता है जो धर्म, नैतिकता और सामाजिक व्यवस्था में मना है और इसे अपमानजनक माना जाता है।

केमद्रुम योग के भेद 

केमद्रुम योग केवल चन्द्र के व्यय दूसरे स्थान में कोई भी ग्रह नहीं होने से ही होता है ऐसा नहीं है। जातक पारिजात में केमद्रुम के १३ भेद बताये हैं इनमे से कोई भी एक प्रकार का योग हो तो केमद्रुम योग हो जाता है। यह भेद इस प्रकार से हैं :-
  1. लग्न में किंवा सप्तम में चन्द्रमा गया हो और उस पर गुरु की दृष्टि न हो तो केमद्रुम योग होता है। सर्वग्रह बलहीन व अष्टकवर्ग में ४ बिंदु से युक्त हो तो यह योग बलवान हो जाता है। 
  2. चन्द्रमा सूर्य से युत हो के नीच राशि में गये हुए ग्रह से दृष्ट हो और पापग्रह के नवांश में गया हो तो दरिद्र योग होता है। 
  3. क्षीण चन्द्रमा अष्टम स्थान में स्थित होकर पापग्रह से दृष्ट किंवा युत हो और रात्रि समय में जन्म हो तो केमद्रुम योग होता है। 
  4. चन्द्रमा राहु आदि पापग्रहों से पीड़ित होकर पापग्रहों से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है। 
  5. लग्न से किंवा चन्द्रमा से चारों केन्द्र स्थान में पापग्रह गयें हों तो केमद्रुम योग बनता है। 
  6. चन्द्र पर बलहीन पराजित शुभग्रहों की दृष्टि हो और जन्म लग्न राहु आदि पापग्रहों से पीड़ित हो तो केमद्रुम योग होता है। 
  7. तुला राशि का चन्द्रमा शत्रुग्रह की राशि के वर्ग में हो और नीच तथा शत्रु राशि में गए हुए ग्रह से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है। 
  8. नीच किंवा शत्रु राशिगत चन्द्रमा १, ४, ७, १० किंवा ९, ५ भाव में गया हो और चन्द्रमा से ६, ८, १२ वे स्थान में गुरु गया हो तो दरिद्र योग होता है। 
  9. चर राशि में चर राशि के ही नवमांश में गया हुआ चन्द्रमा पापग्रह के नवमांश में हो और अपने शत्रुग्रह से दृष्ट हो गुरु की दृष्टि से रहित हो तो महादरिद्र योग होता है। 
  10. नीच शत्रु पापग्रह की राशि नवांशादि वर्ग में गए हुए शनि शुक्र एक राशि से युक्त हो किंवा परस्पर दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है। इस योग में राजवंश में जन्म पाया हुआ भी दरिद्री होता है। 
  11. पापग्रह की राशि में गया हुआ निर्बल चन्द्रमा पापग्रह से युक्त हो और पापग्रह के ही नवमांश में गया हो और रात्रि समय का जन्म हो तथा उसको दशमेश देखता हो तो केमद्रुम योग होता है। 
  12. नीच राशि के नवमांश में गया हुआ चन्द्रमा पाप ग्रह से युक्त हो के नवमेश से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है। 
  13. रात्रि समय का जन्म हो और क्षीण चन्द्रमा नीच राशि में गया हुआ हो तो केमद्रुम योग होता है।
जिनके जन्म काल में ये दरिद्र योग [केमद्रुम] होता है उनका राजयोग भंग होता है। 

केमद्रुम भंग योग - जातक पारिजात में लिखा है। जिनके समय में 
  1. चन्द्रमा अथवा शुक्र केंद्र स्थान में स्थित हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग का भंग [दरिद्र योग नहीं] करता है।  
  2. चन्द्रमा शुभग्रह से युत हो अथवा शुभग्रहों के मध्य में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है।
  3. चन्द्रमा अधि मित्र राशि का किंवा अपनी उच्च राशि का हो अथवा अधिमित्र तथा अपनी उच्चराशि के नवमांश में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है। 
  4. पूर्ण चन्द्रमा शुभ ग्रह से युत होकर बुध की उच्चराशि में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है। 
  5. चन्द्रमा सर्व ग्रहों से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग का बहन भंग करता है।

इन पाँचों योगों में से एक भी योग जिनके जन्म समय में नहीं हो 
उसको केमद्रुम योग का फल अवश्य प्राप्त होगा। 

Thursday, April 2, 2015

ज्वालामुखी योग

ज्वालामुखी योग का फल अशुभ माना गया है। इस योग में आरंभ किया हुआ कार्य पूर्णतया सिद्ध नहीं हो पाता अथवा बार-बार विघ्न बाधाएं आती है। इस योग में शुभ कार्य आरम्भ नहीं करने चाहिए। दुष्ट शत्रुओं पर प्रयोग करने के लिए यह मुहूर्त्त अच्छा समझा जाता है। 

जब प्रतिपदा को मूल नक्षत्र, पंचमी को भरणी, अष्टमी को कृत्तिका, नवमी को रोहिणी अथवा दशमी को आश्लेषा नक्षत्र आता है, तो ज्वालामुखी योग बनता है। इस प्रकार ५ नक्षत्रों एवं ५ तिथियों के संयोग से ज्वालामुखी योग बनता है। इस योग के अशुभ फल को प्रकट करने के लिए निम्नलिखित लोकोक्ति प्रचलित है :-

जन्मे तो जीवे नहीं, बसे तो उजड़े गाँव,
नारी पहने चूड़ियाँ, पुरुष विहिनी होय। 
बोवे तो काटे नहीं, कुएँ उपजे न नीर॥ 

यद्यपि यह लोकोक्ति अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकती है, परन्तु इसके अशुभ प्रभाव के संबंध का उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है। ज्वालामुखी योगानुसार यदि बालक इस योग में पैदा हो तो उसे अरिष्ट योग होता है। यदि इस योग में विवाह किया जाए तो वैधव्य का भय होता है। यदि बीजवपन किया जाये तो फसल अच्छी नहीं होती तथा जल आदि हेतु कुआँ खोदा जाये तो कुआँ शीघ्र सुख जाये - यदि कोई रोगग्रस्त हो तो शीघ्र ठीक न हो - इत्यादि अशुभ फल घटित होते हैं। 

नीचे संवत २०७२ के ज्वालामुखी योग उनकी तारीख़ तथा उनके प्रारंभ और समाप्ति काल के साथ पाठकों के हितार्थ दिए जा रहे हैं :-

३ जून  - प्रारंभ  -  १९ घं  ५० मि    - समाप्ति काल - २१ घं  ०२ मि। 

३ सितम्बर  - प्रारंभ  -  ०२ घं  ४९ मि    - समाप्ति काल - ०७ घं  ३६ मि

७ अक्टूबर  - प्रारंभ  -  १० घं  ५८ मि    -  समाप्ति काल - १७ घं  १० मि

११ दिसंबर  - प्रारंभ  -  २५ घं  २१ मि    - समाप्ति काल - १६ घं  ०४ मि

१५ फरवरी  - प्रारंभ  -  ०४ घं  ११ मि    - समाप्ति काल - २४ घं  २७ मि

१६ फरवरी  - प्रारंभ  -  ०३ घं  ०९ मि    - समाप्ति काल - २३ घं  ०५ मि 

१२ मार्च - प्रारंभ  -  १८ घं  ०३ मि    - समाप्ति काल - ११ घं  ०७ मि। 
 

Sunday, September 28, 2014

विशिष्ट ग्रह योग

किसी भी ग्रह की या ग्रहों की विशेष प्रकार की स्थिति को ज्योतिष में योग कहा जाता है। योग का शाब्दिक अर्थ जोड़ या मिलना होता है। इन योगों में भी ग्रह की स्थान विशेषगत राशि से युति या योग होता है। योग में निर्दिष्ट ग्रह उस स्थिति में हो तो योग का फल मिलता है यदि निर्दिष्ट ग्रह ग्रहान्तर से युक्त है तो योग नहीं बनता। हाँ, उसके साथ मित्र या अनुकूल शुभ ग्रह रहता  उतना बाधित नहीं होता। 

सारे योगों - जिनमे यवनाचार्यों एवं विदेशियों द्वारा बताये गए योगों की संख्या तो बहुत बड़ी है किन्तु यहाँ हम जिन योगों की चर्चा करेंगे वे अत्यंत प्रसिद्ध है तथा ज्योतिष में रुचि रखने वालों को उनका ज्ञान होना ही चाहिए।

यवनादिक पूर्वाचार्यों ने नाभस नाम के १८०० योग विस्तारपूर्वक वर्णन किये हैं उसमें से जो मुख्य ३२ योग हैं जिनमें सचराचर जगत के लोगों का प्रसव होता है वे ३२ योग नौका, कुट , छत्र , चाप, अर्धचन्द्र, वज्र, यव, कमल, वापी, शकट, पक्षि, गदा, श्रृंगाटक, हल, चक्र, समुद्र, यूप, शर, शक्ति, दण्ड , माला, सर्प, रज्जू , मूसल, नल, गोल, युग, शूल, केदार, पाश, दामिनी, वीणा हैं।

इन योगों के चार भेद कर लेते हैं जिनकी संज्ञा - आकृतिआश्रय, दल एवं संख्या के नाम से की जाती है। आकृति वर्ग में आने वाले योग ठीक उसी पद्धति पर तारामंडल का मेष, वृष, मिथुन आदि नामों से वर्गीकरण किया गया है। नामों की सार्थकता देखते हुए इनसे आगे के योग भी अपना स्वतंत्र अर्थ देते हैं किन्तु उनकी गुणात्मकता में परिवर्तन हो जाता है।

आकृति वर्ग  में आने वाले योग
नौका, कूट, छत्र, चाप, अर्धचन्द्र, वज्र, यव, कमल, वापी, शकट, पक्षी,  गदा, हल, श्रृंगाटक, चक्र, समुद्र, यूप, शर, शक्ति, दण्ड  - बीस आकृति नाम की संज्ञा के हैं। इन योगों में जन्म लेने वाले पुरुष विशेष कर सुखी, भाग्यवान्, नृप वल्लभ धनवान आनन्द भोगने वाले होते हैं। ये योग जिस व्यक्ति की कुंडली में बनते हैं, वह आनंदी प्रकृति का, सांसारिक सुख व ऐश्वर्य का उपभोक्ता, राजपूजित व प्रसिद्ध व्यक्ति होता है।

दल वर्ग में आने वाले योग
माला और सर्प दोनों योग फल संज्ञक हैं। इन योगों में जन्म लेने वाले व्यक्ति जीवन की धूप-छाँव में कभी सुख तो कभी दुःख का अनुभव करते हैं, कभी संगति, संबंध या अन्य आधारों के कारण दूसरों के भाग्य संपन्नता का उनके दुःखों  का उपभोग करते हैं कभी स्वार्जित सुखों और विषमताओं का अुनभव करते हैं।

आश्रय वर्ग में आने वाले योग
रज्जू, मूसल और नल नाम के तीन योगों में जन्म लेने वाले व्यक्ति भाग्यवान्, प्रसिद्ध, सुखी, धनिक, उदार तथा राज एवं समाज में सम्मानित होता है।

संख्या वर्ग में आने वाले योग 
गोल, युग, शूल, केदार पाश, दामिनी, वीणा नाम के सात योग व्यक्ति को परोपजीवी बनाते हैं। इन योगों में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने स्वार्जित या स्वकृत पुण्यों का फल स्वतंत्र रूप से नहीं भोगता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ऐसे व्यक्ति यथासंभव सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हैं किन्तु दूसरे के यहाँ और पराश्रित होकर ही (पर पुरुषों की सेवाचाकरी करने वाले होते हैं) जैसे कोई घोड़ा किसी करोड़पति के अस्तबल में रहकर सब सुखों को प्राप्त करता है।

आगे इसी वर्गीकरण के आधार पर ही इन योगों की विस्तार से चर्चा की जाएगी। ध्यान रखने योग्य बात है कि इन योगों में राहु केतु नहीं गिने जाते हैं। योग कर्त्ता ग्रह अन्य ग्रह से युत हो जावे तो योग का फल नहीं होता है।

आकृति वर्ग  में आने वाले योग (विस्तार से) 
  1. नौका योग - लग्न को आदि ले सात स्थान १, २, ३, ४, ५, ६, ७ में क्रम से सर्व ग्रह गये हों तो नौका नाम का योग होता है। यह योग जिसके जन्म समय में होता है वह जल के संबंध से जल मार्ग के संबंध से उपजीवीका करने वाला (जहाज नाव आदि के द्वारा जल मार्ग से व्यापार करने वाला) तथा सोडा वाटर, दवाई, मद्य आदि पानी के समान तरल पदार्थों का विक्रेता, ऐश्वर्यवान्, उद्योगी, हँसमुख, मान प्रतिष्ठा वाला बलवान, कृपण और लोभी होता है। 
  2. कूट योग - सप्तम स्थान से सात स्थान में अनुक्रम से ७,८,९,१०,११, १२,१ सर्वग्रह गये हों तो कूट योग होता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में यह योग होता है वह क्रूर, झूठा, पाखण्डी, चालाक, जंगली और पहाड़ों की ख़ाक छानने वाला, कारावास भोगने वाला होता है। कोई आश्चर्य नहीं यदि यह चोर या डाकू हो।
  3.  छत्र योग -  चौथे स्थान से दसवें स्थान तक के सात स्थानों में ही सारे ग्रह रहें तो छत्र योग होता है। इस योग वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है होता है। बचपन और वृद्धावस्था परम उत्कृष्ट और सुखकर रहती है। वैभव सम्पन्न, उदार हृदय, बलिष्ठ शरीर, दयावान, राज्य शासन से लाभ प्राप्त करने वाला होता है। 
  4. चाप योग - दशम स्थान से चौथे स्थान तक के (१०, ११, १२, १, २, ३, ४) सात स्थानों में सारे ग्रह स्थित हों तो चाप योग बनता है। चाप योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति लूटेरे, ठग  धूर्त किस्म के होते हैं। क्रूरता, असत्य और निर्धनता उनके स्वभाव में रहती है। समाज में उनका कोई महत्व नहीं होता, इसलिए एकान्त स्थानों में अपने जैसे अपराधी वृत्ति के लोगों के बीच रहते है। 
  5. अर्धचन्द्र योग - केंद्र स्थानों को छोड़कर शेष स्थानों (२,३,५,६,८,९,११,१२) में से पाँच स्थानों में ही क्रमशः सारे ग्रह जायें तो अर्धचन्द्र नाम का योग होता है।   यह योग ८ प्रकार का होता है।  दूसरे भाव से आठवें भाव तक सर्व ग्रह जायें तो पहला,  ऐसे ही तीसरे भाव से नौवें भाव तक २, पांचवें भाव से ग्यारहवें भाव तक ३, छठे भाव से बारहवें भाव तक  ४, आठवें भाव से दूसरे भाव तक ५, नववें भाव से तीसरे भाव तक ६, ग्यारहवें भाव से पाँचवें स्थान तक ७, और बारहवें भाव से छठे भाव तक सर्व ग्रह जायें तो आठवें प्रकार का योग होता है। यह योग जिनके जन्म समय में होता है वह सुन्दर, बलिष्ठ, भाग्यवान्, राज्यपक्ष के विश्वस्त, सुखी तथा धनी होते हैं। 
  6. वज्र योग - लग्न व सप्तम (१-७) इन दोनों स्थानों में सर्व शुभ ग्रह और चतुर्थ व दशम (४-१०) स्थान में सर्व पाप ग्रह गए हो तो वज्र नाम का  होता है।  यह योग जिसके होता है वह पूर्व और अंत्य वय में सुखी, भाग्यवान,  शूर, निरोगी, मध्य वय में निर्धन और दुष्टों से विरुद्ध रहने वाला होता है।
  7. यव योग - लग्न व सप्तम स्थान में सर्व पापग्रह और चतुर्थ व दशम स्थान में सर्व शुभ ग्रह गए हों तो यव नाम का योग होता है। यह योग जिसके होता है वह जप टप व्रत नियम में प्रीति रखने वाला मध्य वय में पुत्र, धनादि सुख युत दाता और स्थिर चित्त वाला  शुद्ध पुरुष होता है। 
  8. कमल योग - लग्न, सप्तम और चतुर्थ दशम इन चारों स्थानों शुभ व पाप मिश्र ग्रह गये हो तो कमल नाम का योग बनता है। यह योग जिसके होता है वह विख्यात यश कीर्तिवान गुणी दीर्घायु सुन्दर रूपवान शुभकार्य कर्त्ता राजा या राजा के समान अत्यंत सुखी पुरूष होता है। 
  9. वापी योग - पणफर और आपोक्लिम स्थान २, ५, ११, ३, ६,९, १२ में  ही सर्व ग्रह गए हों तो वापी योग होता है। यह योग जिसके होता है वह धन संपादन करने में चतुर, अचल धनवान, सुतृप्त, विभव भोक्ता, आनंदी स्वभाव का, सुखी अन्नदाता और नाती के सुख से सदा प्रसन्न रहने वाला होता है। 
  10. शकट योग - लग्न और सप्तम इन दो केंद्र स्थान में ही सर्वग्रह गये हों तो शकट नाम का योग होता है।  यह  योग जिसके होता है वह रोगी स्त्री से दुखी (दुष्ट स्त्री वाला) मूर्ख गाड़ी के धंधे से जीविका चलाने वाला धनहीन और कुटुंब व मित्रों से रहित होता है। 
  11. पक्षी योग - चतुर्थ दशम (४, १०) इन दो केंद्र स्थान में ही सर्व ग्रह गए हों तो पक्षी नाम का योग बनता है। यह योग जिसके होता है वह सदैव फिरने वाला मुर्ख, निकृष्ट वृत्ति से जीविका चलाने वाला  दूत (चपरासी, हलकारा, सिपाही किवा वकील वगैरा) का काम करने वाला हास्य मुख कलह प्रिय (लड़ाई का शौकीन) होता है। 
  12. गदा योग - किसी भी एक के आगे के दूसरे ऐसे दो केन्द्र स्थान में सर्वग्रह गए हों तो ४ प्रकार का गदा योग होता है। जैसे प्रथम और चतुर्थ स्थान में सर्वग्रह गए हों तो प्रथम चौथे और सातवें स्थान में सर्वग्रह गए हों तो  दूसरे सातवें और दशम स्थान में सर्वग्रह गए हों तो तीसरे दशम और लग्न में सर्वग्रह गए हों तो चौथा गदा योग होता है। यह योग जिसके होता है वह प्रतिदिन उद्योग धंधा करने वाला होने से धनवान होता है तथा यज्ञ कर्त्ता शास्त्रज्ञ गायन कला में निपुण धनरत्न ऐश्वर्यादि समृद्धि संपन्न होता है। 
  13. श्रृंगाटक योग - लग्न के बिना अन्य स्थानों में गये हुये संपूर्ण ग्रह परस्पर नवम पंचम में गये हों तो श्रृंगाटक नाम का योग बनता है। यह योग तीन प्रकार का होता है। २, ६, १० में सभी ग्रह गयें हो तो प्रथम ३, ७, ११ वें स्थान में सर्व ग्रह जायें तो दूसरे और ४, ८, १२ स्थान में ही सर्वग्रह जायें तो तीसरे प्रकार का होता है।  इस योग में जो जन्मता है वह कलह प्रेमी युद्धाभिलाषी निरन्तर सुखी नृपप्रिय सुरूपवान धनवान पर स्त्री का द्वेषी होता है। 
  14. हल योग - लग्न, नवम, पंचम (१, ५, ९) इन तीनों स्थानों में ही सर्वग्रह गयें हों तो हल योग होता है।  इस योग में जो जन्मते हैं वह बहुभोजी, दरिद्री कृषिकर्म कर्त्ता दुःखी उदासीन रहने वाला, स्वजन बंधुओं से परित्यक्त और दूत का काम करने वाला होता है। 
  15. चक्र योग - लग्न को आदि लेकर एक-एक राशी के अंतर से १, ३, ५, ७, ९, ११ इन छः स्थानों में ही सर्वग्रह गये हों तो चक्र नाम का योग बनता है। यह योग जिसके जन्म काल में होता है वह महाराजाधिराज (बड़ा राजा) यशस्वी सर्व संपत्तिवान होता है। 
  16. समुद्र योग -  धन भाव को आदि लेकर एक-एक राशी के अंतर से २, ४, ६, ८, १०, १२ इन छः स्थानों में ही सर्व ग्रह गये हों तो समुद्र नाम का योग होता है। यह योग जिन जातकों में होता है वह बहुत बड़ा धन रत्नादि समृद्धशाली स्त्रियों का प्यार परन्तु पुत्रहीन स्थिर चित्त का श्रेष्ठ स्वभाव वाला होता है। 
  17. यूप योग - लग्न, द्वित्य, तृतीय और चतुर्थ (१, २, ३, ४) इन चारों स्थानों में ही सभी ग्रह गए हों तो यूप योग होता है। इस योग में जन्म पाने वाला ज्ञानी आत्मवेत्ता यज्ञादि सत्कर्म कर्त्ता त्यागी सत्यवादी सुखी व्रत नियम जप तप मंत्र निरत और दाता पुरुष होता है। 
  18. शर योग - चतुर्थ, पंचम, षष्टम और सप्तम (४, ५, ६, ७) इन चारों स्थानों में ही सभी ग्रह गए हों तो शर योग होता है। इसमें जन्म पाने वाला चोर व्याघ (पशु पक्षी हिंसक पारधी) मांसाहारी दुष्ट स्वभाव का होता है। 
  19. शक्ति योग - सप्तम, अष्टम, नवम, दशम (७, ८, ९, १०)  इन स्थानो में ही सभी ग्रह हों तो शक्ति योग होता है। इस शक्ति योग में जन्म पाने वाला जातक, धनहीन उन्मत्त दुःखी नीच आलसी दीर्घायु युद्ध प्रेमी और भाग्यवान होता है। 
  20. दंड योग - दशम एकादशम द्वादशम व लग्न (१०,११, १२, १) इन चार स्थानों में ही सर्वग्रह गये हों तो दंड योग बनता है। यह जिनके जन्म काल में होता है वह विपरीत स्वाभाव का, कठोर मन का धनहीन विलल्ज दुःखी अच्छे पुरुष जिससे घृणा करें वैसा नीच और दुष्ट वृत्ति से पेट भरने वाला होता है। 
दल वर्ग में आने वाले योग (विस्तार से)
  1. स्रक् (माला) योग - केंद्र स्थान (१, ४, ७, १०) में सर्व ग्रह गये हों तो स्रक् नाम का योग होता है। यह योग जिसके होता है वह सदा सुखी वाहन वस्त्र धन सुख से युत आनंदी और अनेक स्त्रियों का सुख भोगने वाला होता है।
  2. सर्प योग - केंद्र स्थान (१, ४, ७, १०) में सर्व पाप ग्रह गये हों तो सर्प नाम का योग होता है। यह योग जिसके होता है वह दुष्ट स्वभाव का अस्थिर प्रकृति का सदा दुःखी क्रोधी दीन दूसरों के घर का टुकड़ा खा कर निर्वाह करने वाला भिखारी नर होता है। 
आश्रय वर्ग में आने वाले योग (विस्तार से)
  1. रज्जू योग - स्थिर राशि २, ५, ८, ११ में ही सर्वग्रह गये हों तो रज्जू योग होता है। इस योग में जो जन्मता है वह अधम पुरुषों से प्रीति करने वाला सुरुपवान परदेस में धन प्राप्त करने वाला क्रोधी दुष्ट स्वभाव का मनुष्य होता है। 
  2. मूसल योग - चर राशि १, ४, ७, १० में ही सर्व ग्रह गये हों तो मूसल योग होता है। यह योग जिसके जन्म में हो वह मान मर्यादा को पहचानने वाला उद्योगी राजा की कृपा संपादन कर्त्ता प्रसिद्ध धनवान और बहुत नौकर चाकर व पुत्रों वाला दृढ़मानी होता है। 
  3. नल योग - द्विस्वभाव राशि ३, ६, ९, १२ में ही सभी ग्रह गये हों तो नल नाम का योग बनता है। यह योग जिस जातक की जन्मकुंडली में होता है वह बड़ा कपटी दुर्बल देह का क्रूर धन संग्रह कर्त्ता बड़ा चतुर कुटुम्बियों से प्रेम रखने वाला सुन्दर रूपवान होता है। 
संख्या वर्ग में आने वाले योग  (विस्तार से) 
  1. गोल योग - एक ही स्थान में सर्वग्रह गये हो तो गोल नाम का योग होता है। इस योग में जो जन्म पाता है वह बलवान निर्धन विद्या और मान प्रतिष्ठा से रहित मलिन दीन सदा दुःखी पुरुष होता है। 
  2. युग योग - किन्ही दो स्थानों में ही सर्वग्रह गए हों तो गोल नाम का योग बनता है। इस योग में जिसका जन्म होता है वह पाखण्डी निर्धन जाति से बहिष्कृत भिखारी सुत मान धर्मादि रहित होता है। 
  3. शूल योग -  तीन स्थानों पर सभी ग्रह गए हो तो शूल योग होता है। इस योग में जो जन्मता है वह महाक्रोधी धनहीन, हिंसक शरीर में जख्म लगा हुआ बड़ा शूरवीर और युद्धाभिलाषी होता है। 
  4. केदार योग - चार स्थानों में ही सभी ग्रह गए हों तो केदार नाम का योग बनता है। जिस जातक के यह योग होता है वह खेती के काम में बलवान बहुत मनुष्यों का पालनकर्ता निरालसी धनवान् श्रेष्ठ भाग्यवान् सत्यवादी और बंधुओं पर उपकार करने वाला होता है। 
  5. पाश योग - पाँच स्थानों में ही सभी ग्रह गए हों तो पाश नाम का योग बनता है। यह योग जिसके जन्म काल में होता है वह बंधन पाने वाला प्रपंची बहुत नौकरी वाला साहसी धन प्राप्त करने में चतुर अच्छा वक्ता और पुत्रवान होता है। 
  6. दामिनी योग - छः  स्थानों में ही सभी ग्रह गए हों तो दामिनी योग बनता है। जो इस योग में जन्मते हैं वे पुरूष परोपकारी बहु पशुवान धीर पुत्रवान् सुवर्णरत्ना भारणादियुत प्रख्यात विद्वान व धनवान सुज्ञ पुरूष होता है। 
  7. वीणा योग - सात स्थानों में ही सभी ग्रह गये हों तो वीणा योग होता है। इस योग में जन्मता है वह सुखी धनवान नेता पुरुष बहु भृत्ययुत न्याय मार्ग का ज्ञाता सर्व कर्म में चतुर गीतप्रिय व नृत्य प्रिया होता है। 
ये योग सर्व काल में फल देने वाले होते हैं। 

संत्तान सुख बाधाकारक योग

मंगल एवं गुरु को विशेष रूप से संतान कारक ग्रह माना गया है। पंचम भाव, पंचमेश ग्रह एवं गुरु का जन्म कुंडली में स्थान आदि से संतान संबंधी विशेष योग आदि का निर्णय किया जाता है। 
  1. सूर्य पंचम भाव में नीच तुला राशि का हो तथा नवमांश कुंडली में सूर्य शनि की राशि का हो, अथवा सूर्य  अष्टम  भाव में, शनि पंचम में तथा पंचमेश राहु से युक्त हो, पंचम भाव में राहु शनि आदि सूर्य के साथ हो तो पितृ श्राप के दोष के कारण सन्तान सुख में कमी आती है। 
  2. सूर्य गुरु एवं  पंचमेश राहु, शनि, केतु आदि पाप ग्रहों से युक्त हो।
  3. पंचमेश, पंचम या नवम भाव में चन्द्रमा राहु, शनि या मंगल आदि पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो। 
  4. पंचम भाव में राहु हो और पंचमेश को दूषित करता हो तो सर्प के श्राप का प्रभाव समझे। 
  5. यदि केतु के कारण संतान सुख में कमी हो तो ब्राह्मण का श्राप समझे। 

Sunday, February 9, 2014

शरीर पर तिलों का महत्त्व

शरीर पर तिल भी अपना विशेष महत्त्व रखते हैं। तिल दो तरह के होते हैं। एक तो काले रंग के तथा दूसरे सुर्ख लाल रंग जैसे। काले तिल अपना असर कम करते हैं। लाल रंग के तिल शरीर पर अपना पूरा असर करते हैं।  तिल एक जगह पर जब आता है तो हमेशा उसी जगह पर स्थिर रहता है। मगर आयु के मुताबिक़ तिलों का बढ़ना भी हैरानी वाली बात नहीं है। जैसे एक तिल तो अच्छे फल वाला होता है मगर दूसरी तरफ एक अन्य तिल पैदा हो जाता है जो उसके अच्छे फल को पूरी तरह भोगने नहीं देता। अलग-अलग जगह पर तिलों के निशान का फल इस प्रकार है :-

  1. जिस जातक की छाती पर तिल हो तो व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार काम करने वाला तथा हर काम में कामयाबी हासिल करने वाला होता है। 
  2. जिस जातक के मुख के बायें हिस्से पर तिल दिखाई दे तो जातक सुख भोगने वाला, जमीन जायदाद, सवारी का सुख तथा धार्मिक वृत्ति वाला होता है। ऐसे जातकों की संतान लड़कियां अधिक होती हैं। अगर वही तिल चमकता हो तो केवल एक ही पुत्र जानना चाहिए। 
  3. नाक के नज़दीक अगर किसी जातक के तिल हो तो जातक बहुत सफ़र करने वाला, अपने हरेक काम में सफलता पाने वाला तथा दूसरों पर हुक्म चलाने वाला होता है मगर अपनी आयु का प्रथम भाग कम सुखों की प्राप्ति से व्यतीत करता है। यानि पिछली आयु में सुख भोगने वाला होता है। 
  4. अगर ऐसा ही तिल किसी औरत के नाक के पास काले रंग का हो तो ३५ साल की आयु में पति की तरफ से चिंताग्रस्त होना पड़ता है। 
  5. जिस जातक कि नाभि के नज़दीक कला हल्के से रंग का तिल दिखाई दे तो जातक जितनी देर तक जीवित रहता है अपना जीवन ऐशोआराम के साथ ही व्यतीत करता है तथा हमेशा सुखी रहता है। 
  6. अगर किसी जातक के दायें पाँव पर तिल या मोहका हो तो जातक समझदार तो बहुत होता है मगर उसकी औरत हमेशा क्लेश करने वाली ही होती है। 
  7. अगर किसी जातक के बायें पाँव पर तिल दिखाई दे तो ऐसा जातक खुद अपना नुकसान करने वाला होता है।  
  8. जिस जातक के हाथ पर तिल दिखाई दे तो ऐसे जातकों को संतान का सुख पूर्ण मिलता है। संतान पढ़ी -लिखी तथा मशहूर होती है। 
  9. पाँव की ऐड़ी पर अगर कोई तिल का निशाँ दिखाई दे तो उसका फल अशुभ होता है। ऐसे जातकों को माँग कर खाना पड़ता है। यानि बहुत दुखी और धनहीन होते हैं। 
  10. अगर यही तिल पाँव की  तली पर हो तो जातक सब प्रकार के सुखों को भोगने वाला दौलतमंद और बड़े पद को प्राप्त कर सुखी रहने वाला होता है। ऐसे तिल वाले जातक की औरत को कभी भी धन कि कमी नहीं रहती। शुरू से अंत तक सुख ही सुख भोगता है। 
  11. अगर किसी जातक के पाँव की तर्जनी अंगुली (अंगुठे के साथ वाली) पर तिल दिखाई दे तो ऐसे जातक के जीवन का पूर्वार्द्ध तो बड़े सुख के साथ बीतता  है मगर जब ५० वर्ष की आयु होती है तब तक किसी के नीचे काम करना पड़ता है। यानि रुपया पैसा कम हो जाने पर किसी दूसरे के पास नौकरी करने पर मजबूर हो जाते हैं।  ५१ वें वर्ष में विशेषकर परेशान रहते हैं। 
  12. अगर किसी जातक के पाँव के अँगूठे पर तिल हो तो जातक धार्मिक वृत्ति वाला, अपने गुरुजनो का भक्त तथा ईश्वर पर भरोसा रखने व दान पुण्य करने वाला होता है। 
  13. अगर किसी जातक के कान के नजदीक आगे या पीछे तिल हो तो जातक संतान का सुख पाने वाला तथा धनवान होता है। संतान इसकी पढ़ी लिखी व मशहूर होती है। 

Saturday, September 28, 2013

पुरुष की या स्त्री की रति शक्ति के सूचक योग

रति शक्ति का सम्बन्ध व्यक्ति के शारीरिक गठन, नस्ल और देशकाल (जलवायु) से रहता है. इसका ज्ञान हमें स्नायु संस्थान के कारक व रक्त संचार कारक ग्रह की स्थिति से होता है तथा सप्तम स्थान में स्थित राशि व ग्रह के स्वभाव तथा बल के अनुसार निष्कर्ष निकलना पड़ता है.

मान्यता यह है कि काम का उद्गम सबसे पहले मन से होता है. काम को मनोज व मन्मथ भी कहा जाता है देह तो मन की आज्ञाकारी दास है. इसलिए यहाँ हम व्यक्ति की मानसिक स्थिति व काम की ओर होने वाली सहज रूचि के सूचक योगों पर विचार करेंगे.

प्रमुख रूप से कामप्रिय (सेक्सी) होना शुक्र की स्थिति पर निर्भर करता है. विशेष यह है की यह बलवान होकर या निर्बल होकर त्रिक स्थान छठे, आठवें या बारहवें में आ जाये तो व्यक्ति को कामी बनाता है. यहाँ इसमें स्थानगत प्रभाव रहता है. हाँ, यदि इस पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि हो तो बात दूसरी है. शुक्र पाप ग्रहों के साथ देखा जाए अथवा पाप ग्रहों के साथ बैठा हो तो कामी बनाता है. बुध की या अपनी राशि में बैठा हुआ शुक्र भी कामी बना देता है. अगर रिपुभाव में धनु या मीन राशि हो ओर शुक्र मंगल के साथ किसी भी भाव में स्थित हो या कामी होने के लिए सातवें स्थान में शुक्र का बैठना ही प्रयाप्त रहता है.

ये योग व्यक्ति को काम का आवेश आने पर उचित या अनुचित का ध्यान नहीं रहने देते वह कामांध सा हो जाता है. अप्राकृतिक काम घटनाएं या कामापराध कामी व्यक्ति ही किया करते हैं. जब कुंडली में शुक्र की यह स्थिति हो ओर गोचर में वह प्रबल पद रहा हो या इसकी दशा-अंतर्दशा चल रही हो तब यह व्यक्ति को मथकर रख देता है, सिवा काम-वासना के कुछ और दिखाई नहीं देता और वह निर्मम भाव से अपने शरीर का नाश करता रहता है. 

कम या संतुलित काम (सेक्स) वाले लोगों के चंद्रमा वृष या तुला राशि का होता है. शनि और चंद्रमा का योग चौथे स्थान में हो रहा हो. लग्न में विषम राशि हो और शुक्र वहाँ बैठा हो. लग्न में वृष या धनु राशि हो और उसमे शनि स्थित हो. शुक्र सप्तम स्थान में हो और उस पर लग्नपति की दृष्टि हो. यह सभी योग रति शक्ति में कमी होने के थे. 
  • बलवान मंगल आय भाव में रहे तो व्यक्ति चिर युवा रहता है. 
  • लग्न में चंद्र और शुक्र एक साथ रहे तो व्यक्ति सदाबहार रहता है. 
  • बलवान बुध पाप ग्रहों से युत या दृष्ट न होकर त्रिक स्थान के अलावा कहीं हो तो व्यक्ति सदाबहार रहता है. 
अब उन योगों का वर्णन है जिसमें व्यक्ति स्त्रियों को संतुष्ट नहीं कर पता है और उनका प्रिय नहीं होता. उसमे धारण क्षमता का अभाव होता है. 

चंद्र मंगल की राशि (मेष) में हो, सूर्य चंद्रमा की राशि (कर्क) में हो और राहू, शुक्र व शनि इनमें से कोई दो ग्रह अपनी उच्च राशि में हो. शनि और बृहस्पति गर्भस्थान (पाँचवें) में एक साथ हों और चंद्रमा लग्न में हो. शुक्र मकर या कुम्भ राशि में हो, लग्न में कन्या राशि हो जिस पर शनि एवं बुध की दृष्टि हो. इन योगों में व्यक्ति शीघ्र पतन, शुक्रमेह, स्वप्नदोष या अन्य वीर्य विकारों से ग्रस्त रहता है. 

पुरुषत्वहीन करने वाले योग
  • शुक्र और शनि एक साथ दसवें या आठवें स्थान में हो. 
  • शनि जलराशि का होकर छठे या बारहवें स्थान में रहे. 
  • लग्न में विषम राशि हो, मंगल समराशि में हो और लग्न को देख रहा हो. 
  • शुक्र और शनि का योग दसवें स्थान में होने पर भी यह योग बनता है. 
  • शनि, शुक्र से छठे या आठवें स्थान में रहे. नीच राशि का शनि छठे या बारहवें स्थान में हो. 

यह योग जिनके होते है वे लोग पुरुषत्वहीन होते हैं. पुरुषत्वहीनता लाने योगों में व्यक्ति के जननेन्द्रिय संस्थान करीब-करीब निष्क्रिय से रहते हैं. स्मरण रहे इन योगों में पाप ग्रहों के साथ युति स्थिति दृष्टि आदि का सम्बन्ध होने पर ही यह योग सार्थक होते हैं. 

Friday, June 7, 2013

कुंडली में मांगलिक योग

विवाह सर्वमांगल्ये यात्रायां ग्रह गोचरे
जन्म राशि प्रधानत्वं नाम राशि न चिन्तयेत।।
देशे ग्रामे ग्रहे युद्धे सेवायां व्यवहारके
नाम राशि: प्रधानत्वं जन्म राशि न चिन्तयेत।।

वर का प्रसिद्ध नाम तथा कन्या का जन्म नाम, कन्या का जन्म नाम तथा व वर का प्रसिद्ध नाम कदापि न लें। वैवाहिक समय में वर तथा कन्या की कुंडली का मिलान करने से प्रथम निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है ताकि वर-कन्या (नव दंपत्ति) अपना जीवन सुखमय व्यतीत कर सकें।
  1. सर्वप्रथम ध्यान में रखने वाली बात यह है कि कुंडली में मांगलिक दोष, अगर हो तो वर कन्या दोनों की जन्म कुंडलियों में हो।
  2. वर्ण, कूट, वश्य कूट, तारा कूट, योनि कूट ग्रह मैत्री, गण मैत्री, भकूट, नाड़ी कूट इन आठ कूटों का मिलान अवश्य करें।
  3. वर कन्या का जन्म समय ठीक होना चाहिए।
  4. सबसे अधिक ध्यान रखने योग्य बात यह है कि क्या वर तथा कन्या का जन्म-पत्र शुद्ध, सूक्ष्म एवं सिद्धान्तीय गणित के अनुसार है।   

एक नाड़ीस्थनक्षत्रे दम्पत्योर्मरण  ध्रुवं
सेवायां च भवेद्धानि विवाहे प्राण नाशकः ।।

वर-कन्या कि एक नाड़ी हो तो निश्चय मरण, सेवा में हानि और विवाह में प्राणों का नाश होता है

आदि नाड़ी वर हान्ति मध्य नाड़ी च कन्यकाम्
अन्त्यनाड़ायां दूयोमृत्यु नाड़ी दोषं त्यजेद् बुधः ।।

आदि नाड़ी वर को, मध्य नाड़ी कन्या को और अन्य नाड़ी दोनों का हनन करती हैं। इससे नाड़ी दोष विद्वानों को त्याग देना चाहिए।

नाड़ी दोषश्च विप्राणां  वर्णदोषस्तु भुभ्रुजाम्
गण दोषश्च वैश्यषु योनि दोषतु पादजाम्।।

विवाह में ब्राह्मणों के लिए नाड़ी दोष, क्षत्रियों के लिए वर्ण दोष, वैश्यों को गण दोष और शुद्रों को योनि दोष विशेष कर विचारना चाहिए।

एक नक्षत्र जातानां नाड़ी दोषो न विधते
अन्यर्क्षे नाड़िवेधे च विवाहो वर्जितः सदा
ऐकर्क्षे  चैक पापे च विवाहो मरणः प्रदः।।
ऐकर्क्षे भिन्न पापे च विवाहः शुभदायक ।।

एक नक्षत्र में उत्पन्न हुए वर-कन्या को नाड़ी का दोष नहीं है  जो दूसरे नक्षत्रों का नाड़ी वेध हो तो विवाह सदा वर्जित है परन्तु एक नक्षत्र में एक ही चरण हो तो विवाह मरणदायक और एक नक्षत्र में अलग-अलग चरण हो तो विवाह शुभदायक है

लग्ने व्यये व पातालेयामित्रे चाष्टमे कुजे
पत्नी हंति स्वभर्त्ता  भर्त्ता भार्यां विनाश्येत  ।।

यदि स्त्री के लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और व्यय स्थान में मंगल हो तो पुरुष की मृत्यु होती है इसलिए वर कन्या दोनों का मंगल होना आवश्यक है अन्यथा एक को कष्ट स्वाभाविक है

यामित्रे च यदा सौरिर्लग्ने वा हिबुकेऽथवा
अष्टमे द्वादशे चैव भौम दोषो न विद्यते ।।

यदि लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में शनि हो तो मंगल का दोष नहीं रहता

शानिभौमोऽथवा कश्चित् पापो वा तादृशो भवेत्
तेप्नेव भवनेप्वेव भौम दोष विनाशकृत।।

यदि वर या कन्या किसी एक के मंगल हो और दूसरे की कुंडली में मंगल न होकर मंगल के स्थान पर शनि या राहू पाप ग्रह हो तो मंगल दोष नहीं रहता

न वर्ग वर्णों न गणो न योनि योनीर्द्धिद्धादशे नैवषडष्टक
तारा विरुद्धे नवपंचमेवा राशिश मैत्री शुभदे विवाह।।

वर और कन्या की राशियों के स्वामी एक हो व दोनों के स्वामियों की परस्पर मित्रता हो तो वर्णादि कूटों का दोष नहीं रहता
इसी तरह नाड़ी दोष में यदि वर और कन्या का नक्षत्र भिन्न-भिन्न हो किन्तु राशि एक है या दोनों का नक्षत्र एक हो और राशि भिन्न-भिन्न हो तो नाड़ी दोष नहीं होता।
यदि दोनों ही एक राशि और एक ही नक्षत्र हो तो विवाह शुभ नहीं होता।
किन्तु नक्षत्र में भिन्न-भिन्न चरण होने से अति आवश्यक हो तो शुभ रहेगा।

वरस्य पंचमे कन्या, कन्याया नवमेवरः
एतत् त्रिकोणकं ग्रहमं पुत्र पौत्र सुखावहम
मरण पितु मात्रोश्च सन्ग्राह्मं नवपंचकम् ।।
षड्ष्टके भवेन मृत्युर्यत्नं तस्य विचारयेत ।।

वर की राशि से कन्या की राशि पंचम हो, कन्या की राशि से वर की नवम हो तो यह नवपंचम त्रिकोण शुभ है। यदि विपरीत हो यानि कन्या से पंचम वर की व वर से नवम कन्या की तो माता पिता को मृत्यु तुल्य कष्ट कहें

Friday, May 31, 2013

मांगलिक दोष के परिहार

'मुहूर्त दीपक',  'मुहूर्त पारिजात' तथा अन्य मानक ग्रंथों में मांगलिक योग या दोष के कुछ आत्म कुंडलीगत तथा कुछ पर कुंडलीगत परिहार बताए गए हैं। यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो और अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्न प्रकार हो तो कुजदोष स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है :-

  • यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो। 
  • यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो। 
  • यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो। 
  • मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो। 
  • यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो। 
  • यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा परकुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। 

इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो कुजदोष का परिहार करते हैं। अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए।

सौभाग्य की सूचिका भी है मंगली कन्या? 

कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादशभाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशमभाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्यभार्या तथा गुणवान व संतानवान बनाती है।

क्या कहता है आप का मंगल?

यह मांगलिक दोष कैसे बनता हैक्या मंगल ग्रह इतना भयावह है कि उसकी उपस्थिति से जन्म पत्रिका श्रापित हो जाती है जब मंगल ग्रह जन्म कुण्डली के लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक को मांगलिक कहा जाता है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। इसी प्रकार कुण्डली में जहाँ चन्द्र स्थित होता है अर्थात चन्द्र कुण्डली से लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें भाव में जब मंगल स्थित हो तो भी जातक को मांगलिक कहा जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि लग्न कुण्डली के बारह में से पांच भावों में यदि मंगल स्थित होंगे तो जातक  मांगलिक होगा। साथ ही इस लग्न कुण्डली में जहां चन्द्र स्थित है वहां से भी चन्द्र के साथ या उससे चौथे, या उसके सातवें, आठवें या बारहवें में यदि मंगल स्थित हो तो भी जातक मांगलिक कहलाएगा। अब इसे एक उदाहरण से समझते हैं।

कल्पना करते हैं एक कुण्डली का लग्न मेष है और चन्द्रमा तीसरे भाव अर्थात मिथुन में स्थित हैं। इस कुण्डली के 12 भावों में से मात्र 2 भाव (5वां व 11वां) बचे जहां मंगल स्थित हो तो जातक मांगलिक नहीं होगा, बाकी के बचे 10 भावों में से जहां कहीं भी मंगल स्थित होंगे तो जातक मांगलिक कहलाएगा। अब बताइये कि 12 भावों में से किसी एक भाव में तो मंगल उपस्थित होंगे ही और 12 भावों में से लगभग 10 भावों में उनकी उपस्थिति से जातक मांगलिककहलाएगा। इस मांगलिकसे बचने की कितनी कम संभावना है।

ज्योतिष के किसी भी शास्त्रीय ग्रंथ में मांगलिक या मांगलिक-दोष का वर्णन इस रूप में प्राप्त नहीं होता। विवाह हेतु  गुण मिलान इत्यादि के साथ इसका वर्णन कुछ एक ग्रंथों में बहुत सूक्ष्म वर्णित है जिस पर कालान्तर में कुछ शोध ग्रंथों में थोड़ा बहुत विस्तार दिखाई देता है किन्तु मांगलिक का जैसा रूप इस प्रकरण में महत्व प्राप्त कर गया ऐसा तो कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है। यह तो भ्रम का विस्तार ज्ञात होता है न कि ज्योतिष विज्ञान का। 

विवाह प्रकरण में ही मंगल ग्रह व मांगलिक शब्द का उपयोग या महत्व या चर्चा सुनाई देती है, ऐसा क्यों? जहां भी मांगलिक शब्द सुनने को मिलेगा उसका संदर्भ मात्र एवं मात्र विवाह ही होगा। इसका  ज्योतिषीय कारण है किन्तु उस कारण का या मंगल के विवाह-प्रकरण से संबंध का न तो कोई भयावह अर्थ है और न ही कोई अशुभ परिणाम। मंगल या मांगलिक का विवाह से संबंध किस प्रकार स्थापित होता है इसे समझने का प्रयास करते हैं।

लग्न यानि पहला भाव तनु भाव भी कहलाता है अर्थात् शरीर अथवा स्वयं।  इस से सप्तम यानि सातवां भाव भार्या स्थान कहलाता है अर्थात् जीवन संगिनी या फिर जीवन संगी का स्थान। यह दोनों ही भाव विवाह से सम्बंधित हो गए अर्थात् लग्न या तनु भाव एवं सप्तम या भार्या भाव। पहला स्वयं का और दूसरा जीवन साथी का। 

इस के पश्चात् मंगल के विषय में भी कुछ प्रमुख तथ्य जान लेते हैं। पहला तो यह कि ज्योतिष विज्ञानं में जो दो श्रेणियां वर्णित हैं - पुण्य ग्रह और पाप ग्रह, उन में मंगल 'पाप ग्रह' की श्रेणी में आता है। दूसरा तथ्य मंगल के विषय में यह है कि अन्य ग्रहों की भांति सातवीं दृष्टि के अतिरिक्त मंगल की चतुर्थ एवं अष्टम दृष्टि भी है

अब इन तथ्यों को मांगलिक बनाने वाले कारणों के साथ रखते हैं अर्थात् यदि मंगल लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें स्थान पर हो तो मांगलिक कहलाता है। इस कथन को ऊपर दिए तथ्यों पर कसेंगे तो इन सब का आपस में सम्बन्ध दिखाई देगा

- मंगल एक पाप ग्रह है।
लग्न में बैठकर मंगल अपने से सातवें भाव अर्थात् भार्या स्थान को देखता है।
- चौथे स्थान पर बैठकर मंगल अपनी विशेष चौथी दृष्टि से सप्तम अर्थात् भार्या स्थान को देखता है।
- सप्तम स्थान में स्थित मंगल भार्या भाव पर ही बैठा है।
- अष्टम स्थान में स्थित मंगल अपने से सप्तम अर्थात दूसरे भाव को देखता है जो सप्तम भाव का आयु स्थान   
 है। (सप्तम से अष्टम)।
- द्वादश भाव में स्थित मंगल अपनी विशेष अष्टम दृष्टि से सप्तम भाव को देखता है।

उपरोक्त सभी कारणों से स्पष्ट है कि मंगल जो कि एक पाप ग्रह है वह लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव से सप्तम स्थान (जो कि जीवन साथी का भाव है) को किसी न किसी रूप में स्पष्ट व सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इसीलिए इन भावों में मंगल के बैठने पर मंगल का संबंध विवाह से जुड़ता है एवं जातक मांगलिक कहलाता है।

Sunday, May 26, 2013

शकट योग

जैसे कुण्डली मे उपस्थित शुभ योग के परिणामस्वरूप शुभ फल की प्राप्ति होती है उसी प्रकार कुण्डली में अशुभ योग होने पर व्यक्ति को उसका अशुभ परिणाम भी भोगना पड़ता है। 

अशुभ योगों में से एक है "शकट योग" 

इस योग में व्यक्ति को जीवन भर असफलताओं का सामना करना होता है. अगर इस योग को भंग करने वाला कोई ग्रह योग कुंडली में न हो।

शकट पुल्लिंग शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ गाड़ी होता है| गाड़ी पहिये पर चलती है, पहिया जिस प्रकार घूमता है उसी तरह से जिनकी कुंडली में शकट योग बनता है उनके जीवन में उतार चढ़ाव लगा रहता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह योग जिनकी कुंडली में बनता है वो भले ही आमिर घराने में पैदा हुए हो पर उन्हें गरीबी और तकलीफों का सामना करना पड़ता है अगर किसी भी प्रकार से यह योग भंग नहीं होता हो। 

शकट योग ग्रह स्थिति

शकट योग कुंडली में तब बनता है जबकि सभी ग्रह प्रथम और सप्तम भाव में उपस्थित हों। इसका अलावा गुरु और चन्द्र कि स्थिति के अनुसार भी यह योग बनता है। चंद्रमा से गुरु जब षष्टम या अष्टम भाव में होता है और गुरु लग्न केंद्र से बाहर रहता है तब जन्मपत्री में यह अशुभ योग बनता है। इस योग के होने पर व्यक्ति को अपमान, आर्थिक कष्ट, शारीरिक पीड़ा, मानसिक दंश मिलता है। जो व्यक्ति इस योग से पीड़ित होते हैं उनकी योग्यता को सम्मान नहीं मिल पता है। 

शकट योग भंग 

अगर आपकी कुंडली में शकट योग है तो इसके लिए आप को परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि एक पुरानी कहावत है कि प्रकृति अगर आप को बीमार बनाती है तो इसका इलाज़ भी स्वयं ही करती है। इसी तरह कुछ ग्रह स्थिति के कारण आपकी कुंडली में अगर अशुभ शकट योग बन रहा है तो शुभ ग्रह स्थिति आप का बचाव भी करती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार चन्द्रमा बलवान एवं मजबूत स्थिति में होने पर व्यक्ति शकट योग में आने वाली परेशानियों और मुश्किलों से घबराता नहीं है और अपनी मेहनत और कर्तव्य निष्ठा से मान और सम्मान के साथ जीवन के सुख को प्राप्त करता है। लग्नेश और भाग्येश के लग्न में मौजूद होने पर जीवन में उतार चढ़ाव के बावजूद व्यक्ति मान सम्मान के साथ जीता है। 

जिनकी कुंडली में चंद्रमा पर मंगल की दृष्टि होती है उनका शकट योग भंग हो जाता है। षड्बल में गुरु अगर चंद्रमा से मजबूत स्थिति में होता है अथवा चन्द्रमा उच्च राशि या स्वराशि में हो तो यह अशुभ योग प्रभावहीन हो जाता है। राहू अगर कुंडली में चन्द्रमा के साथ युति बनाता है या फिर गुरु पर राहू की दृष्टि तो शकट योग का अशुभ प्रभाव नहीं भोगना पड़ता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में लग्न स्थान से चंद्रमा या गुरु केंद्र में हो या फिर शुक्र चन्द्र की युति हो उन्हें शकट योग में भी धन लाभ, सफलता एवं उन्नति मिलती है. इसी प्रकार कि समान स्थिति तब भी होती है जबकि चंद्रमा वृषभ, मिथुन, कन्या या तुला राशि में हो और कर्क राशि में बुध शुक्र की युति बन रही हो। 

Friday, October 26, 2012

शुक्र से बनने वाले योग

ज्योतिष का यह सार्वभौमिक सिद्घांत है कि ग्रह के प्रभाव के अनुरूप वातावरण निर्माण होता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार अभी कलियुग का 5109 वां वर्ष चल रहा है तथा ४,२६,८९१ वर्ष बाकी हैं। इस समय कलियुग और शुक्र ग्रह की युति सौंदर्य के विश्वव्यापी बाजार के मूल में है। इन प्रतियोगिता में मिलने वाली सफलता ने युवतियों को फिल्म, टेलीविजन और विज्ञापन के बेशकीमती दरवाजे खोले हैं।
विश्लेषण से यह पता चलता है कि इन प्रतियोगिताओं में खुद को आजमाने वाली युवतियों पर शुक्र ग्रह का ही प्रभाव होता है। शुक्र ग्रह का संबंध सांसारिक सुखों से है। यह रास, रंग, भोग, ऐश्वर्य, आकर्षण तथा लगाव का कारक है। शुक्र दैत्यों के गुरु हैं और कार्य सिद्घि के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद के प्रयोग से भी नहीं चूकते। सौन्दर्य में शुक्र की सहायता के बिना सफलता असंभव है।
जन्म कुण्डली में शुक्र का प्रभाव जन्म लग्न पर होने से व्यक्ति आकर्षक, सौन्दर्य, घुंघराले बालों वाला, स्वच्छताप्रिय, रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करने का शौकीन होता है। आजकल फैशन से वशीभूत ऐसे वस्त्रों का प्रचलन स्त्री वर्ग में बढ़ रहा है जो शरीर को ढंकने में अपर्याप्त होते हैं। यह संभवत: शीत प्रधान शुक्र-चन्द्र के प्रभाव क्षेत्रों की देन है। महिला वर्ग का चर्म परिधान शुक्र-चन्द्र एवं मंगल की परतों से बना होता है अर्थात् कोमलता तेज, रक्तिमा एवं सौन्दर्य का सम्मिश्रण ही उसकी विशेष आकर्षण शक्ति होती है।
शुक्र ग्रह से प्रभावित युवतियां ही प्रतियोगिता के अंतिम राउंड तक पहुंच पाती है। कुछ ग्रह ऐसे भी होते हैं जो कुछ दूर तक तो युवतियों का सहयोग करते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे प्रतिभागियों के ग्रह भारी पड़ते हैं, कमजोर ग्रह वाली युवतियां पिछड़ने लगती है। यह भी ज्ञात हुआ है कि प्रतियोगिताओं के निर्णायक भी शनि, मंगल, गुरु जैसे ग्रहों से प्रभावित होते हैं। सौन्दर्य शास्त्र का विधान पूरी तरह से ज्योतिषकर्म और चिकित्सकों के पेशे जैसा ही है। अगर किसी निर्णायक को सौन्दर्य ज्ञान नहीं हो तो वह निर्णय भी नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक शुक्र से प्रभावित तो होते हैं लेकिन उन पर गुरु-चंद्रमा का भी प्रभाव होता है जो उन्हें विवेकवान बनाता है।
जन्म कुण्डली में तृतीय एवं एकादश भाव स्त्री का वक्षस्थल माना जाता है। गुरु-शुक्र इन भावों में बैठे हों या ये दोनों ग्रह इन्हें देख रहे हों, साथ में बली भी हों तो यह भाव सुन्दर, पुष्ट एवं आकर्षक होता है और आंतरिक सौन्दर्य को लग्न के अनुसार परिधान सुशोभित करते हैं। पंचम एवं नवम भाव कटि प्रदेश से नीचे का होता है जो स्त्री को शनि गुरु प्रधान कृषता तथा स्थूलता सुशोभित करती है। अभिनय एवं संगीत में दक्षता प्रदान करने वाला ग्रह शुक्र ही है। शुक्र सौन्दर्य, प्रेम, कलात्मक अभिरुचि, नृत्य, संगीतकला एवं बुद्घि प्रदान करता है।
शुक्र यदि बली होकर नवम, दशम, एकादश भाव अथवा लग्न से संबंध करें तो जातक सौन्दर्य के क्षेत्र में धन-मान और यश प्राप्त करता है। लग्न जातक का रूप, रंग, स्वभाव एवं व्यक्तित्व को दर्शाता है। चतुर्थभाव या चन्द्रमा जनता का प्रतिनिधित्व करता है। पंचम भाव बुद्घि, रुचि एवं मित्र बनाने की क्षमता को दर्शाता है। तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग देता है। मीन राशि के शुक्र कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है।

योग संयोग 

तृतीय भाव सृजनात्मक योग्यता का सूचक है। इसका बली होना एवं लग्न से संबंध सौन्दर्यता में निपुणता लाता है। कुशल अभिनय के लिए चंद्रमा एवं संवाद अदायगी के लिए बुध बली हो तथा शुभ स्थानों में चन्द्र-बुध का होना अभिनय, संगीत एवं नृत्य इत्यादि में सफलता दिलाता है।

जन्म लग्न, चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न से दशम भाव पर शुक्र का प्रभाव सफलता का योग बनाता है। बुध एवं शुक्र का बली होकर शुभ स्थानों (विशेषकर लग्न, पंचम दशम या एकादश), भाव से संबंध सौन्दर्य क्षेत्र में सफलता देता है।

चन्द्र कुण्डली में लग्नेश-धनेश की युति लाभ-स्थान में धन वृद्घि का संकेत देती है। साथ ही शुक्र व बुध का दशम व दशमेश से संबंध जातक को भाग्य बल प्रदान कर सफलता एवं प्रसिद्घि देता है।

चन्द्र, शुक्र एवं बुध का संबंध चतुर्थभाव, चतुर्थेश धन भाव व धनेश, पंचम भाव व पंचमेश, नवमभाव व नवमेश से होने पर सफलता के योग।

पंच महापुरुष योगों के अन्तर्गत शश योग (उच्च का शनि केन्द्र में) एवं मालव्य योग (उच्च व स्वराशि का केन्द्र में) एवं लग्नेश का स्वराशि व उच्च राशि का होना।

कुण्डली में सभी शुभ ग्रह लग्न में एवं सभी पाप ग्रह अष्टम भाव में होने पर यह योग यश का भागीदार बनाता है।

माला योग

कुण्डली में द्वितीय, नवम और एकादश के स्वामी ग्रह अपने-अपने स्थान पर होने से यह योग बनता है जो जातक को प्रसिद्धि के द्वार खोलता है।

श्रीनाथ योग

कुण्डली में सप्तमेश दशम स्थान में और दशमेश के साथ भाग्येश हो तो श्रीनाथ योग बनता है। कुछ विद्वानों के अनुसार दशमेश उच्च का होने पर ही यह योग बन जाता है, जो जातक को आकर्षक, सुखी और सम्माननीय बनाता है।

आंतरिक परिधान के कारक शुक्र, चंद्र और केतु हैं तथा बाह्य परिधान के कारक सूर्य, राहु, बुध, गुरु व शनि हैं। अलग-अलग चन्द्र राशियों एवं सूर्य राशियों के अनुसार अपने प्रभाव दिखाते हैं।

इस क्षेत्र में सफलता के लिए बुद्घि, चातुर्य, कला-कौशल के साथ कठोर परिश्रम जरूरी है। इसके लिए लग्न, चतुर्थ व पंचम भाव बली होना महžवपूर्ण है। सिंह राशि का शुक्र अभिनय कौशल देता है।

तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग प्रदान करता है। मीन राशि का शुक्र व्यक्ति की कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है।