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Friday, April 29, 2022

Think Twice... क्या आप ऐसा चाहेंगे?

When you take a consultation, you are asking for a service and hence invoking Saturn and 6th house (which represents debt) and the once the service is done and you never pay it remains a permanent debt to the astrologer as you initiated a karma.

Now, as Astrology is also related to 8th house it gets activated too. But when you pay it initiates a contract which is 7th house too. But, without payment 7th house does not get invoked. Hence you activate two malefic houses and do nothing to mitigate it. Now this debt shall have invite interest overtime and you have to pay in cash or kind through some other means.  

When a person visit an Astrologer, his/her ninth house is in operation. So if Guru Dakshina is not paid or bargained the ninth house elements get disturbed. If someone has no capacity to pay he or she can say it. But showing cleverness much damage a person own ninth house. 

Do you want that?

जब भी कभी कोई जातक किसी जन्मपत्री विशेषज्ञ या ज्योतिषी के पास अपनी या किसी अपने की जन्मपत्री की जांच अथवा विश्लेषण के लिए जाता है तो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उसका छठा, सातवां, आठवाँ और नौवां भाव सक्रिय हो जाता हैं|  

जब भी आप किसी के पास उसकी सेवायें लेने के लिए जाते है तो आपका शनि और छठा भाव, जो ऋण भाव भी कहलाता है, कार्य करना प्रारम्भ कर देता है|  सेवाएं लेने के बाद ज्योतिषी का सेवा शुल्क न देने पर यह स्थायी ऋण में परिवर्तित हो जाता है|  आठवाँ भाव भी ज्योतिष से संबंधित होने के कारण  क्रियान्वित हो जाता है|  जाने-अनजाने में हम दो अनिष्ट गृहों को सक्रिय कर देते हैं| 

नौवें घर के कारक भी ज्योतिषी का सेवा शुल्क अथवा गुरु-दक्षिणा न देने के कारण कहीं न कहीं शुभ फल देने में असमर्थ हो जाते हैं| जब भी आप सेवा-शुल्क देते हैं तो यह एक तरह से अनुबंध होने को दर्शाता है जो कि सातवाँ भाव भी है| जो कि सेवा-शुल्क न देने की स्थिति में क्रियान्वित नहीं होता है| 

किसी भी कारण से ज्योतिष का ऋण न दे पाने की स्थिति इस ऋण को समय के साथ बढ़ाती चली जाती है| आर्थिक स्थिति के कारण सेवा-शुल्क न दे पाना संबंधित व्यक्ति और ज्योतिषी के साथ सांझा किया जा सकता है परन्तु चालाकी जातक के नौवें भाव, जिसको भाग्य स्थान भी कहा जाता है, या उस के कारकों को भी क्षति पहुँचा सकती है| 

Thursday, May 7, 2020

अष्टकवर्ग - परिचय (भाग - 1)

ज्योतिष में फलादेश के निमित्त विभिन्न पद्धतियां प्रचलित हैं लेकिन उन सभी में पराशरोक्त (लघुपाराशरी) सिद्धान्त तथा पाराशरी महादशा ही प्रमुख हैं। यद्यपि महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा, प्राणदशा आदि इसके सूक्ष्म से सूक्ष्म विभाजन हैं - जिससे दशा समय को दिनों तथा घंटों तक में विभाजित कर सूक्ष्म फलादेश कहा जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद फलादेश सही घटित नहीं होता। वास्तव में ज्योतिष की "अष्टकवर्ग" और "गोचर" पद्धतियां इस दृष्टि से अपना विशेष महत्व रखती हैं। ज्योतिष के फलित सूत्रों के अपेक्षाकृत "अष्टकवर्ग" का सिद्धान्त बहुत ही स्पष्ट और युक्ति संगत है कि कोई भी ग्रह उच्च का, स्वक्षेत्री, केन्द्रादि बलयुक्त, योग कारक ही क्यों न हो, यदि वह अष्टकवर्ग में दुर्बल है तो शुभफल दे पाने में समर्थ नहीं होता। इसके विपरीत षष्ठ, अष्टम, व्यय आदि दुष्ट स्थानों में स्थित, नीच शत्रुक्षेत्री अदि ग्रह भी शुभ फल दे सकते हैं यदि वे अष्टकवर्ग में बली हों।

अष्टकवर्ग का मुख्य आधार यह है कि जन्म के समय या गोचर में ग्रहों की जो परस्पर सापेक्ष स्थिति होती है, उसी के अनुसार फल के शुभत्व या अशुभत्व का निर्णय होता है। सामान्यतः होरा में (कुंडली में) प्रत्येक ग्रह का भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होगा, अब एक ग्रह दूसरे ग्रह की स्थिति से कितना प्रभावित होगा - इसका थोड़ा बहुत विचार दृष्टि से हो सकता है। अष्टकवर्ग में प्रत्येक ग्रह की परस्पर सापेक्ष स्थिति को देखकर उसके शुभाशुभ फल का सही निर्णय किया जा सकता है।

बृहत्पराशर होराशास्त्र के पूर्वखण्ड में महर्षि पराशर ने ग्रहों के समग्र प्रभावों की व्याख्या की है जो ग्रहों की विभिन्न भावों में स्थिति के कारण उत्पन्न होता है। उत्तरखण्ड में अष्टकवर्ग पर अध्याय है, जिसके प्रारम्भ में स्वयं पराशर और उनके शिष्य मैत्रेय के मध्य संवाद दिया गया है :-

कलौ पापरतानां च मन्दा बुद्धिर्यतोनृणाम्।
अतोऽल्पबुद्धिगम्यं यत् शास्त्रमेतद् वदस्व ।।३।। 

तत्तत्कालग्रह स्थित्या मानवनां परिस्फुटम्।
सुख दुःखपरिज्ञानमायुषोनिर्णयं तथा ।।४।।  
बृहत्पराशर होराशास्त्र, अध्याय ६८ 

मैत्रेय अपने गुरु से निवेदन करते हैं - कलियुग में पाप कर्म निरत मनुष्यों की बुद्धि चूंकि मन्द हो जाती है अतः अल्प बुद्धि से भी जो शास्त्रानुशासन हो कृपया वह बताएं , जिससे मनुष्यों को उस समय की ग्रह स्थिति से सुस्पष्ट रूप में सुख-दुःख के पूर्ण ज्ञान तथा आयु का निर्णय हो सके।

अष्टकवर्ग विधि का तर्काधार समझाते हुए महर्षि पराशर कहते हैं :-

"जिस तरह विभिन्न भावों में ग्रहों की स्थिति के प्रभाव का आकलन जन्म-लग्न और चंद्रमा से किया जाता है, उसी तरह दूसरे ग्रहों को भी लग्न की तरह मानकर और उनसे भावों को गिनते हुए भी फलों का आकलन करना चाहिए। इस तरह सात ग्रहों (राहु और केतु को छोड़कर) और लग्न से प्राप्त प्रभावों से ही पूरा चित्र स्पष्ट होता है। जब सातों ग्रहों और लग्न के समग्र प्रभावों को एक साथ आँका जाये तो वह अष्टकवर्ग विश्लेषण कहलाता है"।

भारतीय ज्योतिष में किसी भी कुंडली के फलकथन के लिए प्राचीन काल से ही अनेक विद्याओं का प्रयोग किया जाता रहा है। होराशास्त्र के महर्षियों ने सभी प्रकार के कर्मों से उत्पन्न होने वाले शुभ या अशुभ फलों को जानने के लिए जिस पद्धति का विकास किया उसे 'अष्टकवर्ग' कहा गया है। अष्टकवर्ग के ज्ञान से मनुष्य के समस्त कर्मजनित शुभ या अशुभ फल को वैज्ञानिक ढंग से जाना जा सकता है।

अष्टकवर्ग की सहायता से फलादेश को अत्यन्त सूक्ष्मता प्रदान की जाती है। व्यष्टि व समष्टि के अपूर्व समन्वय का सिद्धान्त इस पद्धति से देखा जा सकता है। उदहारण के लिए कोई ग्रह शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होकर स्वराशि, उच्चराशि या मित्रादि की राशि में स्थित हो तो अपने भाव से सम्बन्धित फलों की वृद्धि करेगा, यह एक सामान्य सिद्धांत है। लेकिन कितनी वृद्धि करेगा?  कुल शुभ व अशुभ फल का अनुपात क्या होगा? इस विषय में अष्टकवर्ग पद्धति ही निर्णायक मानी गयी है। इसकी सहायता से आयु, धन, विद्या, बुद्धि व सुखादि का विशेष निर्णय किया जाता है।

अष्टकवर्ग ही एक ऐसी पद्धति है जिसमें ग्रहों के परस्पर संबंधों को प्रभावशाली ढंग से एक सूत्र में पिरोया गया है। एक ग्रह अपने बल के अनुसार ही कार्य करेगा। इसको मापने की अन्य विधियाँ अपने में विशिष्ट अर्थ रखती हैं परन्तु  इन सभी में एक तथ्य को भुला दिया जाता है कि कोई भी ग्रह शून्य में क्रियाशील नहीं होता है, शेष ग्रह भी आगे-पीछे, निरन्तर क्रियारत होते हैं। इसलिए, कोई भी ग्रह उतना ही कार्य कर पाता ह, जितना अन्य ग्रह उसके लिए संभव बनाते हैं। दूसरे ग्रह या तो उसके काम में सहयोग करते हैं या विरोध। इस तरह से जातक सभी ग्रहों के सामूहिक फल भोगता है। यह केवल अष्टकवर्ग से ही कहा जा सकता है कि यदि किसी राशि में बृहस्पति के पास ७ भिन्नाष्टक और ४२ सर्वाष्टक बिंदुओं का बल है तब इसका अर्थ है कि सभी ग्रहों ने मिलकर बृहस्पति में इतनी अधिक मात्रा में सार्थक बल का विनियोग किया है।

अष्टकवर्ग पर किये गये शोधों से पता चला है कि यदि फलकथन के लिए प्रयोग किये जाने वाली अन्य विद्याओं के साथ-साथ अष्टकवर्ग में प्रयुक्त सर्वाष्टकवर्ग का भी उपयोग किया जाये तो सही निर्णय तक पहुँचने में मदद मिल सकती है।

ग्रहों के विभिन्न राशियों में भ्रमण करने से व्यक्ति विशेष पर शुभाशुभ प्रभाव गोचर फल कहलाता है। इसका विचार जन्म राशि से किया जाता है। वैसे ही अन्य ग्रहों और लग्न से गोचर विचार को अष्टक वर्ग विचार कहा जाता है। अष्टक का अर्थ होता है आठ जिनमे सात ग्रह और जन्म लग्न सम्मिलित हैं। अष्टकवर्ग में राहू-केतु  को छोड़कर शेष सात ग्रह और लग्न सहित आठ को महत्व दिया गया है।

यह सातों ग्रह हर समय गतिमान रहकर अपनी स्थिति बदलते रहते हैं जो शुभ भी हो सकती हैं और अशुभ भी। प्रत्येक ग्रह अपना प्रभाव किसी निश्चित दूरी से दूसरे स्थान पर डालता है।  यदि कोई ग्रह शुभ स्थान व् शुभ योगों में होकर भी शुभ फल नहीं देता हो तो इसका कारण अष्टकवर्ग से सरलता से जाना जा सकता है। जैसे अगर कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में २५ से कम बिंदुओं पर होगा तो अपना शुभ प्रभाव नहीं दे पायेगा।आठों (सात ग्रह और लग्न) से विचार करने पर कोई भी ग्रह अधिक के दृष्टिकोण से शुभ हो तो शुभ और अगर अशुभ हो तो अशुभ। इन प्रभावों को अष्टकवर्ग में महत्व देकर फलित करने की एक सरल विधि तैयार की गयी है। यही अष्टक वर्ग विचार कहलाता है।

वाराहमिहिर के पुत्र पृथुयशो ने भी अपनी पुस्तक होरसारा में लिखा है, "गोचर के द्वारा सामान्य परिणामों को जाना जा सकता है परन्तु सूक्ष्म और शुद्ध परिणाम अष्टकवर्ग के द्वारा ही प्राप्त किये जा सकते हैं।"

सर्वप्रथम पारिभाषिक शब्दों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है:-
  1. रेखा (|) के चार पर्यायवाची शब्द  रेखा, स्थान, फल और कला हैं। बिंदु () के भी चार पर्याय शब्द हैं - करण, बिंदु, दाय और अक्ष। अष्टकवर्ग द्वारा फलादेश जानते समय देखा जाता है कि वहां पर कितनी रेखाएं और बिंदु हैं? शुभफल को प्रायः रेखा (|) से और अशुभफल को बिंदु () से व्यक्त किया जाता है। रेखा और बिंदु केवल शुभ या अशुभ फल के प्रतीक हैं इनमें शुभ या अशुभ फल निहित नहीं है। सूचना के लिए दक्षिण भारत में शुभफल का द्योतक बिंदु को माना जाता है। रेखा को शुभफल की द्योतक और बिंदु को अशुभफल का द्योतक मानते हुए यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के जन्म समय उसकी कुंडली में जिस राशि को रेखाएं प्राप्त हों और उस स्थान पर ग्रह भी हों तो शुभफल होता है। इसी तरह से किसी राशि में बिंदु हों तथा रेखा न हों तो अशुभ फल होता है। किसी राशि में बिंदु और रेखा समान (४-४) संख्या में हों और उसमें साथ ही ग्रह भी विद्यमान हों तो उसका सम (मिश्रित) फल होता है। यदि किसी स्थान पर कुछ भी न हो तो सामान्य (सम) फल होता है।
  2. भिन्नाष्टक वर्ग या सभी सातों ग्रहों का अष्टकवर्ग।
  3. सर्वाष्टकवर्ग - बारहों भावों के प्रत्येक भाव में बिंदुओं का कुल योग। सभी ग्रहों  द्वारा  अपने-अपने भिन्नाष्टक वर्ग में किसी विशेष राशि में दिए गए बिंदुओं का कुल योग एक अन्य वर्ग या कुंडली में दर्शाया जाता है, जिसे सर्वाष्टक वर्ग कहते हैं। 
  4. प्रस्तार चक्र - सारणीबद्ध रूप में यह बारह राशियों में सभी बिंदुओं का कुल योग है।
शुभाशुभ फल का विशेष विचार करने के लिए जन्म लग्न से या चन्द्रमा से जो ग्रह उपचय (वृद्धि) यानि कुंडली के ३, ६, १०, ११वें स्थानों में हों तथा स्वराशि, सवोच्च राशि, मित्र राशि या मूल त्रिकोण राशि में हो तो उसका अष्टक वर्ग जनित फल यदि शुभ हो तो पूर्ण जानना चाहिए। यदि उक्त परिस्थितयों में अशुभ अष्टक वर्ग जन्य फल हो तो अशुभ फल की मात्रा मध्यम होती है। यदि कोई ग्रह जन्म लग्न या चन्द्र से पीड़ा स्थान यानि अपचय (१, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२वें) में स्थित हो तो उसका शुभ फल अल्प होता है तथा अशुभ फल अधिक होता है।

सामान्यतः रेखायुक्त होना शुभ फलदायी होता है किन्तु रेखायुक्त ग्रह भी यदि उपचय स्थान में और स्वोच्चादि राशि में स्थित होगा तो उसका पूर्ण और वैसे ही अपचय स्थानों में होने पर शुभ फल कम हो जाएगा। यही क्रम अशुभ फल के सन्दर्भ में भी अपनाना चाहिए। उपचय स्थानगत ग्रह का फल मध्यम और अपचय स्थानगत ग्रह का अशुभ फल अधिक होता है।

उक्त शुभाशुभ फल अपने दशा परिपाक काल में अथवा गोचर काल में प्रतिफलित होगा। जन्म समय में जो ग्रह बली हो तो गोचर में अपने अष्टक वर्ग जनित फल को और अधिक पुष्ट करके प्रदान करेगा। इसी प्रकार निर्बल ग्रह अपने फल को अपुष्ट रूप से प्रदान करेगा। फल चाहे शुभ या अशुभ कैसा भी हो उसके पुष्टत्व और अपुष्टत्व का विवेक ग्रह के बलाबल के आधार पर करना चाहिए। यदि पूर्ण मंडल वाला चन्द्रमा भी बलहीन होगा तो अवश्य ही अन्य बलहीन ग्रहों की तरह अशुभ फल ही देगा।जन्म के समय जो ग्रह युद्ध में पराजित, अस्तंगत, कम रश्मियों वाला, नीचराशि में स्थित, शत्रुस्थानगत, शत्रुग्रह से दृष्ट और अल्प बिम्ब वाला होगा, वह अष्टक वर्ग जन्य अशुभ फल को अधिक परिपुष्ट करके प्रदान करेगा।

अष्टकवर्ग (भाग - 2)

सर्वाष्टकवर्ग  

सर्वाष्टकवर्ग का विश्लेषण ग्रहों के विश्लेषण जितना ही आवश्यक है। सर्वाष्टकवर्ग फलित ज्योतिष में भविष्य - कथन के लिए प्रामाणिक ही नहीं अपितु विश्वसनीय भी है।

किसी भी भाव में २५ से कम बिंदु अनुकूल परिणाम देने में समर्थ नहीं होते। अगर बिंदुओं की संख्या ३० से अधिक हो तो शुभ परिणाम अपेक्षित हैं। अगर किसी भी भाव में बिंदुओं की संख्या ३० से अधिक हो तो उस भाव का परिणाम पूर्ण रूप से प्राप्त किया जा सकता है। उच्च राशि, त्रिकोण, उपचय आदि कम बिंदुओं में  होने से प्रभावहीन या निष्फल हो जाते हैं।


कुल ३३७ सर्वाष्टक बिंदुओं को १२ से भाग देने पर औसत लगभग २८ आता है। अतः २८ वह औसत अंक है जिससे तुलना करने पर किसी भाव में बिंदुओं का कम या अधिक होना माना जा सकता है। 

सामान्य सिद्धांत  
  1. कोई  भी राशि या भाव जहाँ २८ से अधिक बिंदु हों, शुभ फल देगा। जितने अधिक बिंदु होंगे फल उतना ही अच्छा होगा। इसके विपरीत उन भाव या राशियों में जिनमे २८ से कम बिंदु होंगे, अशुभ फल मिलेंगे। व्यवहार में २५ से ३० के बीच बिंदुओं को सामान्य फलदायी ही माना जाता है। दूसरे शब्दों में यही कहा जायेगा कि यदि बिंदु ३० से ऊपर हों तभी कोई भाव/राशि विशेष शुभ फल देगी।
  2. वह ग्रह प्रभावित हो जाता है जो भाव/राशि में स्थित है जहां बिंदु कम हैं , चाहे वह स्थान उसका उच्च, स्वक्षेत्री, केन्द्र या त्रिकोण ही क्यों न हो, और चाहे वह लग्न से उपचय (३, ६, १०, ११) स्थानों में ही क्यों न स्थित हो। तात्पर्य यह है कि इस ग्रह को अन्य ग्रहों से समर्थन नहीं मिल रहा।
  3. इसके विपरीत वे ग्रह भी शुभ फल देंगे जो अपने नीच स्थानों में अथवा दुःस्थानों, जैसे ६, ८, १२ में हों, किंतु वहां बिंदु अधिक हों। कुछ विद्वानों का मत इससे भिन्न हैं।
  4.  यदि नवें, दसवें, ग्यारहवें और लग्न - इन सभी में ३० से अधिक बिंदु हों तो जातक का जीवन समृद्धिपूर्ण होगा। इसके विपरीत यदि इन भावों में २५ से कम बिंदु हों तो जातक को रोग और बेबसी की ज़िन्दगी भोगनी पड़ेगी।
  5. यदि ग्यारहवें घर में दसवें घर से ज़्यादा बिंदु हों और ग्यारहवें घर में बारहवें घर से ज़्यादा, साथ ही लग्न में बारहवें घर से ज़्यादा बिंदु हो तो जातक सुख-समृद्धि का जीवन भोगेगा।
  6. जातक भिखारी का जीवन जियेगा यदि लग्न, नवम, दशम और एकादश स्थानों में मात्र २१ या २२ या और कम बिंदु हों और त्रिकोण स्थानों में अशुभ ग्रह बैठे हों। 
  7. यदि चन्द्रमा सूर्य से निकट होने के कारण पक्षबल से रहित हो, चन्द्र राशि के स्वामी के पास कम बिंदु (जैसे २२) हों और उसे शनि देखता हो तो जातक पर दुष्टात्माओं का प्रभाव रहेगा। यदि राहु भी चन्द्रमा पर प्रभाव डाल रहा हो तो इस परिणाम में कोई संशय नहीं रहेगा।
  8. जब-जब कोई अशुभ ग्रह ऐसे भाव पर गोचर वश विचरण करेगा जिसमे २१ से कम बिंदु हों तो उस भाव से संबंधित फलों की हानि होगी।
  9. इसके विपरीत, जब कोई ग्रह किसी ऐसे घर में विचरण करता है जहाँ ३० से अधिक बिंदु हों तो उस भाव से संबंधित शुभ फल मिलेंगे जो उस ग्रह के कारकत्व और और संबंधित कुंडली में उसे प्राप्त भाव विशेष के स्वामित्व के अनुरूप होंगे।
  10. इसी तरह ग्रह जिन राशियों के स्वामी होते हैं और जिन राशियों/भावों में वे स्थित होते हैं, उन स्थानों से संबंधित अच्छे फल वे अपनी दशा-अन्तर्दशा में देंगे। सूक्ष्मतर विश्लेषण के लिए दशा-स्वामी के भिन्नाष्टक वर्ग का अध्ययन करना चाहिये।
  11. जिस भाव में ३० से अधिक बिंदु हों और एक साथ कई ग्रह उसमें गोचरवश विचरण कर रहे हों तो उस अवधि में वे उस भाव के शुभ फलों को कई गुणा कर देंगे। फलों का स्वरुप इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित भाव कौन सा है और गोचर के ग्रहों का मूल लग्न में स्थान कहाँ है और उनके कारकत्व क्या है।
  12. जब (किसी विशेष दिन) उस राशि का उदय हो रहा हो जिसमें न्यूनतम बिंदु हैं और उस दिन चिकित्सकों से सलाह करके रोग का उपचार प्रारम्भ किया जाये तो जल्दी स्वास्थ्य-लाभ मिलने की संभावना होती है। उसी तरह उस समय में यदि ऋण लिया जाये तो उसे चुकाने की क्षमता भी जल्दी ही अर्जित हो जाती है।
  13. किसी विवाह के सुखी और सफल होने के लिए वर और वधू की चन्द्र राशियों के बिंदु एक दूसरे की जन्म कुंडलियों में ३० से अधिक होने चाहियें।
  14. जन्म लग्न एवं उससे दूसरे, चौथे, नवें, दसवें और ग्यारहवें भाव के बिंदुओं का योग करें। यदि यह योग १६४ से अधिक है तो जातक समृद्ध होगा। संख्या १६४ को 'वित्ताय' कहते हैं जो वित्तीय समृद्धि का द्योतक है।
  15.  इसी तरह छठे, आठवें और बारहवें घर के बिंदुओं का योग करें। यदि यह योग ७६ से काम आये तो आय व्यय से अधिक होगी। संख्या ७६ को तीर्थ का नाम दिया गया है।
  16. प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम एवं दशम भाव के बिंदुओं का योग करें। ये भाव जातक में अंतर्मुखी प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह योग यदि शेष छः भावों (बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के द्योतक) के बिंदु योग से अधिक है तो जातक संतोषी जीव होगा और ज्ञान-ध्यान, सत्कर्म और दान-पुण्य से आतंरिक शांति पायेगा। विपरीत स्थिति में जातक हमेशा अपने से बाहर सुख ढूंढेगा जिसके कारण उसका मन लालच, छल-कपट, झूठे दिखावे और अहंकार से ग्रस्त रहेगा। 
  17. कुंडली के बारह भावों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है। (क) बंधु - प्रथम, पंचम एवं नवम भाव  (ख) सेवक - द्वितीय, षष्ठ एवं दशम भाव (ग) पोषक - तृतीय, सप्तम एवं एकादश भाव (घ) घटक - चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव। 

तीव्र फलोदय का सिद्धांत :- 

विभिन्न भावों में सर्वाष्टक बिंदुओं की तुलना करें। यदि घर में न्यूनतम बिंदु हैं और उससे अगले घर में अधिकतम, तो जातक जीवन में अचानक ऊपर उठेगा। यदि दोनों अंकों में अंतर काफी ज़्यादा हुआ तो जातक उतनी ही अधिक तीव्र उन्नति का अनुभव करेगा। इसके विपरीत यदि एक घर से दूसरे घर में अधिकतम बिंदुओं से न्यूनतम बिंदुओं की गिरावट हो तो जातक जीवन के किसी या कुछ क्षेत्रों में हानि का सामना करेगा। जहाँ इन घरों में न्यूनतम और अधिकतम बिंदुओं का अंतर मामूली होगा वहां जातक करीब-करीब एक-सी और धीमी प्रगति का अनुभव करेगा। यदि इस तरह के तीव्र अंतर कई भावों के बीच होंगे तो जातक का सारा जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहेगा - यानि कभी राजा तो कभी रंक।

त्वरित भविष्यवाणियों के लिए सर्वाष्टकवर्ग विधि का एक सिद्धान्त अत्यंत लोकप्रिय है :-
  1. यदि एकादश भाव में दशम भाव से अधिक बिंदु हो तो जातक अपेक्षाकृत कम प्रयासों से अधिक लाभ पाएगा। मुख्यतः लग्न से एकादश भाव के सन्दर्भ में यह नियम लागू किया जाता है, लेकिन अन्य भावों से एकादश भाव के संदर्भ में भी इस नियम का उपयोग किया जा सकता है। 
  2. अगर इस स्थिति के विपरीत जातक का बारहवां भाव दूसरे भाव से अधिक प्रबल हो तो इसका अभिप्राय आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में यही होगा कि वह अपने पारिवारिक व्यवसाय में न लग कर, विदेश में अपना भाग्य आजमायेगा और वहां उस पर लक्ष्मी की कृपा होगी। कौन सा परिणाम कहाँ लागू होगा, यह देखने के लिये जन्म कुंडली में दूसरे योगों को भी देखना होगा।
  3. यदि बारहवें भाव में ग्यारहवें से अधिक अंक हों तो इसका अभिप्राय कोई एक हो सकता है, जैसे (क) आय से अधिक व्यय, जिसका परिणाम होगा कर्ज में डूबना  (ख) विदेशी स्रोतों से आय, यह स्थिति उन लोगों की जन्म कुंडलियों में देखी जाती है जिनके सितारे मातृभूमि से बाहर किसी देश में चमकते हैं। ऐसे में चतुर्थ भाव और उसके स्वामी का का किंचित पीड़ित होना लगभग अनिवार्य होता है।
  4. यदि दूसरे भाव में बारहवें भाव से अधिक बिंदु हों तो जातक में आमोद-प्रमोद पर व्यय करने के बजाय धन को जोड़ने की प्रवृत्ति अधिक होगी। ऐसे लोग कभी जल्दबाज़ी में ख़रीदारी नहीं करते बल्कि बारीकी से मोलभाव करते हैं। दो स्थानों के बिंदुओं में अंतर जितना ज़्यादा होगा यह प्रवृत्ति उतनी ही उत्कृष्ट रूप से सामने आयेगी।

Tuesday, January 14, 2020

नीच भंग राजयोग

जन्म कुंडली  में किसी ग्रह का नीच राशि में स्थित होना ख़राब योग माना गया है। किन्तु कभी-कभी ग्रह नीच राशि में स्थित होकर भी बहुत उत्तम प्रभाव दिखाते हैं यानि उनके नीच होने का जो दोष है वह भंग हो जाता है और वह फायदेमंद साबित होता है

किसी ग्रह की नीचता तब बड़ी आसानी से भंग हो जाती है जब कुंडली में उस नीच राशि का स्वामी लग्न या चन्द्रमा से केन्द्र  में अवस्थित हो। दूसरी स्थिति में नीचत्व तब भंग होता  है जब नीच राशि का स्वामी और उसी के उच्च राशि स्वामी परस्पर एक-दूसरे से केन्द्र में हो (इसमें एक नियम यह भी कहा गया है कि कोई ग्रह नीच का है उस राशि  में जो ग्रह उच्च का होता है उसकी युति या दृष्टि हो तो भी नीच भंग हो जाएगा) यह भी माना गया है कि नीच ग्रह अगर लग्न और चंद्र से केन्द्र में अवस्थित हो तो भी ग्रहों का नीचत्व भंग हो जाता है। अष्टमेश ग्रह को नीचत्व का दोष स्वयं भंग हो जाता है और नीच ग्रह को उसके उच्च राशि स्वामी अगर पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो

नीचस्थितो जन्मनि यो ग्रह: स्यात्तद्राशिनाथोSपि तदुच्चनाथः
स चन्द्रलग्नाद्यदि केन्द्रवर्ती राजा भवेद्धार्मिकचक्रवर्ती

यदि किसी के जन्म के समय कोई ग्रह नीच राशि मे पड़ा हो और 

क)  इस नीच राशि का स्वामी चंद्रमा से केन्द्र में हो और 
ख)  जो ग्रह नीच है और उसका उच्चनाथ भी चन्द्रमा से  केन्द्र में हो 

तो नीच भंग हो जाता है बल्कि उत्तम राज योग बनाता है। यह समस्त एक योग है।  उच्चनाथ शब्द का क्या अर्थ है? इसके अर्थ में मतभेद है; मान लीजिए शनि मेष राशि का नीच का हैा इसका उच्चनाथ कौन हुआ? एक मत तो यह है कि शनि तुला राशि का उच्च का होता है और तुला  शुक्र होता है इस कारण उच्चनाथ शुक्र हुआ। दूसरा मत यह है कि शनि मेष राशि में है और मेष राशि में सूर्य उच्च का होता है इस कारण उच्चनाथ सूर्य हुआ। हमारे विचार से पहला अर्थ  उपयुक्त है। सूर्य का उच्चनाथ मंगल, चन्द्रमा का उच्चनाथ शुक्र, बुध का उच्चनाथ बुध, बृहस्पति का उच्चनाथ चन्द्रमा, शुक्र का उच्चनाथ बृहस्पति और शनि का उच्चनाथ शुक्र है

नीचभंग होने के लिए (क) और (ख) दोनों शर्तों का पूरा होना आवश्यक है

एक टीकाकार इस श्लोक का अर्थ यह कहते हैं कि (१) जो ग्रह नीच राशि में हो उसका स्वामी लग्न से केन्द्र  में हो या (२) जो नीच राशि में ग्रह है उसका स्वामी चंद्रमा से केंद्र में हो (३) या जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ लग्न से केन्द्र में हो या (४) जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ चन्द्रमा से केन्द्र में हो - इन चारों परिस्थितियों में नीच भंग हो जाएगा। परन्तु मूल संस्कृत श्लोक में 'अपि' शब्द आया है जिस का अर्थ है कि जो ग्रह नीच राशि में है उसका स्वामी और उसका उच्चारण भी यानि दोनों, केवल एक नहीं

इसी प्रकार मूल श्लोक में लिखा है 'चन्द्रलग्नात्' जिसका श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने अर्थ किया है 'चन्द्रमा से या लग्न से' परन्तु यदि दोनों से अभिप्राय होता तो मूल संस्कृत में 'चन्द्रलग्नात्' यह पञ्चमी का एक वचन नहीं आता। चन्द्र लग्नात् का अर्थ है चन्द्र लग्न से यानि चन्द्रमा जिस राशि में है उससे।  

यदि इस श्लोक में दी गई चार शर्तों को अलग-अलग चार योग मान लिया जाये तब तो प्रायः सभी नीच ग्रहों का भंग हो जावेगा क्योंकि जो ग्रह नीच राशि का है उसका स्वामी यदि लग्न से केन्द्र में ही (चार घर उसके अंतर्गत आ गए) या चन्द्रमा  से केन्द्र में हो (चार घर इस परिभाषा में आ गए)  या उच्चनाथ लग्न से केन्द्र में हो (चार घर इस में आ गये) या चन्द्र से केन्द्र में हों (चार घर इस में आ गए) इस प्रकार १६ निर्दिष्ट स्थानों में से कहीं न कही आ जायेगा हीा 

एक टीकाकार यह भी अर्थ करते हैं कि यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी या उस नीच ग्रह का उच्चनाथ उस नीच ग्रह से केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है


यद्येको नीचगतस्तद्राश्यधिपस्तदुच्चपः केन्द्रे
यस्य स तु चक्रवर्ती समस्तभूपालवन्द्यांघ्रि 

यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) उस नीच राशि का स्वामी और जो ग्रह नीच का है उसका उच्चारण यदि दोनों परस्पर केन्द्र में हों तो नीचभंग राजयोग होता है। यहाँ भी उच्चारण के दो अर्थ हो सकते हैं परन्तु हम यही अर्थ लेंगे कि नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उस राशि का स्वामी उच्चप या उच्चनाथ कहलाएगा

इस श्लोक का एक अन्य अर्थ भी हो सकता है कि यदि कोई ग्रह नीच हो तो उस नीच राशि के स्वामी का जो उच्चनाथ है वह उच्चनाथ यदि केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है। उदाहरण के लिए किसी की कुंडली में सूर्य नीच राशि का है, तुलाराशि नाथ शुक्र है। शुक्र उच्च होता है मीन में। मीन का स्वामी हुआ बृहस्पति, यह बृहस्पति यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राज योग हुआ


यस्मिन्राशौ वर्तते खेचरस्तद्राशीशेन प्रेक्षितश्चेत्स खेटः
क्षोणीपालं कीर्तिमन्तं विदध्यात् सुस्थानश्चेति्कपुनः पार्थिवेन्द्रः   

एक अन्य नीच भंग राजयोग बताते हैं। जिस राशि में नीच ग्रह हो उस राशि का स्वामी यदि नीच ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो नीच भंग राज योग होता है। यदि यह नीच ग्रह ६-८-१२ दुःस्थान में हो तो इतना अच्छा राजयोग नहीं होगा किन्तु सुस्थान में हो तो बहुत उत्तम नीचभंग राजयोग बनता है। 


नीचे तिष्ठति यस्तदाश्रितगृहाधीशो विलग्नाद्यदा 
चन्द्राद्वा यदि नीचगस्य विहगस्योच्चर्क्षनाथोऽथवा 
केन्द्रे तिष्ठति चेत्प्रपूर्णविभवः स्याच्चक्रवर्ती नृपो  
धर्मिष्ठोऽन्यमहीशवन्दितपदस्तेजोयशोभाग्यवान् 

यदि कोई  ग्रह नीच राशि में हो तो (क) इस नीच राशि का स्वामी अथवा (ख) नीच ग्रह का उच्चनाथ इन दोनों में से एक भी जन्म लग्न या चन्द्र लग्न से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है


नीचे यस्तस्य नीचोच्चभेशौ द्वावेक एव वा
केन्द्रस्थश्चेच्चक्रवर्ती भूपः स्याद्भूपवन्दितः

यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी और नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उसका स्वामी वह - एक या दोनों लग्न से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग  होता है


सौजन्य :- फलदीपिका भावार्थबोधिनी 

Wednesday, March 27, 2019

ज्योतिष शास्त्र के कुछ अन्य सांकेतिक शब्द

ज्योतिष शास्त्र के कुछ सांकेतिक शब्दों का एक लेख सितम्बर २०१५, में भी प्रकाशित किया जा चुका है। यह लेख उसी का विस्तार है जिसमें कुछ अन्य पारिभाषिक शब्दों की चर्चा की गई है। इससे भारतीय ज्योतिष को ना केवल समझने और जानने में सहजता का अनुभव होगा अपितु  कुंडली बनाने और उसका फलादेश करने में भी सहायता होगी :-

इष्टकाल - सूर्योदय से जन्मकाल तक के घट्यादि काल को इष्टकाल कहा जाता है।

सूर्योदय - यह समय हर स्थान के लिए भिन्न होता है अतः इसे हम पंचांग से जान सकते हैं जहाँ यह स्थानीय, मानक अथवा दोनों का ही उपलब्ध रहता है। 

जन्म समय - यह जातक के जन्म का समय होता है। इसे घण्टा-मिनट में व्यवहार किया जाता है।

घटी - घटी, दण्ड, घड़ी, नाड़ी आदि तुल्यार्थ बोधक शब्द हैं। एक अहोरात्र में ६० घड़ी माना गया है। अतः १ घंटे में २.३० घटी/पल होता है। ६० विपल का एक पल, ६० पल की एक घड़ी, ६० घड़ी का एक अहोरात्र होता है।

भयात - यह नक्षत्र का वह समय है जो नक्षत्र के प्रारम्भ काल से जातक के जन्म काल तक व्यतीत होता है।

भभोग - यह नक्षत्र के सम्पूर्ण स्पष्ट भोग काल का नाम है।

ग्रहस्पष्ट - जन्म या प्रश्न के समय ग्रहों की आकाशीय वास्तविक स्थिति, जो राशि, अंश, कला, विकला अदि के रूप में साधन करनी होती है।

मध्यम मान - स्पष्ट मानों का माध्य अर्थात् औसत मान को कहा जाता है। जैसे तिथि का औसत भोगमान ६० घड़ी, वैसे ही नक्षत्र, योग आदि का भी तुल्य ही औसत भोग मान होता है।

सावन दिन या वार - सूर्योदय से अन्यतम सूर्योदय तक के काल को सावन दिन या वार कहा जाता है, जिसे ही लोग रवि, सोम अदि सात वारों के नाम से जानते हैं।

भाव - जन्म कुंडली में १२ भाव होते हैं जिन्हें क्रम से तनु, धन, सहज, सुख, सुत, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय और व्यय कहा जाता है।

लग्न - इसे जन्म लग्न भी कहते हैं। यह कुंडली का पहला भाव होता है। जन्म के समय पूर्व क्षितिज में जो राशि प्रथम उदित होती है उसे लग्न कहा जाता है।

लग्न-स्पष्ट - लग्न के जितने राशि, अंश, कला, विकला आदि पर जन्म हो, उसे लग्न स्पष्ट कहते हैं।

क्रांतिवृत्त - इसे राशि-मंडल भी कहते हैं। आकाश गोल में अपनी गति से चलने का जो सूर्य का मार्ग है, उसी को क्रांतिवृत्त कहा जाता है।

मानक समय - सम्प्रति यूरोप महादेशीय ग्रीनविच नाम के स्थान से गुजरती भूमध्य रेखा से पूर्व ८२/३० अंश-कला रेखांश के स्थानिक समय को सम्पूर्ण भारत के लिए मानक समय (स्टैण्डर्ड टाईम) माना गया है।

स्थानिक समय - जब जिस स्थान के खमध्य में सूर्य, भ्रमण वश पहुँचता है, वह उस स्थान का दिनार्द्ध होता है। जिसे दिन-मध्य भी कहा जाता है। दिन-मध्य से पूर्व सूर्योदय तथा बाद में सूर्यास्त होता है। दिन मध्य या दिनार्द्ध का दो गुणा दिनमान और दिनमान का पाँचवाँ भाग स्थानिक सूर्यास्त घण्टा-मिनट होता है।सूर्यास्त काल को १२ में से निकाल देने पर सूर्योदय घण्टा-मिनट हो जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पंचांग में इन्हे (दिनमान, सूर्योदय व सूर्यास्त को लिखने की परम्परा है।) यह प्रत्येक स्थान का भिन्न होता है। इसलिए ऐसे समय को स्थानिक समय (Local Time) कहा जाता है।

रेखांश - ग्रीनविच नामक स्थान को सम्प्रति भूमध्य माना गया है और भूमध्य रेखा पर जो स्थान जिस अंश-कला पर स्थित होता है, सम्पूर्ण विश्व के उस-उस स्थान का उसे रेखांश कहा जाता है। इस प्रकार ग्रीनविच को भूमध्य के 0 अंश पर स्थित मानकर उससे पूर्व और पश्चिम में स्थित स्थानों का रेखांश सर्वेक्षण द्वारा नियत कर मानचित्र में विधिवत् दर्शाया गया रहता है।

अक्षांश - भूगोल ध्रुवों द्वारा दो भागों में विभक्त माना गया है - एक उत्तरी और दूसरी दक्षिणी। ध्रुव से ९० अंश की दूरी पर निरक्ष देश स्थित माना गया है। मानचित्र में प्रायः तिरछी रेखाओं द्वारा अक्षांश का संज्ञापन करते हुए उत्तर तथा दक्षिण स्थान का प्रदर्शन किया हुआ रहता है। इसका उपयोग दो स्थानों के दक्षिणोत्तर अन्तरांश को जानने के लिए किया जाता है। निरक्ष देश पर से गई हुई रेखावृत्त विषुवत् वृत्त कहलाती है, जिससे भूगोल उत्तर अक्षांश और दक्षिण अक्षांश सम्बन्धी देशों में बँटा हुआ माना जाता है।

चरान्तर साधन - जन्म स्थान और पंचांग स्थान के चरों का अंतर चरान्तर होता है। अतः दोनों स्थानों का चर साधन करना पड़ता है। जन्म स्थान का चर अधिक होने पर चरान्तर घन अन्यथा ऋण जानना चाहिए अथवा घन या ऋण चरान्तर का निर्णय इस प्रकार करना चाहिए - जन्म स्थान के अक्षांश से पंचांग स्थान का अक्षांश कम हो तथा उत्तराक्रान्ति हो, तो घन चरान्तर, इसी तरह जन्मस्थान के अक्षांश से पंचांग स्थान का अक्षांश अधिक और दक्षिणक्रान्ति हो, तो भी घन चरान्तर जानना चाहिए बाकि अन्य स्थितियों में चरान्तर ऋण होगा।

अयनांश  - पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करने के साथ-साथ अपनी धुरी पर भी लट्टू की तरह घूमती रहती है। जिसके फलस्वरूप इसकी धुरी के केन्द्र बिंदु एक जगह स्थिर नहीं रहते हैं, अपितु एक प्रकार का वृत्त बनाते हैं। यह प्रतिवर्ष करीब-करीब ५० विकला से अधिक के हिसाब से पूर्व स्थान से खिसकते हैं और ३६० अंश की पूर्ण परिक्रमा २५,८०० वर्षों में पूरी करते हैं।    

Friday, December 30, 2016

षोडश योग

षोडश योगों के विचार के बिना वर्ष कुंडली का अध्ययन अधूरा ही रहता है। षोडश यानि सोलह योगों का निर्माण लग्नेश तथा कर्मेश की पारस्परिक स्थिति के आधार पर बनता है। वर्ष लग्न पद्धति मूलतः यवनों में प्रचलित थी। उन्हीं के द्वारा भारत में लाई जाने के कारण इन योगों के नाम अरबी-फ़ारसी भाषा के ही हैं।
वर्ष कुंडली में निम्न सोलह योग बहुत ही महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं:-
इक्कबाल योग  - यदि वर्षकुण्डली में सभी ग्रह केन्द्र (१, ४, ७, १०) तथा पणफर (२, ५, ८, ११) स्थानों में (अष्टम स्थान को छोड़कर) पड़े हों यानि ३, ६, ८, ९, व १२वें स्थान में कोई ग्रह न हो तो इक्कबाल योग होता है। यह योग सुख, यश, धन, प्रगति, संतान-प्राप्ति एवं भाग्यवृद्धि का परिचायक है।

इन्दुवार योग - वर्षकुण्डली में सभी ग्रह आपोक्लिम (३, ६, ९, १२) स्थानों में हों तो इन्दुवार योग होता है। इस योग के होने से सामान्य सुख की प्राप्ति होती है, परन्तु वर्ष-भर चिंता व परेशानी बनी रहती है। 

इत्थशाल योग - इस योग को समझने के लिए ग्रहों की गति एवं राशिगत अंशों पर ध्यान देना होगा। कुछ ग्रह शीघ्रगामी होते हैं तो कुछ मंदगति। मंदगति ग्रह के राशिगत अंश अधिक हों और शीघ्रगति ग्रह के अंश कम हों, वर्ष के मध्य किसी भी समय शीघ्रगति ग्रह अधिक अंश चल कर मन्दगति ग्रह के अंश के बराबर जायें तो इस प्रकार शीघ्रगति ग्रह मंदगति ग्रह को उसके अंश के बराबर पहुँच कर उसे अपना तेज देता है। इसे इत्थशाल योग कहते हैं।  
 
उदहारण - सूर्य ३ राशि ८ अंश तथा मंगल ३ राशि १२ अंश पर हैं, सूर्य १ दिन में १ अंश चलता है। मान लीजिये मंगल की उस समय की चाल ४५ कला प्रतिदिन है। १६ दिन में सूर्य १६ अंश चल कर ३ राशि २४ अंश हो जायेगा तथा मंगल १६ दिन में १६ x ४५ = ७२० कला या १२ अंश आगे बढ़कर ३ राशि २४ अंश हो जायेगा। 
 
परन्तु इत्थशाल योग में कुछ दशाएं आवश्यक हैं -
 
क)  दोनों ग्रहों में से एक लग्नेश होना चाहिये।
ख) दोनों ग्रह एक-दूसरे को देखते हों। 
ग) दोनों ग्रह दीप्तांश के भीतर हों। 
 
दोनों  ग्रहों में मूलतः ३० कला से कम का अंतर हो तो पूर्ण इत्थशाल योग बनता है। लग्नेश का प्रत्येक भाव के स्वामी के साथ इत्थशाल हो सकता है। जिस भावेश (कार्येश) का लग्नेश के साथ इत्थशाल होगा, उस भाव का फल वर्ष में अवश्य घटित होगा। षष्ठेश, अष्टमेश, तथा द्वादशेश का लग्नेश से इत्थशाल हो तो वर्ष में इन भावों से सम्बन्धित अशुभ घटनाएं (रोग, मृत्यु, व्यय, शत्रुभय) अधिक होंगी। इसके विपरीत द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश, व एकादशेश से इत्थशाल होना शुभ है। 
 
इसराफ़ योग - यह इत्थशाल योग से विपरीत है। इसके अन्तर्गत तीन आवश्यक दशाएं तो वे ही हैं जो इत्थशाल योग में हैं परन्तु तीव्रगामी ग्रह के अंश मन्द ग्रह से अधिक होते हैं, जिससे तीव्रगामी ग्रह मन्दगति ग्रह से अधिक दूर होता चला जाता है। अशुभ भावों के स्वामी से इसराफ़ योग शुभ होता है क्योंकि इसराफ़ योग अशुभ भावों के अशुभ फल की हानि (नष्ट) करता है, जैसे रोग-हानि, मृत्यु-हानि व व्यय-हानि यानि रोग न हो, मृत्यु न हो, व्यय न हो आदि। शुभ भावों के स्वामी से भी इसराफ़ योग इतना हानिकारक नहीं है। 
 
नक्त योग - जिस भाव के सम्बन्ध में विचार करना हो, उस भाव का स्वामी (कार्येश) व लग्नेश एक-दूसरे को न देखते हों, परन्तु इन दोनों के बीच में एक तीव्रगामी ग्रह हो, जो दोनों को देखता हो, बीच वाला ग्रह पीछे वाले ग्रह से तेज ले कर आगे वाले ग्रह को देता है। इस योग को नक्त योग कहते हैं। इससे कार्यसिद्धि किसी अन्य व्यक्ति के सहयोग से होती है। 
 
यमय योग - इस योग में लग्नेश व कार्येश दीप्तांश के भीतर हो, पर दृष्टि न हो। इन दोनों के बीच में तीसरा मंद ग्रह हो, जो दोनों को देखता हो। यह मंद ग्रह पीछे वाले ग्रह से तेज लेकर आगे वाले ग्रह को देता है। इससे भी कार्य तीसरे व्यक्ति के सहयोग से होता है। 
 
मणऊ योग - लग्नेश व कार्येश के इत्थशाल में बाधा डालने वाला योग मणऊ योग है। शनि या मंगल, जिसकी दोनों में से एक पर शत्रु दृष्टि हो तथा उनके दीप्तांश के भीतर हो तो यह पाप ग्रह इत्थशाल योग में खलनायक का कार्य करता है। यह योग अशुभ एवं कार्यनाशक है। 
 
कम्बूल योग - जब लग्नेश व कार्येश का इत्थशाल हो और चंद्रमा दोनों में से किसी एक से भी इत्थशाल करे तो कम्बूल योग होता है। यदि दोनों ग्रह उच्च या स्वराशिस्थ हों तो उत्तम कम्बूल योग तथा दोनों नीच या शत्रुक्षेत्री हों तो अधम कम्बूल योग, परन्तु एक उच्च या स्वक्षेत्री और एक नीच या शत्रुक्षेत्री और एक नीच या शत्रुक्षेत्री हो तो माध्यम कम्बूल योग होता है। 
उत्तम कम्बूल  योग लग्नेश और कार्येश के इत्थशाल योग के शुभ फल की वृद्धि करता है। 
 
गैर कम्बूल योग -  जब चन्द्रमा लग्नेश कार्येश को नहीं देखता हो, अपनी राशि के अंतिम अंशों में हो और अपनी राशि में जाकर किसी अन्य (गैर) बली ग्रह से कम्बूल करे तो गैर कम्बूल योग होता है। यह योग भी तीसरे व्यक्ति की सहायता से कार्यसाधक है। 
 
खल्लासर योग - लग्नेश और कार्येश में इत्थशाल हो, पर चन्द्रमा शून्यमार्गी (वह ग्रह जो न उच्च का है न नीच का, न शुभ ग्रह दृष्ट हो न ही अशुभ ग्रह दृष्ट हो न मित्र ग्रही हो और न शत्रु ग्रही हो, यानि एकाकी असम्बद्ध हो) हो, लग्नेश या कार्येश से कम्बूल न करे और न ही किसी अन्य ग्रह से गैर कम्बूल करे तो या योग खल्लासर कहलाता है। यह योग कार्य को बिगाड़ने वाला होता है। 
 
रद्द योग - यदि लग्नेश अथवा कार्येश जिनका इत्थशाल हो, वक्री, अस्तंगत, नीच अथवा ६, ८, १२वें घर का स्वामी हो तो वह कार्य को नष्ट (रद्द) करता है। यह योग प्राणघातक, शत्रुओं को बढ़ाने वाला एवं उन्नति में बाधक है। 
 
दुफालि कुत्थ योग - इत्थशाल करने वाले लग्नेश व कार्येश में से मंदगति ग्रह बली (उच्च, स्वराशिस्थ, वर्गोत्तम) हो, पर तीव्रगामी ग्रह में ये गुण न हो (निर्बल हो) तो यह योग होता है। इसमें भी कार्यसिद्धि होती है, पर सफलता की गति धीमी होती है। 
 
दुत्थ कुत्थीर योग - यदि लग्नेश व कार्येश में इत्थशाल होते हुए भी दोनों निर्बल हों तो दुत्थ कुत्थीर योग होता है। इसमें भी तीसरे व्यक्ति की सहायता से कार्य होता है।  
 
तम्बीर योग - जब लग्नेश व कार्येश में इत्थशाल न हो, उनमें से एक ग्रह राशि के अंतिम अंशों में रह कर अगली राशि में किसी बली ग्रह से इत्थशाल करे तो तम्बीर योग होता है। इससे वर्ष में सुख-शान्ति बढ़ती है। 
 
कुत्थ योग - वर्षकुण्डली में जब लग्नेश व कार्येश केन्द्र तथा पणफर में स्थित हो, पंचवर्गी तथा हर्ष बल के अनुसार बली हो तो कुत्थ योग होता है। इस योग से वर्ष में सफलता, उन्नति तथा हर्ष होता है। 
 
दुरुफ योग - यह कुत्थ योग से विपरीत है। जब वर्षकुण्डली में सभी ग्रह आपोक्लिम में स्थित हों या पंचवर्गी हर्ष बल के अनुसार निर्बल हों तो दुरुफ योग होता है। यह योग वर्ष भर संताप देने वाला, कष्टदायक तथा प्राणघातक है।
इस प्रकार वर्षकुंडली का फलादेश करते समय उक्त सोलह योगों पर विचार करना भी आवश्यक है। 

यह अनमोल कृति ज्योतिष के विद्वान "श्री रघुनन्दनप्रसाद जी" की अनमोल कृति है जिसका प्रकाशन इस ब्लॉग के पड़ने वालों के ज्योतिष-ज्ञान में वृद्धि के लिए किया गया है। 

Tuesday, December 6, 2016

Astrology Basics

TIME LIMIT

A Day = 24 hours
An Hour = 60 minutes
A Minute = 60 seconds
1 Day = 86,400 seconds

THE HINDU TIME TABLE

A day = 60 ghatikas 
A Ghatikas = 60 vighatikas
A Vighati = 60 liptas
A Lipta = 60 viliptas
A Vilipta = 60 paras
A Para = 60 tatparas
1 Day = 46,656,000,000 tatparas

Time is eternal. It cannot be measured. But, a change may happen in a thing, as mud becoming a pot by the labour of a potter. This new form may be said to have started a certain particular time and its destruction by being broken etc. also may be indicated by a certain time. This duration or interim period when it existed as a pot, is the limitation of time for the thing. 

Astrology may be divided into six divisions: 
  1. Vegetable Horoscopy - This indicates the seasons and mostly relates to crops and weather conditions.
  2. Animal Horoscopy - This indicates animals, their increase, decrease etc. 
  3. Human Horoscopy - This speaks of human beings.
  4. Mundane Horoscopy - This refers to countries and places.
  5. Horary Horoscopy - This type of horoscopy deals with knowing future through prasna or questioning time.
  6. Electional Horoscopy or Muhurt - This speaks of methods of selection of auspicious time for performance of important functions in life. 
As can be seen Moon takes 27 days to pass through the entire Zodiac. Sun takes about a month to pass through each Rasi. But the next month will not commence unless the New Moon has taken place and this will mean roughly another two days and a quarter making a total of 29-1/4 days. The difference in the Lunar and Solar months would become too great. Therefore, in Lunar System once in about three years, a year gets thirteen months to bring it into conformity with the Solar years.
 
The year is divided into 12 months. 
 
The Lunar months are:-
  1. Chaitra
  2. Vaisakha
  3. Jyestha
  4. Ashada
  5. Sravana
  6. Bhadrapada
  7. Aswina
  8. Karthika
  9. Margashira
  10. Pushya
  11. Magham
  12. Phalguna
When Moon finishes a round and Amavasya or New Moon occurs, a month ends and the next begins from the first day after the New Moon.

The months got their names from the fact that on the Full Moon day, during the month of Chaitra Nakshatra will be Chittra. 
  1. Vaisakha - Visakha
  2. Jyestha - Jyestha
  3. Ashada - Purvashada
  4. Sravana - Sravana
  5. Bhadrapada -Bhadrapada
  6. Aswina - Aswini
  7. Karthika - Kruttika
  8. Margashira - Mrigasira
  9. Pushyam - Pushyami
  10. Magha - Makha
  11. Phalguna - Uttara Phalguni
The Solar year has also twelve months called - 
  1. Chittrai 
  2. Adi
  3. Alpisi
  4. Thai
  5. Vykasi
  6. Avani
  7. Karthikai
  8. Masi
  9. Ani
  10. Perattasi
  11. Margali
  12. Panguni
These months are calculated according to the entry of Sun into each Rasi from Mesha. 

Each year is said to produce certain effects independently on its own and that refers not to individual  but has a distinct bearing on mundane horoscopy with particular reference to general masses. 

Name of Planet              Takes to move in a sign or Rasi
Sun - Surya                           about one month
Moon - Chandra                     about 2 1/4 days
Mars - Mangal or Kuja            about 45 days
Mercury - Budha                    about a month
Jupiter - Guru                        about a year
Venus - Sukra                        about a month
Saturn - Sani                         about 2 1/2 years (Two and Half Year)
Dragon's Head - Rahu/
Ascending Node                     about 1 1/2 years (One and Half Year)
Dragon's Tail - Kethu
Descending Node                   about 1 1/2 year (One and Half Year)
 
Sun and Moon never have a retrograde motion but have an accelerated or retarded motion. 
 
Rahu and Kethu have always a retrograde motion. 
 
All other planets have direct, retrograde, accelerated or retarded motion.
 
This extract has been taken from "Indian Astrology" written by great astrologer Sh. C.J. Krishnasamy.

Sunday, August 14, 2016

ग्रहों की अवस्थाएं

राशि, अंशों, भावों तथा पारस्परिक सम्बन्धों के अनुसार ग्रहों की भिन्न-भिन्न प्रकार से अवस्थाएं मानी गयी हैं। ग्रह अपनी अवस्थानुसार ही फल देते हैं। ग्रहों की अवस्था का वर्गीकरण निम्नानुसार है:-

१. अंशों के आधार पर अवस्था 

अंशों के आधार पर ग्रहों को पांच आयुवर्गों में बांटा गया है। विषम राशियों में बढ़ते हुए अंशों में बालक से मृत तथा सम राशियों में घटते हुए अंशों में बालक से मृत के क्रम में ग्रहों की आयु मानी गयी है। 

क)  ग्रह विषम राशियों में ६° तक बालक, ६° से १२° तक कुमार, १२° से १८° तक युवा, १८° से २४° तक वृद्ध तथा २४° से ३०° तक मृत अवस्था में रहता है। 

ख) ग्रह सम राशियों में ३०° से २४° तक बालक, २४° से १८° तक कुमार, १८° से १२° तक युवा, १२° से ६° तक वृद्ध तथा ६° से नीचे मृत अवस्था में होता है। 

इस वर्गीकरण को नीचे दिये गए चक्र में दर्शाया गया है :-


बाल्यावस्था में ग्रह का फल कम, कुमारावस्था में आधा, युवावस्था में पूर्ण, वृद्धावस्था में कम तथा मृतावस्था में नगण्य रहता है। 

२. चैतन्यता के आधार पर अवस्था 

क)
 विषम राशि में ग्रह १०° तक जागृत, १०° से २०° तक स्वप्न तथा २०° से ३०° तक सुषुप्तावस्था में रहते हैं।

ख)  सम राशि में ग्रह १०° तक सुषुप्त, १०° से २०° तक स्वप्न तथा २०° से ३०° तक जागृत अवस्था में रहता है।


ग्रह की जागृत अवस्था कार्यसिद्धि करती है, स्वप्नावस्था मध्यम फल देती है तथा सुषुप्तावस्था निष्फल होती है।

३. दीप्ति के अनुसार अवस्था

क)  दीप्त - उच्च राशिस्थ ग्रह दीप्त कहलाता है। जिसका फल कार्यसिद्धि है।

ख ) स्वस्थ - स्वगृही ग्रह स्वस्थ होता है, जिसका फल लक्ष्मी व कीर्ति प्राप्ति है।

ग) मुदित - मित्रक्षेत्री ग्रह मुदित होता है, जो आनन्द देता है।

घ) दीन - नीच राशिस्थ ग्रह दीन होता है, जो कष्टदायक होता है।

ड़ ) सुप्त - शत्रुक्षेत्री ग्रह सुप्त होता है, जिसका फल शत्रु से भय होता है।

च) निपीड़ित - जो ग्रह किसी अन्य ग्रह से अंशो में पराजित हो जाये उसे निपीड़ित कहते हैं, यानि एक ग्रह की गति तीव्र हो तथा वह किसी दूसरे ग्रह से कम अंशों पर उसी राशि में हो, परन्तु गति वाला ग्रह उस ग्रह के बराबर अंशों में आगे आकर बढ़ जाए तो पीछे रहने वाला ग्रह पराजित अथवा निपीड़ित ग्रह कहलाता है, जिसका फल धनहानि है।

छ) हीन - नीच अंशोन्मुखी ग्रह हीन कहलाता है, जिसका फल धनहानि है।

ज) सुवीर्य - उच्च अंशोन्मुखी ग्रह सुवीर्य कहलाता है, जो सम्पत्ति वृद्धि करता है।

झ) मुषित - अस्त होने वाले ग्रह को मुषित कहते हैं, जिसका फल कार्यनाश है।

ञ) अधिवीर्य - शुभ वर्ग में अच्छी कांति वाले ग्रह को अधिवीर्य कहते हैं, जिसका फल कार्यसिद्धि है।

४. क्षेत्र, युति तथा दृष्टि के आधार पर अवस्था 

क) लज्जित - पंचम स्थान में राहु-केतु के साथ अथवा सूर्य, शनि या मंगल के साथ अन्य ग्रह लज्जित होता है।

ख ) गर्वित - उच्च राशि या मूल त्रिकोण का ग्रह गर्वित होता है।

ग) क्षुधित - शत्रु के घर में, शत्रु से युक्त अथवा दृष्ट अथवा शनि से दृष्ट ग्रह क्षुधित होता है।

घ) तृषित - जल राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) में शत्रु से दृष्ट, परन्तु शुभ ग्रह से दृष्ट न हो तो ग्रह तृषित कहलाता है।

ड़ ) मुदित - मित्र के घर में, मित्र से युक्त, अथवा दृष्ट अथवा गुरु से युक्त ग्रह मुदित कहलाता है।

च) क्षोभित - सूर्य से युक्त, पाप या शत्रु से दृष्ट ग्रह क्षोभित कहलाता है।

फल -

क) जिस भाव में क्षुधित या क्षोभित ग्रह हों उस भाव की हानि करते हैं।

ख) गर्वित या मुदित ग्रह भाव की वृद्धि करते हैं।

ग) यदि कर्म स्थान में क्षोभित, क्षुधित, तृषित अथवा लज्जित ग्रह हों तो जातक दरिद्र तथा दुःखी होता है।

घ) पंचम स्थान में लज्जित ग्रह संतान नष्ट करता है।

ड़) सप्तम स्थान में क्षोभित, क्षुधित अथवा तृषित ग्रह पत्नी का नाश करता है।

कुल मिला कर गर्वित व मुदित ग्रह एक प्रकार से सुख देते हैं, जबकि लज्जित, क्षुधित, तृषित एवं क्षोभित ग्रह कष्ट देने वाले होते हैं। 

५. सूर्य से दूरी के अनुसार अवस्था 

क) अस्तंगत - सूर्य से युक्त ग्रह (राहु केतु को छोड़कर) अस्त कहलाते हैं। चंद्रमा सूर्य से १२°, मंगल १०°, वक्री बुध १२°, मार्गी बुध १४°, गुरु ११°,  वक्री शुक्र ८°, मार्गी शुक्र १०° तथा शनि १५° की दूरी तक सूर्य की प्रखर किरणों के कारण अस्तंगत होते हैं। ऐसे ग्रहों को मुषित कहते हैं।

ख ) उदयी - सूर्य से उपरोक्त अंशों से अधिक दूर हो जाने पर ग्रह उदय हो जाते हैं।

पूर्वोदयी -  जो ग्रह सूर्य से धीमा हो तथा सूर्य से अंशों में कम हो उसका उदय पूर्व में होता है।

पश्चिमोदयी - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा तीव्र हों तथा सूर्य से अधिक अंशों पर हो, उसका उदय पश्चिम से होता है।

पूर्वास्त - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा तीव्र हों और सूर्य से कम अंशों में हों, उसका अस्त पूर्व में होता है।

पश्चिमास्त - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा धीमा हो और सूर्य से अधिक अंशों में हों, उस ग्रह का अस्त पश्चिम में होता है।

६. गति के अनुसार अवस्था - 

क) सूर्य तथा चंद्रमा सदैव मार्गी रहते हैं। मेष से वृषभ, मिथुन आदि के क्रम में चलने वाले।

ख) राहु और केतु सदैव वक्री रहते हैं। मिथुन से वृषभ आदि के क्रम में चलने वाले।

ग) शेष ग्रह मंगल, बुध, गुरु व शनि सामान्यतः मार्गी होते हैं पर बीच-बीच में वक्री भी हो जाते हैं।

घ) इन ग्रहों की गति  मार्गी से वक्री तथा मार्गी से वक्री होते समय अति मंद हो जाती है।

ड़) यह ग्रह वक्री होने के कुछ दिन पहले व कुछ दिन बाद तक स्थिर दिखाई पड़ते हैं।

इनकी वक्री व स्थिर होने की अवधि निम्नानुसार है:-


वास्तव में कोई ग्रह वक्री या स्थिर नहीं होता  है। पृथ्वी तथा उस ग्रह की पारस्परिक गतियां तथा सूर्य के संदर्भ में उस ग्रह की सापेक्ष स्थिति के सम्मिलित प्रभाव में ऐसा लगता है मानो कोई ग्रह ठहर गया हो या उल्टा चलने लग गया हो।

७, सूर्य से भावों की दूरी के अनुसार अवस्था - 

क ) सूर्य से दूसरे स्थान पर ग्रहों की गति तीव्र हो जाती है।

ख ) सूर्य से तीसरे स्थान पर सम तथा चौथे स्थान पर गति मंद हो जाती है।

ग)  सूर्य से पांचवे व छठे स्थान पर ग्रह वक्री हो जाता है।

घ)  सूर्य से सातवें व आठवें स्थान पर ग्रह अतिवक्री हो जाता है।

ड़ ) सूर्य से नवें व दसवें स्थान पर ग्रह मार्गी हो जाता है।

च)  सूर्य से ग्यारहवें व बारहवें स्थान पर ग्रह पुनः तीव्र हो जाता है।

 क्रूर ग्रह वक्री  होने पर अधिक क्रूर फल देते हैं, परन्तु सौम्य ग्रह वक्री होने पर अति शुभ फल देते हैं। 

Wednesday, August 3, 2016

शनि, राहु और केतु - परिचय


शनि -

शनि का व्यास १,२०,००० किलोमीटर, परिभ्रमण काल १० घंटे ३८ मिनट तथा परिक्रमण काल २९. ४६ वर्ष है। शनि के चारों ओर ७ प्रकाशमान छल्ले हैं।  शनि ग्रह से विचित्र संगीत की भिनभिनाहट की ध्वनि की खोज की गयी है। इसके १७ उपग्रह हैं। शनि एक राशि पर ढ़ाई (२½) वर्ष रहता है।  शनि काला, तमोगुणी, वायु तत्त्व, स्त्री नपुंसक पाप ग्रह है। यह पश्चिम दिशा, संकर जातियों तथा शिशिर ऋतु का स्वामी है। यह  एक ठंडा व शुष्क ग्रह है। शनि अंधकार, दुर्भाग्य, हानि तथा संकट का प्रतीक है, परन्तु इसके बलवान होने पर यह विपत्तियां कम हो जाती हैं।  शनि वायु का अधिपति तथा विपत्ति का अधिष्ठाता है। प्राचीन काल में Satan (शैतान) या Satar (शातिर) के नाम पर इसका नाम Saturn (शनि) पड़ा है। कान, दांत, अस्थियों, वायु रोग व स्नायु से सम्बन्धित रोगों विचार शनि से किया जाता है। अंग्रेज़ी शिक्षा, आयु, जीवन, मृत्यु, शारीरिक बल, उदारता, विपत्ति, प्रभुता, ऐश्वर्य, मोक्ष, जमीन-जायदाद, खानों तथा छठे, आठवें, दसवें व बारहवें भाव का कारक शनि है। बुध और शुक्र शनि के मित्र, गुरु सम, तथा सूर्य, चंद्र और मंगल शत्रु हैं।  शनि तुला राशि में 1°  से 20° तक उच्च, परन्तु  20° पर परमोच्च, मेष राशि में 1° से 20° तक नीच, परन्तु 20° पर परमनीच, कुम्भ राशि में 1° से 20° तक मूलत्रिकोण में व कुम्भ में ही 20° से 30° तक स्वगृही है। यह मकर व कुम्भ राशियों का स्वामी है। इसकी पूर्ण दृष्टि तीसरी, सातवीं तथा दसवीं हैं। 

राहु (Dragon's Head or Ascending Node of the Moon)

चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के साथ 5° का कोण बनाती हुई पृथ्वी की कक्षा को दो विपरीत स्थानों पर काटती है। इन दोनों कटान बिंदुओं को ज्योतिष में छाया ग्रह माना गया है। जिस कटान बिंदु से चंद्रमा पृथ्वी के कक्षा तल से ऊपर आता है, वह राहु (Dragon's Head or Ascending Node of the Moon) कहलाता है। जिस कटान बिंदु से चंद्रमा पृथ्वी के कक्षा ताल से नीचे उतरता है वह केतु (Dragon's Tail or Descending Node of the Moon) कहलाता है। यह दोनों बिंदु एक-दूसरे से 180° दूर है तथा विपरीत दिशा में सरकते हुए दिखाई देते हैं।  यह १८ वर्ष में पुनः उसी स्थान पर आ जाते हैं। पृथ्वी, चंद्रमा व सूर्य के इन बिंदुओं को सीध में आने तथा 5° के कोण का अंतर कम हो जाने पर ग्रहण होते हैं। इसीलिए कहा जाता है राहु चंद्रमा को ग्रस्ता है। राहु तमोगुणी, कृष्णवर्णी तथा पाप ग्रह है। यह कुंडली में जिस स्थान पर बैठता है, उसकी प्रगति को रोकता है। राहु मद का अधिष्ठाता है। राहु लगभग १८ माह तक एक राशि पर रहता है। यह सदैव वक्री रहता है तथा प्रत्येक राशि में इसके अंश कम होते जाते हैं। मिथुन राशि में उच्च 20° पर परमोच्च, धनु राशि में नीच 20° पर परमनीच तथा कुम्भ के 6° तक मूल त्रिकोण में होता है। शुक्र तथा शनि राहु के मित्र तथा सूर्य, चंद्रमा व मंगल शत्रु हैं। इसकी पूर्ण दृष्टि पांचवी, सातवीं, नवीं व बारहवीं है। 

केतु (Dragon's Tail or Descending Node of the Moon) - 

केतु सदैव राहु से 180° दूर रहता है। इसके अंश, कला और विकला समान रहते हैं। केतु धब्बेदार काले रंग का तमोगुणी पाप ग्रह है। हाथ, पैर, पेट व चर्म रोगों का विचार केतु से किया जाता है। केतु धनु राशि में उच्च 20° पर परमोच्च, मिथुन राशि में नीच 20° पर परम नीच तथा सिंह राशि में 6° तक मूल त्रिकोण में होता है। यह भी राहु की तरह वक्री ग्रह है। सिरविहीन होने के कारण यह दृष्टिविहीन भी है। कुछ विद्वान राहु की दृष्टि के समान ही केतु की दृष्टि भी मानते हैं। 

Thursday, July 28, 2016

शनि की साढ़ेसाती एवं ढैय्या

ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। 
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरं ॥ 

शनि ग्रह का भ्रमण, जब साढ़ेसाती की परिधि के भीतर साढ़े सात वर्षों के लिए प्रवेश करता है अथवा करने वाला होता है, तभी इस विषय का ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों को एक अप्रत्याशित भय, भ्रांति तथा भ्रम प्रकंपित करने लगता है। शनि समय के संचालक हैं परंतु इसे भ्रम और भ्रांति ही समझ जाना चाहिए कि शनि की साढ़ेसाती अपार कष्ट देने वाली होती है। 

शनि एक राशि पर ढ़ाई वर्ष के लगभग रहते हैं। शनि की गोचर गति सबसे कम हैं जिस कारण से यह मन्दतम ग्रह कहलाते हैं। इनकी अधिकतम दैनिक गति ७ कला तथा वक्री से मार्गी या मार्गी से वक्री होते समय न्यूनतम गति १ कला प्रतिदिन भी हो सकती है। 

शनि की साढ़ेसाती व ढैया 

साढ़ेसाती

चंद्र लग्न से द्वादश भाव में शनि के आने से शनि की तीसरी पूर्ण दृष्टि द्वितीय (धन) भाव पर, सप्तम दृष्टि षष्ठ (रिपु/यश) भाव तथा दशम दृष्टि नवम (भाग्य व धर्म) भाव पर पड़ती है। लग्न के दोनों ओर द्वादश एवं द्वितीय भाव शनि के दुष्प्रभाव से ग्रसित होने से उनके बीच स्थित लग्न भी दूषित हो जाता है। धन, यश तथा आय भाव तो शनि के कुप्रभाव में आ ही जाते हैं और लग्न के दूषित होने से तन, मन एवं सम्मान पर भी कुप्रभाव पड़ता है। इसी कारण साढ़ेसाती जातक के लिए बहुत कष्टदायक होती है। 


इसी प्रकार चंद्र लग्न में शनि के आने पर शनि की तीसरी दृष्टि पराक्रम भाव पर, सप्तम दृष्टि सप्तम भाव पर तथा दशम दृष्टि दशम (कर्म एवं पिता) भाव पर पड़ती है, जिससे क्रमशः पराक्रम (भ्राता), पत्नी एवं कर्म (पिता) के भाव बिगड़ जाते हैं। 


जब शनि जन्म राशि से द्वितीय भाव में आता है तब शनि की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ, अष्टम व एकादश भावों पर पड़ती है जो क्रमशः सुख, माता, संपत्ति भाव, आयु भाव तथा लाभ भाव हैं। शनि के जन्म राशि से द्वितीय होने से ये तीनो भाव बिगड़ जाते हैं।  


इस प्रकार  साढ़े सात वर्षों में अधिकांश भावों से संबंधित हानि होती है। 

ढैया 

जन्म राशि से शनि के चतुर्थ या अष्टम स्थान पर आने पर छोटी साढ़ेसाती या ढैया होती है। चतुर्थ शनि होने से शनि की तीसरी पूर्ण दृष्टि षष्ठम भाव पर, सप्तम पूर्ण दृष्टि दशम भाव पर तथा दशम पूर्ण दृष्टि लग्न पर पड़ती है, जिससे इन भावों की हानि होती है। इसी प्रकार शनि के जन्म राशि से अष्टम होने से तृतीय पूर्ण दृष्टि दशम पर, सप्तम पूर्ण दृष्टि द्वितीय पर तथा दशम पूर्ण दृष्टि पंचम भाव पर पड़ती है। अतः क्रमशः कर्म, धन तथा संतान पक्ष दुष्ट प्रभाव में आ जाते हैं। कर्क राशि वाले जातक को तुला (चतुर्थ) तथा कुम्भ (अष्टम) राशि में शनि रहते ढैया होगी। 

दक्षिण भारत (विशेष रूप से कर्नाटक) में साढ़ेसाती से भी अधिक दुष्ट प्रभाव पंचम शनि को मानते हैं।  चंद्र लग्न से पंचम (पुत्र भाव) शनि की पूर्ण दृष्टि सप्तम, एकादश व द्वितीय भावों पर पड़ती है। यदि इस अवधि में शनि नीच, अस्तंगत, शत्रुक्षेत्री तथा पाप ग्रह से युक्त व दृष्ट हो तो अत्यंत वैभवशाली व्यक्तियों को भी फूटे मटके में खाना खिलाता है। 

शनि की साढ़ेसाती सभी के लिए अनिष्टकारक नहीं 

शनि की साढ़ेसाती या ढैया सभी व्यक्तियों के लिए अथवा पूरी अवधि के लिए अनिष्टकारक नहीं होती है।  शनि के गोचर विचार की एक विधा यह भी है कि शनि के साढ़ेसाती या ढैया में प्रवेश करते समय चंद्रमा किस राशि में है, इसका प्रभाव शनि के प्रभाव पर पड़ता है। इसे शनि का चरण विचार कहते हैं।  

यदि शनि के साढ़ेसाती या ढैया में प्रवेश करते समय चंद्रमा जन्म राशि से १, ६ या ११वें स्थान (राशि) में हो तो स्वर्णपाद साढ़ेसाती कहलाती है। यदि चंद्रमा २, ५ या  ९ में हो तो रजतपाद तथा यदि ३, ७ या १० में हो तो ताम्रपाद और ४, ८ या १२ में होने पर लौहपाद साढ़ेसाती कहलाती है। 

स्वर्णपाद पर साढ़ेसाती प्रारम्भ हो तो सब प्रकार का सुख मिलता है। रजतपाद में भाग्य अच्छा रहता है।  ताम्रपाद में सामान्य स्थिति रहती है तथा लौहपाद साढ़ेसाती में धन का नाश होता है। 

साढ़ेसाती अवधि में शनि जिन राशियों में से गुजरेगा उनके नक्षत्रों के स्वामियों के साथ यदि शनि की मित्रता या समता है तो शनि अधिक हानि नहीं करेगा। यदि उन नक्षत्रों के स्वामियों से शनि की शत्रुता है तो अधिक हानि करेगा। 

यदि जन्मकुंडली में शनि उच्च, स्वराशि या मित्रराशि में हों तो ६, ८ या १२ (दुःस्थानों) में स्थित होते हुए भी शनि हानिकारक नहीं होता। परंतु शनि नीच राशिस्थ, अस्तंगत या शत्रुक्षेत्री होने पर अधिक अशुभ फल देता है। इसी प्रकार गोचर में भी उच्च अथवा नीच राशिस्थ होने पर भी फल में अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि शनि पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो उसका फल अधिक अशुभ होता है। इसके विपरीत यदि उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उसके अशुभ फल में कमी आ जाती है। 

साढ़ेसाती जातक को प्रायः हानि ही करती है किसी को प्रारंभ में, किसी को मध्य में तो  किसी को अंत में।