Thursday, May 7, 2020

अष्टकवर्ग (भाग - 2)

सर्वाष्टकवर्ग  

सर्वाष्टकवर्ग का विश्लेषण ग्रहों के विश्लेषण जितना ही आवश्यक है। सर्वाष्टकवर्ग फलित ज्योतिष में भविष्य - कथन के लिए प्रामाणिक ही नहीं अपितु विश्वसनीय भी है।

किसी भी भाव में २५ से कम बिंदु अनुकूल परिणाम देने में समर्थ नहीं होते। अगर बिंदुओं की संख्या ३० से अधिक हो तो शुभ परिणाम अपेक्षित हैं। अगर किसी भी भाव में बिंदुओं की संख्या ३० से अधिक हो तो उस भाव का परिणाम पूर्ण रूप से प्राप्त किया जा सकता है। उच्च राशि, त्रिकोण, उपचय आदि कम बिंदुओं में  होने से प्रभावहीन या निष्फल हो जाते हैं।


कुल ३३७ सर्वाष्टक बिंदुओं को १२ से भाग देने पर औसत लगभग २८ आता है। अतः २८ वह औसत अंक है जिससे तुलना करने पर किसी भाव में बिंदुओं का कम या अधिक होना माना जा सकता है। 

सामान्य सिद्धांत  
  1. कोई  भी राशि या भाव जहाँ २८ से अधिक बिंदु हों, शुभ फल देगा। जितने अधिक बिंदु होंगे फल उतना ही अच्छा होगा। इसके विपरीत उन भाव या राशियों में जिनमे २८ से कम बिंदु होंगे, अशुभ फल मिलेंगे। व्यवहार में २५ से ३० के बीच बिंदुओं को सामान्य फलदायी ही माना जाता है। दूसरे शब्दों में यही कहा जायेगा कि यदि बिंदु ३० से ऊपर हों तभी कोई भाव/राशि विशेष शुभ फल देगी।
  2. वह ग्रह प्रभावित हो जाता है जो भाव/राशि में स्थित है जहां बिंदु कम हैं , चाहे वह स्थान उसका उच्च, स्वक्षेत्री, केन्द्र या त्रिकोण ही क्यों न हो, और चाहे वह लग्न से उपचय (३, ६, १०, ११) स्थानों में ही क्यों न स्थित हो। तात्पर्य यह है कि इस ग्रह को अन्य ग्रहों से समर्थन नहीं मिल रहा।
  3. इसके विपरीत वे ग्रह भी शुभ फल देंगे जो अपने नीच स्थानों में अथवा दुःस्थानों, जैसे ६, ८, १२ में हों, किंतु वहां बिंदु अधिक हों। कुछ विद्वानों का मत इससे भिन्न हैं।
  4.  यदि नवें, दसवें, ग्यारहवें और लग्न - इन सभी में ३० से अधिक बिंदु हों तो जातक का जीवन समृद्धिपूर्ण होगा। इसके विपरीत यदि इन भावों में २५ से कम बिंदु हों तो जातक को रोग और बेबसी की ज़िन्दगी भोगनी पड़ेगी।
  5. यदि ग्यारहवें घर में दसवें घर से ज़्यादा बिंदु हों और ग्यारहवें घर में बारहवें घर से ज़्यादा, साथ ही लग्न में बारहवें घर से ज़्यादा बिंदु हो तो जातक सुख-समृद्धि का जीवन भोगेगा।
  6. जातक भिखारी का जीवन जियेगा यदि लग्न, नवम, दशम और एकादश स्थानों में मात्र २१ या २२ या और कम बिंदु हों और त्रिकोण स्थानों में अशुभ ग्रह बैठे हों। 
  7. यदि चन्द्रमा सूर्य से निकट होने के कारण पक्षबल से रहित हो, चन्द्र राशि के स्वामी के पास कम बिंदु (जैसे २२) हों और उसे शनि देखता हो तो जातक पर दुष्टात्माओं का प्रभाव रहेगा। यदि राहु भी चन्द्रमा पर प्रभाव डाल रहा हो तो इस परिणाम में कोई संशय नहीं रहेगा।
  8. जब-जब कोई अशुभ ग्रह ऐसे भाव पर गोचर वश विचरण करेगा जिसमे २१ से कम बिंदु हों तो उस भाव से संबंधित फलों की हानि होगी।
  9. इसके विपरीत, जब कोई ग्रह किसी ऐसे घर में विचरण करता है जहाँ ३० से अधिक बिंदु हों तो उस भाव से संबंधित शुभ फल मिलेंगे जो उस ग्रह के कारकत्व और और संबंधित कुंडली में उसे प्राप्त भाव विशेष के स्वामित्व के अनुरूप होंगे।
  10. इसी तरह ग्रह जिन राशियों के स्वामी होते हैं और जिन राशियों/भावों में वे स्थित होते हैं, उन स्थानों से संबंधित अच्छे फल वे अपनी दशा-अन्तर्दशा में देंगे। सूक्ष्मतर विश्लेषण के लिए दशा-स्वामी के भिन्नाष्टक वर्ग का अध्ययन करना चाहिये।
  11. जिस भाव में ३० से अधिक बिंदु हों और एक साथ कई ग्रह उसमें गोचरवश विचरण कर रहे हों तो उस अवधि में वे उस भाव के शुभ फलों को कई गुणा कर देंगे। फलों का स्वरुप इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित भाव कौन सा है और गोचर के ग्रहों का मूल लग्न में स्थान कहाँ है और उनके कारकत्व क्या है।
  12. जब (किसी विशेष दिन) उस राशि का उदय हो रहा हो जिसमें न्यूनतम बिंदु हैं और उस दिन चिकित्सकों से सलाह करके रोग का उपचार प्रारम्भ किया जाये तो जल्दी स्वास्थ्य-लाभ मिलने की संभावना होती है। उसी तरह उस समय में यदि ऋण लिया जाये तो उसे चुकाने की क्षमता भी जल्दी ही अर्जित हो जाती है।
  13. किसी विवाह के सुखी और सफल होने के लिए वर और वधू की चन्द्र राशियों के बिंदु एक दूसरे की जन्म कुंडलियों में ३० से अधिक होने चाहियें।
  14. जन्म लग्न एवं उससे दूसरे, चौथे, नवें, दसवें और ग्यारहवें भाव के बिंदुओं का योग करें। यदि यह योग १६४ से अधिक है तो जातक समृद्ध होगा। संख्या १६४ को 'वित्ताय' कहते हैं जो वित्तीय समृद्धि का द्योतक है।
  15.  इसी तरह छठे, आठवें और बारहवें घर के बिंदुओं का योग करें। यदि यह योग ७६ से काम आये तो आय व्यय से अधिक होगी। संख्या ७६ को तीर्थ का नाम दिया गया है।
  16. प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम एवं दशम भाव के बिंदुओं का योग करें। ये भाव जातक में अंतर्मुखी प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह योग यदि शेष छः भावों (बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के द्योतक) के बिंदु योग से अधिक है तो जातक संतोषी जीव होगा और ज्ञान-ध्यान, सत्कर्म और दान-पुण्य से आतंरिक शांति पायेगा। विपरीत स्थिति में जातक हमेशा अपने से बाहर सुख ढूंढेगा जिसके कारण उसका मन लालच, छल-कपट, झूठे दिखावे और अहंकार से ग्रस्त रहेगा। 
  17. कुंडली के बारह भावों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है। (क) बंधु - प्रथम, पंचम एवं नवम भाव  (ख) सेवक - द्वितीय, षष्ठ एवं दशम भाव (ग) पोषक - तृतीय, सप्तम एवं एकादश भाव (घ) घटक - चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव। 

तीव्र फलोदय का सिद्धांत :- 

विभिन्न भावों में सर्वाष्टक बिंदुओं की तुलना करें। यदि घर में न्यूनतम बिंदु हैं और उससे अगले घर में अधिकतम, तो जातक जीवन में अचानक ऊपर उठेगा। यदि दोनों अंकों में अंतर काफी ज़्यादा हुआ तो जातक उतनी ही अधिक तीव्र उन्नति का अनुभव करेगा। इसके विपरीत यदि एक घर से दूसरे घर में अधिकतम बिंदुओं से न्यूनतम बिंदुओं की गिरावट हो तो जातक जीवन के किसी या कुछ क्षेत्रों में हानि का सामना करेगा। जहाँ इन घरों में न्यूनतम और अधिकतम बिंदुओं का अंतर मामूली होगा वहां जातक करीब-करीब एक-सी और धीमी प्रगति का अनुभव करेगा। यदि इस तरह के तीव्र अंतर कई भावों के बीच होंगे तो जातक का सारा जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहेगा - यानि कभी राजा तो कभी रंक।

त्वरित भविष्यवाणियों के लिए सर्वाष्टकवर्ग विधि का एक सिद्धान्त अत्यंत लोकप्रिय है :-
  1. यदि एकादश भाव में दशम भाव से अधिक बिंदु हो तो जातक अपेक्षाकृत कम प्रयासों से अधिक लाभ पाएगा। मुख्यतः लग्न से एकादश भाव के सन्दर्भ में यह नियम लागू किया जाता है, लेकिन अन्य भावों से एकादश भाव के संदर्भ में भी इस नियम का उपयोग किया जा सकता है। 
  2. अगर इस स्थिति के विपरीत जातक का बारहवां भाव दूसरे भाव से अधिक प्रबल हो तो इसका अभिप्राय आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में यही होगा कि वह अपने पारिवारिक व्यवसाय में न लग कर, विदेश में अपना भाग्य आजमायेगा और वहां उस पर लक्ष्मी की कृपा होगी। कौन सा परिणाम कहाँ लागू होगा, यह देखने के लिये जन्म कुंडली में दूसरे योगों को भी देखना होगा।
  3. यदि बारहवें भाव में ग्यारहवें से अधिक अंक हों तो इसका अभिप्राय कोई एक हो सकता है, जैसे (क) आय से अधिक व्यय, जिसका परिणाम होगा कर्ज में डूबना  (ख) विदेशी स्रोतों से आय, यह स्थिति उन लोगों की जन्म कुंडलियों में देखी जाती है जिनके सितारे मातृभूमि से बाहर किसी देश में चमकते हैं। ऐसे में चतुर्थ भाव और उसके स्वामी का का किंचित पीड़ित होना लगभग अनिवार्य होता है।
  4. यदि दूसरे भाव में बारहवें भाव से अधिक बिंदु हों तो जातक में आमोद-प्रमोद पर व्यय करने के बजाय धन को जोड़ने की प्रवृत्ति अधिक होगी। ऐसे लोग कभी जल्दबाज़ी में ख़रीदारी नहीं करते बल्कि बारीकी से मोलभाव करते हैं। दो स्थानों के बिंदुओं में अंतर जितना ज़्यादा होगा यह प्रवृत्ति उतनी ही उत्कृष्ट रूप से सामने आयेगी।

Tuesday, January 14, 2020

नीच भंग राजयोग

जन्म कुंडली  में किसी ग्रह का नीच राशि में स्थित होना ख़राब योग माना गया है। किन्तु कभी-कभी ग्रह नीच राशि में स्थित होकर भी बहुत उत्तम प्रभाव दिखाते हैं यानि उनके नीच होने का जो दोष है वह भंग हो जाता है और वह फायदेमंद साबित होता है

किसी ग्रह की नीचता तब बड़ी आसानी से भंग हो जाती है जब कुंडली में उस नीच राशि का स्वामी लग्न या चन्द्रमा से केन्द्र  में अवस्थित हो। दूसरी स्थिति में नीचत्व तब भंग होता  है जब नीच राशि का स्वामी और उसी के उच्च राशि स्वामी परस्पर एक-दूसरे से केन्द्र में हो (इसमें एक नियम यह भी कहा गया है कि कोई ग्रह नीच का है उस राशि  में जो ग्रह उच्च का होता है उसकी युति या दृष्टि हो तो भी नीच भंग हो जाएगा) यह भी माना गया है कि नीच ग्रह अगर लग्न और चंद्र से केन्द्र में अवस्थित हो तो भी ग्रहों का नीचत्व भंग हो जाता है। अष्टमेश ग्रह को नीचत्व का दोष स्वयं भंग हो जाता है और नीच ग्रह को उसके उच्च राशि स्वामी अगर पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो

नीचस्थितो जन्मनि यो ग्रह: स्यात्तद्राशिनाथोSपि तदुच्चनाथः
स चन्द्रलग्नाद्यदि केन्द्रवर्ती राजा भवेद्धार्मिकचक्रवर्ती

यदि किसी के जन्म के समय कोई ग्रह नीच राशि मे पड़ा हो और 

क)  इस नीच राशि का स्वामी चंद्रमा से केन्द्र में हो और 
ख)  जो ग्रह नीच है और उसका उच्चनाथ भी चन्द्रमा से  केन्द्र में हो 

तो नीच भंग हो जाता है बल्कि उत्तम राज योग बनाता है। यह समस्त एक योग है।  उच्चनाथ शब्द का क्या अर्थ है? इसके अर्थ में मतभेद है; मान लीजिए शनि मेष राशि का नीच का हैा इसका उच्चनाथ कौन हुआ? एक मत तो यह है कि शनि तुला राशि का उच्च का होता है और तुला  शुक्र होता है इस कारण उच्चनाथ शुक्र हुआ। दूसरा मत यह है कि शनि मेष राशि में है और मेष राशि में सूर्य उच्च का होता है इस कारण उच्चनाथ सूर्य हुआ। हमारे विचार से पहला अर्थ  उपयुक्त है। सूर्य का उच्चनाथ मंगल, चन्द्रमा का उच्चनाथ शुक्र, बुध का उच्चनाथ बुध, बृहस्पति का उच्चनाथ चन्द्रमा, शुक्र का उच्चनाथ बृहस्पति और शनि का उच्चनाथ शुक्र है

नीचभंग होने के लिए (क) और (ख) दोनों शर्तों का पूरा होना आवश्यक है

एक टीकाकार इस श्लोक का अर्थ यह कहते हैं कि (१) जो ग्रह नीच राशि में हो उसका स्वामी लग्न से केन्द्र  में हो या (२) जो नीच राशि में ग्रह है उसका स्वामी चंद्रमा से केंद्र में हो (३) या जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ लग्न से केन्द्र में हो या (४) जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ चन्द्रमा से केन्द्र में हो - इन चारों परिस्थितियों में नीच भंग हो जाएगा। परन्तु मूल संस्कृत श्लोक में 'अपि' शब्द आया है जिस का अर्थ है कि जो ग्रह नीच राशि में है उसका स्वामी और उसका उच्चारण भी यानि दोनों, केवल एक नहीं

इसी प्रकार मूल श्लोक में लिखा है 'चन्द्रलग्नात्' जिसका श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने अर्थ किया है 'चन्द्रमा से या लग्न से' परन्तु यदि दोनों से अभिप्राय होता तो मूल संस्कृत में 'चन्द्रलग्नात्' यह पञ्चमी का एक वचन नहीं आता। चन्द्र लग्नात् का अर्थ है चन्द्र लग्न से यानि चन्द्रमा जिस राशि में है उससे।  

यदि इस श्लोक में दी गई चार शर्तों को अलग-अलग चार योग मान लिया जाये तब तो प्रायः सभी नीच ग्रहों का भंग हो जावेगा क्योंकि जो ग्रह नीच राशि का है उसका स्वामी यदि लग्न से केन्द्र में ही (चार घर उसके अंतर्गत आ गए) या चन्द्रमा  से केन्द्र में हो (चार घर इस परिभाषा में आ गए)  या उच्चनाथ लग्न से केन्द्र में हो (चार घर इस में आ गये) या चन्द्र से केन्द्र में हों (चार घर इस में आ गए) इस प्रकार १६ निर्दिष्ट स्थानों में से कहीं न कही आ जायेगा हीा 

एक टीकाकार यह भी अर्थ करते हैं कि यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी या उस नीच ग्रह का उच्चनाथ उस नीच ग्रह से केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है


यद्येको नीचगतस्तद्राश्यधिपस्तदुच्चपः केन्द्रे
यस्य स तु चक्रवर्ती समस्तभूपालवन्द्यांघ्रि 

यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) उस नीच राशि का स्वामी और जो ग्रह नीच का है उसका उच्चारण यदि दोनों परस्पर केन्द्र में हों तो नीचभंग राजयोग होता है। यहाँ भी उच्चारण के दो अर्थ हो सकते हैं परन्तु हम यही अर्थ लेंगे कि नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उस राशि का स्वामी उच्चप या उच्चनाथ कहलाएगा

इस श्लोक का एक अन्य अर्थ भी हो सकता है कि यदि कोई ग्रह नीच हो तो उस नीच राशि के स्वामी का जो उच्चनाथ है वह उच्चनाथ यदि केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है। उदाहरण के लिए किसी की कुंडली में सूर्य नीच राशि का है, तुलाराशि नाथ शुक्र है। शुक्र उच्च होता है मीन में। मीन का स्वामी हुआ बृहस्पति, यह बृहस्पति यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राज योग हुआ


यस्मिन्राशौ वर्तते खेचरस्तद्राशीशेन प्रेक्षितश्चेत्स खेटः
क्षोणीपालं कीर्तिमन्तं विदध्यात् सुस्थानश्चेति्कपुनः पार्थिवेन्द्रः   

एक अन्य नीच भंग राजयोग बताते हैं। जिस राशि में नीच ग्रह हो उस राशि का स्वामी यदि नीच ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो नीच भंग राज योग होता है। यदि यह नीच ग्रह ६-८-१२ दुःस्थान में हो तो इतना अच्छा राजयोग नहीं होगा किन्तु सुस्थान में हो तो बहुत उत्तम नीचभंग राजयोग बनता है। 


नीचे तिष्ठति यस्तदाश्रितगृहाधीशो विलग्नाद्यदा 
चन्द्राद्वा यदि नीचगस्य विहगस्योच्चर्क्षनाथोऽथवा 
केन्द्रे तिष्ठति चेत्प्रपूर्णविभवः स्याच्चक्रवर्ती नृपो  
धर्मिष्ठोऽन्यमहीशवन्दितपदस्तेजोयशोभाग्यवान् 

यदि कोई  ग्रह नीच राशि में हो तो (क) इस नीच राशि का स्वामी अथवा (ख) नीच ग्रह का उच्चनाथ इन दोनों में से एक भी जन्म लग्न या चन्द्र लग्न से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है


नीचे यस्तस्य नीचोच्चभेशौ द्वावेक एव वा
केन्द्रस्थश्चेच्चक्रवर्ती भूपः स्याद्भूपवन्दितः

यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो और उस नीच राशि का स्वामी और नीच ग्रह जिस राशि में उच्च होता है उसका स्वामी वह - एक या दोनों लग्न से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग  होता है


सौजन्य :- फलदीपिका भावार्थबोधिनी 

Cancellation of Debilitation of a Planet

Due to the motion of the planets in the Zodiac, they pass through certain degrees of constellations and Rashis (Signs), they acquire or loose strength or power. In Western Astrology, the word Debilitated is used for a planet which is at fall due to its presence in a specific Zodiac Sign. But in Vedic Astrology Debilitated means when Planet is placed in a sign where it's not comfortable may be in an enemy house. Therefore, debilitation denotes planet's weakness or infirmity whereas Neecha means negative or malefic qualities of the planet in question to the native.
  • The debilitation of a Planet stands cancelled if the lord of the sign the planet in question occupies is in a Kendra from the Lagna or the Chandra-lagna.
  • The debilitation of a Planet also stands cancelled if the lord of the sign of exaltation of the said planet is in a Kendra from the Lagna or the Chandra-lagna
  • The debilitation of a Planet stands cancelled also if its dispositor fully aspects the Planet in question. The debilitation of a Planet is cancelled if the lords of the signs of debilitation and exaltation of the Planet in question conjoins or oppose each other or if they are at a distance of 4 houses or 10 houses from each other.
  • The debilitation of a Planet stands cancelled also if the Planet in Question is Retrograde, i.e., it is moving in the reverse direction.
  • If a planet is in his sign or debilitation, and is aspected by the lord of that sign, the debilitation gets cancelled. 
Notes :- 
The Mars is said to be the dispositor of the Saturn if the Saturn happens to occupy the sign and the house owned by the Mars. 
There is some difference of opinion about the interpretation of the word Ucchanatha. Suppose Saturn is in the Aries in debilitation who will be Ucchanatha or Saturn? According to one view Saturn is exalted in Libra. Therefore lord of Libra, namely, Venus is the Ucchanatha. Another view is that Saturn being in Aries and the Sun is exalted in Aries. Therefore, the Sun is the Ucchanatha. In our view the second view is more appropriate. 
Thus, there are five kinds of Neechbhanga Raj Yogas as described below:-
a) The lord of depression sign or the planet that is exalted in that sign, is in a Kendra position from the Lagna or the Moon. 
b)The lord of the sign of debilitation and the lord of the exaltation sign of the debilitation planet are mutually in Kendra positions. 
c) The planet in the sign of debilitation is aspected by the lord of that sign.
d) The lord of the sign of debilitation or the lord of the exaltation sign of the planet in debilitation, is in Kendra from the Lagna or the Moon. 
e) The planet in his sign of debilitation is in Kendra with reference to the Lagna or the Moon. 

Study by Yashraj Sharma @ aaskplanets.com
In Kalyuga, most of us are not so pure. So energies syncs easily and debilitated planets helps people to go through lowest level of Karma or Materialistic work to achieve something but exalted helps to go through highest level to achieve something. These debilitated planets makes one very cunning and they are more selfish to gain and achieve something. 
Also, Debilitated planets are more materialistic than exalted ones. Debilitated planet does very well in 6th house, if it's alone there, and lagna is strong. This is because, person will have to face low level of enemies, competitions and small diseases. And if lagna is weak than it can be dangerous.  

Study by Yogita (Astrologer) Shimla, India

Consideration to Judge whether Debilitated Planet is weak or not:-
  • The Planet can said to be weak when it is mrit or very old. One should see the degree. Planets become neech at specific degree.
  • A retrograde planet has a very strong impact on the native. So certainly, a debilitated planet is not weak when it comes in retrogression. It cancel the neechta as well. 
  • Debilitated Planet is not weak if has any benefic aspect or it is aspected directly by the lord of the sign it is place in.
  • If the planet is improving in the navamsa chart. 
Debilitated planets can give fruitful results as well in my experience in the following cases:-
  • When present in a prominent nakshatra. 
  • If the lord of the sign is well placed in natal chart and navamsa. The debilitated planets improves with time if it is exalted in Navamsa Chart or in Kendra with moon in Navamsa Chart.
Study by Adit Venkat, Vedic Astrologer and Researcher
  • Debilitated planets are weak but it still produces results. The result given by a debilitated planet may not be satisfactory or worthy. Debilitated Jupiter in Capricorn gives lot of wealth and status usually but the person may lack inner contentment, joy and happiness which is signified by Jupiter.
  • Most planets are debilitated in signs of planets which they are not comfortable with except for Venus which is debilitated in a sign of its friend.
  • Mars is debilitated in Cancer which is ruled by Moon. Moon is an emotional planet and Mars rules aggression and courage. Both these do not get together. 
  • Jupiter is debilitated in Capricorn which is sign of Materialism. Jupiter is inner joy and happiness (Cancer) which does not come from external things (Saturn).
  • Sun is debilitated in Libra. Sun is a singular planer and always likes to be alone. Libra is a sign of sharing and compromise. Here sun is forced to oblige and come down. 
  • Venus is debilitated in Virgo because Virgo is breaking apart of agreements (12th to Libra). Venus likes to keep promises and contracts as that is what it rules over (Libra stands for agreements, contacts, promises). Venus debilitated can still be helped by Mercury. 
  • Mercury is debilitated in Pisces because Mercury relies on facts and data, things which can be verified by the 5 senses. Pisces is the imagination and mercury does not take anything which is not tangible. Mercury rules Virgo which is outright tangible things of the earth. 
  • Saturn is debilitated in Aries because Saturn likes to do things patiently while Aries rushes through things. Saturn likes to follow while Aries like to take charge and lead. 
  • So Debilitated planets are not bad. They are just opposed to their natural functions and find it difficult to easily manifest the significance of those signs. 

Wednesday, March 27, 2019

Astrological Nomenclatures

Zodiac - According to traditional astrology the zodiac commences from a constant point. This constant point is 1800 away from Chitra Nakshatra. But according to Western Astrology the zodiac commences from Aries sign 0 degree and retreats back by 50.23 seconds per year.

Sayana and Niryana System -  According to western astrology the sun is pivot to calculate or delineate the results. Moon is the central point for all calculations in Indian Astrology. According to Western Astrology the Sun moves on Aries sign to between 21 March to 20 April while the Sun moves on Pisces sign between this period as per Hindu Astrology. 

Ayanamsa - In Western Astrology or Sayana system for the calculations of constellations and planets an imaginary constant point is conceived. This constant point never changes. Therefore, the position of constellations and planets also does not change.The distance between this constant point and vernal equinox (the beginning point of Aries Sign) is called Ayanamsa. 

Day - The period from sunrise to next sunrise is termed as day in traditional astrology while in civil time the day changes after 12.00 midnight.  

House of Bhava and Cusp - According to Indian astrology the zodiac is divided into twelve parts. Each part is called house or Bhava. The longitude of zodiac is 360°.  Therefore, each part is of thirty degree in longitude. The word cusp though signifies a house yet it has different meaning from general sense of a house or Bhava. Cusp is actually the beginning point of a house. The beginning point of a house is considered to be very influential as well as powerful. This is generally a western concept and quite scientific in nature. In Placidus system of house division each Bhava or house varies in longitude. A particular Bhava may be of 30 degree or more or less from 30 degree but the total of 12 cusps or houses will always be 360 degrees in longitude. 

Transit or Gochara - The entrance of the planet into the sign is called transit or Gochara. The transit  effect of the planets is studied in respect to the position of moon at the time of birth. Now-a-days many astrologers read transit in respect to ascendant. 

Constellation - There are 27 constellations. Though, one more constellation, i.e. Abhijeet, find place among the constellations but it is not used. Each constellation measures 13°-20'  or 800 minutes in longitude. These 27 constellations are divided among nine planets. Each planet consist of 2¼ stars of 9 Padas. These 27 constellations are further divided into 249 parts and each part is called sub-lord. 

Sub-Lord - The 27 constellations were divided into 249 parts. Each part is called sub lord. 

Significators - It is  also a new concept. Significators signify the matter in question. In fact the significators hypothesis rests on the use of constellations lord in predictive astrology.

This is a creation of Dr. Arastu Prabhakar.

ज्योतिष शास्त्र के कुछ अन्य सांकेतिक शब्द

ज्योतिष शास्त्र के कुछ सांकेतिक शब्दों का एक लेख सितम्बर २०१५, में भी प्रकाशित किया जा चुका है। यह लेख उसी का विस्तार है जिसमें कुछ अन्य पारिभाषिक शब्दों की चर्चा की गई है। इससे भारतीय ज्योतिष को ना केवल समझने और जानने में सहजता का अनुभव होगा अपितु  कुंडली बनाने और उसका फलादेश करने में भी सहायता होगी :-

इष्टकाल - सूर्योदय से जन्मकाल तक के घट्यादि काल को इष्टकाल कहा जाता है।

सूर्योदय - यह समय हर स्थान के लिए भिन्न होता है अतः इसे हम पंचांग से जान सकते हैं जहाँ यह स्थानीय, मानक अथवा दोनों का ही उपलब्ध रहता है। 

जन्म समय - यह जातक के जन्म का समय होता है। इसे घण्टा-मिनट में व्यवहार किया जाता है।

घटी - घटी, दण्ड, घड़ी, नाड़ी आदि तुल्यार्थ बोधक शब्द हैं। एक अहोरात्र में ६० घड़ी माना गया है। अतः १ घंटे में २.३० घटी/पल होता है। ६० विपल का एक पल, ६० पल की एक घड़ी, ६० घड़ी का एक अहोरात्र होता है।

भयात - यह नक्षत्र का वह समय है जो नक्षत्र के प्रारम्भ काल से जातक के जन्म काल तक व्यतीत होता है।

भभोग - यह नक्षत्र के सम्पूर्ण स्पष्ट भोग काल का नाम है।

ग्रहस्पष्ट - जन्म या प्रश्न के समय ग्रहों की आकाशीय वास्तविक स्थिति, जो राशि, अंश, कला, विकला अदि के रूप में साधन करनी होती है।

मध्यम मान - स्पष्ट मानों का माध्य अर्थात् औसत मान को कहा जाता है। जैसे तिथि का औसत भोगमान ६० घड़ी, वैसे ही नक्षत्र, योग आदि का भी तुल्य ही औसत भोग मान होता है।

सावन दिन या वार - सूर्योदय से अन्यतम सूर्योदय तक के काल को सावन दिन या वार कहा जाता है, जिसे ही लोग रवि, सोम अदि सात वारों के नाम से जानते हैं।

भाव - जन्म कुंडली में १२ भाव होते हैं जिन्हें क्रम से तनु, धन, सहज, सुख, सुत, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय और व्यय कहा जाता है।

लग्न - इसे जन्म लग्न भी कहते हैं। यह कुंडली का पहला भाव होता है। जन्म के समय पूर्व क्षितिज में जो राशि प्रथम उदित होती है उसे लग्न कहा जाता है।

लग्न-स्पष्ट - लग्न के जितने राशि, अंश, कला, विकला आदि पर जन्म हो, उसे लग्न स्पष्ट कहते हैं।

क्रांतिवृत्त - इसे राशि-मंडल भी कहते हैं। आकाश गोल में अपनी गति से चलने का जो सूर्य का मार्ग है, उसी को क्रांतिवृत्त कहा जाता है।

मानक समय - सम्प्रति यूरोप महादेशीय ग्रीनविच नाम के स्थान से गुजरती भूमध्य रेखा से पूर्व ८२/३० अंश-कला रेखांश के स्थानिक समय को सम्पूर्ण भारत के लिए मानक समय (स्टैण्डर्ड टाईम) माना गया है।

स्थानिक समय - जब जिस स्थान के खमध्य में सूर्य, भ्रमण वश पहुँचता है, वह उस स्थान का दिनार्द्ध होता है। जिसे दिन-मध्य भी कहा जाता है। दिन-मध्य से पूर्व सूर्योदय तथा बाद में सूर्यास्त होता है। दिन मध्य या दिनार्द्ध का दो गुणा दिनमान और दिनमान का पाँचवाँ भाग स्थानिक सूर्यास्त घण्टा-मिनट होता है।सूर्यास्त काल को १२ में से निकाल देने पर सूर्योदय घण्टा-मिनट हो जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पंचांग में इन्हे (दिनमान, सूर्योदय व सूर्यास्त को लिखने की परम्परा है।) यह प्रत्येक स्थान का भिन्न होता है। इसलिए ऐसे समय को स्थानिक समय (Local Time) कहा जाता है।

रेखांश - ग्रीनविच नामक स्थान को सम्प्रति भूमध्य माना गया है और भूमध्य रेखा पर जो स्थान जिस अंश-कला पर स्थित होता है, सम्पूर्ण विश्व के उस-उस स्थान का उसे रेखांश कहा जाता है। इस प्रकार ग्रीनविच को भूमध्य के 0 अंश पर स्थित मानकर उससे पूर्व और पश्चिम में स्थित स्थानों का रेखांश सर्वेक्षण द्वारा नियत कर मानचित्र में विधिवत् दर्शाया गया रहता है।

अक्षांश - भूगोल ध्रुवों द्वारा दो भागों में विभक्त माना गया है - एक उत्तरी और दूसरी दक्षिणी। ध्रुव से ९० अंश की दूरी पर निरक्ष देश स्थित माना गया है। मानचित्र में प्रायः तिरछी रेखाओं द्वारा अक्षांश का संज्ञापन करते हुए उत्तर तथा दक्षिण स्थान का प्रदर्शन किया हुआ रहता है। इसका उपयोग दो स्थानों के दक्षिणोत्तर अन्तरांश को जानने के लिए किया जाता है। निरक्ष देश पर से गई हुई रेखावृत्त विषुवत् वृत्त कहलाती है, जिससे भूगोल उत्तर अक्षांश और दक्षिण अक्षांश सम्बन्धी देशों में बँटा हुआ माना जाता है।

चरान्तर साधन - जन्म स्थान और पंचांग स्थान के चरों का अंतर चरान्तर होता है। अतः दोनों स्थानों का चर साधन करना पड़ता है। जन्म स्थान का चर अधिक होने पर चरान्तर घन अन्यथा ऋण जानना चाहिए अथवा घन या ऋण चरान्तर का निर्णय इस प्रकार करना चाहिए - जन्म स्थान के अक्षांश से पंचांग स्थान का अक्षांश कम हो तथा उत्तराक्रान्ति हो, तो घन चरान्तर, इसी तरह जन्मस्थान के अक्षांश से पंचांग स्थान का अक्षांश अधिक और दक्षिणक्रान्ति हो, तो भी घन चरान्तर जानना चाहिए बाकि अन्य स्थितियों में चरान्तर ऋण होगा।

अयनांश  - पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करने के साथ-साथ अपनी धुरी पर भी लट्टू की तरह घूमती रहती है। जिसके फलस्वरूप इसकी धुरी के केन्द्र बिंदु एक जगह स्थिर नहीं रहते हैं, अपितु एक प्रकार का वृत्त बनाते हैं। यह प्रतिवर्ष करीब-करीब ५० विकला से अधिक के हिसाब से पूर्व स्थान से खिसकते हैं और ३६० अंश की पूर्ण परिक्रमा २५,८०० वर्षों में पूरी करते हैं।    

Friday, December 30, 2016

षोडश योग

षोडश योगों के विचार के बिना वर्ष कुंडली का अध्ययन अधूरा ही रहता है। षोडश यानि सोलह योगों का निर्माण लग्नेश तथा कर्मेश की पारस्परिक स्थिति के आधार पर बनता है। वर्ष लग्न पद्धति मूलतः यवनों में प्रचलित थी। उन्हीं के द्वारा भारत में लाई जाने के कारण इन योगों के नाम अरबी-फ़ारसी भाषा के ही हैं।
वर्ष कुंडली में निम्न सोलह योग बहुत ही महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं:-
इक्कबाल योग  - यदि वर्षकुण्डली में सभी ग्रह केन्द्र (१, ४, ७, १०) तथा पणफर (२, ५, ८, ११) स्थानों में (अष्टम स्थान को छोड़कर) पड़े हों यानि ३, ६, ८, ९, व १२वें स्थान में कोई ग्रह न हो तो इक्कबाल योग होता है। यह योग सुख, यश, धन, प्रगति, संतान-प्राप्ति एवं भाग्यवृद्धि का परिचायक है।

इन्दुवार योग - वर्षकुण्डली में सभी ग्रह आपोक्लिम (३, ६, ९, १२) स्थानों में हों तो इन्दुवार योग होता है। इस योग के होने से सामान्य सुख की प्राप्ति होती है, परन्तु वर्ष-भर चिंता व परेशानी बनी रहती है। 

इत्थशाल योग - इस योग को समझने के लिए ग्रहों की गति एवं राशिगत अंशों पर ध्यान देना होगा। कुछ ग्रह शीघ्रगामी होते हैं तो कुछ मंदगति। मंदगति ग्रह के राशिगत अंश अधिक हों और शीघ्रगति ग्रह के अंश कम हों, वर्ष के मध्य किसी भी समय शीघ्रगति ग्रह अधिक अंश चल कर मन्दगति ग्रह के अंश के बराबर जायें तो इस प्रकार शीघ्रगति ग्रह मंदगति ग्रह को उसके अंश के बराबर पहुँच कर उसे अपना तेज देता है। इसे इत्थशाल योग कहते हैं।  
 
उदहारण - सूर्य ३ राशि ८ अंश तथा मंगल ३ राशि १२ अंश पर हैं, सूर्य १ दिन में १ अंश चलता है। मान लीजिये मंगल की उस समय की चाल ४५ कला प्रतिदिन है। १६ दिन में सूर्य १६ अंश चल कर ३ राशि २४ अंश हो जायेगा तथा मंगल १६ दिन में १६ x ४५ = ७२० कला या १२ अंश आगे बढ़कर ३ राशि २४ अंश हो जायेगा। 
 
परन्तु इत्थशाल योग में कुछ दशाएं आवश्यक हैं -
 
क)  दोनों ग्रहों में से एक लग्नेश होना चाहिये।
ख) दोनों ग्रह एक-दूसरे को देखते हों। 
ग) दोनों ग्रह दीप्तांश के भीतर हों। 
 
दोनों  ग्रहों में मूलतः ३० कला से कम का अंतर हो तो पूर्ण इत्थशाल योग बनता है। लग्नेश का प्रत्येक भाव के स्वामी के साथ इत्थशाल हो सकता है। जिस भावेश (कार्येश) का लग्नेश के साथ इत्थशाल होगा, उस भाव का फल वर्ष में अवश्य घटित होगा। षष्ठेश, अष्टमेश, तथा द्वादशेश का लग्नेश से इत्थशाल हो तो वर्ष में इन भावों से सम्बन्धित अशुभ घटनाएं (रोग, मृत्यु, व्यय, शत्रुभय) अधिक होंगी। इसके विपरीत द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश, व एकादशेश से इत्थशाल होना शुभ है। 
 
इसराफ़ योग - यह इत्थशाल योग से विपरीत है। इसके अन्तर्गत तीन आवश्यक दशाएं तो वे ही हैं जो इत्थशाल योग में हैं परन्तु तीव्रगामी ग्रह के अंश मन्द ग्रह से अधिक होते हैं, जिससे तीव्रगामी ग्रह मन्दगति ग्रह से अधिक दूर होता चला जाता है। अशुभ भावों के स्वामी से इसराफ़ योग शुभ होता है क्योंकि इसराफ़ योग अशुभ भावों के अशुभ फल की हानि (नष्ट) करता है, जैसे रोग-हानि, मृत्यु-हानि व व्यय-हानि यानि रोग न हो, मृत्यु न हो, व्यय न हो आदि। शुभ भावों के स्वामी से भी इसराफ़ योग इतना हानिकारक नहीं है। 
 
नक्त योग - जिस भाव के सम्बन्ध में विचार करना हो, उस भाव का स्वामी (कार्येश) व लग्नेश एक-दूसरे को न देखते हों, परन्तु इन दोनों के बीच में एक तीव्रगामी ग्रह हो, जो दोनों को देखता हो, बीच वाला ग्रह पीछे वाले ग्रह से तेज ले कर आगे वाले ग्रह को देता है। इस योग को नक्त योग कहते हैं। इससे कार्यसिद्धि किसी अन्य व्यक्ति के सहयोग से होती है। 
 
यमय योग - इस योग में लग्नेश व कार्येश दीप्तांश के भीतर हो, पर दृष्टि न हो। इन दोनों के बीच में तीसरा मंद ग्रह हो, जो दोनों को देखता हो। यह मंद ग्रह पीछे वाले ग्रह से तेज लेकर आगे वाले ग्रह को देता है। इससे भी कार्य तीसरे व्यक्ति के सहयोग से होता है। 
 
मणऊ योग - लग्नेश व कार्येश के इत्थशाल में बाधा डालने वाला योग मणऊ योग है। शनि या मंगल, जिसकी दोनों में से एक पर शत्रु दृष्टि हो तथा उनके दीप्तांश के भीतर हो तो यह पाप ग्रह इत्थशाल योग में खलनायक का कार्य करता है। यह योग अशुभ एवं कार्यनाशक है। 
 
कम्बूल योग - जब लग्नेश व कार्येश का इत्थशाल हो और चंद्रमा दोनों में से किसी एक से भी इत्थशाल करे तो कम्बूल योग होता है। यदि दोनों ग्रह उच्च या स्वराशिस्थ हों तो उत्तम कम्बूल योग तथा दोनों नीच या शत्रुक्षेत्री हों तो अधम कम्बूल योग, परन्तु एक उच्च या स्वक्षेत्री और एक नीच या शत्रुक्षेत्री और एक नीच या शत्रुक्षेत्री हो तो माध्यम कम्बूल योग होता है। 
उत्तम कम्बूल  योग लग्नेश और कार्येश के इत्थशाल योग के शुभ फल की वृद्धि करता है। 
 
गैर कम्बूल योग -  जब चन्द्रमा लग्नेश कार्येश को नहीं देखता हो, अपनी राशि के अंतिम अंशों में हो और अपनी राशि में जाकर किसी अन्य (गैर) बली ग्रह से कम्बूल करे तो गैर कम्बूल योग होता है। यह योग भी तीसरे व्यक्ति की सहायता से कार्यसाधक है। 
 
खल्लासर योग - लग्नेश और कार्येश में इत्थशाल हो, पर चन्द्रमा शून्यमार्गी (वह ग्रह जो न उच्च का है न नीच का, न शुभ ग्रह दृष्ट हो न ही अशुभ ग्रह दृष्ट हो न मित्र ग्रही हो और न शत्रु ग्रही हो, यानि एकाकी असम्बद्ध हो) हो, लग्नेश या कार्येश से कम्बूल न करे और न ही किसी अन्य ग्रह से गैर कम्बूल करे तो या योग खल्लासर कहलाता है। यह योग कार्य को बिगाड़ने वाला होता है। 
 
रद्द योग - यदि लग्नेश अथवा कार्येश जिनका इत्थशाल हो, वक्री, अस्तंगत, नीच अथवा ६, ८, १२वें घर का स्वामी हो तो वह कार्य को नष्ट (रद्द) करता है। यह योग प्राणघातक, शत्रुओं को बढ़ाने वाला एवं उन्नति में बाधक है। 
 
दुफालि कुत्थ योग - इत्थशाल करने वाले लग्नेश व कार्येश में से मंदगति ग्रह बली (उच्च, स्वराशिस्थ, वर्गोत्तम) हो, पर तीव्रगामी ग्रह में ये गुण न हो (निर्बल हो) तो यह योग होता है। इसमें भी कार्यसिद्धि होती है, पर सफलता की गति धीमी होती है। 
 
दुत्थ कुत्थीर योग - यदि लग्नेश व कार्येश में इत्थशाल होते हुए भी दोनों निर्बल हों तो दुत्थ कुत्थीर योग होता है। इसमें भी तीसरे व्यक्ति की सहायता से कार्य होता है।  
 
तम्बीर योग - जब लग्नेश व कार्येश में इत्थशाल न हो, उनमें से एक ग्रह राशि के अंतिम अंशों में रह कर अगली राशि में किसी बली ग्रह से इत्थशाल करे तो तम्बीर योग होता है। इससे वर्ष में सुख-शान्ति बढ़ती है। 
 
कुत्थ योग - वर्षकुण्डली में जब लग्नेश व कार्येश केन्द्र तथा पणफर में स्थित हो, पंचवर्गी तथा हर्ष बल के अनुसार बली हो तो कुत्थ योग होता है। इस योग से वर्ष में सफलता, उन्नति तथा हर्ष होता है। 
 
दुरुफ योग - यह कुत्थ योग से विपरीत है। जब वर्षकुण्डली में सभी ग्रह आपोक्लिम में स्थित हों या पंचवर्गी हर्ष बल के अनुसार निर्बल हों तो दुरुफ योग होता है। यह योग वर्ष भर संताप देने वाला, कष्टदायक तथा प्राणघातक है।
इस प्रकार वर्षकुंडली का फलादेश करते समय उक्त सोलह योगों पर विचार करना भी आवश्यक है। 

यह अनमोल कृति ज्योतिष के विद्वान "श्री रघुनन्दनप्रसाद जी" की अनमोल कृति है जिसका प्रकाशन इस ब्लॉग के पड़ने वालों के ज्योतिष-ज्ञान में वृद्धि के लिए किया गया है। 

Tuesday, December 6, 2016

Astrology Basics

TIME LIMIT

A Day = 24 hours
An Hour = 60 minutes
A Minute = 60 seconds
1 Day = 86,400 seconds

THE HINDU TIME TABLE

A day = 60 ghatikas 
A Ghatikas = 60 vighatikas
A Vighati = 60 liptas
A Lipta = 60 viliptas
A Vilipta = 60 paras
A Para = 60 tatparas
1 Day = 46,656,000,000 tatparas

Time is eternal. It cannot be measured. But, a change may happen in a thing, as mud becoming a pot by the labour of a potter. This new form may be said to have started a certain particular time and its destruction by being broken etc. also may be indicated by a certain time. This duration or interim period when it existed as a pot, is the limitation of time for the thing. 

Astrology may be divided into six divisions: 
  1. Vegetable Horoscopy - This indicates the seasons and mostly relates to crops and weather conditions.
  2. Animal Horoscopy - This indicates animals, their increase, decrease etc. 
  3. Human Horoscopy - This speaks of human beings.
  4. Mundane Horoscopy - This refers to countries and places.
  5. Horary Horoscopy - This type of horoscopy deals with knowing future through prasna or questioning time.
  6. Electional Horoscopy or Muhurt - This speaks of methods of selection of auspicious time for performance of important functions in life. 
As can be seen Moon takes 27 days to pass through the entire Zodiac. Sun takes about a month to pass through each Rasi. But the next month will not commence unless the New Moon has taken place and this will mean roughly another two days and a quarter making a total of 29-1/4 days. The difference in the Lunar and Solar months would become too great. Therefore, in Lunar System once in about three years, a year gets thirteen months to bring it into conformity with the Solar years.
 
The year is divided into 12 months. 
 
The Lunar months are:-
  1. Chaitra
  2. Vaisakha
  3. Jyestha
  4. Ashada
  5. Sravana
  6. Bhadrapada
  7. Aswina
  8. Karthika
  9. Margashira
  10. Pushya
  11. Magham
  12. Phalguna
When Moon finishes a round and Amavasya or New Moon occurs, a month ends and the next begins from the first day after the New Moon.

The months got their names from the fact that on the Full Moon day, during the month of Chaitra Nakshatra will be Chittra. 
  1. Vaisakha - Visakha
  2. Jyestha - Jyestha
  3. Ashada - Purvashada
  4. Sravana - Sravana
  5. Bhadrapada -Bhadrapada
  6. Aswina - Aswini
  7. Karthika - Kruttika
  8. Margashira - Mrigasira
  9. Pushyam - Pushyami
  10. Magha - Makha
  11. Phalguna - Uttara Phalguni
The Solar year has also twelve months called - 
  1. Chittrai 
  2. Adi
  3. Alpisi
  4. Thai
  5. Vykasi
  6. Avani
  7. Karthikai
  8. Masi
  9. Ani
  10. Perattasi
  11. Margali
  12. Panguni
These months are calculated according to the entry of Sun into each Rasi from Mesha. 

Each year is said to produce certain effects independently on its own and that refers not to individual  but has a distinct bearing on mundane horoscopy with particular reference to general masses. 

Name of Planet              Takes to move in a sign or Rasi
Sun - Surya                           about one month
Moon - Chandra                     about 2 1/4 days
Mars - Mangal or Kuja            about 45 days
Mercury - Budha                    about a month
Jupiter - Guru                        about a year
Venus - Sukra                        about a month
Saturn - Sani                         about 2 1/2 years (Two and Half Year)
Dragon's Head - Rahu/
Ascending Node                     about 1 1/2 years (One and Half Year)
Dragon's Tail - Kethu
Descending Node                   about 1 1/2 year (One and Half Year)
 
Sun and Moon never have a retrograde motion but have an accelerated or retarded motion. 
 
Rahu and Kethu have always a retrograde motion. 
 
All other planets have direct, retrograde, accelerated or retarded motion.
 
This extract has been taken from "Indian Astrology" written by great astrologer Sh. C.J. Krishnasamy.