Thursday, March 27, 2014

भाव परिचय

जन्मकुण्डली में बनने वाले कोष्ठकों को भाव कहा जाता है। कुण्डली में बारह कोष्ठक अर्थात् भाव होते हैं। इन कोष्ठकों को भाव, भवन, स्थान तो कहते ही हैं, साथ ही इनसे विचार करने वाले विषयों के नाम पर भी इनका नामकरण कर दिया जाता है। जैसे प्रथम भाव को लग्न, तनु, उदय या जन्म, द्वित्तीय भाव को धन, कुटुम्ब या कोश, तीसरे भाव को सहज, पराक्रम आदि भी कहते हैं। 

भाव के अधिपति ग्रह को भावेश कहते हैं। जब हम आयेश कहेंगे तो ग्यारहवें स्थान पर जो राशि है उसका स्वामी आयेश होगा। मान लें कि ग्यारहवें स्थान पर सिंह राशि का अधिपति सूर्य है तो यहाँ आयेश का अर्थ सूर्य होगा। 

भावों के सामूहिक नाम भी हैं-जैसे केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम और त्रिकोण आदि। प्रथम, चतुर्थ, सप्तम एवं दशम भाव को 'केन्द्र' कहा जाता है। दूसरे, पांचवें, आठवें और ग्यारहवें स्थान को 'पणफर' कहते हैं।  तीसरे, छठे, नवें और बारहवें भाव को 'आपोक्लिम' कहते हैं तथा प्रथम, पंचम और नवम भाव को 'त्रिकोण' कहते हैं। तीसरे, छठे और दसवें भाव को 'उपचय', छठे, आठवें, व बारहवें भाव को 'त्रिक', दूसरे व आठवें भाव को 'मारक' तथा तीसरे, छठे व ग्यारहवें भाव को 'त्रिषडाय' कहते हैं। 

भाव स्पष्ट करने की जो प्रचलित रीति है उसके अनुसार लग्न से दशम भाव को स्पष्ट किया जाता है। दशम भाव में छः राशि जोड़ने से चतुर्थ भाव स्पष्ट हो जाता है। चतुर्थ में से लग्न को घटा कर उसे छः से भाग देने पर जो षष्ठांश आये, उसे लग्न में जोड़ने पर प्रथम भाव को सन्धि, सन्धि में पुनः षष्ठांश जोड़ने पर द्वित्तीय भाव, द्वितीय भाव में षष्ठांश x २ को जोड़ने से तीसरा भाव तथा तथा पांचवां और छठा भाव स्पष्ट करने के लिए तीस अंशों में से षष्ठांश को घटाकर जो शेष बचता है, उसे जोड़ते हैं। भाव स्पष्ट करने की यही रीति आज भी प्रचलित है। इस रीति से कोई भी भाव समान अंशों (३० अंश) में नहीं आता, जबकि प्रत्येक भाव को समान अंश का होना चाहिए। दूसरी बात यह है कि कोई भी ग्रह, जो कुंडली में चौथे भाव का अधिपति होता है, भाव स्पष्ट करने में वह पांचवे या तीसरे भाव का अधिपति बन जाता है।

इसलिए आज भाव स्पष्ट करने की जो परिपाटी चल रही है, वह ठीक नहीं है। भारत में इस रीति का प्रचार अरब और मिस्र आदि देशों से हुआ। फलित विकास के लेखक स्वर्गीय पं. रामचरन ओझा ने लिखा है कि भाव साधन की जो पद्धति  आज भारत में प्रचलित है वह मुसलमानी मतानुसार है, ऋषिप्रणीत नहीं है। 'सिद्धान्त तत्त्व विवेक' में इसका पूर्णतया खण्डन किया गया है। जैमिनी सूत्र में राशियों की दशा दी गयी है। भाव स्पष्ट की इस प्रणाली को मनाने से किसी राशि की दशा दो बार आयेगी तो किसी के एक बार भी नहीं आयेगी। 'सर्वे भावा लग्नांशसमाः' अर्थात् सभी भाव लग्न के अंशों के समान हों, ऐसा नहीं हो सकेगा। सभी शास्त्रकारों ने लग्न के बाईसवें द्रेष्काण को मारक कहा है, पर यह तभी संभव हो सकता है जब अष्टम भाव लग्न के अंशादि के बराबर हो। आचार्य वराहमिहिर ने भी उपर्युक्त बात कही है। इससे यह सिद्ध होता है कि भाव स्पष्ट करने की यह रीति सह शुद्ध नहीं है। आर्ष वचनों के अनुसार लग्न स्पष्ट में एक-एक राशि जोड़ने से भाव स्पष्ट (द्वादश भाव) हो जाते हैं। लग्न स्पष्ट के बराबर सभी राशियों के भाव मध्य मानने की परिपाटी रही थी।  भाव मध्य से पन्द्रह अंश पूर्व भाव प्रारंभ तथा भाव मध्य से पन्द्रह अंश पश्चात भाव समाप्त होता है।

जब किसी भाव में कोई ग्रह होता है तो पूर्ण फल प्रदान करता है। जैसे वृषभ लग्न के २० अंश (१/२०) उदित हुए तो मिथुन के २० अंश पर ग्रह द्वितीय और कर्क के २० अंश पर ग्रह तृतीय भाव का फल करेगा। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए। 

Saturday, March 8, 2014

ग्रहों की दृष्टि

ज्योतिष के आधार पर भूमि के बारह भाग और उनसे ग्रहों का सम्बन्ध प्रस्तुत किया गया है। हर एक भाग किसी न किसी दूसरे भाग को देखता या उस के द्वारा देखा जाता अर्थात् कुंडली के किसी भी घर में स्थापित ग्रह की दृष्टि कुंडली के दूसरे किसी न किसी घर में स्थापित ग्रह को देखती है या किसी न किसी दूसरे घर के ग्रहों द्वारा देखे जाते हैं। इसी को दृष्टि कहते हैं जो पूर्ण, आधी, चौथाई दृष्टि, मेल मिलाप, टक्कर कहलाती है। 

पूर्ण दृष्टि

पूर्ण दृष्टि का अर्थ पूर्ण प्रभाव। कुंडली के कुल बारह घर या खाने हैं। पहले छह स्थानों का दृष्टि द्वारा बाद के छह स्थानों से सम्बन्ध है। उन में से पहला घर सातवें घर को पूर्ण दृष्टि से देखता है अर्थात् पहले घर के ग्रह अपना पूर्ण प्रभाव सातवें घर के ग्रहों पर करते हैं। इसी प्रकार तीसरा नौवें को, चौथा दसवें को, पांचवां ग्यारहवें को, छठा बारहवें को देखता है। जिस से यह भी सिद्ध होता है कि पहला सातवें को देखता है परन्तु सातवां पहले को नहीं देखता। तीसरा नौवें को देखता है पर नौंवा तीसरे को नहीं देखता। चौथा दसवें को देखता है पर दसवां चौथे को नहीं। पांचवां ग्यारहवें को देखता है पर ग्यारहवां पांचवें को नहीं क्योंकि बैटरी की रोशनी आगे जाया करती है आगे से पीछे नहीं आया करती है। किसी भी घर की दृष्टि अपने घर में ग्रह के प्रभाव को इस प्रकार से ले जाती है जैसे सिनेमा के परदे पर पड़ने वाली रोशनी अपने साथ चित्र को ले जाती है। बिना ग्रह के साथ घर की दृष्टि दूसरे ग्रह  में ऐसे जायेगी जैसे बिना चित्रों के सिनेमा कि रोशनी परदे पर। 

आधी और चौथाई दृष्टि 

तीसरे घर का ग्रह ग्यारहवें घर के ग्रह को आधी दृष्टि से देखता है। परन्तु ग्यारहवें घर का ग्रह तीसरे घर के ग्रह को नहीं देखता है। पांचवें घर का ग्रह नौवें घर के ग्रह को आधी दृष्टि से देखता है परन्तु नौवें घर का ग्रह पांचवें घर के ग्रह को नहीं देखता है। यानि कि तीसरे और पांचवें घर के ग्रह क्रमशः  ग्यारहवें और नौवें घर के ग्रहों को अपनी आधी शक्ति से प्रभावित करेंगे। परन्तु ग्यारहवें और नौवें घर का प्रभाव क्रमशः तीसरे और पांचवें घर के ग्रहों पर नहीं होगा।

टक्कर 

कुंडली के किसी न किसी भी घर से हर ग्रह अपने से आठवें घर के ग्रह को टक्कर मार कर हानि पहुंचायेगा। वह उसका मित्र हो या शत्रु ग्रह हो इस बात का ध्यान न रखेगा जैसे पहला घर आठवें को टक्कर मारेगा और दसवां घर पांचवें घर को टक्कर मारेगा। इस प्रकार कुंडली के बारह ही घरों के ग्रह अपने घर से आठवें घर में स्थापित ग्रहों की टक्कर मार कर उसे हानि पहुंचायेगे।

आपस की शत्रुता 

अपने से दसवें नम्बर पर पड़ने वाले ग्रह आपस में शत्रु हो कर एक दूसरे घर के संबंधित रिश्तेदारों और वस्तुओं के उल्ट प्रभाव देंगे।

बृहस्पति, मंगल और शनि की दृष्टि 

सभी ग्रह अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं, लेकिन मंगल अपने स्थान से चौथे और आठवें स्थान को, गुरु अपने स्थान से पांचवे और नवें स्थान को व शनि अपने स्थान से तीसरे और दसवें स्थान को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है।

शनि का प्रतीक सांप भी होता है जब वह भूमि पर रेंग कर चलता है तो आगे की और देखता है परन्तु जब वह फन उठाकर खड़ा कर लेता है तो उसकी आँखें आगे देखने कि बजाय पीछे की और देखती हैं। सांप फन उसी समय उठाता है जब उसको अपने पास शत्रु का आभास हो। अतः ज्योतिष के आधार पर भी जब शनि शत्रुता की नीयत और दृष्टि से देखे तो वह उल्टी दृष्टि से अपने पीछे बैठे ग्रह को भी हानि पहुंचा सकता है, छठे से दूसरे घर के ग्रहों को।

कुछ आचार्यों ने राहु-केतु की दृष्टि को भी मान्यता प्रदान की है, लेकिन महषि॔ पराशर ने इनकी कोई दृष्टि नहीं मानी है। अन्य आचार्यों के मत से राहु अपने स्थान से पांचवे, सातवें और नवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है। ऐसी ही केतु की दृष्टि भी होती है।

सूर्य और मंगल की दृष्टि उर्ध्व है, बुध और शुक्र की तिरछी, चन्द्रमा और गुरु की बराबर (सम) तथा राहु और शनि की दृष्टि नीची है। 

Friday, March 7, 2014

ग्रहों के बल और स्वरूप

ग्रहों के - काल बल, चेष्टा बल, नैसर्गिक बल, दिग्बल, दृग्बल और स्थान बल - छह प्रकार के बल माने जाते हैं।
  1. कालबल - नतोन्नत बल,  पक्ष बल, अहोरात्र त्रिभाग बल व् वषैशादि बल इन चार बालों का योग ग्रह का 'काल बल' होता है।
  2. चेष्टा बल -  अयन बल और माध्यम चेष्टा बल का योग ग्रह का 'चेष्टा बल' होता है। 
  3. नैसर्गिक बल - शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चंद्रमा और सूर्य का 'नैसर्गिक बल' क्रमशः एकोत्तर अंशों को सात पर भाग देने से लब्धि तुल्य आता है। 
  4. दिग्बल - शनि में से लग्न को, सूर्य और मंगल में से चतुर्थ को, चन्द्रमा और शुक्र में से दशम को, बुध और गुरु में से सप्तम को घटाकर शेष को छह राशि पर भाग देने से ग्रहों का 'दिग्बल' निकाला जाता है।
  5. दृग्बल -  द्रष्टा ग्रह को दृश्य ग्रह में से घटाकर शेष को दृष्टि ध्रुवांक चक्र में दिये गये अंक से गुणा कर ३० का भाग देने से ग्रहों का 'दृग्बल' आता है। 
  6. स्थान बल - उच्च बल, युग्मायुग्म बल, सप्त वर्णेक्य बल, केन्द्र बल और द्रेष्काण बल का योग ग्रह का 'स्थान बल' कहलाता है। 
यदि ग्रह सूर्य के साथ हो तो 'अस्त', मंगल आदि पुरुष ग्रह चन्द्रमा के साथ हो तो 'समागम' और मंगल के साथ अन्य ग्रह हो तो 'युद्ध' कहलाता है। उत्तरायण में सूर्य और चन्द्रमा दोनों बली होतें है। शेष ग्रह समागम और वक्र गति होने से बलि होते हैं।

सूर्य के नेत्र शहद की भांति पिंगल वर्ण के हैं। इसके शरीर की लम्बाई -चौड़ाई बराबर है। यह अधिक पित्त और थोड़े बालों वाला है तथा मृत्युलोक का अधिपति है। जन्म के समय में इसकी स्थिति के अनुरूप जातक की देह, पिता, पराक्रम, आसक्ति और धन का विचार किया जाता है।

चन्द्रमा सुंदर नेत्र, गोल चेहरा, अधिक वाट और कफ वाला, मेधावी, बुद्धिमान् तथा मीठे वचन कहने वाला है। मन, बुद्धि, व्यावहारिक ज्ञान, राजा की प्रसन्नता, माता और सुख का विचार चन्द्रमा की जन्मकालिक स्थिति से किया जाता है।

मंगल पतली कमर, चंचल स्वभाव, दानशील, शूर, युवावस्था से संपन्न, क्रूर दृष्टि वाला और पित्तप्रधान है। इसकी जन्मकालिक स्थिति से शौर्य, रोग, गुण, छोटे भाई-बहन, भूमि, शत्रु  आदि का विचार किया जाता है।

बुध द्वि-अर्थी (जिन शब्दों के दो अर्थ हों) शब्द बोलने वाला, तीनों प्रकृति (वात-पित्त-कफ़ ) प्रधान गुण वाला व हंसी-मज़ाक वाला ग्रह है। इस की जन्मकालिक स्थिति के अनुसार विद्या, विवेक, बंधु, मामा, वाक् शक्ति, मित्र आदि का विचार किया जाता है।

बृहस्पति पीले नेत्र एवं पीले बालों वाला, दीर्घ और स्थूल देहधारी, श्रेष्ठ बुद्धि एवं कफ़प्रधान प्रकृति वाला है। इसकी जन्मकालिक स्थिति से शरीर-यष्टि, सुख, पुत्र, बुद्धि, धन एवं धार्मिकता का ज्ञान किया जाता है।

शुक्र देखने में सुंदर, सर्वदा सुखी, काले सघन केश, सुंदर नेत्र और वात-कफ़प्रधान प्रकृति वाला है। स्त्री-सुख, भूषणादि, वाहनसुख, कामवासना, व्यापार आदि का विचार इसकी जन्मकालिक स्थिति से किया जाता है।

शनि पतले एवं भारी शरीर, बड़े दांत, रूखे और कड़े केश, आलसी, कपिल-वर्णी नेत्रों तथा वातप्रधान प्रकृति वाला है। इसकी स्थिति से जातक की आयु, जीविका, मृत्यु का कारण, नौकर के सुख-दुःख आदि का विचार किया जाता है।

राहु से पितामह और केतु से मातामह का विचार किया जाता है।

शनि, सूर्य, चन्द्रमा , बुध, शुक्र, गुरु और मंगल ग्रहों को क्रमशः स्नायु, अस्थि, रक्त, त्वचा, वीर्य, वसा, मज्जा आदि का कारक होने से इनके स्वरूप आदि के द्वारा जातक का स्वरूप विचारने में उपयोग होता है। जन्म के समय जातक का जो ग्रह निर्बल होगा उस ग्रह की धातु निर्बल होगी और उसी के समान सम्बन्धित अंग भी पीड़ित होगा। प्रश्नकाल से रोग के कारण आदि का विचार भी किया जाता है।

ग्रहों के लोक 

पूर्वजन्म में जातक किस लोक में था और मृत्यु के पश्चात् वह कहाँ जायेगा, इस विचार के लिए ग्रहों के लोकों का उपयोग होता है।

स्वर्ग का अधिपति गुरु, पितृलोक के शुक्र और चंद्रमा, पाताललोक का बुध, मृत्युलोक के मंगल और सूर्य तथा नरक का अधिपति शनि को माना गया है। 

Thursday, March 6, 2014

ग्रह

ग्रहों का अंग-विन्यास 

जिस प्रकार द्वादश राशियां कालपुरुष का अंग मानी गई हैं अर्थात् कालपुरुष के शरीर में राशियों का विन्यास किया गया है, वैसे ही ग्रहों का विन्यास भी किया जाता है। प्रश्नकाल, गोचर अथवा जन्म-समय में जब ग्रह प्रतिकूल फलदाता होता है तो वह कालपुरुष के उसी अंग में अपने अशुभ फल के कारण पीड़ा पहुंचाता है।

कालपुरुष के सिर और मुख पर ग्रहपति सूर्य का, हृदय और कंठ पर चंद्रमा का, पेट और पीठ पर मंगल का, हाथों और पांवो पर बुध का,  बस्ति  पर गुरु का, गुह्य स्थान पर शुक्र का तथा जाँघों पर शनि का अधिकार होता है। 

सूर्य कालपुरुष की आत्मा और चंद्रमा मन है। मंगल बल है और बुध वाणी है। बृहस्पति सुख और ज्ञान है। शुक्र कामवासना है। शनि दुःख है। ज्योतिष में सूर्य-चन्द्र को राजा, गुरु-शुक्र को मंत्री , मंगल को सेनापति, बुध को युवराज और शनि को भृत्य कहा गया है। 

वर्ण 

सूर्य लाल-श्याम मिले-जुले रंग का, चंद्रमा सफ़ेद रंग का, मंगल लाल रंग का, बुध दूब  की भांति हरे रंग का,  बृहस्पति गौर-पीत रंग का, शुक्र श्वेत रंग का, शनि काले रंग का, राहु नीले रंग का तथा केतु विचित्र रंग का है। 

उपरोक्त कथन जातक के आत्मा व मन आदि  के बारे में पता देता है। यदि ग्रहों के कारक बलवान होंगे तो ग्रह भी पुष्ट होंगे और यदि कारक निर्बल अवस्था में होंगे तो ग्रह भी निर्बल होंगे। वर्ण-सम्बन्धी प्रश्न में नष्ट द्रव्य, चोर के रंग-रूप तथा कुंडली में जातक के रंग-रूप आदि का पता ग्रह के रंग से चलता है। 

ग्रहों की दिशा 

सूर्य पूर्व का, शनि पश्चिम का, बुध उत्तर का, मंगल दक्षिण का, शुक्र अग्नि-कोण का, राहु नैऋत्य का, चंद्रमा वायव्य का और गुरु ईशान दिशा का स्वामी है।

सजल-निर्जल संज्ञा 

चंद्रमा और शुक्र सजल हैं।  शनि, सूर्य और मंगल निर्जल (शुष्क) हैं। बुध और गुरु सजल राशि में रहने पर सजल और निर्जल राशि में रहने पर निर्जल माने जाते हैं।

जातक के शरीर का विचार करने के लिए सजल आदि संज्ञाओं का उपयोग होता है। ग्रह  के सजल होने से शरीर स्थूल होगा तथा ग्रह के शुष्क होने से शरीर पतला होगा।

ग्रहों के वर्ण 

बृहस्पति और शुक्र ब्राह्मण वर्ण के हैं, सूर्य और मंगल का वर्ण क्षत्रिय है तथा चंद्रमा और बुध वैश्य वर्ण के हैं। बुध चूँकि बुद्धि का कारक ग्रह  है, अतः  इसे ब्राह्मणवर्णी मानना अधिक उपयुक्त हो सकता है। किन्तु प्राचीन शास्त्रकार बुध को वैश्य वर्ण का मानते हैं। शनि शूद्रवर्णी है। राहु का अधिपत्य म्लेछों और चाण्डालों पर है और केतु अंत्यजवर्णी है। सत्त्वगुणी ग्रहों में चंद्रमा, सूर्य और गुरु आते हैं। बुध और शुक्र रजोगुणी ग्रह  हैं तथा मंगल और शनि तमोगुणी ग्रह  हैं।

चोर की जाति बताने में ग्रहों के वर्णों का उपयोग किया जाता है।

ग्रहों की अवस्था 

शास्त्रकारों ने ग्रहों कि दस अवस्थाएं मानी हैं, परन्तु किन्हीं आचार्यों ने नौ अवस्थाएं भी मानी हैं।

मूल त्रिकोण राशि में अपनी उच्च राशि का ग्रह प्रदीप्तावस्था में होता है। अपने ही ग्रहों में (स्वगृही) हो तो स्वस्थ, मित्र के गृह में हो तो मुदित, शुभ ग्रह के वर्ण में हो तो शांत, दीप्त किरणों से युक्त हो तो शक्त, ग्रहों से युद्ध में पराजित हो तो पीड़ित, शत्रुक्षेत्रीय (शत्रु राशि में) हो तो दीन, पाप ग्रह  के वर्ण में हो तो खल, अपनी नीच राशि में हो तो भीत और अस्त ग्रह को विकल कहा जाता है।

मित्र ग्रहों की राशि में स्थित ग्रहों की संज्ञा 'बाल' होती है। मूल त्रिकोण में स्थित ग्रह  की संज्ञा 'कुमार' होती है। अपनी उच्च राशि में स्थित होने से ग्रह की 'युवराज' संज्ञा होती है और शत्रु की राशि में स्थित होने पर ग्रह की संज्ञा वृद्ध मानी गई है।

ग्रह अपनी अवस्था के अनुसार ही फल प्रदान करते है। 'बालक' संज्ञा वाला ग्रह सुख देता है। 'कुमार' हो तो अच्छा आचरण प्रदान करता है। यौवनावस्था में राज्याधिकार दिलाता है और वृद्धावस्था में हो तो ऋण या रोग प्रदान करता है।

ग्रहों के रस एवं काल 

जातक की किस प्रकार के भोज्य पदार्थों में रूचि है या रहेगी, इसका ज्ञान ग्रहों के रस द्वारा किया जाता है। प्रश्नकाल में लग्नेश के तुल्य या लग्न नवांशपति के कालतुल्य समय का ज्ञान किया जाता है। जातक प्रायः प्रश्न करते हैं कि कितने समय तक मेरा अमुक कार्य हो जायेगा या अमुक रोगी कब ठीक होगा? ग्रहों के काल का उपयोग ऐसा विचार करने में किया जाता है। दैवज्ञ को चाहिए की लग्नाधिपति और नवांशपति के सम कालतुल्य और देश, काल एवं परिस्थिति का विचार कर समय का निर्धारण करें।

चंद्रमा, सूर्य, शनि, गुरु, मंगल, शुक्र और बुध क्रम से नमकीन, कटु, कषाय, मधुर, तिक्त, खट्टा और मिश्रित रसों के स्वामी हैं।

अयन का स्वामी सूर्य, वर्ष का शनि, ऋतु का बुध, मास का गुरु, पक्ष का शुक्र, दिन का मंगल और घटी का अधिपति चंद्रमा होता है।

मंगल युवा है, बुध बाल है, चंद्रमा और शुक्र प्रौढ़ है तथा शनि, गुरु और सूर्य वृद्ध हैं।

ग्रहों के सम्बन्ध 

ग्रहों के चार प्रकार के सम्बन्ध माने जाते हैं। किन्हीं आचार्यों ने पांच प्रकार के सम्बन्ध भी कहे हैं।
  1. दो ग्रहों में परस्पर राशि-परिवर्तन का योग हो-अर्थात् 'क' ग्रह  'ख' ग्रह की राशि में बैठा हो और 'ख' ग्रह 'क' ग्रह की राशि में बैठा हो-तो यह अति उत्तम सम्बन्ध होता है। 
  2. जब दो ग्रह परस्पर एक-दूसरे को देख रहे हों अर्थात् 'क' ग्रह 'ख' ग्रह को देख रहा हो और 'ख' ग्रह 'क' ग्रह को तो यह मध्यम सम्बन्ध माना जाता है। 
  3. दोनों ग्रहों में से एक ग्रह दूसरे ग्रह की राशि में बैठा हो और दोनों में से एक दूसरे ग्रह को देखता हो तो यह तीसरा सम्बन्ध माना जाता है। 
  4. जब दोनों ग्रह एक ही राशि में संयुक्त होकर बैठें हों तो यह चौथे प्रकार का सम्बन्ध होता है। इस प्रकार के सम्बन्ध को अधम माना जाता है। 
  5. जब दो ग्रह एक-दूसरे से त्रिकोण (पांचवे-नवें) स्थान पर स्थित हों तो यह मतान्तर से पांचवां सम्बन्ध होता है। 
भावों के स्थिर कारक ग्रह 

सूर्य लग्न, धर्म और कर्म भाव का, चंद्रमा सुख भाव का, मंगल सहज और शत्रु भाव का, बुध सुख और कर्म भाव का, गुरु धन, पुत्र, कर्म और आय भाव का, शुक्र स्त्री भाव का तथा शनि शत्रु, मृत्यु, कर्म और व्यय भाव के कारक ग्रह  हैं। 

आत्मादि चर कारक ग्रह 

सूर्यादि नौ ग्रहों में ग्रह स्पष्ट तुल्य अंशों में अधिक हो अर्थात् अंश वाला हो, वह आत्मकारक, उससे कम अंशों वाला ग्रह अमात्यकारक, उससे कम अंशों वाला ग्रह भ्रातृकारक, उससे कम अंशों वाला मातृकारक, उससे कम अंशों वाला पितृकारक, उससे कम अंशों वाला पुत्रकारक, उससे कम अंशों वाला पितृकारक, उससे कम अंशों वाला पुत्रकारक, उससे कम अंशों वाला जातिकारक तथा उससे भी कम अंशों वाला स्त्रीकारक कहा गया है। 

Wednesday, February 26, 2014

राशियां और उनका अंग-विभाग

आचार्य वराहमिहिर ने द्वादश राशियों को कालपुरुष का अंग मान कर शरीर में इनकी जो स्थिति बतलाई है, वह इस प्रकार है - मेष की सिर में, वृषभ की मुख में, मिथुन की स्तनों के मध्य में, कर्क की हृदय में, सिंह की उदर में, कन्या की कमर में, तुला की पेड़ू में, वृश्चिक की लिंग में, धनु की जंघा में, मकर की दोनों घुटनों में, कुम्भ की दोनों पिण्डलियों में तथा मीन की दोनों पैरों में। 

  • मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ पुरुष राशियां हैं।  
  • वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन स्त्री राशियां हैं। 
  • मेष, कर्क, तुला और मकर 'चर' संज्ञक राशियां हैं। 
  • वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ 'स्थिर' संज्ञक राशियां हैं। 
  • मिथुन, कन्या, धनु और मीन 'द्विस्वभाव' संज्ञक राशियां हैं। 
  • धनु, सिंह और मेष अग्नितत्त्व-प्रधान राशियां हैं। 
  • कर्क, वृश्चिक और मीन जलतत्त्व-प्रधान राशियां हैं। 
  • वृष, कन्या और मकर पृथ्वीतत्त्व-प्रधान राशियां हैं। 
  • मिथुन, तुला और कुम्भ वायुतत्त्व-प्रधान राशियां हैं। 

राशियों की दिशा की जानकारी होना भी आवश्यक है, क्योंकि प्रत्येक कार्य में इनका उपयोग होता है। विवाह, व्यवसाय, धनलाभ, आदि बातों कि जानकारी जब किसी ज्योतिषी से पूछी जाती है तो वह कारक ग्रह या राशि की दिशा देख कर ही उत्तर दे सकता है। यदि किसी व्यक्ति का प्रश्न हो कि मुझे अमुक नगर में व्यवसाय करने पर लाभ होगा या हानि, तो इसका उत्तर भी राशि का स्वरुप जानकार ही दिया जा सकेगा। लाभ-हानि जैसी बातें भी राशियों और ग्रहों कि दिशा पर निर्भर करती है। 

मेष

कालपुरुष के अंग में इस राशि का अधिकार सिर पर होता है। यह राशि पूर्व दिशा की स्वामिनी और लाल-पीले वर्ण वाली तथा पुरुष जाति, चार संज्ञक, अग्नितत्त्व, पित्त प्रकृति, भेड़ के समान आकृति वाली, निवास स्थान धातु, रत्न और भूमि, क्रूर स्वभावी, रात्रिबली, क्षत्रिय वर्ण और अल्प संतति वाली होती है। यह साहस, वीरता तथा अहंकार आदि की कारक है। लग्न में यह राशि होने पर जन्म लेने वाले जातक प्रायः गंभीर रहते है। हंसना तो जैसे जानते ही नहीं। स्मित हास्य की रेखा मात्र इनके चेहरे पर दिखाई पड़ती है। ऐसे जातक हँसने और बोलने में कंजूसी करते है तथा उनके बोलने का ढंग भी मधुर और प्रभावशाली नहीं होता, क्योकि दांत या तो बाहर को निकले रहते हैं या एक के ऊपर एक चढ़े रहते है। इनकी चाल भी लुभावनी नहीं होती, लेकिन चलने दौड़ने में ये तेज होते हैं।

वृषभ 

इस राशि की आकृति बैल के समान है तथा कालपुरुष के अंग में मुख से कंठ तक इस राशि का अधिकार होता है। यह राशि स्त्री जाति, स्थिर संज्ञक, शीतल स्वभाव वाली, भूमितत्त्व, दक्षिण दिशा की  स्वामिनी, वात प्रकृति  तथा रात्रिबली है। इसका निवासस्थान वन, पर्वत-शिखर और  गौशाला तथा वर्ण श्वेत है। यह वैश्यवर्णी और शिथिल शरीर वाली, मध्यम संतान सुख प्रदान करने वाली शुभ राशि है। इस राशि में जन्म लेने वाले जातक स्वार्थी स्वभाव  के, अपने हानि-लाभ का पूरा-पूरा ध्यान रखने वाले और विद्या-व्यसनी होते हैं। इससे मुख, कंठ और गालों का विचार किया जाता है।

मिथुन 

कालपुरुष के अंग में कंधे से लेकर हाथों तक इस राशि का अधिकार होता है। इसकी आकृति स्त्री-पुरुष का जोड़ा है। स्त्री हाथ में वीणा लिए हुए और पुरुष गदा लिए हुए है। यह वायुतत्त्व, पश्चिम दिशा कि स्वामिनी, हरा-रंग (तोते जैसा), पुरुष जाती, द्विस्वभाव संज्ञक, शूद्रवर्णी, उष्ण, दिवबली, मध्यम सन्तति और शिथिल देह वाली राशि है। विद्या-व्यसनी व शिल्पी होना इसका प्राकृतिक स्वाभाव है । जातक के कंधे, बहु और हाथों का विचार इसी राशि में किया जाता है। नृत्य-गायन का स्थान, स्त्री, जुआ और विहार करने कि जगह इसका निवासस्थान मन गया है।

कर्क 

यह केकड़े के समान आकृति वाली जलचर राशि है। कालपुरुष के शरीर में इसका अधिकार वक्ष:स्थल पर माना जाता है। यह स्त्री जाति, चर संज्ञक, उत्तर दिशा कि स्वामिनी, कफ प्रकृति, समोदयी, रात्रिबली, मिश्रित रंग, (लाल-सफ़ेद) एवं बहुसन्तति वाली राशि है। खेत, बावड़ी, तट, देवस्थान इस राशि के निवासस्थान हैं। लज्जा, भौतिक सुखों को प्राप्त करने में लगे रहना, स्थिर गति और ज़माने की हवा देखकर कार्य करना इस राशि का प्राकृतिक स्वभाव है।  इससे उदर, सीना और गुर्दों का विचार किया जाता है।

सिंह 

सिंह के समान आकृति वाली इस राशि का कालपुरुष के अंग में हृदय पर अधिकार होता है। यह अग्नितत्त्व, स्थिर संज्ञक, पुरुष जाति, पित्त प्रकृति, पीले रंग वाली, क्षत्रिय वर्णी, उष्ण स्वभाव, कम संतान वाली तथा पूर्व दिशा की स्वामिनी है। मेष राशि से इसका प्राकृतिक स्वभाव प्रायः मिलता जुलता है। इतने पर भी उदारता और स्वतंत्र के प्रति इसका अधिक रुझान होता है। हृदय का विचार इसी राशि से किया जाता है।

कन्या 

हाथ में दीपक लेकर नौका पर बैठी कन्या के सदृश इसकी आकृति है। कालपुरुष के शरीर में इसका अधिकार उदर पर माना जाता है।  हरी-भरी घास वाली भूमि, स्त्री, रति और चित्रशाला में इसका निवासस्थान होता है। यह स्त्री जाति, द्विस्वभाव संज्ञक, पिंगल-वर्णी, रात्रिबली, दक्षिण दिशा कि स्वामिनी, वायु और शीत प्रकृति, पृथ्वीतत्त्व, अल्प संतान और शिथिल शरीर वाली राशि है। स्वाभिमान इस राशि कि पहचान तथा उत्तरोतर उन्नति करते रहना इसका स्वभाव है। इस राशि से उदर का विचार किया जाता है।

तुला 

इसकी आकृति हाथ में तराजू लिए पुरुष जैसी है। कालपुरुष के शरीर में इसका अधिकार नाभि से बस्ति पर्यन्त होता है। हाट-बाज़ार तथा व्यापारियों कि जगहों में इसका निवासस्थान होता है। यह पुरुष जाती, चार संज्ञक, पश्चिम दिशा कि स्वामिनी, वायुतत्त्व, श्यामवर्णी, शीर्षोदयी, दिन-बली, क्रूर एवं शुद्र संज्ञक राशि है। विचारशीलता, राजनितिक चातुर्य, शास्त्रों के प्रति जिज्ञासा तथा अपना कार्य सिद्ध करने में पटु इसका प्राकृतिक स्वभाव है। नाभि और उस से नीचे के अंगों का विचार इसी राशि से किया जाता है।

वृश्चिक

इसकी आकृति बिच्छू के समान मानी गई  है तथा कालपुरुष के शरीर में इसका अधिकार गुह्य स्थानों (लिंग-गुदा) आदि पर माना जाता है। यह स्त्री जाति, शुभवर्णी, स्थिर संज्ञक, जलतत्त्व, रात्रिबली, उत्तर दिशा की स्वामिनी, ब्राह्मण वर्ण, कफ प्रकृति और बहुसंतान वाली राशि है। अपने निश्चय पर दृढ़ रहना, टूट जाना लेकिन झुकना नहीं, आगे से मृदु लेकिन पीछे से तीक्ष्ण, स्पष्ट कथन-भले ही किसी को बुरा लगे या अच्छा-इसके प्राकृतिक गुण  हैं। शरीर की लम्बाई और जननेन्द्रिय का विचार इसी राशि से किया जाता है।

धनु 

कमर से ऊपर का भाग धनुष लिए मनुष्य का तथा कमर से नीचे का भाग घोड़े के समान, ऐसी इस राशि की आकृति है। कालपुरुष के शरीर में इसका अधिकार दोनों जांघो पर है। यह पुरुष जाति, द्विस्वभाव, क्रूर स्वभाव वाली, कंचनवर्णी, पित्त-प्रकृति, दिवबली, क्षत्रिय वर्ण, अग्नितत्त्व, पूर्व दिशा कि स्वामिनी और अल्प संतान वाली राशि  है। आस्तिकता, परोपकारिता, दयालुता और मर्यादा कि इच्छा के साथ-साथ अधिकारप्रिय होना इसका स्वाभाविक गुण है। इससे जांघो का विचार किया जाता है।

मकर 

यह मगर जैसी आकृति वाली राशि है। कालपुरुष के शरीर में इसका दोनों घुटनों पर अधिकार माना जाता है। यह स्त्री जाति, चर स्वभाव, वात-प्रकृति, पृथ्वीतत्त्व, पिंगलवर्णी, रात्रिबली, वैश्य वर्ण, दक्षिण दिशा कि स्वामिनी और शिथिल शरीर राशि है। यह शनि कि स्वराशि भी है। शनि को भृत्य मन गया है तथा भृत्य की भांति ही कर्त्तव्यपरायणता और उच्चाभिलाषी होना इस राशि का स्वाभाविक गुण है। घुटनों का विचार इसी राशि से किया जाता है।

कुम्भ 

कालपुरुष के शरीर में दोनों पिंडलियों पर इस राशि का अधिकार माना जाता है। इसकी आकृति कन्धे पर जल का घड़ा लिये पुरुष है। पुरुष जाति, स्थिर संज्ञक, विचित्र वर्ण, वायुतत्त्व, शीर्षोदयी, पश्चिम दिशा की स्वामिनी, दिवाबली, शीतलता, अन्वेषक विचारधारा और शिल्प-चातुर्य इसके प्राकृतिक गुण है। आँतों का विचार इसी राशि से किया जाता है।

मीन 

कालपुरुष के शरीर में इस राशि का अधिकार दोनों पैरों पर माना जाता है। यह परस्पर मुख-पुच्छ-मिश्रित जल में दो मछलियों की जैसी आकृति वाली, उत्तर दिशा की स्वामिनी, स्त्री-जाति , कफ-प्रकृति, द्विस्वभाव संज्ञक, जलतत्त्व, विप्र वर्ण, रात्रिबली और पिंगल रंग कि राशि है। दानशीलता, दयालुता तथा परोपकारिता इसके प्राकृतिक गुण हैं। पैरों का विचार इसी राशि से किया जाता है। 

Sunday, February 9, 2014

शरीर पर तिलों का महत्त्व

शरीर पर तिल भी अपना विशेष महत्त्व रखते हैं। तिल दो तरह के होते हैं। एक तो काले रंग के तथा दूसरे सुर्ख लाल रंग जैसे। काले तिल अपना असर कम करते हैं। लाल रंग के तिल शरीर पर अपना पूरा असर करते हैं।  तिल एक जगह पर जब आता है तो हमेशा उसी जगह पर स्थिर रहता है। मगर आयु के मुताबिक़ तिलों का बढ़ना भी हैरानी वाली बात नहीं है। जैसे एक तिल तो अच्छे फल वाला होता है मगर दूसरी तरफ एक अन्य तिल पैदा हो जाता है जो उसके अच्छे फल को पूरी तरह भोगने नहीं देता। अलग-अलग जगह पर तिलों के निशान का फल इस प्रकार है :-

  1. जिस जातक की छाती पर तिल हो तो व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार काम करने वाला तथा हर काम में कामयाबी हासिल करने वाला होता है। 
  2. जिस जातक के मुख के बायें हिस्से पर तिल दिखाई दे तो जातक सुख भोगने वाला, जमीन जायदाद, सवारी का सुख तथा धार्मिक वृत्ति वाला होता है। ऐसे जातकों की संतान लड़कियां अधिक होती हैं। अगर वही तिल चमकता हो तो केवल एक ही पुत्र जानना चाहिए। 
  3. नाक के नज़दीक अगर किसी जातक के तिल हो तो जातक बहुत सफ़र करने वाला, अपने हरेक काम में सफलता पाने वाला तथा दूसरों पर हुक्म चलाने वाला होता है मगर अपनी आयु का प्रथम भाग कम सुखों की प्राप्ति से व्यतीत करता है। यानि पिछली आयु में सुख भोगने वाला होता है। 
  4. अगर ऐसा ही तिल किसी औरत के नाक के पास काले रंग का हो तो ३५ साल की आयु में पति की तरफ से चिंताग्रस्त होना पड़ता है। 
  5. जिस जातक कि नाभि के नज़दीक कला हल्के से रंग का तिल दिखाई दे तो जातक जितनी देर तक जीवित रहता है अपना जीवन ऐशोआराम के साथ ही व्यतीत करता है तथा हमेशा सुखी रहता है। 
  6. अगर किसी जातक के दायें पाँव पर तिल या मोहका हो तो जातक समझदार तो बहुत होता है मगर उसकी औरत हमेशा क्लेश करने वाली ही होती है। 
  7. अगर किसी जातक के बायें पाँव पर तिल दिखाई दे तो ऐसा जातक खुद अपना नुकसान करने वाला होता है।  
  8. जिस जातक के हाथ पर तिल दिखाई दे तो ऐसे जातकों को संतान का सुख पूर्ण मिलता है। संतान पढ़ी -लिखी तथा मशहूर होती है। 
  9. पाँव की ऐड़ी पर अगर कोई तिल का निशाँ दिखाई दे तो उसका फल अशुभ होता है। ऐसे जातकों को माँग कर खाना पड़ता है। यानि बहुत दुखी और धनहीन होते हैं। 
  10. अगर यही तिल पाँव की  तली पर हो तो जातक सब प्रकार के सुखों को भोगने वाला दौलतमंद और बड़े पद को प्राप्त कर सुखी रहने वाला होता है। ऐसे तिल वाले जातक की औरत को कभी भी धन कि कमी नहीं रहती। शुरू से अंत तक सुख ही सुख भोगता है। 
  11. अगर किसी जातक के पाँव की तर्जनी अंगुली (अंगुठे के साथ वाली) पर तिल दिखाई दे तो ऐसे जातक के जीवन का पूर्वार्द्ध तो बड़े सुख के साथ बीतता  है मगर जब ५० वर्ष की आयु होती है तब तक किसी के नीचे काम करना पड़ता है। यानि रुपया पैसा कम हो जाने पर किसी दूसरे के पास नौकरी करने पर मजबूर हो जाते हैं।  ५१ वें वर्ष में विशेषकर परेशान रहते हैं। 
  12. अगर किसी जातक के पाँव के अँगूठे पर तिल हो तो जातक धार्मिक वृत्ति वाला, अपने गुरुजनो का भक्त तथा ईश्वर पर भरोसा रखने व दान पुण्य करने वाला होता है। 
  13. अगर किसी जातक के कान के नजदीक आगे या पीछे तिल हो तो जातक संतान का सुख पाने वाला तथा धनवान होता है। संतान इसकी पढ़ी लिखी व मशहूर होती है। 

Thursday, December 12, 2013

स्वगृही ग्रहों का फल

  1. सूर्य - जातक उत्तम विद्या, यश, कुटुंबियों से सुख, धन, वैभव तथा मान वृद्धि पाता है। 

  2. चंद्रमा - जातक कृषि से धन लाभ, राज सम्मान, बंधुजन तथा मित्रों का सुख पाता है। 

  3. मंगल - जातक भू-संपदा, धन, धान्य, उच्च अधिकार तथा मान व प्रतिष्ठा पाता है। 

  4. बुध - जातक धन, धान्य, वाणिज्य, भूमि, रत्नाभूषण तथा वस्त्रादि का सुख पाता है। उसे पत्नी, पुत्र और मित्रों का सुख तथा उत्तम भोजन कि प्राप्ति होती है।   

  5. गुरु - जातक भूमि, वस्त्र, उत्तम भोजन, वहाँ तथा सत्तालाभ का श्रेष्ठ सुख पाता है। 

  6. शुक्र - जातक को परोपकारी, गौरवशाली, सुख वैभव संपन्न तथा स्त्री, पुत्र मित्रों से सुखी बनाता है। 

  7. शनि - जातक के बल, पौरुष व यश कि वृद्धि होती है। वह राज्याश्रय पाता है। कोई जातक भूमि, भवन तथा वस्त्राभूषण का सुख पाता है। वह अपने गुणों के कारण सम्मान पाता है।  

  8. राहु - जातक स्त्री तथा वाहन का सुख प्राप्त करता है। कोई जातक ग्राम या नगर का अधिपत्य पाता है। 

  9. केतु - जातक को धन व सुख देता है। उसका साहस, बल व आत्म विश्वास बढ़ता है। धर्म व अध्यात्म में उसकी सहज रूचि होती है।