Friday, November 22, 2013

ग्रहों के विषय

सभी ग्रह अपने कारकत्व के अनुरूप अपनी दशा/अंतर्दशा (भुक्ति) में जातक पर प्रभाव डालते हैं :-
  1. सूर्य आत्मा, पिता, पद, प्रतिष्ठा, स्वास्थय व शक्ति (शारीरिक व आत्म बल) के साथ धन व लक्ष्मी का कारक है. 

  2. चंद्रमा से मन, बुद्धि, राजकृपा तथा धनसंपदा का विचार किया जाता है. 

  3. मंगल से पराक्रम, परिश्रम, संघर्ष शक्ति, अनुज, भूमि, शत्रु, रोग व चचेरे भाई का ज्ञान होता है. मंगल बली होने पर जातक अपने पराक्रम से सुख व सफलता पता है. 

  4. बुध विद्या, बुद्धि, बंधू, माया, मित्र, मनोरंजन, वाणी, कार्यक्षमता का कारक है. अतः शुभ होने पर अपनी दशा अंतर्दशा में बुध मौज मस्ती कराएगा मित्र मण्डली का सुख देगा.

  5. गुरु ज्ञान, प्रजा, धर्म, धन, संतान, शरीर की पुष्टि, मंत्रोपासना का कारक है. गुरु अपनी अंतर्दशा में प्रायः स्नेह, सहयोग, सुख व समृद्धि देता है. जातक की धर्म में रूचि होती है. 

  6. शुक्र वस्त्राभूषण, दांपत्य सुख, पत्नी से सम्बन्ध, सुख वैभव तथा वहाँ का कारक होता है. शुभ शुक्र अपनी दशा में सुख, समृद्धि व दांपत्य सुख देता है. 

  7. शनि आयु, जीवन, जीविका (नौकरी), दस-दासी या दुःख देता है. मृत्यु व विपत्ति का विचार भी शनि से होता है. कालपुरुष का लग्न, शनि की नीच राशि है. अतः इसे काल पुरुष का दुःख माना गया है. बहुधा शनि विलम्ब या बाधा देता है. 

  8. राहू से दादा का विचार किया जाता है. तीसरे भाव अथवा मिथुन/वृष राशि का उच्चस्थ राहू साहस पराक्रम बढ़ाता है. 

  9. केतु से नाना का विचार किया जाता है. द्वादश भाव का केतु मोक्षदायी व मुक्ति कारक माना गया है. केतु अपनी दशा/भुक्ति में प्रायः अनिष्ट व अशुभ से छुटकारा दिलाया करता है. 

Saturday, September 28, 2013

पुरुष की या स्त्री की रति शक्ति के सूचक योग

रति शक्ति का सम्बन्ध व्यक्ति के शारीरिक गठन, नस्ल और देशकाल (जलवायु) से रहता है. इसका ज्ञान हमें स्नायु संस्थान के कारक व रक्त संचार कारक ग्रह की स्थिति से होता है तथा सप्तम स्थान में स्थित राशि व ग्रह के स्वभाव तथा बल के अनुसार निष्कर्ष निकलना पड़ता है.

मान्यता यह है कि काम का उद्गम सबसे पहले मन से होता है. काम को मनोज व मन्मथ भी कहा जाता है देह तो मन की आज्ञाकारी दास है. इसलिए यहाँ हम व्यक्ति की मानसिक स्थिति व काम की ओर होने वाली सहज रूचि के सूचक योगों पर विचार करेंगे.

प्रमुख रूप से कामप्रिय (सेक्सी) होना शुक्र की स्थिति पर निर्भर करता है. विशेष यह है की यह बलवान होकर या निर्बल होकर त्रिक स्थान छठे, आठवें या बारहवें में आ जाये तो व्यक्ति को कामी बनाता है. यहाँ इसमें स्थानगत प्रभाव रहता है. हाँ, यदि इस पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि हो तो बात दूसरी है. शुक्र पाप ग्रहों के साथ देखा जाए अथवा पाप ग्रहों के साथ बैठा हो तो कामी बनाता है. बुध की या अपनी राशि में बैठा हुआ शुक्र भी कामी बना देता है. अगर रिपुभाव में धनु या मीन राशि हो ओर शुक्र मंगल के साथ किसी भी भाव में स्थित हो या कामी होने के लिए सातवें स्थान में शुक्र का बैठना ही प्रयाप्त रहता है.

ये योग व्यक्ति को काम का आवेश आने पर उचित या अनुचित का ध्यान नहीं रहने देते वह कामांध सा हो जाता है. अप्राकृतिक काम घटनाएं या कामापराध कामी व्यक्ति ही किया करते हैं. जब कुंडली में शुक्र की यह स्थिति हो ओर गोचर में वह प्रबल पद रहा हो या इसकी दशा-अंतर्दशा चल रही हो तब यह व्यक्ति को मथकर रख देता है, सिवा काम-वासना के कुछ और दिखाई नहीं देता और वह निर्मम भाव से अपने शरीर का नाश करता रहता है. 

कम या संतुलित काम (सेक्स) वाले लोगों के चंद्रमा वृष या तुला राशि का होता है. शनि और चंद्रमा का योग चौथे स्थान में हो रहा हो. लग्न में विषम राशि हो और शुक्र वहाँ बैठा हो. लग्न में वृष या धनु राशि हो और उसमे शनि स्थित हो. शुक्र सप्तम स्थान में हो और उस पर लग्नपति की दृष्टि हो. यह सभी योग रति शक्ति में कमी होने के थे. 
  • बलवान मंगल आय भाव में रहे तो व्यक्ति चिर युवा रहता है. 
  • लग्न में चंद्र और शुक्र एक साथ रहे तो व्यक्ति सदाबहार रहता है. 
  • बलवान बुध पाप ग्रहों से युत या दृष्ट न होकर त्रिक स्थान के अलावा कहीं हो तो व्यक्ति सदाबहार रहता है. 
अब उन योगों का वर्णन है जिसमें व्यक्ति स्त्रियों को संतुष्ट नहीं कर पता है और उनका प्रिय नहीं होता. उसमे धारण क्षमता का अभाव होता है. 

चंद्र मंगल की राशि (मेष) में हो, सूर्य चंद्रमा की राशि (कर्क) में हो और राहू, शुक्र व शनि इनमें से कोई दो ग्रह अपनी उच्च राशि में हो. शनि और बृहस्पति गर्भस्थान (पाँचवें) में एक साथ हों और चंद्रमा लग्न में हो. शुक्र मकर या कुम्भ राशि में हो, लग्न में कन्या राशि हो जिस पर शनि एवं बुध की दृष्टि हो. इन योगों में व्यक्ति शीघ्र पतन, शुक्रमेह, स्वप्नदोष या अन्य वीर्य विकारों से ग्रस्त रहता है. 

पुरुषत्वहीन करने वाले योग
  • शुक्र और शनि एक साथ दसवें या आठवें स्थान में हो. 
  • शनि जलराशि का होकर छठे या बारहवें स्थान में रहे. 
  • लग्न में विषम राशि हो, मंगल समराशि में हो और लग्न को देख रहा हो. 
  • शुक्र और शनि का योग दसवें स्थान में होने पर भी यह योग बनता है. 
  • शनि, शुक्र से छठे या आठवें स्थान में रहे. नीच राशि का शनि छठे या बारहवें स्थान में हो. 

यह योग जिनके होते है वे लोग पुरुषत्वहीन होते हैं. पुरुषत्वहीनता लाने योगों में व्यक्ति के जननेन्द्रिय संस्थान करीब-करीब निष्क्रिय से रहते हैं. स्मरण रहे इन योगों में पाप ग्रहों के साथ युति स्थिति दृष्टि आदि का सम्बन्ध होने पर ही यह योग सार्थक होते हैं. 

Thursday, September 26, 2013

ग्रहों के मारक ग्रह

सूर्य से शनि, शनि से मंगल, मंगल से गुरु, गुरु से चंद्र, चंद्र से शुक्र, शुक्र से बुध, बुध से चंद्र निश्चय कर के मारे जाते हैं... अर्थात् सूर्य से शनि का दोष मिटता है इसी तरह सर्व ग्रह एक दूसरे के फल को मार देते हैं.....

ग्रहों के दोष शामक ग्रह 

राहू का दोष बुध नाश करता है राहू व बुध इन दोनों के दोष को शनि नाश करता है.... राहू, बुध, शनि इन तीनों के दोष को मंगल नाश करता है... राहू, बुध, शनि, मंगल इन चारों के दोष को शुक्र और राहू, बुध, शनि, मंगल और शुक्र इन पाँचों के दोष को गुरु नाश करता है, राहू, बुध, शनि, मंगल,  शुक्र और गुरु इन छहों के दोष को चंद्रमा और सातों ही ग्रहों के दोष को विशेषकर उत्तरायण में रवि नाश कर देता है.......

According to Jataka Parijata (II - 73.74),


Mercury when in strength is said to counter the evil used by Rahu. Saturn can counter the evil caused by the combining of Mercury and Rahu. Mars is said to be capable of overcoming the evil generated by these three planets put together. Venus can counter the evil caused by all these four planets being together.  Jupiter can overcome the joint evil of all the 5 planets Mercury, Rahu, Saturn, Mars and Venus. The Sun is said to be so powerful that he can remove the evil effects of the foregoing planets plus of the Moon. 

Friday, June 7, 2013

कुंडली में मांगलिक योग

विवाह सर्वमांगल्ये यात्रायां ग्रह गोचरे।
जन्म राशि प्रधानत्वं नाम राशि न चिन्तयेत।।
देशे ग्रामे ग्रहे युद्धे सेवायां व्यवहारके।
नाम राशि: प्रधानत्वं जन्म राशि न चिन्तयेत।।

वर का प्रसिद्ध नाम तथा कन्या का जन्म नाम, कन्या का जन्म नाम तथा व वर का प्रसिद्ध नाम कदापि न लें। वैवाहिक समय में वर तथा कन्या की कुंडली का मिलान करने से प्रथम निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है ताकि वर-कन्या (नव दंपत्ति) अपना जीवन सुखमय व्यतीत कर सकें।
  1. सर्वप्रथम ध्यान में रखने वाली बात यह है कि कुंडली में मांगलिक दोष, अगर हो तो वर कन्या दोनों की जन्म कुंडलियों में हो।
  2. वर्ण, कूट, वश्य कूट, तारा कूट, योनि कूट ग्रह मैत्री, गण मैत्री, भकूट, नाड़ी कूट इन आठ कूटों का मिलान अवश्य करें।
  3. वर कन्या का जन्म समय ठीक होना चाहिए।
  4. सबसे अधिक ध्यान रखने योग्य बात यह है कि क्या वर तथा कन्या का जन्म-पत्र शुद्ध, सूक्ष्म एवं सिद्धान्तीय गणित के अनुसार है।   

एक नाड़ीस्थनक्षत्रे दम्पत्योर्मरण  ध्रुवं ।
सेवायां च भवेद्धानि विवाहे प्राण नाशकः ।।

वर-कन्या कि एक नाड़ी हो तो निश्चय मरण, सेवा में हानि और विवाह में प्राणों का नाश होता है ।

आदि नाड़ी वर हान्ति मध्य नाड़ी च कन्यकाम् ।
अन्त्यनाड़ायां दूयोमृत्यु नाड़ी दोषं त्यजेद् बुधः ।।

आदि नाड़ी वर को, मध्य नाड़ी कन्या को और अन्य नाड़ी दोनों का हनन करती हैं। इससे नाड़ी दोष विद्वानों को त्याग देना चाहिए।

नाड़ी दोषश्च विप्राणां  वर्णदोषस्तु भुभ्रुजाम्।
गण दोषश्च वैश्यषु योनि दोषतु पादजाम्।।

विवाह में ब्राह्मणों के लिए नाड़ी दोष, क्षत्रियों के लिए वर्ण दोष, वैश्यों को गण दोष और शुद्रों को योनि दोष विशेष कर विचारना चाहिए।

एक नक्षत्र जातानां नाड़ी दोषो न विधते।
अन्यर्क्षे नाड़िवेधे च विवाहो वर्जितः सदा।
ऐकर्क्षे  चैक पापे च विवाहो मरणः प्रदः।।
ऐकर्क्षे भिन्न पापे च विवाहः शुभदायक ।।

एक नक्षत्र में उत्पन्न हुए वर-कन्या को नाड़ी का दोष नहीं है।  जो दूसरे नक्षत्रों का नाड़ी वेध हो तो विवाह सदा वर्जित है परन्तु एक नक्षत्र में एक ही चरण हो तो विवाह मरणदायक और एक नक्षत्र में अलग-अलग चरण हो तो विवाह शुभदायक है ।

लग्ने व्यये व पातालेयामित्रे चाष्टमे कुजे ।
पत्नी हंति स्वभर्त्ता  भर्त्ता भार्यां विनाश्येत  ।।

यदि स्त्री के लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और व्यय स्थान में मंगल हो तो पुरुष की मृत्यु होती है इसलिए वर कन्या दोनों का मंगल होना आवश्यक है अन्यथा एक को कष्ट स्वाभाविक है ।

यामित्रे च यदा सौरिर्लग्ने वा हिबुकेऽथवा ।
अष्टमे द्वादशे चैव भौम दोषो न विद्यते ।।

यदि लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में शनि हो तो मंगल का दोष नहीं रहता ।

शानिभौमोऽथवा कश्चित् पापो वा तादृशो भवेत् ।
तेप्नेव भवनेप्वेव भौम दोष विनाशकृत।।

यदि वर या कन्या किसी एक के मंगल हो और दूसरे की कुंडली में मंगल न होकर मंगल के स्थान पर शनि या राहू पाप ग्रह हो तो मंगल दोष नहीं रहता।

न वर्ग वर्णों न गणो न योनि योनीर्द्धिद्धादशे नैवषडष्टक ।
तारा विरुद्धे नवपंचमेवा राशिश मैत्री शुभदे विवाह।।

वर और कन्या की राशियों के स्वामी एक हो व दोनों के स्वामियों की परस्पर मित्रता हो तो वर्णादि कूटों का दोष नहीं रहता।
इसी तरह नाड़ी दोष में यदि वर और कन्या का नक्षत्र भिन्न-भिन्न हो किन्तु राशि एक है या दोनों का नक्षत्र एक हो और राशि भिन्न-भिन्न हो तो नाड़ी दोष नहीं होता।
यदि दोनों ही एक राशि और एक ही नक्षत्र हो तो विवाह शुभ नहीं होता।
किन्तु नक्षत्र में भिन्न-भिन्न चरण होने से अति आवश्यक हो तो शुभ रहेगा।

वरस्य पंचमे कन्या, कन्याया नवमेवरः।
एतत् त्रिकोणकं ग्रहमं पुत्र पौत्र सुखावहम।
मरण पितु मात्रोश्च सन्ग्राह्मं नवपंचकम् ।।
षड्ष्टके भवेन मृत्युर्यत्नं तस्य विचारयेत ।।

वर की राशि से कन्या की राशि पंचम हो, कन्या की राशि से वर की नवम हो तो यह नवपंचम त्रिकोण शुभ है। यदि विपरीत हो यानि कन्या से पंचम वर की व वर से नवम कन्या की तो माता पिता को मृत्यु तुल्य कष्ट कहें ।

Friday, May 31, 2013

मांगलिक दोष के परिहार

'मुहूर्त दीपक',  'मुहूर्त पारिजात' तथा अन्य मानक ग्रंथों में मांगलिक योग या दोष के कुछ आत्म कुंडलीगत तथा कुछ पर कुंडलीगत परिहार बताए गए हैं। यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो और अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्न प्रकार हो तो कुजदोष स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है :-

  • यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो। 
  • यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो। 
  • यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो। 
  • मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो। 
  • यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो। 
  • यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा परकुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। 

इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो कुजदोष का परिहार करते हैं। अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए।

सौभाग्य की सूचिका भी है मंगली कन्या? 

कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादशभाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशमभाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्यभार्या तथा गुणवान व संतानवान बनाती है।

क्या कहता है आप का मंगल?

यह मांगलिक दोष कैसे बनता है? क्या मंगल ग्रह इतना भयावह है कि उसकी उपस्थिति से जन्म पत्रिका श्रापित हो जाती है?  जब मंगल ग्रह जन्म कुण्डली के लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक को मांगलिक कहा जाता है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। इसी प्रकार कुण्डली में जहाँ चन्द्र स्थित होता है अर्थात चन्द्र कुण्डली से लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें भाव में जब मंगल स्थित हो तो भी जातक को मांगलिक कहा जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि लग्न कुण्डली के बारह में से पांच भावों में यदि मंगल स्थित होंगे तो जातक  मांगलिक होगा। साथ ही इस लग्न कुण्डली में जहां चन्द्र स्थित है वहां से भी चन्द्र के साथ या उससे चौथे, या उसके सातवें, आठवें या बारहवें में यदि मंगल स्थित हो तो भी जातक मांगलिक कहलाएगा। अब इसे एक उदाहरण से समझते हैं।

कल्पना करते हैं एक कुण्डली का लग्न मेष है और चन्द्रमा तीसरे भाव अर्थात मिथुन में स्थित हैं। इस कुण्डली के 12 भावों में से मात्र 2 भाव (5वां व 11वां) बचे जहां मंगल स्थित हो तो जातक मांगलिक नहीं होगा, बाकी के बचे 10 भावों में से जहां कहीं भी मंगल स्थित होंगे तो जातक मांगलिक कहलाएगा। अब बताइये कि 12 भावों में से किसी एक भाव में तो मंगल उपस्थित होंगे ही और 12 भावों में से लगभग 10 भावों में उनकी उपस्थिति से जातक ‘मांगलिक’ कहलाएगा। इस ‘मांगलिक’ से बचने की कितनी कम संभावना है।

ज्योतिष के किसी भी शास्त्रीय ग्रंथ में मांगलिक या मांगलिक-दोष का वर्णन इस रूप में प्राप्त नहीं होता। विवाह हेतु  गुण मिलान इत्यादि के साथ इसका वर्णन कुछ एक ग्रंथों में बहुत सूक्ष्म वर्णित है जिस पर कालान्तर में कुछ शोध ग्रंथों में थोड़ा बहुत विस्तार दिखाई देता है किन्तु मांगलिक का जैसा रूप इस प्रकरण में महत्व प्राप्त कर गया ऐसा तो कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है। यह तो भ्रम का विस्तार ज्ञात होता है न कि ज्योतिष विज्ञान का। 

विवाह प्रकरण में ही मंगल ग्रह व मांगलिक शब्द का उपयोग या महत्व या चर्चा सुनाई देती है, ऐसा क्यों? जहां भी मांगलिक शब्द सुनने को मिलेगा उसका संदर्भ मात्र एवं मात्र विवाह ही होगा। इसका  ज्योतिषीय कारण है किन्तु उस कारण का या मंगल के विवाह-प्रकरण से संबंध का न तो कोई भयावह अर्थ है और न ही कोई अशुभ परिणाम। मंगल या मांगलिक का विवाह से संबंध किस प्रकार स्थापित होता है इसे समझने का प्रयास करते हैं।

लग्न यानि पहला भाव तनु भाव भी कहलाता है अर्थात् शरीर अथवा स्वयं।  इस से सप्तम यानि सातवां भाव भार्या स्थान कहलाता है अर्थात् जीवन संगिनी या फिर जीवन संगी का स्थान। यह दोनों ही भाव विवाह से सम्बंधित हो गए अर्थात् लग्न या तनु भाव एवं सप्तम या भार्या भाव। पहला स्वयं का और दूसरा जीवन साथी का। 

इस के पश्चात् मंगल के विषय में भी कुछ प्रमुख तथ्य जान लेते हैं। पहला तो यह कि ज्योतिष विज्ञानं में जो दो श्रेणियां वर्णित हैं - पुण्य ग्रह और पाप ग्रह, उन में मंगल 'पाप ग्रह' की श्रेणी में आता है। दूसरा तथ्य मंगल के विषय में यह है कि अन्य ग्रहों की भांति सातवीं दृष्टि के अतिरिक्त मंगल की चतुर्थ एवं अष्टम दृष्टि भी है।

अब इन तथ्यों को मांगलिक बनाने वाले कारणों के साथ रखते हैं अर्थात् यदि मंगल लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें स्थान पर हो तो मांगलिक कहलाता है। इस कथन को ऊपर दिए तथ्यों पर कसेंगे तो इन सब का आपस में सम्बन्ध दिखाई देगा।

- मंगल एक पाप ग्रह है।
_ लग्न में बैठकर मंगल अपने से सातवें भाव अर्थात् भार्या स्थान को देखता है।
- चौथे स्थान पर बैठकर मंगल अपनी विशेष चौथी दृष्टि से सप्तम अर्थात् भार्या स्थान को देखता है।
- सप्तम स्थान में स्थित मंगल भार्या भाव पर ही बैठा है।
- अष्टम स्थान में स्थित मंगल अपने से सप्तम अर्थात दूसरे भाव को देखता है जो सप्तम भाव का आयु स्थान   
 है। (सप्तम से अष्टम)।
- द्वादश भाव में स्थित मंगल अपनी विशेष अष्टम दृष्टि से सप्तम भाव को देखता है।

उपरोक्त सभी कारणों से स्पष्ट है कि मंगल जो कि एक पाप ग्रह है वह लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव से सप्तम स्थान (जो कि जीवन साथी का भाव है) को किसी न किसी रूप में स्पष्ट व सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इसीलिए इन भावों में मंगल के बैठने पर मंगल का संबंध विवाह से जुड़ता है एवं जातक मांगलिक कहलाता है।

Sunday, May 26, 2013

शकट योग

जैसे कुण्डली मे उपस्थित शुभ योग के परिणामस्वरूप शुभ फल की प्राप्ति होती है उसी प्रकार कुण्डली में अशुभ योग होने पर व्यक्ति को उसका अशुभ परिणाम भी भोगना पड़ता है। 

अशुभ योगों में से एक है "शकट योग" 

इस योग में व्यक्ति को जीवन भर असफलताओं का सामना करना होता है. अगर इस योग को भंग करने वाला कोई ग्रह योग कुंडली में न हो।

शकट पुल्लिंग शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ गाड़ी होता है| गाड़ी पहिये पर चलती है, पहिया जिस प्रकार घूमता है उसी तरह से जिनकी कुंडली में शकट योग बनता है उनके जीवन में उतार चढ़ाव लगा रहता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह योग जिनकी कुंडली में बनता है वो भले ही आमिर घराने में पैदा हुए हो पर उन्हें गरीबी और तकलीफों का सामना करना पड़ता है अगर किसी भी प्रकार से यह योग भंग नहीं होता हो। 

शकट योग ग्रह स्थिति

शकट योग कुंडली में तब बनता है जबकि सभी ग्रह प्रथम और सप्तम भाव में उपस्थित हों। इसका अलावा गुरु और चन्द्र कि स्थिति के अनुसार भी यह योग बनता है। चंद्रमा से गुरु जब षष्टम या अष्टम भाव में होता है और गुरु लग्न केंद्र से बाहर रहता है तब जन्मपत्री में यह अशुभ योग बनता है। इस योग के होने पर व्यक्ति को अपमान, आर्थिक कष्ट, शारीरिक पीड़ा, मानसिक दंश मिलता है। जो व्यक्ति इस योग से पीड़ित होते हैं उनकी योग्यता को सम्मान नहीं मिल पता है। 

शकट योग भंग 

अगर आपकी कुंडली में शकट योग है तो इसके लिए आप को परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि एक पुरानी कहावत है कि प्रकृति अगर आप को बीमार बनाती है तो इसका इलाज़ भी स्वयं ही करती है। इसी तरह कुछ ग्रह स्थिति के कारण आपकी कुंडली में अगर अशुभ शकट योग बन रहा है तो शुभ ग्रह स्थिति आप का बचाव भी करती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार चन्द्रमा बलवान एवं मजबूत स्थिति में होने पर व्यक्ति शकट योग में आने वाली परेशानियों और मुश्किलों से घबराता नहीं है और अपनी मेहनत और कर्तव्य निष्ठा से मान और सम्मान के साथ जीवन के सुख को प्राप्त करता है। लग्नेश और भाग्येश के लग्न में मौजूद होने पर जीवन में उतार चढ़ाव के बावजूद व्यक्ति मान सम्मान के साथ जीता है। 

जिनकी कुंडली में चंद्रमा पर मंगल की दृष्टि होती है उनका शकट योग भंग हो जाता है। षड्बल में गुरु अगर चंद्रमा से मजबूत स्थिति में होता है अथवा चन्द्रमा उच्च राशि या स्वराशि में हो तो यह अशुभ योग प्रभावहीन हो जाता है। राहू अगर कुंडली में चन्द्रमा के साथ युति बनाता है या फिर गुरु पर राहू की दृष्टि तो शकट योग का अशुभ प्रभाव नहीं भोगना पड़ता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में लग्न स्थान से चंद्रमा या गुरु केंद्र में हो या फिर शुक्र चन्द्र की युति हो उन्हें शकट योग में भी धन लाभ, सफलता एवं उन्नति मिलती है. इसी प्रकार कि समान स्थिति तब भी होती है जबकि चंद्रमा वृषभ, मिथुन, कन्या या तुला राशि में हो और कर्क राशि में बुध शुक्र की युति बन रही हो।