Friday, May 31, 2013

मांगलिक दोष के परिहार

'मुहूर्त दीपक',  'मुहूर्त पारिजात' तथा अन्य मानक ग्रंथों में मांगलिक योग या दोष के कुछ आत्म कुंडलीगत तथा कुछ पर कुंडलीगत परिहार बताए गए हैं। यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो और अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्न प्रकार हो तो कुजदोष स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है :-

  • यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो। 
  • यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो। 
  • यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो। 
  • मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो। 
  • यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो। 
  • यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा परकुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। 

इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो कुजदोष का परिहार करते हैं। अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए।

सौभाग्य की सूचिका भी है मंगली कन्या? 

कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादशभाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशमभाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्यभार्या तथा गुणवान व संतानवान बनाती है।

क्या कहता है आप का मंगल?

यह मांगलिक दोष कैसे बनता हैक्या मंगल ग्रह इतना भयावह है कि उसकी उपस्थिति से जन्म पत्रिका श्रापित हो जाती है जब मंगल ग्रह जन्म कुण्डली के लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक को मांगलिक कहा जाता है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। इसी प्रकार कुण्डली में जहाँ चन्द्र स्थित होता है अर्थात चन्द्र कुण्डली से लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें भाव में जब मंगल स्थित हो तो भी जातक को मांगलिक कहा जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि लग्न कुण्डली के बारह में से पांच भावों में यदि मंगल स्थित होंगे तो जातक  मांगलिक होगा। साथ ही इस लग्न कुण्डली में जहां चन्द्र स्थित है वहां से भी चन्द्र के साथ या उससे चौथे, या उसके सातवें, आठवें या बारहवें में यदि मंगल स्थित हो तो भी जातक मांगलिक कहलाएगा। अब इसे एक उदाहरण से समझते हैं।

कल्पना करते हैं एक कुण्डली का लग्न मेष है और चन्द्रमा तीसरे भाव अर्थात मिथुन में स्थित हैं। इस कुण्डली के 12 भावों में से मात्र 2 भाव (5वां व 11वां) बचे जहां मंगल स्थित हो तो जातक मांगलिक नहीं होगा, बाकी के बचे 10 भावों में से जहां कहीं भी मंगल स्थित होंगे तो जातक मांगलिक कहलाएगा। अब बताइये कि 12 भावों में से किसी एक भाव में तो मंगल उपस्थित होंगे ही और 12 भावों में से लगभग 10 भावों में उनकी उपस्थिति से जातक मांगलिककहलाएगा। इस मांगलिकसे बचने की कितनी कम संभावना है।

ज्योतिष के किसी भी शास्त्रीय ग्रंथ में मांगलिक या मांगलिक-दोष का वर्णन इस रूप में प्राप्त नहीं होता। विवाह हेतु  गुण मिलान इत्यादि के साथ इसका वर्णन कुछ एक ग्रंथों में बहुत सूक्ष्म वर्णित है जिस पर कालान्तर में कुछ शोध ग्रंथों में थोड़ा बहुत विस्तार दिखाई देता है किन्तु मांगलिक का जैसा रूप इस प्रकरण में महत्व प्राप्त कर गया ऐसा तो कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है। यह तो भ्रम का विस्तार ज्ञात होता है न कि ज्योतिष विज्ञान का। 

विवाह प्रकरण में ही मंगल ग्रह व मांगलिक शब्द का उपयोग या महत्व या चर्चा सुनाई देती है, ऐसा क्यों? जहां भी मांगलिक शब्द सुनने को मिलेगा उसका संदर्भ मात्र एवं मात्र विवाह ही होगा। इसका  ज्योतिषीय कारण है किन्तु उस कारण का या मंगल के विवाह-प्रकरण से संबंध का न तो कोई भयावह अर्थ है और न ही कोई अशुभ परिणाम। मंगल या मांगलिक का विवाह से संबंध किस प्रकार स्थापित होता है इसे समझने का प्रयास करते हैं।

लग्न यानि पहला भाव तनु भाव भी कहलाता है अर्थात् शरीर अथवा स्वयं।  इस से सप्तम यानि सातवां भाव भार्या स्थान कहलाता है अर्थात् जीवन संगिनी या फिर जीवन संगी का स्थान। यह दोनों ही भाव विवाह से सम्बंधित हो गए अर्थात् लग्न या तनु भाव एवं सप्तम या भार्या भाव। पहला स्वयं का और दूसरा जीवन साथी का। 

इस के पश्चात् मंगल के विषय में भी कुछ प्रमुख तथ्य जान लेते हैं। पहला तो यह कि ज्योतिष विज्ञानं में जो दो श्रेणियां वर्णित हैं - पुण्य ग्रह और पाप ग्रह, उन में मंगल 'पाप ग्रह' की श्रेणी में आता है। दूसरा तथ्य मंगल के विषय में यह है कि अन्य ग्रहों की भांति सातवीं दृष्टि के अतिरिक्त मंगल की चतुर्थ एवं अष्टम दृष्टि भी है

अब इन तथ्यों को मांगलिक बनाने वाले कारणों के साथ रखते हैं अर्थात् यदि मंगल लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें स्थान पर हो तो मांगलिक कहलाता है। इस कथन को ऊपर दिए तथ्यों पर कसेंगे तो इन सब का आपस में सम्बन्ध दिखाई देगा

- मंगल एक पाप ग्रह है।
लग्न में बैठकर मंगल अपने से सातवें भाव अर्थात् भार्या स्थान को देखता है।
- चौथे स्थान पर बैठकर मंगल अपनी विशेष चौथी दृष्टि से सप्तम अर्थात् भार्या स्थान को देखता है।
- सप्तम स्थान में स्थित मंगल भार्या भाव पर ही बैठा है।
- अष्टम स्थान में स्थित मंगल अपने से सप्तम अर्थात दूसरे भाव को देखता है जो सप्तम भाव का आयु स्थान   
 है। (सप्तम से अष्टम)।
- द्वादश भाव में स्थित मंगल अपनी विशेष अष्टम दृष्टि से सप्तम भाव को देखता है।

उपरोक्त सभी कारणों से स्पष्ट है कि मंगल जो कि एक पाप ग्रह है वह लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव से सप्तम स्थान (जो कि जीवन साथी का भाव है) को किसी न किसी रूप में स्पष्ट व सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इसीलिए इन भावों में मंगल के बैठने पर मंगल का संबंध विवाह से जुड़ता है एवं जातक मांगलिक कहलाता है।

Sunday, May 26, 2013

शकट योग

जैसे कुण्डली मे उपस्थित शुभ योग के परिणामस्वरूप शुभ फल की प्राप्ति होती है उसी प्रकार कुण्डली में अशुभ योग होने पर व्यक्ति को उसका अशुभ परिणाम भी भोगना पड़ता है। 

अशुभ योगों में से एक है "शकट योग" 

इस योग में व्यक्ति को जीवन भर असफलताओं का सामना करना होता है. अगर इस योग को भंग करने वाला कोई ग्रह योग कुंडली में न हो।

शकट पुल्लिंग शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ गाड़ी होता है| गाड़ी पहिये पर चलती है, पहिया जिस प्रकार घूमता है उसी तरह से जिनकी कुंडली में शकट योग बनता है उनके जीवन में उतार चढ़ाव लगा रहता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह योग जिनकी कुंडली में बनता है वो भले ही आमिर घराने में पैदा हुए हो पर उन्हें गरीबी और तकलीफों का सामना करना पड़ता है अगर किसी भी प्रकार से यह योग भंग नहीं होता हो। 

शकट योग ग्रह स्थिति

शकट योग कुंडली में तब बनता है जबकि सभी ग्रह प्रथम और सप्तम भाव में उपस्थित हों। इसका अलावा गुरु और चन्द्र कि स्थिति के अनुसार भी यह योग बनता है। चंद्रमा से गुरु जब षष्टम या अष्टम भाव में होता है और गुरु लग्न केंद्र से बाहर रहता है तब जन्मपत्री में यह अशुभ योग बनता है। इस योग के होने पर व्यक्ति को अपमान, आर्थिक कष्ट, शारीरिक पीड़ा, मानसिक दंश मिलता है। जो व्यक्ति इस योग से पीड़ित होते हैं उनकी योग्यता को सम्मान नहीं मिल पता है। 

शकट योग भंग 

अगर आपकी कुंडली में शकट योग है तो इसके लिए आप को परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि एक पुरानी कहावत है कि प्रकृति अगर आप को बीमार बनाती है तो इसका इलाज़ भी स्वयं ही करती है। इसी तरह कुछ ग्रह स्थिति के कारण आपकी कुंडली में अगर अशुभ शकट योग बन रहा है तो शुभ ग्रह स्थिति आप का बचाव भी करती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार चन्द्रमा बलवान एवं मजबूत स्थिति में होने पर व्यक्ति शकट योग में आने वाली परेशानियों और मुश्किलों से घबराता नहीं है और अपनी मेहनत और कर्तव्य निष्ठा से मान और सम्मान के साथ जीवन के सुख को प्राप्त करता है। लग्नेश और भाग्येश के लग्न में मौजूद होने पर जीवन में उतार चढ़ाव के बावजूद व्यक्ति मान सम्मान के साथ जीता है। 

जिनकी कुंडली में चंद्रमा पर मंगल की दृष्टि होती है उनका शकट योग भंग हो जाता है। षड्बल में गुरु अगर चंद्रमा से मजबूत स्थिति में होता है अथवा चन्द्रमा उच्च राशि या स्वराशि में हो तो यह अशुभ योग प्रभावहीन हो जाता है। राहू अगर कुंडली में चन्द्रमा के साथ युति बनाता है या फिर गुरु पर राहू की दृष्टि तो शकट योग का अशुभ प्रभाव नहीं भोगना पड़ता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में लग्न स्थान से चंद्रमा या गुरु केंद्र में हो या फिर शुक्र चन्द्र की युति हो उन्हें शकट योग में भी धन लाभ, सफलता एवं उन्नति मिलती है. इसी प्रकार कि समान स्थिति तब भी होती है जबकि चंद्रमा वृषभ, मिथुन, कन्या या तुला राशि में हो और कर्क राशि में बुध शुक्र की युति बन रही हो। 

Monday, March 4, 2013

बुरी फेंग शुई का घर में प्रवेश कैसे होता है?

बुरी फेंग शुई का प्रवेश घर के अंदर, घर की संरचना तथा अनावश्यक वस्तुओं को रकने से भी होता है. वस्तुओं को ग़लत जगह रखने से भी बुरी फेंग शुई का प्रवेश होता है. बुरी फेंग शुई प्रवेश करने के कुछ उदाहरण इस प्रकार से हैं :-
  • मकान के मुख्य द्वार के आगे शौचालय या रसोईघर का दरवाजा होना 
  • मुख्य द्वार के आगे दीवार या खम्भा होना 
  • सोने वाले स्थान के उपर बीम होना 
  • मुख्य दीवार के आगे दर्पण होना 
  • घर के अंदर घुमावदार सीढ़ियाँ होना 
  • सबसे ऊपरी मंजिल के फ्लैट में रहना 
  • सूखे फूलों को घर में रखना 
  • अलमारी का दरवाजा खुला रखना 
  • शौचालय के दरवाजों को खुला रखना 
  • हिंसात्मक चित्र घर में लगाना 
  • शयन कक्ष में शीशा होना 
  • दरवाजे के सामने सिर या पैर कर के सोना 
  • शयन कक्ष में मछली घर होना 
  • झाड़ू को खुली जगह रखना 
  • अनावश्यक वस्तुओं को घर में रखना 
  • किचन में गैस का चूल्हा और सिंक का एक साथ होना 
  • चाकू, कैंची खुले रखना 
  • खुली खिड़की तथा दरवाजे की तरफ पीठ करके बैठना
  • नल की टंकी या टूटी से पानी का फालतू बहना 
  • फर्नीचर का तिकोना होना 
  • खाली दीवार की तरफ मुंह करके बैठना या सिर करके सोना 
  • फैक्स, टेलीफोन, कंप्यूटर का अनुचित स्थान पर होना 
  • टूटे हुए शीशे घर में रखना 
  • कैक्टस के पौधे घर के अंदर होना
  • डूबता जहाज़ या तिकोने पहाड़ों के चित्र का होना 
  • पलंग के अंदर अनावश्यक वस्तुएं संभाल कर रखना 

Friday, January 4, 2013

वक्री ग्रह - कितने शुभ कितने अशुभ

सारावली के अनुसार वक्री ग्रह सुखकारक व बलहीन अथवा शत्रु राशिगत वक्री ग्रह अकारण भ्रमण देने वाला तथा अरिष्टकारक सिद्ध होता है.

संकेतनिधि के अनुसार वक्री मंगल अपने स्थान से तृतीय भाव के प्रभाव को दर्शाता है. इसी प्रकार गुरु अपने से पंचम, बुध चतुर्थ, शुक्र सप्तम तथा शनि नवम भाव के फल प्रदान करता है.

जातक पारिजात में स्पष्ट लिखा है कि वक्री ग्रह के अतिरिक्त शत्रु भाव में किसी अन्य ग्रह का भ्रमण अपना एक तिहाई फल खो देता है.

उत्तर कलामृत के अनुसार वक्री ग्रह के समय कि स्थिति ठीक वैसी हो जाती है जैसे कि ग्रह के अपने उच्च अथवा मूल त्रिकोण राशि में होने से होती है.

फल दीपिका में मंत्रेश्वर का कथन है कि ग्रह कि वक्री गति उस ग्रह विशेष के चेष्टाबल को बढ़ाती है.

कृष्णमूर्ति पद्धति का कथन है कि प्रश्न के समय संबंधित ग्रह का वक्री ग्रह के नक्षत्र अथवा उसमें रहना नकारात्मक उत्तर का प्रतीक है. यदि कोई संबंधित ग्रह वक्री नहीं है परन्तु वक्री ग्रह के नक्षत्र में प्रश्न के समय स्थित है तो वह कार्य तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक कि वह ग्रह वक्री है.

आचार्य वेंकटेश कि सर्वार्थ चिंतामणि में वक्री ग्रह कि दशा, अंतर्दशा के फल का सुंदर विवरण मिलता है - 
मंगल ग्रह यदि वक्री है तथा उसकी दशा अथवा अंतर्दशा चल रही हो तो व्यक्ति अग्नि, शत्रु आदि के भय से त्रस्त रहेगा, वह ऐसे में एकांतवास अधिक चाहेगा.

वक्री बुध अपनी दशा अंतर्दशा में शुभ फल देता है. वह पत्नी, परिवार आदि का सुख भोगता है. धार्मिक कार्यों में उसकी रूचि जागृत होती है.

वक्री गुरु पारिवारिक सुख, समृद्धि देता  है तथा शत्रु पक्ष पर विजय करवाता है. व्यक्ति ऐश्वर्यमय जीवन जीता है.

वक्री शुक्र मान-सम्मान का द्योतक है. वाहन सुख तथा सुख-सुविधा के अनेक साधन वह जुटा पता है.

वक्री शनि अपनी दशा अंतर्दशा में अपव्यय करवाता है, व्यक्ति के प्रयासों में सफलता नहीं मिलने देता. ऐसा शनि मानसिक तनाव, दुःख आदि देता है.

अनेक ग्रंथो के अध्ययन-मनन के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि कोई ग्रह वक्री है और साथ ही साथ बलहीन भी है तो फलादेश में वह बलवान सिद्ध होगा. इसी प्रकार बलवान ग्रह यदि वक्री है तो अपनी दशा अंतर्दशा में निर्बल सिद्ध होगा. शुभाशुभ का फलादेश अन्य कारकों पर भी निर्भर करेगा यह कदापि नहीं भूलना चाहिए.

अनेक बार अनुभव में आया है कि ग्रह कि वक्रता का सुप्रभाव अथवा दुष्प्रभाव उसी ग्रह के लिए गणना किया जाता है जहाँ  पर वह स्थित है यह अशुद्ध गणना है. वक्रता का शुभाशुभ फल उससे पहले वाले भाव से सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

देखने में आता है कि जब कोई ग्रह, मुख्य रूप से गुरु वक्री अथवा मार्गी होता है तो किसी न किसी व्यक्ति, देश, मौसम आदि को शुभ अथवा अशुभ रूप से प्रभावित अवश्य करता है. 

Friday, October 26, 2012

शुक्र से बनने वाले योग

ज्योतिष का यह सार्वभौमिक सिद्घांत है कि ग्रह के प्रभाव के अनुरूप वातावरण निर्माण होता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार अभी कलियुग का 5109 वां वर्ष चल रहा है तथा ४,२६,८९१ वर्ष बाकी हैं। इस समय कलियुग और शुक्र ग्रह की युति सौंदर्य के विश्वव्यापी बाजार के मूल में है। इन प्रतियोगिता में मिलने वाली सफलता ने युवतियों को फिल्म, टेलीविजन और विज्ञापन के बेशकीमती दरवाजे खोले हैं।
विश्लेषण से यह पता चलता है कि इन प्रतियोगिताओं में खुद को आजमाने वाली युवतियों पर शुक्र ग्रह का ही प्रभाव होता है। शुक्र ग्रह का संबंध सांसारिक सुखों से है। यह रास, रंग, भोग, ऐश्वर्य, आकर्षण तथा लगाव का कारक है। शुक्र दैत्यों के गुरु हैं और कार्य सिद्घि के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद के प्रयोग से भी नहीं चूकते। सौन्दर्य में शुक्र की सहायता के बिना सफलता असंभव है।
जन्म कुण्डली में शुक्र का प्रभाव जन्म लग्न पर होने से व्यक्ति आकर्षक, सौन्दर्य, घुंघराले बालों वाला, स्वच्छताप्रिय, रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करने का शौकीन होता है। आजकल फैशन से वशीभूत ऐसे वस्त्रों का प्रचलन स्त्री वर्ग में बढ़ रहा है जो शरीर को ढंकने में अपर्याप्त होते हैं। यह संभवत: शीत प्रधान शुक्र-चन्द्र के प्रभाव क्षेत्रों की देन है। महिला वर्ग का चर्म परिधान शुक्र-चन्द्र एवं मंगल की परतों से बना होता है अर्थात् कोमलता तेज, रक्तिमा एवं सौन्दर्य का सम्मिश्रण ही उसकी विशेष आकर्षण शक्ति होती है।
शुक्र ग्रह से प्रभावित युवतियां ही प्रतियोगिता के अंतिम राउंड तक पहुंच पाती है। कुछ ग्रह ऐसे भी होते हैं जो कुछ दूर तक तो युवतियों का सहयोग करते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे प्रतिभागियों के ग्रह भारी पड़ते हैं, कमजोर ग्रह वाली युवतियां पिछड़ने लगती है। यह भी ज्ञात हुआ है कि प्रतियोगिताओं के निर्णायक भी शनि, मंगल, गुरु जैसे ग्रहों से प्रभावित होते हैं। सौन्दर्य शास्त्र का विधान पूरी तरह से ज्योतिषकर्म और चिकित्सकों के पेशे जैसा ही है। अगर किसी निर्णायक को सौन्दर्य ज्ञान नहीं हो तो वह निर्णय भी नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक शुक्र से प्रभावित तो होते हैं लेकिन उन पर गुरु-चंद्रमा का भी प्रभाव होता है जो उन्हें विवेकवान बनाता है।
जन्म कुण्डली में तृतीय एवं एकादश भाव स्त्री का वक्षस्थल माना जाता है। गुरु-शुक्र इन भावों में बैठे हों या ये दोनों ग्रह इन्हें देख रहे हों, साथ में बली भी हों तो यह भाव सुन्दर, पुष्ट एवं आकर्षक होता है और आंतरिक सौन्दर्य को लग्न के अनुसार परिधान सुशोभित करते हैं। पंचम एवं नवम भाव कटि प्रदेश से नीचे का होता है जो स्त्री को शनि गुरु प्रधान कृषता तथा स्थूलता सुशोभित करती है। अभिनय एवं संगीत में दक्षता प्रदान करने वाला ग्रह शुक्र ही है। शुक्र सौन्दर्य, प्रेम, कलात्मक अभिरुचि, नृत्य, संगीतकला एवं बुद्घि प्रदान करता है।
शुक्र यदि बली होकर नवम, दशम, एकादश भाव अथवा लग्न से संबंध करें तो जातक सौन्दर्य के क्षेत्र में धन-मान और यश प्राप्त करता है। लग्न जातक का रूप, रंग, स्वभाव एवं व्यक्तित्व को दर्शाता है। चतुर्थभाव या चन्द्रमा जनता का प्रतिनिधित्व करता है। पंचम भाव बुद्घि, रुचि एवं मित्र बनाने की क्षमता को दर्शाता है। तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग देता है। मीन राशि के शुक्र कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है।

योग संयोग 

तृतीय भाव सृजनात्मक योग्यता का सूचक है। इसका बली होना एवं लग्न से संबंध सौन्दर्यता में निपुणता लाता है। कुशल अभिनय के लिए चंद्रमा एवं संवाद अदायगी के लिए बुध बली हो तथा शुभ स्थानों में चन्द्र-बुध का होना अभिनय, संगीत एवं नृत्य इत्यादि में सफलता दिलाता है।

जन्म लग्न, चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न से दशम भाव पर शुक्र का प्रभाव सफलता का योग बनाता है। बुध एवं शुक्र का बली होकर शुभ स्थानों (विशेषकर लग्न, पंचम दशम या एकादश), भाव से संबंध सौन्दर्य क्षेत्र में सफलता देता है।

चन्द्र कुण्डली में लग्नेश-धनेश की युति लाभ-स्थान में धन वृद्घि का संकेत देती है। साथ ही शुक्र व बुध का दशम व दशमेश से संबंध जातक को भाग्य बल प्रदान कर सफलता एवं प्रसिद्घि देता है।

चन्द्र, शुक्र एवं बुध का संबंध चतुर्थभाव, चतुर्थेश धन भाव व धनेश, पंचम भाव व पंचमेश, नवमभाव व नवमेश से होने पर सफलता के योग।

पंच महापुरुष योगों के अन्तर्गत शश योग (उच्च का शनि केन्द्र में) एवं मालव्य योग (उच्च व स्वराशि का केन्द्र में) एवं लग्नेश का स्वराशि व उच्च राशि का होना।

कुण्डली में सभी शुभ ग्रह लग्न में एवं सभी पाप ग्रह अष्टम भाव में होने पर यह योग यश का भागीदार बनाता है।

माला योग

कुण्डली में द्वितीय, नवम और एकादश के स्वामी ग्रह अपने-अपने स्थान पर होने से यह योग बनता है जो जातक को प्रसिद्धि के द्वार खोलता है।

श्रीनाथ योग

कुण्डली में सप्तमेश दशम स्थान में और दशमेश के साथ भाग्येश हो तो श्रीनाथ योग बनता है। कुछ विद्वानों के अनुसार दशमेश उच्च का होने पर ही यह योग बन जाता है, जो जातक को आकर्षक, सुखी और सम्माननीय बनाता है।

आंतरिक परिधान के कारक शुक्र, चंद्र और केतु हैं तथा बाह्य परिधान के कारक सूर्य, राहु, बुध, गुरु व शनि हैं। अलग-अलग चन्द्र राशियों एवं सूर्य राशियों के अनुसार अपने प्रभाव दिखाते हैं।

इस क्षेत्र में सफलता के लिए बुद्घि, चातुर्य, कला-कौशल के साथ कठोर परिश्रम जरूरी है। इसके लिए लग्न, चतुर्थ व पंचम भाव बली होना महžवपूर्ण है। सिंह राशि का शुक्र अभिनय कौशल देता है।

तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग प्रदान करता है। मीन राशि का शुक्र व्यक्ति की कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है।

Wednesday, October 24, 2012

ग्रहों के वर्जित दान एवं कार्य

अक्सर अपने दैनिक जीवन में प्राय: हम एक कहावत विभिन्न अर्थों में सुनते हैं कि "नेकी कर दरिया में डाल" या नेकी करो और भूल जाओ. कभी-कभी अच्छे शब्दों में भी सुनते हैं, कि हम किसी के लिए कितना ही अच्छा क्यों न करें लेकिन बदले में हमेशा बुराई ही हाथ लगती है.

एक व्यक्ति किसी गरीब को भोजन कराता है, तो खाने वाला बीमार पड जाता है. किसी नें किसी को धन उधार दिया तो उसकी वसूली के समय देनदार नें कोई गलत कदम उठा लिया और बेचारा लेनदार बिना वजह मुसीबत में फँस गया. किसी की मदद करने चले तो उल्टा स्वयं ही अपने लिए मुसीबत मोल ले बैठे. अमूमन ऎसी सैकडों प्रकार की घटनायें आये दिन किसी न किसी प्रकार से किसी न किसी के साथ घटती ही रहती हैं.

दरअसल यह सब निर्भर करता है हमारी जन्मकुँडली में बैठे ग्रहों पर, जो यह संकेत करते हैं कि किस वस्तु का दान या त्याग करना अथवा कौन से कार्य हमारे लिए लाभदायक होगें और कौन सी चीजों के दान/त्याग अथवा कार्यों से हमें हानि का सामना करना पडेगा. इसकी जानकारी निम्नानुसार है.

जो ग्रह जन्मकुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, उनसे सम्बन्धित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए.

सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिँह राशि में होने पर अपनी स्वराशि का होता है.

अत: आपकी जन्मकुंडली में उक्त किसी राशि में हो तो:-

* लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें.

* गुड, आटा, गेहूँ, ताँबा आदि किसी को न दें.

* खानपान में नमक का सेवन कम करें. मीठे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए.

चन्द्र वृष राशि में उच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है. यदि आपकी जन्मकुंडली में ऎसी स्थिति में हो तो :-

* दूध, चावल, चाँदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें.

* माता अथवा मातातुल्य किसी स्त्री का कभी भूल से भी दिल न दुखायें अन्यथा मानसिक तनाव,   

  अनिद्रा एवं किसी मिथ्या आरोप का भाजन बनना पडेगा.

* किसी नल, टयूबवेल, कुआँ, तालाब अथवा प्याऊ निर्माण में कभी आर्थिक रूप से सहयोग न करें.

मंगल
मेष या वृश्चिक राशि में हो तो स्वराशि का तथा मकर राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--* मसूर की दाल, मिष्ठान अथवा अन्य किसी मीठे खाद्य पदार्थ का दान नहीं करना चाहिए.

* घर आये किसी मेहमान को कभी सौंफ खाने को न दें अन्यथा वह व्यक्ति कभी किसी अवसर पर आपके खिलाफ ही कडुवे वचनों का प्रयोग करेगा.

* किसी भी प्रकार का बासी भोजन (अधिक समय पूर्व पकाया हुआ) न तो स्वयं खायें और न ही किसी अन्य को खाने के लिए दें.


बुध मिथुन राशि में तो स्वगृही तथा कन्या राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में बुध उपरोक्त वर्णित किसी स्थिति में है तो :--* हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए.

* साबुत मूँग, पैन-पैन्सिल, पुस्तकें, मिट्टी का घडा, मशरूम आदि का दान न करें अन्यथा सदैव रोजगार और धन सम्बन्धी समस्यायें बनी रहेंगी.

* न तो घर में मछलियाँ पालें और न ही मछलियों को कभी दाना डालें.

बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में :--

* पीले रंग के पदार्थों का दान वर्जित है.

* सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुएं आदि का दान नहीं करना चाहिए. अन्यथा "घर का जोगी जोगडा, आन गाँव का सिद्ध" जैसी हालात होने लगेगी अर्थात मान-सम्मान में कमी रहेगी.

* घर में कभी कोई लतादार पौधा न लगायें.



शुक्र
जब जन्मपत्रिका में वृष या तुला राशि में हो स्वराशि तथा मीन राशि में हो तो उच्च भाव का होता है. अत ऎसी स्थिति में:--

* ऎसे व्यक्ति को श्वेत रंग के सुगन्धित पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यक्ति के भौतिक सुखों में न्यूनता पैदा होने लगती है.

* नवीन वस्त्र, फैशनेबल वस्तुएं, कास्मेटिक या अन्य सौन्दर्य वर्धक सामग्री, सुगन्धित द्रव्य, दही, मिश्री, मक्खन, शुद्ध घी, इलायची आदि का दान न करें अन्यथा अकस्मात हानि का सामना करना पडता है.


शनि
यदि मकर या कुम्भ राशि में हो तो स्वगृही होता है तथा तुलाराशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी दशा में :--

* काले रंग के पदार्थों का दान न करें.

* लोहा, लकडी और फर्नीचर, तेल या तैलीय सामग्री, बिल्डिंग मैटीरियल आदि का दान/त्याग न करें.


* भैंस अथवा काले रंग की गाय, काला कुत्ता आदि न पालें.

राहु यदि कन्या राशि में हो तो स्वराशि का तथा वृष (ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं मिथुन (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--

* नीले, भूरे रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए.

* मोरपंख, नीले वस्त्र, कोयला, जौं अथवा जौं से निर्मित पदार्थ आदि का दान किसी को न करें अन्यथा ऋण का भार चढने लगेगा.

* अन्न का कभी भूल से भी अनादर न करें और न ही भोजन करने के पश्चात थाली में झूठन छोडें.


केतु
यदि मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा वृश्चिक (ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं धनु (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में केतु उपरोक्त स्थिति में है तो :--

* घर में कभी पक्षी न पालें अन्यथा धन व्यर्थ के कामों में बर्बाद होता रहेगा.


* भूरे, चित्र-विचित्र रंग के वस्त्र, कम्बल, तिल या तिल से निर्मित पदार्थ आदि का दान नहीं करना चाहिए.

* नंगी आँखों से कभी सूर्य/चन्द्रग्रहण न देंखें अन्यथा नेत्र ज्योति मंद पड जाएगी अथवा अन्य किसी प्रकार का नेत्र सम्बन्धी विकार उत्पन होने लगेगा.


मकान की लग्न कुंडली

जिस प्रकार व्यक्ति पर ग्रह-गोचर की स्थिति का प्रभाव पड़ता है, उसी तरह मकान की कुंडली को भी ग्रह प्रभावित करते हैं। मकान की प्रतिकूल ग्रह स्थिति होने पर ग्रह शांति कराने से लाभ संभव है।


जिस प्रकार व्यक्ति की जन्म कुंडली होती है, उसी तरह मकान की भी जन्म कुंडली बनती है। भवन की जन्म कुंडली दो प्रकार की होती है। एक गृहारंभ के समय की तथा दूसरी गृह प्रवेश के समय की। जो संबंध शरीर और आत्मा का है अथवा जो कंप्यूटर की भाषा में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का है, वही गृहारंभ कुंडली और गृह प्रवेश की कुंडली का है।

भौगोलिक भूभाग का नाम देश है जो मूर्त होता है। अपने देश के प्रति जुड़ा रहना, वहां की नागरिकता होना यही राष्ट्रीयता है। इसका आधार राष्ट्र है। शरीर का ढांचा जो दिखाई देता है, वह मूर्त है। लेकिन चेतन धर्मा आत्मा अमूर्त है। कंप्यूटर में जो कुछ ढांचा दिखाई देता है, वह हार्डवेयर है तथा जो कार्यों को गति देता है, वह अमूर्त है- सॉफ्टवेयर कहलाता है। भवन के विषय में भी यही बात चरितार्थ होती है। कहावत है पुरूष मकान बनाता है और महिला उसे आशियाना [निवास] बनाती है।

जिस समय भवन की आधारशिला रखी जाती है, उस समय की लग्न कुंडली ही भवन की जन्म कुंडली है। उस कुंडली के अष्टम भाव से उस भवन की आयु का निर्णय किया जाता है। यदि उस कुंडली के अष्टम से मंगल का संबंध है तो अग्नि भय से भवन नष्ट होना संभव है। इसी प्रकार यदि अष्टम भाव से शुक्र चंद्र का संबंध हो और ये ग्रह निर्बल हों तो अधिक वर्षा के कारण मकान को क्षति होना संभव है। यदि अष्टम भाव पर शनि की दृष्टि हो तो तूफान के कारण मकान को क्षति होगी। अष्टम भाव से राहु का संबंध मकान पर अतृप्त आत्मा के प्रभाव की ओर संकेत करता है। अर्थात घर में पितर दोष होता है। कुंडली में पराक्रम भाव [तृतीय स्थान] धर्म भाव [नवम स्थान] एवं लाभ भाव [एकादश भाव] से सौम्य ग्रहों का संबंध मकान की सुख-समृद्धि कारक होने का संकेत है। संतान भाव [पंचम स्थान] और नवम भाव का सौम्य ग्रहों से संबंध वंशवृद्धि का सूचक है। भवन की कुंडली में केंद्र [1-4-7-10] त्रिकोण [5-9] एवं तृतीय एकादश भाव में से किसी भाव में बृहस्पति का होना मकान को सौभाग्यशाली बनाता है।

मकान के गृह प्रवेश के लग्न का अपना महžव है। लग्न, मकान में रहने वालों का जीवन कैसा समृद्धिशाली होगा, इस ओर संकेत करता है। यदि गृह प्रवेश कुंडली के लग्न का स्वामी अथवा दशम भाव का स्वामी छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो मकान का स्वामी अपने मकान का उपयोग नहीं कर पाता है या तो मकान किराए पर चलता है अथवा मकान मालिक के द्वारा मकान विक्रय कर दिया जाता है। यदि मंगल की दृष्टि लग्न पर हो अथवा मंगल का चतुर्थ भाव से संबंध हो तो गृह प्रवेश के पश्चात भी मकान में और निर्माण कार्य अतिशीघ्र कराया जाता है। यदि चतुर्थ भाव का संबंध शुक्र से हो तो गृह प्रवेश के थोड़े से ही अंतराल के पश्चात मकान मालिक को विशेष प्रकार के [अधिक सुविधायुक्त] वाहन का सुख प्राप्त होता है। गृह प्रवेश कुंडली में यदि बृहस्पति केंद्र अथवा त्रिकोण में हो तो गृह प्रवेश के पश्चात तेरह मास में उस घर में विवाह संपन्न होता है। यदि गृह प्रवेश लग्न से षष्ठ, अष्टम अथवा व्यय भाव में मकान मालिक का जन्म लग्न अथवा जन्म राशि हो तो क्रमश: विवाद-शत्रुता, लड़ाई-झगड़ा, शारीरिक कष्ट एवं आर्थिक संकट से मकान मालिक को गुजरना पड़ता है। गृह प्रवेश लग्न से अष्टम अथवा द्वादश भाव में राहु की स्थिति मकान में रहने वालों को पितर बाधा से पीडि़त करती है। जिस प्रकार व्यक्ति पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, उसी प्रकार मकान की कुंडली पर भी पाप ग्रहों का प्रभाव पड़ता है। ऎसी स्थिति में वास्तु शांति या ग्रह शांति कराने से लाभ होता है।