Saturday, November 23, 2013

योगिनी दशा

योगिनी आठ होती हैं। योगिनी महादशा का एक सम्पूर्ण चक्र ३६ वर्ष में पूरा हो जाता है। इसके बाद इसकी पुनरावृत्ति होती है। केतु को छोड़कर बाकी सभी ग्रह एक-एक योगिनी के स्वामी हैं। योगिनी दशा की कुल अवधि ३६ वर्ष है जबकि विंशोत्तरी में दशा की अवधि १२० वर्ष की है. अन्य शब्दों में यदि मनुष्य की आयु १२० वर्ष मानें तो योगिनी दशा के तीन चक्र पूरे हो जाएंगे और चौथे चक्र की दशाएं जीवन के अंत समय में चल रही होंगी।

प्रत्येक योगिनी दशा के जन्म नक्षत्र तथा स्वामी निश्चित हैं, जो निम्न तालिका से स्पष्ट हो जाएंगे :-


भ्रामरी दशा अश्विनी नक्षत्र में होती है। इसके बाद सभी नक्षत्रों में एक-एक योगिनी दशा होती है। अतः ८-८ जन्म नक्षत्रों के बाद पुनः जन्म नक्षत्रों की आवृत्ति उसी दशा में होती है, जैसे भ्रामरी क्रमांक १, ९, १७ व २५ में प्रथम ३  (मंगला, पिंगला तथा धन्या)  एवं अंतिम २ (सिद्धा व संकटा ) प्रत्येक दशा ३-३ नक्षत्रों में होती है, जबकि बीच की ३ (भ्रामरी, भद्रा तथा उल्का दशाएं ४-४ नक्षत्रों में होती हैं। 

योगिनी दशाओं के नाम और फल निम्न प्रकार हैं :-
  1. मंगला (चंद्रमा) अवधि १ वर्ष : इस दशा में मन पवित्र होता है तथा धार्मिक कार्यों में सहज रूचि होती है. देव पूजन, सत्संग, धर्म चर्चा व पुराण कथाओं में सम्मिलित होने से सुख, वैभव और सम्पन्नता बढ़ती है. इस अवधि में सुख, सुविधा, यश एवं रत्नाभूषण की प्राप्ति होती है. घर परिवार में मंगल उत्सव होते हैं. विद्या, विनय, वैभव के साथ मित्र व संबंधियों का स्नेह व सहयोग भी मन की प्रसन्नता को बढ़ाता है. अन्य विद्वानों के अनुसार मंगल, मांगल्य, मंगला का अर्थ शुभ श्रेष्ठ व कल्याणकारी है. निष्ठावान पत्नी, सुशील, आज्ञाकारी और भाग्यशाली संतान, धन वैभव, शुभता, पूजा अर्चना प्रार्थना द्वारा अरिष्ट निवारण, स्वस्थ, श्रेष्ठ व कल्याणकारी आयोजन, पद, प्रतिष्ठा, प्रताप, पराक्रम व विशेष सफलता, मंगला की दशा या भुक्ति में सहज मिलती है. 

  2. पिंगला (सूर्य) अवधि २ वर्ष : विद्वानों ने सूर्य को क्रूर ग्रह माना है. अतः इस दशा में मनोव्यथा, देह कष्ट, हृदय रोग तथा मिथ्या मनोरथ से उपजा दुःख अथवा अनैतिक आचरण, या कुसंगति के कारण धन व यश की हानि तो कभी पित्त रोग, ज्वर या रक्त विकार से कष्ट होता है. इस अवधि में संतान, सेवक तथा संबंधी भी कष्ट पाते हैं जिस कारण मन दुखी रहता है. कुछ विद्वान पिंगला का संबंध अग्नि-दुर्घटना या उष्णता, वरिष्ठ जन के सहयोग से कार्य सिद्धि, उल्लू जैसी सजगता, कुबेर का खजाना, पर्यटन प्रेम, व्यापार कुशलता, पीला या सुनहरी रंग जो प्रसन्नता का वातावरण बनाए, कष्ट-क्लेश से मुक्ति, किसी प्रभावशाली महिला का सहयोग व समर्थन तथा शुभ कृत्य, उदारता, परोपकार और अधिकार या सत्ता सुख से जोड़ते हैं. ध्यान रहे पिंगला एक सरल हृदया और धार्मिक विचार वाली राजनर्तकी थी जो अपने तोते को राम नाम सिखाते हुए मृत्यु प्राप्त कर मुक्त हो गई. 

  3. धान्या (गुरु) अवधि ३ वर्ष : धान्या दशा का संबंध गुरु, उन्नति, प्रगति, विकास, धन-मान की वृद्धि तथा सुख सम्पन्नता से माना जाता है. इस अवधि में विद्या, शिक्षा और योग्यता बढ़ती है तथा शत्रु नष्ट होते हैं. गुरु धर्म और अध्यात्म का कारक होने से, धान्या दशा में, जातक देवार्चन करता है तथा उपासना व तीर्थाटन से कार्यसिद्धि व सुख पाता है तो कभी राजा के अनुग्रह से धन, मान और पद प्रतिष्ठा मिलती है. अन्य विद्वान धान्या को धन धान्य की वृद्धि करने वाली दशा मानते हैं. ये दशा स्वास्थ्य, सम्मान, सद्गुण, स्नेह व परस्पर सहयोग को बढ़ाकर सुखी बनाती है. यों तो प्राचीन ग्रंथों में धान्या को मधुर, शीतल, स्वादिष्ट, स्वास्थयवर्धक तथा उत्तम भोजन माना है किन्तु मतान्तर में कहीं धान्या का अर्थ कसैला, कड़वा अथवा प्यास बढ़ाने वाला, तिक्त तथा मूत्र रोग का कारक भी माना गया है. 

  4. भ्रामरी (मंगल) अवधि ४ वर्ष : यह दशा पर्यटन, भ्रमण तो कभी घर परिवार से दूर निरर्थक भटकाव दिया करती है. मंगल अग्नि तत्त्व, क्रूर ग्रह होने से कभी, पदभंग, मानहानि या स्थानांतरण संबंधी क्लेश देता है. कोई जातक साहस, पराक्रम तथा परिश्रम से, अपनी प्रतिष्ठा बचाने या सफलता और सम्मान पाने से सुखी होता है. अन्य विद्वानों के अनुसार भ्रामरी दशा घर परिवार के सुख में तो कमी करती है किन्तु परिश्रम व पर्यटन द्वारा जातक, राजा सरीखे धनी मानी व्यक्तियों की कृपा से लाभ पता है. यदि जातक मानसिक संतुलन और धैर्य बनाए रखे तो जैसे देवी ने भ्रमरों द्वारा दैत्य समुदाय का नाश किया था, वैसे ही सारी बुराइयां इस दशा में स्वतः मिट जाती हैं.   

  5. भद्रिका (बुध) अवधि ५ वर्ष : यह दशा परिवार में स्नेह, सौहार्द तथा सहयोग बढ़ाती है. नए व लाभकार मैत्री संबंध बनते हैं. जातक संत, महात्मा, धनी मानी तथा राजा या उच्च अधिकारियों की कृपा से धन, मान व सुख पता है. घर में मंगल समारोह का आयोजन होता है. व्यापारिक दक्षता तथा सुख सुविधा की वृद्धि होती है. मित्रों के साथ आमोद-प्रमोद में समय बीतता है. भद्र या भद्रिका का अर्थ शुभ और कल्यानप्रद होता है. जातक मानो शुभता का आगार बन जाता है. सिद्ध महात्मा और धनी मानी व्यक्तियों के आशीर्वाद से उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं. वह स्वस्थ, गुणी, उदार, परोपकारी तथा दूसरों की सेवा सहायता को तत्पर रहने से स्नेह, सम्मान व प्रतिष्ठा पाता है.  

  6. उल्का (शनि) अवधि ६ वर्ष : किसी अग्नि पिंड का आकाश से गिरना उल्कापात कहलाता है. इसकी तुलना निर्धारित लक्ष्य पर मार करने वाले संहारक प्रक्षेपास्त्र से की जा सकती है. यह दशा धन, यश तथा वाहन सुख को नष्ट करती है. संतान तथा सेवक से मानसिक कष्ट क्लेश मिलता है. कभी राजा के कोप से धन और प्रतिष्ठा की हानि होती है. परिवार में मतभेद या वैर विरोध बढ़ने से, घर मानो युद्ध भूमि अथवा शत्रु दुर्ग सरीखा जान पढ़ता है. हृदय, उदर, दांत, कान या पाँव की पीड़ा भी दुःख दिया करती है. अन्य विद्वानों के मत से उल्का दशा, नगर या बस्ती में उपद्रव या उत्पाद (दंगों) से कष्ट देती है. कभी अग्नि या दुर्घटना का भय होता है. शायद ये अवधि व्यक्ति, परिवार, समाज तथा देश (स्थान) के लिए अशुभ और अनिष्टप्रद है. कोई जातक ज्योतिष या व्याकरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट सफलता भी पाता है. 

  7. सिद्ध (शुक्र) अवधि ७ वर्ष : इस दशा विद्वानों ने धन, विद्या, सफलता व संपन्नता देने वाली दशा माना है.  जातक सुख, सौभाग्य, सम्मान तथा पद-प्रतिष्ठा व यश पाता है. उसे धन, वस्त्र, रत्नाभूषण तथा वाहन सुख की प्राप्ति होती है. कभी बच्चों का विवाह होने से सुख व संतोष मिलता है. अन्य विद्वानों के अनुसार इस दशा में जातक की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं. उसे मनोवांछित लाभ और सफलता मिलती हैं. वह उच्च पद, अधिकार व सत्ता सुख पाता है. कभी सिद्ध महात्माओं की कृपा से, दैवीय गुण और शक्तियों का विकास होता है. वह निर्णय कुशल, सभी के झगड़े निपटाने वाला तथा चमत्कारिक व्यक्तित्व का धनी व प्रतिष्टित व्यक्ति होता है. 

  8. संकटा (राहू) अवधि ८ वर्ष : यह दशा धन, मान, यश तथा पद प्रतिष्ठा की हानि करती है. कभी चोरी, अग्निभय या उपद्रव के कारण धन सम्पदा का नाश होता है. मिथ्या मनोरथ, देह की दुर्बलता, परिवार से वियोग या स्वर्ण की हानि भी क्लेश देती है. यदि आयुष्य स्माप्त प्रायः हो तो जातक की मृत्यु होना भी संभव है. मतान्तर से जातक मनमानी करने की प्रवृत्ति, हठी स्वभाव, कुसंगति व स्वार्थपूर्ण आचरण के कारण अपनी परेशानी स्वयं ही बढ़ाता है. लोभ और स्वार्थ के वशीभूत होकर वह नीति विरुद्ध कार्य कर अपयश और कलंक का भागी बनता है. कभी संकीर्ण व संकुचित मनोवृति भी मनोव्यथा का कारण बनती है. बनारस की संकटा देवी की उपासना करने से संकट मिटते हैं तथा सुख की प्राप्ति होती है. 
ब्लॉग में  सम्मिलित सभी लेख किसी न किसी महानुभव की वर्षों  की तपस्या का फल है.  इस ब्लॉग में इनका पुनः प्रकाशन  ज्योतिष शास्त्र में रूचि रखने वाले मित्रों के कल्याणार्थ किया जा रहा  है. 

Friday, November 22, 2013

ग्रहों के विषय

सभी ग्रह अपने कारकत्व के अनुरूप अपनी दशा/अंतर्दशा (भुक्ति) में जातक पर प्रभाव डालते हैं :-
  1. सूर्य आत्मा, पिता, पद, प्रतिष्ठा, स्वास्थय व शक्ति (शारीरिक व आत्म बल) के साथ धन व लक्ष्मी का कारक है. 

  2. चंद्रमा से मन, बुद्धि, राजकृपा तथा धनसंपदा का विचार किया जाता है. 

  3. मंगल से पराक्रम, परिश्रम, संघर्ष शक्ति, अनुज, भूमि, शत्रु, रोग व चचेरे भाई का ज्ञान होता है. मंगल बली होने पर जातक अपने पराक्रम से सुख व सफलता पता है. 

  4. बुध विद्या, बुद्धि, बंधू, माया, मित्र, मनोरंजन, वाणी, कार्यक्षमता का कारक है. अतः शुभ होने पर अपनी दशा अंतर्दशा में बुध मौज मस्ती कराएगा मित्र मण्डली का सुख देगा.

  5. गुरु ज्ञान, प्रजा, धर्म, धन, संतान, शरीर की पुष्टि, मंत्रोपासना का कारक है. गुरु अपनी अंतर्दशा में प्रायः स्नेह, सहयोग, सुख व समृद्धि देता है. जातक की धर्म में रूचि होती है. 

  6. शुक्र वस्त्राभूषण, दांपत्य सुख, पत्नी से सम्बन्ध, सुख वैभव तथा वहाँ का कारक होता है. शुभ शुक्र अपनी दशा में सुख, समृद्धि व दांपत्य सुख देता है. 

  7. शनि आयु, जीवन, जीविका (नौकरी), दस-दासी या दुःख देता है. मृत्यु व विपत्ति का विचार भी शनि से होता है. कालपुरुष का लग्न, शनि की नीच राशि है. अतः इसे काल पुरुष का दुःख माना गया है. बहुधा शनि विलम्ब या बाधा देता है. 

  8. राहू से दादा का विचार किया जाता है. तीसरे भाव अथवा मिथुन/वृष राशि का उच्चस्थ राहू साहस पराक्रम बढ़ाता है. 

  9. केतु से नाना का विचार किया जाता है. द्वादश भाव का केतु मोक्षदायी व मुक्ति कारक माना गया है. केतु अपनी दशा/भुक्ति में प्रायः अनिष्ट व अशुभ से छुटकारा दिलाया करता है. 

Saturday, September 28, 2013

पुरुष की या स्त्री की रति शक्ति के सूचक योग

रति शक्ति का सम्बन्ध व्यक्ति के शारीरिक गठन, नस्ल और देशकाल (जलवायु) से रहता है. इसका ज्ञान हमें स्नायु संस्थान के कारक व रक्त संचार कारक ग्रह की स्थिति से होता है तथा सप्तम स्थान में स्थित राशि व ग्रह के स्वभाव तथा बल के अनुसार निष्कर्ष निकलना पड़ता है.

मान्यता यह है कि काम का उद्गम सबसे पहले मन से होता है. काम को मनोज व मन्मथ भी कहा जाता है देह तो मन की आज्ञाकारी दास है. इसलिए यहाँ हम व्यक्ति की मानसिक स्थिति व काम की ओर होने वाली सहज रूचि के सूचक योगों पर विचार करेंगे.

प्रमुख रूप से कामप्रिय (सेक्सी) होना शुक्र की स्थिति पर निर्भर करता है. विशेष यह है की यह बलवान होकर या निर्बल होकर त्रिक स्थान छठे, आठवें या बारहवें में आ जाये तो व्यक्ति को कामी बनाता है. यहाँ इसमें स्थानगत प्रभाव रहता है. हाँ, यदि इस पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि हो तो बात दूसरी है. शुक्र पाप ग्रहों के साथ देखा जाए अथवा पाप ग्रहों के साथ बैठा हो तो कामी बनाता है. बुध की या अपनी राशि में बैठा हुआ शुक्र भी कामी बना देता है. अगर रिपुभाव में धनु या मीन राशि हो ओर शुक्र मंगल के साथ किसी भी भाव में स्थित हो या कामी होने के लिए सातवें स्थान में शुक्र का बैठना ही प्रयाप्त रहता है.

ये योग व्यक्ति को काम का आवेश आने पर उचित या अनुचित का ध्यान नहीं रहने देते वह कामांध सा हो जाता है. अप्राकृतिक काम घटनाएं या कामापराध कामी व्यक्ति ही किया करते हैं. जब कुंडली में शुक्र की यह स्थिति हो ओर गोचर में वह प्रबल पद रहा हो या इसकी दशा-अंतर्दशा चल रही हो तब यह व्यक्ति को मथकर रख देता है, सिवा काम-वासना के कुछ और दिखाई नहीं देता और वह निर्मम भाव से अपने शरीर का नाश करता रहता है. 

कम या संतुलित काम (सेक्स) वाले लोगों के चंद्रमा वृष या तुला राशि का होता है. शनि और चंद्रमा का योग चौथे स्थान में हो रहा हो. लग्न में विषम राशि हो और शुक्र वहाँ बैठा हो. लग्न में वृष या धनु राशि हो और उसमे शनि स्थित हो. शुक्र सप्तम स्थान में हो और उस पर लग्नपति की दृष्टि हो. यह सभी योग रति शक्ति में कमी होने के थे. 
  • बलवान मंगल आय भाव में रहे तो व्यक्ति चिर युवा रहता है. 
  • लग्न में चंद्र और शुक्र एक साथ रहे तो व्यक्ति सदाबहार रहता है. 
  • बलवान बुध पाप ग्रहों से युत या दृष्ट न होकर त्रिक स्थान के अलावा कहीं हो तो व्यक्ति सदाबहार रहता है. 
अब उन योगों का वर्णन है जिसमें व्यक्ति स्त्रियों को संतुष्ट नहीं कर पता है और उनका प्रिय नहीं होता. उसमे धारण क्षमता का अभाव होता है. 

चंद्र मंगल की राशि (मेष) में हो, सूर्य चंद्रमा की राशि (कर्क) में हो और राहू, शुक्र व शनि इनमें से कोई दो ग्रह अपनी उच्च राशि में हो. शनि और बृहस्पति गर्भस्थान (पाँचवें) में एक साथ हों और चंद्रमा लग्न में हो. शुक्र मकर या कुम्भ राशि में हो, लग्न में कन्या राशि हो जिस पर शनि एवं बुध की दृष्टि हो. इन योगों में व्यक्ति शीघ्र पतन, शुक्रमेह, स्वप्नदोष या अन्य वीर्य विकारों से ग्रस्त रहता है. 

पुरुषत्वहीन करने वाले योग
  • शुक्र और शनि एक साथ दसवें या आठवें स्थान में हो. 
  • शनि जलराशि का होकर छठे या बारहवें स्थान में रहे. 
  • लग्न में विषम राशि हो, मंगल समराशि में हो और लग्न को देख रहा हो. 
  • शुक्र और शनि का योग दसवें स्थान में होने पर भी यह योग बनता है. 
  • शनि, शुक्र से छठे या आठवें स्थान में रहे. नीच राशि का शनि छठे या बारहवें स्थान में हो. 

यह योग जिनके होते है वे लोग पुरुषत्वहीन होते हैं. पुरुषत्वहीनता लाने योगों में व्यक्ति के जननेन्द्रिय संस्थान करीब-करीब निष्क्रिय से रहते हैं. स्मरण रहे इन योगों में पाप ग्रहों के साथ युति स्थिति दृष्टि आदि का सम्बन्ध होने पर ही यह योग सार्थक होते हैं. 

Thursday, September 26, 2013

ग्रहों के मारक ग्रह

सूर्य से शनि, शनि से मंगल, मंगल से गुरु, गुरु से चंद्र, चंद्र से शुक्र, शुक्र से बुध, बुध से चंद्र निश्चय कर के मारे जाते हैं... अर्थात् सूर्य से शनि का दोष मिटता है इसी तरह सर्व ग्रह एक दूसरे के फल को मार देते हैं.....

ग्रहों के दोष शामक ग्रह 

राहू का दोष बुध नाश करता है राहू व बुध इन दोनों के दोष को शनि नाश करता है.... राहू, बुध, शनि इन तीनों के दोष को मंगल नाश करता है... राहू, बुध, शनि, मंगल इन चारों के दोष को शुक्र और राहू, बुध, शनि, मंगल और शुक्र इन पाँचों के दोष को गुरु नाश करता है, राहू, बुध, शनि, मंगल,  शुक्र और गुरु इन छहों के दोष को चंद्रमा और सातों ही ग्रहों के दोष को विशेषकर उत्तरायण में रवि नाश कर देता है.......

According to Jataka Parijata (II - 73.74),


Mercury when in strength is said to counter the evil used by Rahu. Saturn can counter the evil caused by the combining of Mercury and Rahu. Mars is said to be capable of overcoming the evil generated by these three planets put together. Venus can counter the evil caused by all these four planets being together.  Jupiter can overcome the joint evil of all the 5 planets Mercury, Rahu, Saturn, Mars and Venus. The Sun is said to be so powerful that he can remove the evil effects of the foregoing planets plus of the Moon. 

Friday, June 7, 2013

कुंडली में मांगलिक योग

विवाह सर्वमांगल्ये यात्रायां ग्रह गोचरे
जन्म राशि प्रधानत्वं नाम राशि न चिन्तयेत।।
देशे ग्रामे ग्रहे युद्धे सेवायां व्यवहारके
नाम राशि: प्रधानत्वं जन्म राशि न चिन्तयेत।।

वर का प्रसिद्ध नाम तथा कन्या का जन्म नाम, कन्या का जन्म नाम तथा व वर का प्रसिद्ध नाम कदापि न लें। वैवाहिक समय में वर तथा कन्या की कुंडली का मिलान करने से प्रथम निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है ताकि वर-कन्या (नव दंपत्ति) अपना जीवन सुखमय व्यतीत कर सकें।
  1. सर्वप्रथम ध्यान में रखने वाली बात यह है कि कुंडली में मांगलिक दोष, अगर हो तो वर कन्या दोनों की जन्म कुंडलियों में हो।
  2. वर्ण, कूट, वश्य कूट, तारा कूट, योनि कूट ग्रह मैत्री, गण मैत्री, भकूट, नाड़ी कूट इन आठ कूटों का मिलान अवश्य करें।
  3. वर कन्या का जन्म समय ठीक होना चाहिए।
  4. सबसे अधिक ध्यान रखने योग्य बात यह है कि क्या वर तथा कन्या का जन्म-पत्र शुद्ध, सूक्ष्म एवं सिद्धान्तीय गणित के अनुसार है।   

एक नाड़ीस्थनक्षत्रे दम्पत्योर्मरण  ध्रुवं
सेवायां च भवेद्धानि विवाहे प्राण नाशकः ।।

वर-कन्या कि एक नाड़ी हो तो निश्चय मरण, सेवा में हानि और विवाह में प्राणों का नाश होता है

आदि नाड़ी वर हान्ति मध्य नाड़ी च कन्यकाम्
अन्त्यनाड़ायां दूयोमृत्यु नाड़ी दोषं त्यजेद् बुधः ।।

आदि नाड़ी वर को, मध्य नाड़ी कन्या को और अन्य नाड़ी दोनों का हनन करती हैं। इससे नाड़ी दोष विद्वानों को त्याग देना चाहिए।

नाड़ी दोषश्च विप्राणां  वर्णदोषस्तु भुभ्रुजाम्
गण दोषश्च वैश्यषु योनि दोषतु पादजाम्।।

विवाह में ब्राह्मणों के लिए नाड़ी दोष, क्षत्रियों के लिए वर्ण दोष, वैश्यों को गण दोष और शुद्रों को योनि दोष विशेष कर विचारना चाहिए।

एक नक्षत्र जातानां नाड़ी दोषो न विधते
अन्यर्क्षे नाड़िवेधे च विवाहो वर्जितः सदा
ऐकर्क्षे  चैक पापे च विवाहो मरणः प्रदः।।
ऐकर्क्षे भिन्न पापे च विवाहः शुभदायक ।।

एक नक्षत्र में उत्पन्न हुए वर-कन्या को नाड़ी का दोष नहीं है  जो दूसरे नक्षत्रों का नाड़ी वेध हो तो विवाह सदा वर्जित है परन्तु एक नक्षत्र में एक ही चरण हो तो विवाह मरणदायक और एक नक्षत्र में अलग-अलग चरण हो तो विवाह शुभदायक है

लग्ने व्यये व पातालेयामित्रे चाष्टमे कुजे
पत्नी हंति स्वभर्त्ता  भर्त्ता भार्यां विनाश्येत  ।।

यदि स्त्री के लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और व्यय स्थान में मंगल हो तो पुरुष की मृत्यु होती है इसलिए वर कन्या दोनों का मंगल होना आवश्यक है अन्यथा एक को कष्ट स्वाभाविक है

यामित्रे च यदा सौरिर्लग्ने वा हिबुकेऽथवा
अष्टमे द्वादशे चैव भौम दोषो न विद्यते ।।

यदि लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में शनि हो तो मंगल का दोष नहीं रहता

शानिभौमोऽथवा कश्चित् पापो वा तादृशो भवेत्
तेप्नेव भवनेप्वेव भौम दोष विनाशकृत।।

यदि वर या कन्या किसी एक के मंगल हो और दूसरे की कुंडली में मंगल न होकर मंगल के स्थान पर शनि या राहू पाप ग्रह हो तो मंगल दोष नहीं रहता

न वर्ग वर्णों न गणो न योनि योनीर्द्धिद्धादशे नैवषडष्टक
तारा विरुद्धे नवपंचमेवा राशिश मैत्री शुभदे विवाह।।

वर और कन्या की राशियों के स्वामी एक हो व दोनों के स्वामियों की परस्पर मित्रता हो तो वर्णादि कूटों का दोष नहीं रहता
इसी तरह नाड़ी दोष में यदि वर और कन्या का नक्षत्र भिन्न-भिन्न हो किन्तु राशि एक है या दोनों का नक्षत्र एक हो और राशि भिन्न-भिन्न हो तो नाड़ी दोष नहीं होता।
यदि दोनों ही एक राशि और एक ही नक्षत्र हो तो विवाह शुभ नहीं होता।
किन्तु नक्षत्र में भिन्न-भिन्न चरण होने से अति आवश्यक हो तो शुभ रहेगा।

वरस्य पंचमे कन्या, कन्याया नवमेवरः
एतत् त्रिकोणकं ग्रहमं पुत्र पौत्र सुखावहम
मरण पितु मात्रोश्च सन्ग्राह्मं नवपंचकम् ।।
षड्ष्टके भवेन मृत्युर्यत्नं तस्य विचारयेत ।।

वर की राशि से कन्या की राशि पंचम हो, कन्या की राशि से वर की नवम हो तो यह नवपंचम त्रिकोण शुभ है। यदि विपरीत हो यानि कन्या से पंचम वर की व वर से नवम कन्या की तो माता पिता को मृत्यु तुल्य कष्ट कहें

Friday, May 31, 2013

मांगलिक दोष के परिहार

'मुहूर्त दीपक',  'मुहूर्त पारिजात' तथा अन्य मानक ग्रंथों में मांगलिक योग या दोष के कुछ आत्म कुंडलीगत तथा कुछ पर कुंडलीगत परिहार बताए गए हैं। यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो और अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्न प्रकार हो तो कुजदोष स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है :-

  • यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो। 
  • यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो। 
  • यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो। 
  • मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो। 
  • यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो। 
  • यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा परकुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। 

इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो कुजदोष का परिहार करते हैं। अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए।

सौभाग्य की सूचिका भी है मंगली कन्या? 

कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादशभाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशमभाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्यभार्या तथा गुणवान व संतानवान बनाती है।

क्या कहता है आप का मंगल?

यह मांगलिक दोष कैसे बनता हैक्या मंगल ग्रह इतना भयावह है कि उसकी उपस्थिति से जन्म पत्रिका श्रापित हो जाती है जब मंगल ग्रह जन्म कुण्डली के लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक को मांगलिक कहा जाता है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। इसी प्रकार कुण्डली में जहाँ चन्द्र स्थित होता है अर्थात चन्द्र कुण्डली से लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें भाव में जब मंगल स्थित हो तो भी जातक को मांगलिक कहा जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि लग्न कुण्डली के बारह में से पांच भावों में यदि मंगल स्थित होंगे तो जातक  मांगलिक होगा। साथ ही इस लग्न कुण्डली में जहां चन्द्र स्थित है वहां से भी चन्द्र के साथ या उससे चौथे, या उसके सातवें, आठवें या बारहवें में यदि मंगल स्थित हो तो भी जातक मांगलिक कहलाएगा। अब इसे एक उदाहरण से समझते हैं।

कल्पना करते हैं एक कुण्डली का लग्न मेष है और चन्द्रमा तीसरे भाव अर्थात मिथुन में स्थित हैं। इस कुण्डली के 12 भावों में से मात्र 2 भाव (5वां व 11वां) बचे जहां मंगल स्थित हो तो जातक मांगलिक नहीं होगा, बाकी के बचे 10 भावों में से जहां कहीं भी मंगल स्थित होंगे तो जातक मांगलिक कहलाएगा। अब बताइये कि 12 भावों में से किसी एक भाव में तो मंगल उपस्थित होंगे ही और 12 भावों में से लगभग 10 भावों में उनकी उपस्थिति से जातक मांगलिककहलाएगा। इस मांगलिकसे बचने की कितनी कम संभावना है।

ज्योतिष के किसी भी शास्त्रीय ग्रंथ में मांगलिक या मांगलिक-दोष का वर्णन इस रूप में प्राप्त नहीं होता। विवाह हेतु  गुण मिलान इत्यादि के साथ इसका वर्णन कुछ एक ग्रंथों में बहुत सूक्ष्म वर्णित है जिस पर कालान्तर में कुछ शोध ग्रंथों में थोड़ा बहुत विस्तार दिखाई देता है किन्तु मांगलिक का जैसा रूप इस प्रकरण में महत्व प्राप्त कर गया ऐसा तो कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है। यह तो भ्रम का विस्तार ज्ञात होता है न कि ज्योतिष विज्ञान का। 

विवाह प्रकरण में ही मंगल ग्रह व मांगलिक शब्द का उपयोग या महत्व या चर्चा सुनाई देती है, ऐसा क्यों? जहां भी मांगलिक शब्द सुनने को मिलेगा उसका संदर्भ मात्र एवं मात्र विवाह ही होगा। इसका  ज्योतिषीय कारण है किन्तु उस कारण का या मंगल के विवाह-प्रकरण से संबंध का न तो कोई भयावह अर्थ है और न ही कोई अशुभ परिणाम। मंगल या मांगलिक का विवाह से संबंध किस प्रकार स्थापित होता है इसे समझने का प्रयास करते हैं।

लग्न यानि पहला भाव तनु भाव भी कहलाता है अर्थात् शरीर अथवा स्वयं।  इस से सप्तम यानि सातवां भाव भार्या स्थान कहलाता है अर्थात् जीवन संगिनी या फिर जीवन संगी का स्थान। यह दोनों ही भाव विवाह से सम्बंधित हो गए अर्थात् लग्न या तनु भाव एवं सप्तम या भार्या भाव। पहला स्वयं का और दूसरा जीवन साथी का। 

इस के पश्चात् मंगल के विषय में भी कुछ प्रमुख तथ्य जान लेते हैं। पहला तो यह कि ज्योतिष विज्ञानं में जो दो श्रेणियां वर्णित हैं - पुण्य ग्रह और पाप ग्रह, उन में मंगल 'पाप ग्रह' की श्रेणी में आता है। दूसरा तथ्य मंगल के विषय में यह है कि अन्य ग्रहों की भांति सातवीं दृष्टि के अतिरिक्त मंगल की चतुर्थ एवं अष्टम दृष्टि भी है

अब इन तथ्यों को मांगलिक बनाने वाले कारणों के साथ रखते हैं अर्थात् यदि मंगल लग्न, चौथे, सातवें, आठवें व बारहवें स्थान पर हो तो मांगलिक कहलाता है। इस कथन को ऊपर दिए तथ्यों पर कसेंगे तो इन सब का आपस में सम्बन्ध दिखाई देगा

- मंगल एक पाप ग्रह है।
लग्न में बैठकर मंगल अपने से सातवें भाव अर्थात् भार्या स्थान को देखता है।
- चौथे स्थान पर बैठकर मंगल अपनी विशेष चौथी दृष्टि से सप्तम अर्थात् भार्या स्थान को देखता है।
- सप्तम स्थान में स्थित मंगल भार्या भाव पर ही बैठा है।
- अष्टम स्थान में स्थित मंगल अपने से सप्तम अर्थात दूसरे भाव को देखता है जो सप्तम भाव का आयु स्थान   
 है। (सप्तम से अष्टम)।
- द्वादश भाव में स्थित मंगल अपनी विशेष अष्टम दृष्टि से सप्तम भाव को देखता है।

उपरोक्त सभी कारणों से स्पष्ट है कि मंगल जो कि एक पाप ग्रह है वह लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव से सप्तम स्थान (जो कि जीवन साथी का भाव है) को किसी न किसी रूप में स्पष्ट व सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इसीलिए इन भावों में मंगल के बैठने पर मंगल का संबंध विवाह से जुड़ता है एवं जातक मांगलिक कहलाता है।