Thursday, April 2, 2015

खग्रास (ग्रस्तोदय) चंद्रग्रहण (४ अप्रैल २०१५ चैत्र पूर्णिमा, शनिवार) - Total Lunar Eclipse - 4 April 2015

यह खग्रास चंद्रग्रहण ४ अप्रैल २०१५ को पूरे भारत में ग्रस्तोदय रूप में दिखाई देगा जिसका अर्थ हुआ कि भारत के किसी भी नगर में जब चंद्रोदय होगा उससे काफी पहले ही चंद्रग्रहण प्रारंभ हो चुका होगा। भारत के केवल सुदूर उत्तर पूर्वी राज्यों में इस ग्रहण का परमग्रास तथा परमग्रास की समाप्ति देखी जा सकती है। शेष भारत में तो जब चंद्रोदय होगा तब तक खग्रास समाप्त हो चुका होगा तथा केवल ग्रहण-समाप्ति ही दृष्टिगोचर होगी। भारत में इस ग्रहण का खण्डग्रास रूप ही दिखाई देगा। 
भूगोल पर इस ग्रहण के स्पर्श आदि काल (भा.स्टै.टा.) इस प्रकार है :-

ग्रहण (स्पर्श) प्रारंभ  - १५ घं  ४५ मि (भा.स्टै.टा.)
खगास प्रारंभ   - १७ घं  २४ मि (भा.स्टै.टा.)
ग्रहण मध्य (परमग्रास) - १७ घं  ३० मि (भा.स्टै.टा.)
खगास समाप्त    - १७ घं  ३६ मि (भा.स्टै.टा.)
ग्रहण (मोक्ष) समाप्त - १९ घं  १५ मि (भा.स्टै.टा.)

(चन्द्रमालिन्य प्रारंभ (enters penumbra) = १४ घं  ३० मि तथा चंद्रकांति निर्मल (leaves penumbra) = २० घं  ३१ मि) पर्वकाल = ३ घं  ३० मि)

भारत में स्थानीय चंद्रोदय से ही ग्रहण का आरंभ माना जाएगा क्यूंकि भारत में मुख्यतः चंद्रोदय के बाद इस ग्रहण की समाप्ति ही देखी जा सकेगी।

भारत के अतिरिक्त यह खग्रास चंद्रग्रहण लगभग सम्पूर्ण एशिया, ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी-पूर्वी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, अंटार्कटिका, हिन्द महासागर तथा प्रशांत महासागर में दिखाई देगा। इंग्लैंड आदि यूरोपीय देशों, दक्षिण अफ्रीका, रुस आदि में दिखाई नहीं देगा।

ग्रस्तोदय ग्रहण में चंद्रोदय से ग्रहण समाप्ति तक के काल को 'पर्वकाल' माना जाता है। धर्मपरायण लोगों को चंद्रोदय को ही ग्रहण मानकर सभी धार्मिक क्रियाओं का संपादन व अनुष्ठान करना चाहिए।

इस ग्रहण का सूतक ४ अप्रैल २०१५ को प्रातः सूर्योदय से ही प्रारंभ हो जायेगा। शुद्ध (ग्रहण-मोक्ष) चंद्र बिम्ब के दर्शन एवं तर्पण करने के बाद ही सभी धार्मिक कार्य करने चाहिए।

यह चंद्रग्रहण हस्त नक्षत्र (कन्या राशि) कालीन घटित हो रहा है। अतएव इस नक्षत्र एवं कन्या राशि वालों को इस ग्रस्तोदय ग्रहण का फल विशेष रूप से अशुभ एवं कष्टकारी होगा। जिस राशि के लिए ग्रहण का फल अशुभ हो उसे यथाशक्ति जप-पाठ, ग्रह राशि (चंद्रमा  एवं राशिस्वामी बुध की) एवं दानादि द्वारा अशुभ प्रभाव को क्षीण किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त ग्रहण-उपरान्त ओषधि स्नान करने से भी अनिष्ट की शांति होती है। सभी राशियों के लिए इस ग्रहण का फल इस प्रकार होगा :-

मेष (२२ मार्च - २० अप्रैल) - रोग, गुप्त चिंता, कार्य विलंब - व्यापार बढ़ेगा व कार्यों में बढ़ोतरी होगी। भाग्य का पक्ष मजबूत साबित होगा। बहुत से लोगों के विवाह के योग बन रहे हैं। आय में बढ़ोतरी के आसार हैं। नौकरी करने वालों का कार्य में मन नहीं लगेगा।

वृषभ  (२१ अप्रैल - २१  मई) - खर्च और भागदौड़ में वृद्धि - कार्यों में आ रही रुकावटें दूर होंगी और रुके हुए कार्यों में उन्नति होगी। आर्थिक स्थिति पहले की अपेक्षा मजबूत होगी। पद, प्रतिष्ठा इत्यादि का लाभ होगा। स्वास्थ्य के लिए और संतान भाव के लिए यह समय अनुकूल नहीं है। चोट, ऑपरेशन इत्यादि संभव है।

मिथुन (२२ मई  - २१  जून) - कार्य सिद्धि और धन लाभ - घरेलू मामलों में रुकावटें आयेगी। कार्य योजनाओं में प्रगति होगी। पद-प्रतिष्ठा में कुछ अड़चनें आ सकती हैं। अपने निकटतम लोगों के द्वारा परेशानी मिल सकती है। स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है।

कर्क (२२ जून  - २३  जुलाई) - प्रगति, उत्साह एवं पुरुषार्थ वृद्धि - आर्थिक पक्ष मज़बूत होगा। बहुत से नए लोगों से संपर्क स्थापित होगा। भाई-बंधुओं या रिश्तेदारों के कारण कुछ समस्याएँ आपको घेरे रहेगी। परिवार में शुभ कार्यों के योग बनेंगे। 

सिंह  (२४ जुलाई  - २१  अगस्त) - धन हानि, खर्च अधिक, यात्रा - समय का महत्व समझ आएगा, सकारात्मक विचारों से आत्मबल मजबूत होगा। घर व परिवार में ख़ुशहाली का माहौल उत्पन्न होगा। धन का इस्तेमाल शुभ कार्यों में होगा। सट्टे आदि का कार्य करने वालों को लाभ मिल सकता है।

कन्या (२२ अगस्त - २१  सितम्बर) - शारीरिक कष्ट, चोट, भय, धन क्षय - निवेश से बचे या सावधानी बरतें। घरेलू मामलों में तनाव आ सकता है। खट्टी वस्तुओं के सेवन से बचे वर्ना एसिडिटी हो सकती है।

तुला  (२२ सितम्बर - २३ अक्टूबर) - धन हानि, परेशानी -  जीवन में नई उमंगें आयेंगी। व्यावसायिक क्षेत्र में उन्नति संभव है। अच्छे समाचार सुनने को मिलेंगे। ज्वर, सिर दर्द आदि की संभावना है स्वास्थ्य का ख्याल रखें।

वृश्चिक (२४ अक्टूबर - २१ नवंबर) - धन एवं सुख लाभ -  कार्य पूर्ण न होने की स्थिति में क्षोभ उत्पन्न हो सकता है। नाकारात्मक विचारों से बचने की आवश्यकता है। मातुल पक्ष की ओर से सुखद समाचार प्राप्त हो सकता है।

धनु (२२ नवंबर - २१ दिसंबर) - रोग, कष्ट, भय, चिंता और संघर्ष - व्यर्थ के तर्क वितर्क में न पड़े, विवाद की संभावना है। व्यवसाय में आज किसी को ऋण न दें। प्रतियोगी परीक्षाएं देने वालों के लिए समय अनुकूल है।

मकर (२२ दिसंबर - २० जनवरी) - संतान संबंधी चिंता - रोज़गार की दिशा में किये गए प्रयास सार्थक सिद्ध होंगे। आय के स्रोतों में वृद्धि होगी। जीवन साथी से मधुर सम्बन्ध स्थापित होंगे। नए संबंधों पर अत्यधिक विश्वास न करें। स्वास्थ्य का ध्यान रखें।

कुम्भ  (२१ जनवरी - १९ फरवरी ) - शत्रु व दुर्घटना भय, व्यय अधिक - आपके व्यक्तित्व में निखार आयेगा। विरोधी तत्त्व हानि दे सकते हैं। सांस्कारिक सुखों की और मन आकर्षित होगा। रुका हुआ धन मिल सकता है।

मीन  (२० फरवरी - २१ मार्च) - स्त्री/ पत्नी संबंधी कष्ट - शुभ समाचार प्राप्त हो। ससुराल पक्ष में मांगलिक कार्य होगा। अत्यधिक व्यस्तता के कारण शारीरिक थकान महसूस होगी। किसी गरीब की सहायता करने का अवसर मिल सकता है।

ध्यान रखें इस ग्रहण से होने वाला प्रभाव अधिकतम १५ दिनों तक अनुभव किया जा सकेगा। 

Sunday, March 1, 2015

आजीविका के उपाय

अपना अध्ययन पूरा  करने के पश्चात प्रत्येक व्यक्ति रोज़गार के अवसर ढूंढता है। जीवनयापन के लिए धन कमाना गृहस्ठ की अनिवार्यता है। कई लोगों को अच्छे अवसर मिल जाते हैं, कई लोग धन के अभाव में कष्ट उठाते हैं। कुछ सरल उपायों का अवलम्बन आप के भाग्य का द्वार खोल सकता है, इनका उल्लेख नीचे किया जा रहा है:-
  1. किसी व्यक्ति को व्यवसाय में निरन्तर घाटा लग रहा हो तो वह ४१ दिनों तक सूर्योदय से पूर्व बिल्व वृक्ष के नीचे बैठकर "श्री रमायै नमः" मंत्र का जाप करे तो व्यावसायिक बाधाएं दूर हो जायेंगी। 
  2. कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी के लिए प्रयत्न कर रहा है अथवा प्रतियोगी परीक्षाओं की  तैयारी कर रहा है तो उसे नरसिंहलक्ष्मी की उपासना करनी चाहिए। यह स्तोत्र 'स्तोत्र रत्नावली' पुस्तक में उपलब्ध है। इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन नरसिंहलक्ष्मी के छविचित्र के सम्मुख एक बार करना चाहिये।
  3. जो लोग भूमि एवं निर्माण के व्यवसाय से जुड़े हैं उन्हें उन्नति के लिए वराह भगवान की उपासना करनी चाहिये। भागवत के पंचम स्कन्ध में पृथ्वी देवी द्वारा की गयी भगवान वराह की स्तुति का प्रतिदिन उनके चित्र के समक्ष एक बार पाठ करना चाहिये। 
  4. जो व्यक्ति पहले से ही किसी पद पर कार्यरत हैं एवं पदोन्नति चाहता है तो उसे भगवान के पार्षद  'चक्रराज सुदर्शन' की स्तुति करनी चाहिये। दक्षिण भारत से प्रकाशित रामानुज सम्प्रदाय के स्तोत्र ग्रंथों में यह स्तुति उपलब्ध है। 
  5. कोई व्यक्ति व्यवसाय में निरंतर मेहनत कर रहा हो फिर भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही हो, कारोबारी सौदे  प्रायः बनते बनते बिगड़ जाते हों तो उसे भरत जी की उपासना करनी चाहिये। भरत जी का ऐसा चित्र सामने रखना चाहिए जिसमे भरत जी श्री राम जी की चरण पादुकाओं का पूजन कर रहे हों। 
                   "विश्व भरत पोषण कर जोई 
                            ताकर राम भरत अस होई"

            इस चौपाई के सवा लाख ४५ दिन में  करने पर अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।


यह लेख श्री मञ्जूषा पत्रिका में भरत शास्त्री जी द्वारा प्रकाशित किया गया था। अपने और पाठकों के कल्याणार्थ इस ब्लॉग में पुनः प्रकाशित कर रहा हूँ। आशा है पाठक इससे अवश्य लाभान्वित होंगे।

Tuesday, February 3, 2015

आप का व्यवसाय - Your Profession

ऐसा देखा गया है कि एक ही व्यवसाय करने वाला जातक उसमें अपार सफलता प्राप्त कर लेता है और दूसरा ना चाहते हुए भी पतन का अधिकारी बनता है। जिस तरह मौसम सदैव एक जैसा नहीं रहता उसी तरह से मनुष्य का भाग्य भी एक जैसा नहीं रहता जरूरत रहती है तो मनुष्य के भाग्य को अनुकूल स्थिति में ले जाने की। ज्योतिष का कार्य मार्गदर्शन ही तो है - सुयोग के समय अत्यधिक लाभ और दुर्योग के समय न्यूनतम हानि। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी को भी उसके व्यवसाय के बारें में शत-प्रतिशत सत्य बताया जा सकता है। इस सम्बन्ध में ज्योतिष के सारांश-सूत्र प्रस्तुत हैं - 

लग्न का अध्ययन -

लग्न से किसी जातक के व्यक्तित्व व चारित्रिक विशेष का अध्ययन किया जाता है। विभिन्न लग्न के जातकों का मानसिक विकास तथा मानसिक रूझान भिन्न होता है। उसके अनुसार ही उनका व्यवसाय होता है। विभिन्न लग्नों के व्यवसाय नीचे दिए गए हैं। जिन व्यक्तियों के पास अपनी जन्मकुंडली नहीं है और जिन्हें अपने लग्न का ज्ञान नहीं है वह अपनी राशि के अनुसार अपनी जीविका का चयन कर सकते हैं। 

मेष - पुलिस,  सेना अधिकारी, रक्षा मंत्रालय, लोहे इत्यादि का व्यवसाय, सर्जन, नेता, खिलाड़ी आदि। 

वृष - कलाकार, संगीतकार, लेखक, सुगन्धित वस्तुओं का व्यवसायी, कर-अधिकारी, दुग्ध व्यवसाय, वाहनों का व्यवसाय, विलासिता से संबंधित वस्तुएँ, आभूषण इत्यादि। 

मिथुन - वैज्ञानिक, पत्रकार, योजनाधिकारी, प्रकाशक, संपादक, इंजीनियर, सचिव, ठेकेदार, गणितज्ञ, अकाउंटेंट, चालक, दलाल आदि। 

कर्क - योजना विभाग, कवि, चित्रकार, नर्स, समाजसेवी, इतिहासकार, नौ सेना अधिकारी, जलपोत, वक्ता, मंत्री, सलाहकार आदि। 

सिंह - सरकारी सेवा, शेयर बाज़ार, संगीत, अधिकारी, नेता, मैनेजिंग डायरेक्टर, उच्च सेवा इत्यादि। यदि सूर्य की स्थिति शुभ हो तो अधिकारी बनना निश्चित है। 

कन्या - आर्किटेक्ट, इंजीनियर, ऑडिटर, कंप्यूटर और वैज्ञानिक उपकरणों से संबंधित, डॉक्टर, सर्जन, प्रकाशक, बीमा एजेंट, ज्योतिष, खगोलशास्त्री। 

तुला - न्यायविद, सलाहकार, आलोचक, सचिव, रसायनशास्त्री, चित्रकार, यातायात विभाग, द्रव्य का व्यवसाय, नर्तक, संगीतकार, कवि, गायक आदि। 

वृश्चिक -  सेना, चिकित्सक, रसायन विभाग में प्राध्यापक, पराविद्या, भूगोलशास्त्री, भूगर्भ वैज्ञानिक, संत-महात्मा, ज्योतिष, जासूस, पुलिस इत्यादि। 

धनु - अधिकारी, प्रोफेसर, बैंक कर्मचारी, धार्मिकवक्ता, राजनीति, कानून, आलोचक, कंपनी सेक्रेटरी, ऑडिटर, ठेकेदार इत्यादि। 

मकर - अर्थशास्त्री, आर्थिक सलाहकार, चार्टर्ड अकाउंटेंट, ब्रोकर, जमीन से निकली वस्तुओं का व्यापारी, दार्शनिक, कानूनी सलाहकार, संत, धर्मशास्त्री, ज्योतिष आदि। 

कुम्भ - खोजी, एडमिनिस्ट्रेटर, मनोवैज्ञानिक, ज्योतिष, भूगर्भशास्त्री, नौसेना, सीबीआई, चित्रकार, बिजली विभाग इत्यादि। 

मीन - समुद्र में व्यापर, जहाज, सलाहकार, मंत्री, ज्योतिष, संगीतज्ञ, कलाकार, धर्मशास्त्री, शिक्षा विभाग, व्यापारी, तेल एवं गैस विभाग आदि। 

द्वितीय भाव के उपस्वामी का अध्ययन -

कुंडली में द्वितीय भाव बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि जातक की धन-स्थिति का अध्ययन इस भाव से किया जाता है तथा यह भी पता लगाया जा सकता है कि धन प्राप्ति किस स्रोत से होगी। द्वितीय भाव के उपस्वामी का विभिन्न भावों से संबंध निम्न रूप से दिखाया गया है :-

यदि उपस्वामी संबंध द्वितीय भाव से हो - कारखाने, उद्योग, व्यापार, शेयर बाज़ार। 

यदि उपस्वामी का सम्बन्ध तृतीय भाव से हो - प्रकाशन, प्रेस, ट्रांसपोर्ट, दूर-संचार, लेखन, जर्नलिज्म, लाइब्रेरी। 

यदि उपस्वामी का संबंध चतुर्थ भाव से हो - शिक्षा संस्थान, जमीन इत्यादि से संबंधित कार्य, खान, संस्थान, वाहनों का व्यापर, कृषि। 

यदि उपस्वामी का संबंध पंचम भाव से हो - फिल्म, संगीत, थिएटर, राजनीति, खेल-कूद, पब्लिक रिलेशन, शेयर बाज़ार, पुजारी, मंत्र-विज्ञान। 

यदि उपस्वामी का संबंध षष्ठं भाव से हो - अस्पताल, सेनिटोरियम, सफाई विभाग, ब्रोकर, धन उधार देने वाली संस्था, बैंक। 

यदि उपस्वामी का संबंध सप्तम भाव से हो - सहयोग से व्यापार, महिलाओं संबंधी कार्य, कपड़ों का व्यापार, सुगंध का व्यापार, विदेश विभाग, अंतर्राष्ट्रीय संस्था। 

यदि उपस्वामी का संबंध अष्टम भाव से हो - बीमा विभाग, प्रोविडेंट फण्ड, कार्यालय, रजिस्ट्रार, पराविद्या, खोज, सर्जन, स्वास्थ्य विभाग,  संबंधी कार्य, ध्यान-विद्या, योग-विद्या। 

यदि उपस्वामी का संबंध नवम भाव से हो - धार्मिक संस्थान, कानून संबंधी कार्य, दर्शन, विदेशों में यात्रा, कानूनविद, धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन, उच्च शिक्षा संस्थान। 

यदि उपस्वामी का संबंध दशम भाव से हो - सरकारी सेवा, उच्च सेवाएं, राजदूत, मंत्री, डॉक्टर, नेता, सलाहकार, इंजीनियर। 

यदि उपस्वामी का संबंध एकादश भाव से हो -  सरकारी सेवा,  लाभ का पद, ,राष्ट्रीय नेता, आर्किटेक्ट, योजना विभाग, बिजली विभाग, संग्राहलय, कृषि व जल विभाग, विदेश सहायता प्राप्त संस्थान। 

यदि उपस्वामी का संबंध द्वादश भाव से हो -  जेल विभाग, संत, दर्शन, मनोचिकित्सा, पराविद्या, खोज, रसायन विज्ञान, पागलखाना, अस्पताल, ग़ैर-कानूनी धंधा।

द्वितीय भाव का उपस्वामी यदि चर राशि यानि मेष, कर्क, तुला व मकर में हो तो धन अवस्था अस्थिर होती है तथा जातक किसी अन्य स्रोत से भी धन प्राप्त कर सकता है। यदि उपस्वामी स्थिर राशि वृष, सिंह, व्रुश्चिक या कुम्भ राशि में हो तो धन की प्राप्ति एक ही स्रोत से होती है। यदि उपस्वामी द्विस्वभाव राशि में हो तो निश्चय ही एक से अधिक स्रोतों से धन-लाभ होगा।

दशम भाव का अध्ययन -

कुंडली में दशम भाव जातक के व्यवसाय को प्रदर्शित करता है। दशम भाव के सार्थक ग्रहों से यह पता लगाया जा सकता है कि जातक को किन व्यवसायों से लाभ होगा। प्रत्येक ग्रह किसी व्यवसाय से संबंध रखता है। दशम भाव के सार्थक ग्रहों का फल निम्न है :-

सूर्य - सरकारी सेवा, राजनीति, पिता के धन से व्यापर, विभागाध्यक्ष, मंत्री, प्रभावशाली व्यक्ति, सोने का कार्य।

चन्द्रमा - पानी के जहाज़ संबंधी कार्य, द्रव्य का व्यापर, योजना विभाग, कवि-कल्पनशीलक, सलाहकार, शराब का कार्य।

मंगल - सैन्य विभाग, बंदूकों का व्यापार, रसायन, सर्जन, नाई, लोहे का कार्य, मांस का व्यापर, पुलिस, नेता, कारपेंटर।

बुध - वैज्ञानिक, इंजीनियर, अकाउंटेंट, ज्योतिष, सूचना एवं प्रसार अधिकारी, वक्ता, कानूनविद, सिनेमा।

बृहस्पति - कानूनविद, धर्म-संस्थान, प्रोफेसर, दार्शनिक, बैंक, पुजारी, जर्नलिस्ट, राजनीतिज्ञ, संपादक, ज्योतिष।

शुक्र - कलाकार, संगीतकार, चित्रकार, वाद्य-यन्त्र संबंधी कार्य, खिलाड़ी व रत्नों का व्यापार, कपडा संबंधी कार्य, ट्रांसपोर्टर, नर्तक।

शनि - ज़मीन से निकलने वाली वस्तुओं संबंधी कार्य, लोहा व पीतल का कार्य, अर्धसरकारी संस्थान, पब्लिक सेक्टर, कृषि, लेबर, अफसर, भूगर्भशास्त्री, ब्रोकर, इंजीनियर, क्लर्क, मज़दूर।

राहू व केतू के फल उनके साथ स्थित ग्रहों के आधार पर हैं,  यदि कोई भी ग्रह साथ में न हो तो जिस राशि में राहू व केतू  हैं, उस राशि के स्वामी के फल होते हैं।

Friday, January 23, 2015

चन्द्र और चन्द्र लग्न का महत्व

दक्षिण भारत को छोड़कर पूरे भारत में प्रत्येक जन्मपत्री में दो लग्न बनाये जाते हैं। एक जन्म लग्न और दूसरा चन्द्र लग्न। जन्म लग्न को देह समझा जाये तो चन्द्र लग्न मन है। बिना मन के देह का कोई अस्तित्व नहीं होता और बिना देह के मन का कोई स्थान नहीं  है। देह और मन हर प्राणी के लिए आवश्यक है इसीलिये लग्न और चन्द्र दोनों की स्थिति देखना ज्योतिष शास्त्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। सूर्य लग्न का अपना महत्व है। वह आत्मा की स्थिति को दर्शाता है। मन और देह दोनों का विनाश हो जाता है परन्तु आत्मा अमर है। 

चन्द्र ग्रहों में सबसे छोटा ग्रह है। परन्तु इसकी गति ग्रहों में सबसे अधिक है। शनि एक राशि को पार करने के लिए ढ़ाई वर्ष लेता है, बृहस्पति लगभग एक वर्ष, राहू लगभग १४ महीने और चन्द्रमा सवा दो दिन - कितना अंतर है। चन्द्रमा की तीव्र गति और इसके प्रभावशाली होने के कारण किस समय क्या घटना होगी, चन्द्र से ही पता चलता है।  विंशोत्तरी दशा, योगिनी दशा, अष्टोतरी दशा आदि यह सभी दशाएं चन्द्र की गति से ही बनती है।  चन्द्र जिस नक्षत्र के स्वामी से ही दशा का आरम्भ होता है। अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक की दशा केतु से आरम्भ होती है क्योंकि अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु है। इस प्रकार जब चन्द्र भरणी नक्षत्र में हो तो व्यक्ति शुक्र दशा से अपना जीवन आरम्भ करता है क्योंकि भरणी नक्षत्र का स्वामी शुक्र है। अशुभ और शुभ समय को देखने के लिए दशा, अन्तर्दशा और प्रत्यंतर दशा देखी जाती है। यह सब चन्द्र से ही निकाली जाती है। 

ग्रहों की स्थिति  निरंतर हर समय बदलती  रहती है। ग्रहों की बदलती स्थिति का प्रभाव विशेषकर चन्द्र कुंडली से ही देखा जाता है। जैसे शनि चलत में चन्द्र से तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में हो तो शुभ फल देता है और दुसरे भावों में हानिकारक होता है। बृहस्पति चलत में चन्द्र लग्न से दूसरे, पाँचवे, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भाव में शुभ फल देता है और दूसरे भावों में इसका फल शुभ नहीं होता। इसी प्रकार सब ग्रहों का चलत में शुभ या अशुभ फल देखना के लिए चन्द्र लग्न ही देखा जाता है। कई योग ऐसे होते हैं तो चन्द्र की स्थिति से बनते हैं और उनका फल बहुत प्रभावित होता है।

चन्द्र से अगर शुभ ग्रह छः, सात और आठ राशि में हो तो यह एक बहुत ही शुभ स्थिति है।  शुभ ग्रह शुक्र, बुध और बृहस्पति माने जाते हैं।  यह योग मनुष्य जीवन सुखी, ऐश्वर्या वस्तुओं से भरपूर, शत्रुओं पर विजयी , स्वास्थ्य, लम्बी आयु कई प्रकार से सुखी बनाता है। 

जब चन्द्र से कोई भी शुभ ग्रह जैसे शुक्र, बृहस्पति और बुध दसवें भाव में हो तो व्यक्ति दीर्घायु, धनवान और परिवार सहित हर प्रकार से सुखी होता है।चन्द्र  से कोई भी ग्रह जब दूसरे या बारहवें भाव में न हो तो वह अशुभ होता है। अगर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि चन्द्र पर न हो तो वह बहुत ही अशुभ होता है। 

इस प्रकार से चन्द्र की स्थिति से १०८ योग बनते हैं और वह चन्द्र लग्न से ही बहुत ही आसानी के साथ देखे जा सकते हैं।

चन्द्र का प्रभाव पृथ्वी, उस पर रहने वाले प्राणियों और पृथ्वी के दूसरे पदार्थों पर बहुत ही प्रभावशाली होता है। चन्द्र के कारण ही समुद्र मैं ज्वारभाटा उत्पन्न होता है। समुद्र पर पूर्णिमा और अमावस्या को २४ घंटे में एक बार चन्द्र का प्रभाव देखने को मिलता है। किस प्रकार से चन्द्र सागर के पानी को ऊपर ले जाता है और फिर नीचे ले आता है।  तिथि बदलने के साथ-साथ सागर का उतार चढ़ाव भी बदलता  रहता है। 

प्रत्येक व्यक्ति में ६० प्रतिशत से अधिक पानी होता है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है चन्द्र के बदलने का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता होगा।  चन्द्र के बदलने के साथ-साथ किसी पागल व्यक्ति की स्थिति को देख कर इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

चन्द्र साँस की नाड़ी और शरीर में खून का कारक है। चन्द्र की अशुभ स्थिति से व्यक्ति को दमा भी हो सकता है।  दमे के लिए वास्तव में वायु की तीनों राशियाँ मिथुन, तुला और कुम्भ इन पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि, राहु और केतु का चन्द्र संपर्क, बुध और चन्द्र की स्थिति यह सब देखने के पश्चात ही निर्णय लिया जा सकता है।

चन्द्र माता का कारक है। चन्द्र और सूर्य दोनों राजयोग के कारक होते हैं। इनकी स्थिति शुभ होने से अच्छे पद की प्राप्ति होती है। चन्द्र जब धनी बनाने पर आये तो इसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

चन्द्र खाने-पीने के विषय में बहुत प्रभावशाली है। अगर चन्द्र की स्थिति ख़राब हो जाये  तो व्यक्ति कई नशीली वस्तुओं का सेवन करने लगता है। जातक पारिजात के आठवें अध्याय के १००वे श्लोक में लिखा है चन्द्र उच्च का वृष राशि का हो तो व व्यक्ति मीठे पदार्थ खाने का इच्छुक होता है।  जातक पारिजात के अध्याय ६, श्लोक ८१ में  लिखा है कि चन्द्र खाने-पीने की आदतों पर प्रभाव डालता है।  इसी प्रकार बृहत् पराशर होरा के अध्याय ५७ श्लोक ४८ में लिखा है कि अगर चन्द्र की स्थिति निर्बल हो तो शनि की अंतरदशा में व्यक्ति को समय से खाना नहीं मिलता।

Thursday, January 22, 2015

कुंडली के द्वादश भावों से विचारणीय बातें

प्रथम भाव - प्रथम भाव से जातक के शरीर, रंग, रूप, जाति, आत्मबल, स्वाभाव, आकृति, आयु, सुख-दुःख, विवेक और चरित्र आदि का विचार किया जाता है। 

द्वितीय भाव - द्वितीय भाव से जातक के  धन, कोष, कुल, मित्र, आँख, कान, नाक, स्वर, सौंदर्य, आदतें, संचित पूंजी, क्रय-विक्रय, वाणी, प्रेम आदि का ज्ञान किया जाता है। 

तृतीय भाव - तृतीय भाव से जातक के पराक्रम, छोटे भाई-बहन, नौकर-चाकर, शौर्य-धैर्य, दमा-खाँसी, योगाभ्यास, फेफड़े और श्वसन-सम्बन्धी बातों का विचार किया जाता है। 

चतुर्थ भाव - चतुर्थ भाव से जातक के मातृसुख, घर, पशु और वाहन का सुख, सम्पत्ति, अंतःकरण, बाग़-बग़ीचा, जमीन, छल-कपट, निधि, पेट के रोग, उदारता तथा गोद जाने आदि जाने का  विचार किया जाता है।

पंचम भाव - पंचम भाव से विद्या-बुद्धि, प्रबन्ध, संतान, नीति, विनय, देशभक्ति, ख्याति, पाचन-शक्ति, नौकरी छोड़ना, अनायास धन प्राप्ति (लॉटरी , सट्टा इत्यादि) गर्भाशय, मुत्रपिण्ड एवं बस्ति का विचार किया जाता है।

षष्ठम भाव - षष्ठम भाव से जातक के मामा, शत्रु, रोग, भय, झगड़े-मुक़दमे, क़र्ज़ , दुःख, व्रण, गुदास्थान आदि का विचार किया जाता है।

सप्तम भाव - सप्तम भाव से जातक की स्त्री, स्त्री-सुख, दैनिक जीविका, भोग-विलास, जननेन्द्रिय रोग, व्यापार-विवाह, स्त्री का रूप, रंग, शील, चरित्र, बवासीर, तलाक़ आदि का विचार किया जाता है।

अष्टम भाव - अष्टम भाव से जातक की व्याधि, आयु, जीवन-मरण, प्रवास, पुरातत्त्वान्वेषण, पूर्वसंचित द्रव्य, गड़ा धन, पूर्व जन्म, अकाल-मृत्यु, ऋणग्रस्तता, लिंग-योनि, अंडकोष आदि के रोगो का विचार किया जाता है।

नवम भाव - नवम भाव से जातक के भाग्योदय, शील, विद्या, तप, धर्म, धर्म-परिवर्तन, तीर्थ-यात्रा, गुरु, ईश्वर-प्राप्ति, पिता का सुख, दान-पुण्य, मानसिक वृत्ति आदि का ज्ञान किया जाता है।

दशम भाव - दशम भाव से जातक के राज्य, मान, नौकरी, पिता का सुख, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, ऐश्वर्या-भोग, कीर्ति-लाभ, नेतृत्व, विदेश यात्रा, आत्मविश्वास आदि का ज्ञान किया जाता है।

एकादश भाव - एकादश भाव से जातक की आय, संपन्नता, वैभव, मोटर, पालिक, संपत्ति, बड़े भाई-बहनों की संख्या, गुप्त धन, लाभ-हानि, स्वतंत्र चिंतन, नौकर आदि के सुख का विचार किया जाता है। 

द्वादश भाव - द्वादश भाव से जातक के व्यय, व्यय का माध्यम, अर्थ-हानि, शत्रु का विरोध, नेत्र-पीड़ा, दंड, व्यसन, शय्या-सुख, अतिरिक्त एवं आकस्मिक व्यय, विपत्तियां, मोक्ष यानि मरने के बाद प्राणी की गति आदि का ज्ञान किया जाता है।

Tuesday, January 13, 2015

कुंडली चक्र

  • कुंडली के प्रथम भाव को लग्न कहा जाता है और उसके स्वामी को लग्नेश या लग्नाधिपति कहते हैं।
  • १, ४, ७, १० भावों को केंद्र स्थान कहते हैं।
  • २, ५, ८, ११, १२ को पणफर ग्रह कहते हैं। 
  • ३,  ६, ९ को आपोक्लिम ग्रह कहते हैं। 
  • ५, ९ को त्रिकोण स्थान कहते हैं।
  • ९वें   को त्रि-त्रिकोण स्थान कहते हैं। 
  • २, ८ को मारक स्थान कहते हैं। 
  • ३, ६, १०, ११ को उपचय स्थान कहते हैं। 
  • ६, ८, १२ को त्रिक स्थान कहते हैं। 
  • ३, ६, ११ को त्रिषडाय स्थान कहते हैं। 
  • दूसरे भाव को द्रव्य स्थान और उसके स्वामी को द्रव्येश कहते हैं। 
  • तीसरे भाव को पराक्रम स्थान और उसके स्वामी को पराक्रमेश कहते हैं। 
  • चौथे स्थान को सुख स्थान या मातृ स्थान और उसके स्वामी को सुखेश कहा गया है। 
  • पाँचवे स्थान को विद्या स्थान, संतान स्थान या सुत स्थान भी कहते हैं और उसके स्वामी को पंचमेश या सुतेश कहा गया है। 
  • छठे स्थान को कष्ट स्थान और उसके स्वामी को कष्टेश कहते हैं। 
  • सातवें भाव को जाया स्थान और उसके स्वामी को सप्तमेश अथवा जायेश कहते हैं। 
  • आठवें भाव को मृत्यु स्थान और  मारकेश या मृतेश भी कहा गया है। 
  • नौवें भाव को भाग्य स्थान और उसके स्वामी को भाग्येश के नाम से पुकारा जाता है। 
  • दसवें भाव को कर्म स्थान या राज्य स्थान कहा जाता है तथा उसके स्वामी को कर्मेश या राज्येश कहा जाता है। 
  • ग्यारहवें भाव को आय स्थान और उसके स्वामी को आयेश कहते हैं। 
  • बारहवें भाव को व्यय स्थान और उसके स्वामी को व्ययेश कहते हैं।

Sunday, January 11, 2015

कुंडली का फलकथन करने से पूर्व विचार करने योग्य बातें :-

  • किसी भी ग्रह की महादशा में उसी ग्रह की अन्तर्दशा अनुकूल फल नहीं देती। 
  • योगकारक ग्रह की महादशा में पापी या मारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में शुभ फल तथा उत्तरार्द्ध में अशुभ फल देने लगता है। 
  • अकारक ग्रह की महादशा में कारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में अशुभ तथा उत्तरार्द्ध में शुभ फल की प्राप्ति होती है।
  • भाग्य स्थान का स्वामी यदि भाग्य भाव में बैठा हो और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो ऐसा व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली माना जाता है।
  • लग्न का स्वामी सूर्य के साथ बैठकर विशेष अनुकूल रहता है।
  • सूर्य के समीप निम्न अंशों तक जाने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं, (चन्द्र-१२ अंश, मंगल-१७ अंश, बुध-१३ अंश, गुरु-११ अंश, शुक्र-९ अंश, शनि-१५ अंश) फलस्वरूप ऐसे ग्रहों का फल शून्य होता है। अस्त ग्रह जिन भावों के अधिपति होते हैं उन भावों का फल शून्य ही समझना चाहिए। 
  • सूर्य उच्च  का होकर यदि ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली तथा पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तित्व होता है।
  • सूर्य और चन्द्र को छोड़कर यदि कोई ग्रह अपनी राशि में बैठा हो तो वह अपनी दूसरी राशि के प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।
  • किसी भी भाव में जो ग्रह बैठा है, इसकी अपेक्षा जो ग्रह उस भाव को देख रहा होता है, उसका प्रभाव ज़्यादा रहता है।
  • जिन भावों में शुभ ग्रह बैठे हों या जिन भावों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो वे भाव शुभ फल देने में सहायक होते हैं।
  • एक ग्रह दो भावों का अधिपति होता है। ऐसी स्थिति में वह ग्रह अपनी दशा में लग्न से गिनने पर जो राशि पहले आएगी उसका फल वह पहले प्रदान करेगा।
  • दो केन्द्रों  का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण के स्वामी के साथ बैठे हैं तो उसे केंद्रत्व दोष नहीं लगता और वह शुभ फल देने में सहायक हो जाता है। सामान्य नियमों के अनुसार यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो वह अशुभ फल देने लग जाता है चाहे वह जन्म-कुंडली में करक ग्रह ही क्यों न हो।
  • अपने भाव से केन्द्र व कोण में पड़ा हुआ ग्रह शुभ होता है। 
  • केंद्र के स्वामी तथा त्रिकोण के स्वामी के संबंध हो तो वे एक दूसरे की दशा में शुभ फल देते हैं।  यदि संबंध न हो तो एक की महादशा में जब दूसरे की अंतर्दशा आती है तो अशुभ फल ही प्राप्त होता है।
  • वक्री होने पर ग्रह अधिक बलवान हो जाता है तथा वह ग्रह जन्म-कुंडली में जिस भाव का स्वामी है, उस भाव को विशेष फल प्रदान करता है। 
  • यदि भावाधिपति उच्च, मूल त्रिकोणी, स्वक्षेत्री अथवा मित्रक्षेत्री हो तो शुभ फल करता है।
  • यदि केन्द्र का स्वामी त्रिकोण में बैठा हो या त्रिकोण  केंद्र में हो तो वह ग्रह अत्यन्त ही श्रेष्ठ फल देने में समर्थ होता है। जन्म-कुंडली में पहला, पाँचवा तथा नवाँ  भाव त्रिकोण स्थान कहलाते हैं। परन्तु कोई ग्रह त्रिकोण में बैठकर केंद्र के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करता है तो वह न्यून योगकारक ही माना जाता है।
  • त्रिक स्थान (कुंडली के ३, ६, ११वे भाव को त्रिक स्थान कहते हैं) में यदि शुभ ग्रह बैठे हो तो त्रिक स्थान को शुभ फल देते हैं परन्तु स्वयं दूषित हो जाते हैं और अपनी शुभता खो देते हैं। 
  • यदि त्रिक स्थान में पाप ग्रह बैठे हों तो त्रिक भावों को पापयुक्त बना देते हैं पर वे ग्रह स्वयं शुभ रहते हैं और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं। 
  • चाहे अशुभ या पाप ग्रह ही हो, पर यदि वह त्रिकोण भाव में या त्रिकोण भाव का स्वामी होता है तो उसमे शुभता आ जाती है।
  • एक ही त्रिकोण का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण भाव में बैठा हो तो उसकी शुभता समाप्त हो जाती है और वह विपरीत फल देते है। जैसे पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में हो तो संतान से संबंधित परेशानी रहती है या संतान योग्य नहीं होती।
  • यदि एक ही ग्रह जन्म-कुंडली में दो केंद्रस्थानों का स्वामी हो तो शुभफलदायक नहीं रहता। जन्म-कुंडली में पहला, चौथा, सातवाँ तथा दसवां भाव केन्द्र स्थान कहलाते हैं।
  • शनि और राहु विछेदात्मक ग्रह हैं अतः ये दोनों ग्रह जिस भाव में भी होंगे संबंधित फल में विच्छेद करेंगे जैसे अगर ये ग्रह सप्तम भाव में हों तो पत्नी से विछेद रहता है। यदि पुत्र भाव में हों तो पुत्र-सुख में न्यूनता रहती है। 
  • राहू या केतू  जिस भाव में बैठते हैं उस भाव की राशि के स्वामी  समान बन जाते हैं तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं।
  • केतु जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है उस ग्रह के प्रभाव को बहुत अधिक बड़ा देता है।
  • लग्न का स्वामी जिस भाव में भी बैठा होता है उस भाव को वह विशेष फल देता है तथा उस भाव की वृद्धि करता है।
  • लग्न से तीसरे स्थान पर पापी ग्रह शुभ प्रभाव करता है लेकिन शुभ ग्रह हो तो मध्यम फल मिलता है। 
  • तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रहों का रहना शुभ माना जाता जाता है।
  • तीसरे भाव का स्वामी तीसरे में, छठे भाव का स्वामी छठे में या ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे ग्रह पापी नहीं रहते अपितु शुभ फल देने लग जाते हैं।
  • चौथे भाव में यदि अकेला शनि हो तो उस व्यक्ति की वृद्धावस्था अत्यंत दुःखमय व्यतीत होती है। 
  • यदि मंगल चौथे, सातवें , दसवें भाव में से किसी भी एक भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति का गृहस्थ जीवन दुःखमय होता है। पिता से कुछ भी सहायता नहीं मिल पाती और जीवन में भाग्यहीन बना रहता है।
  • यदि चौथे भाव का स्वामी पाँचवे भाव में हो और पाँचवें भाव का स्वामी चौथे भाव में हो तो विशेष फलदायक होता है।  इसी प्रकार नवम भाव का स्वामी दशम भाव में बैठा हो तथा दशम भाव का स्वामी नवम भाव में बैठा हो तो विशेष अनुकूलता देने में समर्थ होता है। 
  • अकेला गुरु यदि पंचम भाव में हो तो संतान से न्यून सुख प्राप्त होता है या प्रथम पुत्र से मतभेद रहते हैं।
  • जिस भाव की जो राशि होती है उस राशि के स्वामी ग्रह को उस भाव का अधिपति या भावेश कहा जाता है। छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी जिन भावों में रहते हैं, उनको बिगाड़ते हैं, किन्तु अपवाद रूप में यदि यह स्वगृही ग्रह हों तो अनिष्ट फल नहीं करते, क्योंकि स्वगृही ग्रह का फल शुभ होता है। 
  • छठे भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठेगा, उस भाव में परेशानियाँ रहेगी। उदहारण के लिए छठे भाव का स्वामी यदि आय भाव में हो तो वह व्यक्ति जितना परिश्रम करेगा उतनी आय उसको प्राप्त नहीं सकेगी।
  • यदि सप्तम भाव में अकेला शुक्र हो तो उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन सुखमय नहीं रहता और पति-पत्नी में परस्पर अनबन बनी रहती है।
  • अष्टम भाव का स्वामी जहाँ भी बैठेगा उस भाव को कमजोर करेगा।
  • शनि यदि अष्टम भाव में हो तो उस व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।
  • अष्टम भाव में प्रत्येक ग्रह कमजोर होता है परन्तु सूर्य या चन्द्रमा अष्टम भाव में हो तो कमजोर नहीं रहते।
  • आठवें और बारहवें भाव में सभी ग्रह अनिष्टप्रद होते हैं, लेकिन बारहवें घर में शुक्र इसका अपवाद है क्योंकि शुक्र भोग का ग्रह है  बारहवां भाव भोग का स्थान है।
  • यदि शुक्र बारहवें भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति अतुलनीय धनवान एवं प्रसिद्ध व्यक्ति होता है। 
  • द्वादश भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठता है, उस भाव को हानि पहुँचाता है। 
  • दशम भाव में सूर्य और मंगल स्वतः ही बलवान माने गए हैं, इसी प्रकार चतुर्थ भाव में चन्द्र और शुक्र, लग्न में बुध तथा गुरु और सप्तम भाव में शनि स्वतः ही बलवान हो जाते हैं तथा विशेष फल देने में सहायक होते हैं।
  • ग्यारहवें भाव में सभी ग्रह अच्छा फल करते हैं। 
  • अपने स्वामी ग्रह से दृष्ट, युत या शुभ ग्रह से दृष्ट भाव बलवान होता है। 
  • किस भाव का स्वामी कहाँ स्थित है तथा उस भाव के स्वामी का क्या फल है, यह भी देख लेना चाहिए।
  • यदि कोई ग्रह जिस राशि में है उसी नवमांश में भी हो तो वह वर्गोत्तम ग्रह कहलाता है और ऐसा ग्रह पूर्णतया बलवान माना जाता है तथा श्रेष्ठ फल देने में सहायक होता है।