Thursday, May 17, 2012

शनि के विशिष्ट योग

  • यदि शनि लग्न में स्वगृही हो, मार्गी हो तो उसके शत्रु दैवी विपत्तियों से स्वतः ही नष्ट हो जाता है।
  • लग्न में यदि शनि वक्री हो तो जातक हत्यारा हो सकता है, पकड़ा नहीं जाता लेकिन गुरु एवं शुभ ग्रहों कि दृष्टि हो तो हत्या नहीं करता।
  • मृत्यु का असली करक ग्रह शनि होता है। मृत्यु से पहले शनि के हाथ जरूर लगते हैं तभी मृत्यु होती है।
  • यदि  शनि वायु राशि में होता है तो ज़हर से मृत्यु होती है।
  • यदि  शनि अग्नि राशि में होता है तो भी ज़हर से मृत्यु होती है।
  • यदि  शनि पृथ्वी राशि में होता है तो मारपीट से मृत्यु होती है।
  •  यदि  शनि जल राशि में होता है तो औषधि के विपरीत परिणाम से मृत्यु होती है।
  • अष्टम भाव में गोचर में जब शनि आता है और शून्य अंश पार कर जाता है तो वृद्ध महिला या पुरुष से अपार धन दिलवाता है।
  • यदि  शनि वायु ३, ७, ११ मिथुन, तुला, कुम्भ का शनि छठे भाव में हो तो जातक सदैव रोगी रहता है।
  • यदि  जीवन में शनि की दशा चौथे की आ जाए तो जीवन बड़ा दुःख, दरिद्र, आपत्ति बंधन योग ये सब होते हैं। स्त्रियों के लिए आठवाँ महीना बड़ा ख़राब होता है।
  •  षड्वर्ग में यदि शनि को तीन से अधिक वोट मिलते हैं तो शनि शुभ होता है।
  • शुभ  शनि शारीरिक क्षमता को छोड़कर सब सुख देता है परन्तु जिन-जिन अंगों को देखता है उनको कष्ट देता है।
  • कुंभ लग्न वाले जातको का शनि छठे घर में गोचर में यदि कर्क का होता है तो जातक को रोग देता है परन्तु जब षडवर्ग निर्बल होगा तब अत्यधिक रोग देगा और शनि का संबंध ६, ८, १२ से होगा तब भी।
  • षडवर्ग में जातक का जो अंग निर्बल है उसकी निर्बलता या दुर्बलता समाप्त करना कठिन कार्य है जैसे दिल में सुराख, सफ़ेद दाग, गंजापन, नपुंसकता एवं अंगों का टेढ़ापन आदि।
  • शनि  छठे भाव में जातक को रोग मुक्त नहीं होने देता ।
  • शनि  अष्टम भाव में झगड़े, झंझट, फसाद करवाता है, बिना कारण अनेक उत्पात उत्पन्न कराता है।
  • बारहवें  का शनि सब धन को नष्ट कराकर शव यात्राएं, जेल यात्राएं, निर्धनता आदि योग देता है।पहले ६ वर्ष बहुत दुःखदायी होते हैं, दूसरे ६ वर्ष में बहुत उन्नति करता है और आखिरी के ६ वर्ष में सब कुछ नष्ट करा देता है।
  • ११वे भाव में नीच का शनि बेईमानी से धन इकट्ठा करवाता है और पता नहीं लगने देता कि कितनी  बेईमानी की है। बुध भी ११वे भाव में बेईमानी करवाता है।
  • यदि  मंगल शनि को देख ले तो बेईमानी नहीं करवाता।
  • ११वे भाव में शनि जो बेईमानी करवाता है वह बुध की महादशा में प्रकट हो जाती है।
  • शनि  का किसी प्रकार बुध से संबंध हो जाए तो बेईमानी से धन अर्जित करवाता है। 

Saturday, April 21, 2012

हर्षल ग्रह विलक्षणता का द्योतक है

शनि के उपरान्त हर्षल की सौर मंडल में स्थिति है जिसका वायुमंडल शनि और बृहस्पति के तुल्य है। यह सूर्य से १ अरब ७८ करोड़ २३ लाख मील दूर है जबकि पृथ्वी से इसकी दूरी १ अरब ६९ करोड़ मील आंकी गयी है, यह ग्रह मंद गति से पूर्व से पश्चिम की और सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। सूर्य की परिक्रमा करने में इसे ८४ वर्ष का समय लगता है। स्थूल मान से यह ७ वर्ष मैं एक राशि चक्र पूरा कर लेता है। हर्षल ग्रह की खोज १३ मार्च १७८१ को सर विलियम हर्बल ने की थी अतः अंक ज्योतिष की गणना अनुसार मूलांक ४ को इसका प्रतिनिधि अंक माना गया है। अंक ४ की विषेशतानुसार ही खगोलज्ञो ने एवं ज्योतिषवेत्ताओ ने वर्षों तक शोध एवं निरीक्षण किया जिसमें दैनिक गति एवं वार्षिक गतियों का संकलन करके फलित सिद्धांतों की खोज की जो काफ़ी आश्चर्यजनक निकले। 

आधुनिक ज्योतिषयों ने हर्षल को ज्ञान, विज्ञान से संपन्न, जागृति का द्योतक, सर्वाधिक विलक्षण खोज युक्त, अनूठा एवं अदभुत ग्रह माना है, यह भी अन्य ग्रहों की भांति जनमानस को प्रभावित करता है। इसकी मित्र राशियां मिथुन, तुला एवं कुम्भ है। यह ग्रह बुध, गुरु एवं शनि के साथ शुभ फल देता है। अन्वेषण, पर्वतारोहण, देशाटन कार्यों में ख्याति देता है। हर्षल मैं परम्परावादी विचारधारा से हटकर नया करने की प्रकृति पाई जाती है, सार्वजनिक जीवन के सम्बन्ध में नये नियम बनाने का कार्य हर्षल प्रधान व्यक्ति करते है। 

विश्वप्रसिद्ध भविष्यवक्ता कीरो ने हर्षल अंक वाले व्यक्तियों के बारे में बताया है की ऐसे व्यक्तियों का मूल्यांकन करना कठिन होता है यह लोग जैसे दिखाई देते है ठीक उसके विपरीत दृष्टिकोण रखने वाले होते हैं। तर्क-वितर्क करने और विपक्ष में रहने के कारण अनेक लोग उनके शत्रु बन जाते हैं, ये लोग वकालत के व्यवसाय मैं अच्छे सिद्ध होते हैं। बुध हर्षल योग उच्चकोटि की सफलता दिलाता है जबकि गुरु हर्षल योग उच्चकोटि का विद्वान बनाता है, शनि के साथ अध्यात्म ज्ञान की और उन्मुख करता है जबकि मंगल के साथ शुभ प्रभाव में उच्च कोटि का सेनानायक और अशुभ स्थिति में रहने पर विध्वंसक बनाता है। सूर्य से विरोधी विचारधारा रखकर यह विद्रोही प्रकृति का बनाता है ऐसा जातक अधिकांश पितृ-विरोधी देखा गया है। चंद्र के साथ तंत्र-मंत्र एवं जादू-टोना की और प्रवृत्त करता है। आधुनिक जगत मैं विद्युत-विकास, इलेक्ट्रोनिक्स, सिनेमा, जनसंचार प्रणाली, अंतरिक्ष अनुसंधान एवं अन्य वैज्ञानिक उपलब्धियों का संबंध हर्षल ग्रह से माना गया है। यह वायुवेग प्रिय ग्रह है। आधुनिक ज्योतिर्विदों ने कुम्भ राशि पर इसका स्वामित्व स्वीकार किया है।

यह ग्रह प्रभाव युक्त होने पर उद्वेग, हठ, आकस्मिक दुर्भाग्य एवं निराशा का संचार करने लगता है। विघटन, विनाश अथवा सामूहिक विपत्तियों का सृजन करता है। क्रान्ति, विद्रोह, राजनैतिक उथल-पुथल, मोटर, रेल एवं वायुयान दुर्घटनाएं इसके कुप्रभाव का परिणाम हैं। राष्ट्रों, प्रान्तों एवं घनिष्ठ संबंधों के मध्य विघटन करवाने की भूमिका इसी हर्षल ग्रह की कुदृष्टि का परिणाम होती है। यह चंद्र अथवा सूर्य के निकट होने पर दांपत्य सुख में कमी करके व्यक्ति को एकाकी एवं विघटनकारी बनाता है। शुक्र के साथ बुरे कार्यों की और ले जाता है, मादक पदार्थ का सेवन करवाता है। यह ग्रह रात्रि बली, गुप्तचरों का प्रतिनिधि, चमत्कारिक एवं विस्मयकारी गुणों से युक्त तमोगुणी ग्रह है। इस ग्रह के गुण, लक्षण, वृति, दृष्टि प्रभावों का शुभाशुभ ज्ञान ज्योतिष ज्ञान में परिमार्जन एवं परिवर्धन हेतु परम आवश्यक है।

Friday, April 6, 2012

नाड़ी दोष परिहार

नक्षत्र मेलापक के अष्ट कूटों में नाड़ी सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह व्यक्ति के मन एवं मानसिक ऊर्जा की सूचक होती है। व्यक्ति के निजी सम्बन्ध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते है। जिन-जिन व्यक्तियों में भावनात्मक पूरकता होती है, उनके संबंधो में घनिष्टता और जिनमें भावनात्मक समानता, या प्रतिद्वंदिता होती है, उनके संबंधों में टकराव पाया जाता है

जैसे शरीर के वात, पित्त एवं कफ़, इन तीन दोषों की जानकारी उनकी कलाई पर चलने वाली नाड़ियों से प्राप्त की जाती है। उसी प्रकार अपरिचित व्यक्तियों के भावनात्मक लगाव की जानकारी आदि, मध्य एवं अंत्य नाड़ी के द्वारा मिलती है। वैदिक ज्योतिष के आचार्यों ने आदि, मध्य एवं अंत्य इन तीनो नाड़ियों को यथाक्रमेण, आवेग, उद्वेग एवं संवेग का सूचक माना है। कुछ अन्य आचार्यों का मत है कि तीनो  नाड़ियां, यथाक्रमेण, संकल्प, विकल्प एवं प्रतिक्रिया की सूचक होती हैं। मानवीय मन भी कुल मिलाकर संकल्प, विकल्प या प्रतिक्रिया ही करता है और व्यक्ति की मनोदशा का मूल्यांकन उसके आवेग, उद्वेग या संवेग के द्वारा होता है। इस प्रकार मेलापक में नाड़ी के माध्यम से जातक की मानसिकता, मनोदशा का मूल्यांकन किया जाता है। 

वैदिक ज्योतिष के मेलापक प्रकरण में गणदोष, भकूट दोष एवं नाड़ी दोष - इन तीनों को सावधिक महत्त्व दिया जाता है। यह इस बात से ही स्पष्ट है कि ये तीनों ३६ गुणों में से (६+७+८=२१) कुल २१ गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। शेष पाँचों कूट (वर्ण, वश्य, तारा, योनि एवं ग्रह मैत्री) १५ गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अकेली नाड़ी के ८ गुण होते हैं, जो वर्ण, वश्य आदि ८ कूटों कि तुन्लना में सर्वाधिक हैं। इसलिए नक्षत्र मेलापक में नाड़ी दोष एक महादोष माना जाता है। 

नाड़ी विचार - नाड़ी कूट में ३  नाड़ियां होती हैं आदि नाड़ी, मध्य नाड़ी एवं अंत्य नाड़ी। नक्षत्रों की संख्या २७ और  नाड़ियों की संख्या ३ होने के कारण प्रत्येक नाड़ी में ९-९ नक्षत्र आते हैं। व्यक्ति की नाड़ी का निश्चय उसके जन्म नक्षत्र के आधार पर किया जाता है।

नाड़ी दोष - जिस प्रकार वात प्रकृति के व्यक्ति के लिए वात गुण वाले पदार्थों का सेवन एवं वातावरण वर्जित होता है, अथवा कफ़ प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए कफ़ नाड़ी के चलने पर कफ़ प्रधान पदार्थों का सेवन एवं ठंडा वातावरण हानिकारक होता है, ठीक उसी प्रकार नक्षत्र  मेलापक में वर-वधू की एक समान नाड़ी का होना, उनके मानसिक और भावनात्मक ताल-मेल में हानिकारक होने के कारण, वर्जित माना गया है। तात्पर्य यह है कि लड़की-लड़के कि एक समान नाड़ियां हों तो उनका विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी मानसिकता के कारण, उनमें सामंजस्य होने कि सम्भावना अधिकतम पायी जाती है। इसलिए मेलापक  में आदि नाड़ी के साथ आदि का, मध्य नाड़ी के साथ मध्य का और अंत्य नाड़ी के साथ अंत्य का मेलापक वर्जित होता है, जबकि लड़की और लड़के को भिन्न-भिन्न नाड़ी होना उनके दांपत्य संबंधों में शुभता का द्योतक होता है।

जिस लड़की-लड़के का एक समान नक्षत्र हो, या एक समान राशि हो तो इस विशेष परिस्थिति में नाड़ी दोष प्रभावहीन हो जाता है जिसको नाड़ी दोष का परिहार कहते हैं। यह परिहार इन परिस्थितियों में होता है :-

यदि लड़की और लड़के का जन्म नक्षत्र एक ही हो, तो उन दोनों कि नाड़ी भी एक ही होगी और प्रथम दृष्टि मैं यह नाड़ी दोष प्रतीत होगा। किन्तु यदि एक ही नक्षत्र में उत्पन्न लड़की और लड़के के नक्षत्र के चरण भिन्न-भिन्न हों तो नाड़ी दोष कर परिहार हो जाता है। इसका कारण यह है कि एक समान नक्षत्र में उत्पन्न युगल के आठ कूटों में से सात कूट वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह-मैत्री, गण एवं भकुट शुभ एवं शुद्ध होते हैं। और एक समान नक्षत्र होने के कारण उनकी मानसिकता में आत्मीय भाव होता है। नक्षत्र के चरण भिन्न होने से नवमांश का भेद होने के कारण, उनमे पूरकता होती है। अतः इस स्थिति में उनके अहं के टकराव कि सम्भावना टल जाती है। परिणामस्वरूप एक नक्षत्र में भिन्न-भिन्न चरणों में उत्पन्न वर-वधु का, नाड़ी दोष होने पर भी विवाह किया जा सकता है।

नाड़ी के गुण - नक्षत्र मेलापक  में नाड़ी के ८ गुण होते हैं। यदि लड़के और लड़की कि भिन्न-भिन्न नाड़ी हो तो ८ गुण मिलते हैं और यदि उन दोनों कि एक समान नाड़ी हो तो गुण शून्य होता है। नाड़ी के गुणों कि जानकारी इस चक्र से की जा सकती है :-


उदाहरण मेलापक के प्रचलित उदाहरण में लड़की का जन्म उत्तराफाल्गुनी और लड़के का जन्म नक्षत्र पुष्य है। इसलिए, नियमानुसार लड़की की नाड़ी आदि और लड़की की नाड़ी मध्य है क्योंकि इन दोनों की नाडियाँ भिन्न-भिन्न हैं। अतः इस उदाहरण मैं नाड़ी दोष नहीं है और इनकी नाड़ियों के ८ गुण मिलते है। परिणामतः इनका विवाह किया जा सकता है।

Friday, March 16, 2012

मानव पर शनि की दशा

शनि  जहाँ दिवालियेपन का कारण बनता है, वहीं यह ऐशो-आराम की जिंदगी भी प्रदान करता है....

मानव पर ग्रहों का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है,उन ग्रहों में भी शनि एक प्रबल ग्रह माना गया है। शनि ग्रह प्रधान व्यक्ति उच्च श्रेणी के दिमागी कार्य किया करते हैं। शनि प्रधान व्यक्ति मैकेनिक, डॉक्टर, इंजिनियर, लेखक, संगीतकार, ज्योतिष, राजनेता, तांत्रिक, अभिनेता, पुलिस तथा अच्छे शासक हुआ करते हैं। ऐसे व्यक्ति बड़े उद्योगपति तथा खतरनाक,विस्फोटक सामग्री के निर्माणकर्ता हुआ करते हैं।  

शनि प्रधान व्यक्ति खतरों से खेलने में अन्य ग्रह वाले व्यक्ति से आगे रहते हैं,यह हिम्मत के धनी होते हैं,किसी के अधीन होकर काम करना इन्हें पसंद नहीं,थोड़ी सी असफलता में चिंताग्रस्त हो जाते हैं,लेकिन उन परिस्थितियों से आखिरी दम तक लड़ने की कोशिश करते हैं। इनका बचपन कष्टदायक होता है, पत्नी तो अच्छी मिलती है, फिर भी इनके मन को संतुष्टि नहीं मिल पाती,  दूसरे की पत्नी की तारीफ़ करना इनकी आदत सी होती है,स्वास्थय सामान्य होता है और यह हमेशा चिंतित रहते हैं।

ऐसे  व्यक्तियों की प्रेमिकाओं की संख्या एक से अधिक होती है, ये बातें काफ़ी बढ़ा-चढ़ा कर करते हैं, बातों में किसी को भी अपने सामने टिकने नहीं देते।  शनि की दशा अगर सामान्य रही, तो ऐसे व्यक्ति नशे की और झुक जाते हैं, सफलता इनके कदम चूमती है, मांस-मछली और अंडे खाने के ये शौकीन होते हैं। अंतिम अवस्था में ऐसे व्यक्ति ख़ाक से उठकर आसमान में स्थापित हो जाया करते हैं।

प्रारंभिक दौर

शनि की दशा के प्रारंभिक दौर में ऐसे व्यक्ति के हाथ में पैसा 'आया राम गया राम' ही रहता है, आमदनी से खर्च अधिक होने लगता है,  घर-परिवार में मतभेद हो जाता है,  पुत्रों की माँ-बाप से नहीं बनती,  छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव हो जाता है,  रिश्तों में दरार पड़ जाती है।  प्रारंभिक दौर में ऐसे व्यक्ति का स्वास्थय अच्छा होता है,  उसकी आमदनी भी अच्छी होती है,  रोजगार पूर्ण रूप से सफल रहता है, परन्तु खर्च भी इस क्रम में बढ़ जाता है। मित्रों की संख्या अधिक होती है तथा कई प्रशासनिक स्त्तर के अधिकारियों से संपर्क बन जाता है। इस दौर में गैरकानूनी ढंग से भी आय होती है।

द्वितीय दौर

द्वितीय दौर में शनि व्यक्ति को खर्चीला बना देता है,  पैसा बेवजह खर्च होने लगता है,  आज नहीं होगा,  तो कल होगा,  इसी आशा में वह पैसे खर्च करता रहता है, शराब ज़रूरत से ज्यादा पीने लगता है,  परिवार के सदस्यों में कटुता बन जाती है,  घर में कलह का कोई न कोई सूत्र हमेशा मौजूद रहता है;  मित्रों के ऊपर भी बेवजह पैसा खर्च होता है, प्रेमिका को पाने के लिए दिन-रात एक कर देता है, ऐसे समय में प्रेम पत्र लेखन, शायरी आदि भी की जाती है।  व्यापार के प्रति मोह कुछ कम रहता है, समय पर काम नहीं बनता तथा खाने-पीने के मामले में भी कोई नियम नहीं रह जाता, विभागीय तनाव भी बना रहता है, तबादले आदि की समस्या से मन खिन्न रहता है, मेहनत पूर्वक अच्छे कार्य करने पर भी अधिकारी व अन्य नाखुश से ही रहते हैं, पदोन्नति के मामले में भी निराशा का सामना करना पड़ता है; पढाई में भी कष्टों का सामना करना पढ़ता और अत्यधिक परिश्रम के बावजूद परीक्षा में बहुत ही सामान्य अंक प्राप्त हो पाते हैं।

तृतीय दौर

इस दौर में व्यक्ति को आर्थिक कष्टों का सामना करना पड़ता है, घर-परिवार में तनाव बढ़ जाता है, लड़ाई-झगड़ें, पुलिस, कोर्ट, कचहरी, डॉक्टर आदि का चक्कर पड़ जाता है, भाई-भाई में नफ़रत हो जाती है, परिवार में दरारें पड़ जाती हैं, अगर कोई प्रेम सम्बन्ध हो, तो वह भी कष्टदायक होता है, दोनों और से तनावग्रस्त माहौल, झगड़े, हिंसा आदि की नौबत भी आ सकती है।

शराब, जुआं आदि खेलने की आदत सी हो जाती है, संचित धन भी ख़त्म हो जाता है और किसी कारणवश जेल जाने की नौबत आ जाती है, सामाजिक और आर्थिक बदनामी होती है तथा समाज में भी ऐसा व्यक्ति चर्चा का विषय बन जाता है।

सरकारी नौकरी वाले के लिए भी यह संकट की घड़ी होती है, वरिष्ठ अधिकारियों से दण्डित होता है तथा 'सस्पेंड' होने की संभावनाएं रहती हैं। अगर कोई व्यक्ति ठेकेदारी कर रहा है, तो उसके मार्ग में बाधा उत्पन्न हो जाती है, आमदनी कम और खर्चा अधिक हो जाता है। पति-पत्नी के बीच संबंधो में दरार आ जाती है और घर छोड़ने की भी स्थिति बन जाती है; धन का आभाव रहता है, लेकिन ऐसे समय मैं कर्ज भी आसानी से मिल जाता है।

चौथा और अंतिम दौर 

शनि के अंतिम दौर को भी दो भागों में बांटा गया है ....

 प्रथम - प्रथम भाग में व्यक्ति कर्ज़दार बन जाता है, परिवार से संपर्क टूटा सा रहता है, जिसके परिणामस्वरूप अधिक कष्टों का सामना करना पड़ता है, दौड़-धूप की स्थिति बनी रहती है, प्रशासनिक स्तर के अधिकारियों से संपर्क टूट जाता है, आय का मार्ग भी लगभग कष्टदायक बन जाता है, व्यापार में घाटा होता है तथा जमा पूँजी भी खो बैठता है, नौकरी हाथ से निकल जाती है; विद्यार्थी जीवन संकट में होता है तथा परीक्षा में असफलता मिलती है, स्वभाव में चिडचिडापन आ जाता है, वैवाहिक जीवन भी कष्टदायक होता है, स्वास्थ्य गिर जाता है, धन कहीं से प्राप्त भी होता है, तो वह जेब में नहीं रुकता तथा सर्वत्र बदनामी का सामना करना पड़ता है।

व्यक्ति को किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिलती, मन अस्थिर रहता है, विचारों और कार्यों के बीच कोई तादात्मय  स्थापित नहीं हो पाता, ये किसी भी कार्य को स्थाई रूप से नहीं कर पाते, एक कार्य पूरा नहीं होता, की उसे छोड़ कर दूसरा कार्य प्रारंभ कर देते है, और सदैव असफल और चिंतित सा रहते हैं। ऐसे व्यक्ति को अंत में अपने आपको दिवालिया घोषित करना पड़ता है।

आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण ऐसे व्यक्ति गलत रास्ते पर चलने के लिए मजबूर हो जाते हैं, घर-परिवार का सहयोग नहीं मिल पता और हमेशा अपने आप में अकेलापन महसूस करते हैं, मित्र-स्वजन सम्बन्ध तोड़ देते हैं, ऐसे में आत्महत्या के विचार भी आते हैं, इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग ही नहीं दिखता; इनके अंदर क्रोध की भी अधिकता हो जाती है, लेकिन जितनी जल्दी क्रोध आता है, उतनी ही जल्दी उतर भी जाता है।

लेकिन कष्टों में भी ऐसे व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान होती है। इस अवधि में यदि उसका विवाह होता है, तो वैवाहिक जीवन सामान्य होता है, लेकिन आर्थिक स्थिति डांवाडोल बनी रहती है।

द्वितीय - शनि अकरक होने पर जहाँ एक ओर इंसान के भीतर आत्महत्या की भावना को प्रबल करता है, वहीं कारक होने पर यह व्यक्ति को झोपड़ी से महल में भी पहुंचा देता है। अंतिम चरण में शनि दो ही कार्य करता है - या तो झकझोर के रख देता है या बना देता है।

व्यक्ति के इस समय में दुर्घटना तथा मृत्यु की भी संभावनाएं बनी रहती है या शरीर के किसी हिस्से को नुकसान भी पहुँच सकता है।

यदि ऐसे समय में बृहस्पति प्रबल ओर सहायक रहा तो ऐसा व्यक्ति पूर्ण सुख भोग ऐश्वर्य प्राप्त करता है, धन की वर्षा सी होने लग जाती है, वाहन सुख, व्यापार वृद्धि, चुनाव में पूर्ण सफलता, सरकारी नौकरी लगना, नौकरी में प्रमोशन प्राप्त होती है, यो कहा जाये तो उसके जीवन में परिवर्तन आ जाता है। ऐसे व्यक्ति की उन्नति भी समाज में चर्चा का विषय होती है, व्यापार, नौकरी, विद्या अध्ययन में चतुर्दिक सफलता प्राप्त होती है एवं सुखद यात्राओं का योग बनता है।

ऐसे समय में यदि विवाह होता है, तो पत्नी सुंदर ओर हंसमुख होती है, तथा प्रथम संतान के रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

Saturday, March 10, 2012

कैसे जगाए अपनी जन्म-कुण्डली के सोए हुए घर

लाल किताब के अनुसार जिस घर में कोई ग्रह न हो तथा जिस घर पर किसी ग्रह की नज़र नहीं पड़ती हो उसे सोया हुआ घर माना जाता है. लाल किताब का मानना है जो घर सोया होता है उस घ्रर से सम्बन्धित फल तब तक प्राप्त नहीं होता है जबतक कि वह घर जागता नहीं है. लाल किताब में सोये हुए घरों को जगाने के लिए कई उपाय बताए गये हैं.

  1. जिन लोगों की कुण्डली में प्रथम भाव सोया हुआ हो उन्हें इस घर को जगाने के लिए मंगल का उपाय करना चाहिए. मंगल का उपाय करने के लिए मंगलवार का व्रत करना चाहिए. मंगलवार के दिन हनुमान जी को लडुडुओं का प्रसाद चढ़ाकर बांटना चाहिए. मूंगा धारण करने से भी प्रथम भाव जागता है.
  2. अगर दूसरा घर सोया हुआ हो तो चन्द्रमा का उपाय शुभ फल प्रदान करता है. चन्द्र के उपाय के लिए चांदी धारण करना चाहिए. माता की सेवा करनी चाहिए एवं उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. मोती धारण करने से भी लाभ मिलता है.
  3. तीसरे घर को जगाने के लिए बुध का उपाय करना लाभ देता है. बुध के उपाय हेतु दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए. बुधवार के दिन गाय को चारा देना चाहिए.
  4. लाल किताब के अनुसार किसी व्यक्ति की कुण्डली में अगर चौथा घर सोया हुआ है तो चन्द्र का उपाय करना लाभदायी होता है.
  5. पांचवें घर को जागृत करने के लिए सूर्य का उपाय करना फायदेमंद होता है. नियमित आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ एवं रविवार के दिन लाल भूरी चीटियों को आटा, गुड़ देने से सूर्य की कृपा प्राप्त होती है.
  6. छठे घर को जगाने के लिए राहु का उपाय करना चाहिए. जन्मदिन से आठवां महीना शुरू होने पर पांच महीनों तक बादाम मन्दिर में चढ़ाना चाहिए, जितना बादाम मन्दिर में चढाएं उतना वापस घर में लाकर सुरक्षित रख दें. घर के दरवाजा दक्षिण में नहीं रखना चाहिए. इन उपायों से छठा घर जागता है क्योंकि यह राहु का उपाय है.
  7. सोये हुए सातवें घर के लिए शुक्र को जगाना होता है. शुक्र को जगाने के लिए आचरण की शुद्धि सबसे आवश्यक है.
  8. सोये हुए आठवें घर के लिए चन्द्रमा का उपाय शुभ फलदायी होता है.
  9. जिनकी कुण्डली में नवम भाव सोया हो उनहें गुरूवार के दिन पीलावस्त्र धारण करना चाहिए. सोना धारण करना चाहिए व माथे पर हल्दी अथवा केशर का तिलक करना चाहिए. इन उपाय से गुरू प्रबल होता है और नवम भाव जागता है.
  10. दशम भाव को जागृत करने हेतु शनिदेव का उपाय करना चाहिए.
  11. एकादश भाव के लिए भी गुरू का उपाय लाभकारी होता है.
  12. अगर बारहवां घ्रर सोया हुआ हो तो घर मे कुत्ता पालना चाहिए. पत्नी के भाई की सहायता करनी चाहिए. मूली रात को सिरहाने रखकर सोना चाहिए और सुबह मंदिर मे दान करना चाहिए.

नवमांश की उपयोगिता

सभी वर्ग कुंडलियों में नवमांश सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। विम्शोपक बल में भी जन्म कुंडली के बाद सबसे महत्वपूर्ण नवांश ही हैं। विम्शोपक बल में लग्न कुंडली के बाद सबसे अधिक अंक नवांश को दिए गए हैं। जन्म कुंडली और नवांश को देख कर ही आप ग्रह किस नक्षत्र और चरण में हैं ज्ञात कर सकते हैं। ज्योतिषीय ग्रन्थ जैसे बृहत् पराशर होरा शास्त्र, जातक पारिजात, चंद्र नाडी कला, बृहत् जातक इत्यादि में नवांश के उपयोग कई स्थानों पर वर्णित हैं। 

नवमांश के उपयोग
  1. यदि ग्रह जन्म कुंडली में निर्बल अर्थात पाप ग्रहों से दृष्ट नीच का हो, अस्त हो परन्तु नवांश में बली हो तो ग्रह के पास बल होता हैं। 
  2. अस्त ग्रह यदि नवांश में सूर्य से २ भाव से अधिक दूरी पर हो तो अस्त ग्रह भी फल देने में सक्षम होता हैं। 
  3. कोई भी ग्रह यदि मित्र तथा सौम्य ग्रह के नवांश में हो तो उस ग्रह का फल अवश्य और शुभ मिलता हैं। 
  4. शुभ राशि में वर्गोत्तम ग्रह शुभ फल देता हैं। 
  5. क्रूर राशि में वर्गोत्तम ग्रह संघर्षो के बाद परिणाम देता है। 
सारावली के अनुसार, चंद्र राशि हमारे स्वभाव को दर्शाती हैं परन्तु यदि जिस नवांश में चंद्र हैं. उसका स्वामी अधिक बली हो तो स्वभाव नवांश के अनुसार होगा। 
सर्वार्थ चिंतामणि के अनुसार, यदि चतुर्थ भाव का स्वामी जिस नवांश में हैं उसका स्वामी लग्न कुंडली में केन्द्रगत हो तो ऐसे जातक को घर-सम्पदा का सुख अवश्य प्राप्त होता हैं। 
परन्तु यदि वह त्रिक भाव (६-८-१२) में हो तो ऐसे जातक को घर-सम्पदा के सुख की हानि होती हैं। ऐसे श्लोक हमे बाध्य करते हैं कि हम नवांश के स्वामी की स्थिति फल कथन से पहले अवश्य विचार लें। 
जब सर्वार्थ चिंतामणी के श्लोक पर ध्यान देते हुए परिणाम अद्भुत था। यदि भावेश का नवांश अधिपति लग्न कुंडली मे केंद्र अथवा त्रिकोण में बली हो तो उस भाव के फल अवश्य मिलते हैं और यदि भावेश का नवांश अधिपति निर्बल होकर त्रिक भावो में हो तो निश्चय ही उस भाव के फल में कमी आएगी। 

कैसे करें बाधा निवारण

  1. प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिये भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोवे। यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक करें।
  2. रूके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई हो। इसकी आराधना करें। इसके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो एक लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। लौंग को चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें `जय गणेश काटो कलेश´
  3. किसी के प्रत्येक शुभ कार्य में बाधा आती हो या विलम्ब होता हो तो रविवार को भैरों जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ा कर बटुक भैरव स्तोत्र´´ का एक पाठ कर के गौ, कौओं और काले कुत्तों को उनकी रूचि का पदार्थ खिलाना चाहिए। ऐसा वर्ष में 4-5 बार करने से कार्य बाधाएं नष्ट हो जाएंगी।
  4. सिन्दूर लगे हनुमान जी की मूर्ति का सिन्दूर लेकर सीता जी के चरणों में लगाएँ। फिर माता सीता से एक श्वास में अपनी कामना निवेदित कर भक्ति पूर्वक प्रणाम कर वापस आ जाएँ। इस प्रकार कुछ दिन करने पर सभी प्रकार की बाधाओं का निवारण होता है।
  5. किसी शनिवार को, यदि उस दिन `सर्वार्थ सिद्धि योगहो तो अति उत्तम सांयकाल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप लें। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़ें। उसे स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। तब पत्ते पर अपनी कामना रुपी नापा हुआ लाल रेशमी सूत लपेट दें और पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं और कामनाओं की पूर्ति होती है।
  6. अक्सर सुनने में आता है कि घर में कमाई तो बहुत है, किन्तु पैसा नहीं टिकता, तो यह प्रयोग करें। जब आटा पिसवाने जाते हैं तो उससे पहले थोड़े से गेंहू में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर मिला लें तथा अब इसको बाकी गेंहू में मिला कर पिसवा लें। यह क्रिया सोमवार और शनिवार को करें। फिर घर में धन की कमी नहीं रहेगी।
  7. आटा पिसते समय उसमें 100 ग्राम काले चने भी पिसने के लियें डाल दिया करें तथा केवल शनिवार को ही आटा पिसवाने का नियम बना लें।
  8. शनिवार को खाने में किसी भी रूप में काला चना अवश्य ले लिया करें।
  9. संध्या समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सोने से पूर्व पैरों को ठंडे पानी से धोना चाहिए, किन्तु गीले पैर नहीं सोना चाहिए। इससे धन का क्षय होता है।
  10. रात्रि में चावल, दही और सत्तू का सेवन करने से लक्ष्मी का निरादर होता है। अत: समृद्धि चाहने वालों को तथा जिन व्यक्तियों को आर्थिक कष्ट रहते हों, उन्हें इनका सेवन रात्रि भोज में नहीं करना चाहिये।
  11. भोजन सदैव पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर के करना चाहिए। संभव हो तो रसोईघर में ही बैठकर भोजन करें इससे राहु शांत होता है। जूते पहने हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिए।
  12. सुबह कुल्ला किए बिना पानी या चाय न पीएं। जूठे हाथों से या पैरों से कभी गौ, ब्राह्मण तथा अग्नि का स्पर्श न करें।
  13. घर में देवी-देवताओं पर चढ़ाये गये फूल या हार के सूख जाने पर भी उन्हें घर में रखना अलाभकारी होता है।
  14. अपने घर में पवित्र नदियों का जल संग्रह कर के रखना चाहिए। इसे घर के ईशान कोण में रखने से अधिक लाभ होता है।