Wednesday, October 24, 2012

ग्रहों के वर्जित दान एवं कार्य

अक्सर अपने दैनिक जीवन में प्राय: हम एक कहावत विभिन्न अर्थों में सुनते हैं कि "नेकी कर दरिया में डाल" या नेकी करो और भूल जाओ. कभी-कभी अच्छे शब्दों में भी सुनते हैं, कि हम किसी के लिए कितना ही अच्छा क्यों न करें लेकिन बदले में हमेशा बुराई ही हाथ लगती है.

एक व्यक्ति किसी गरीब को भोजन कराता है, तो खाने वाला बीमार पड जाता है. किसी नें किसी को धन उधार दिया तो उसकी वसूली के समय देनदार नें कोई गलत कदम उठा लिया और बेचारा लेनदार बिना वजह मुसीबत में फँस गया. किसी की मदद करने चले तो उल्टा स्वयं ही अपने लिए मुसीबत मोल ले बैठे. अमूमन ऎसी सैकडों प्रकार की घटनायें आये दिन किसी न किसी प्रकार से किसी न किसी के साथ घटती ही रहती हैं.

दरअसल यह सब निर्भर करता है हमारी जन्मकुँडली में बैठे ग्रहों पर, जो यह संकेत करते हैं कि किस वस्तु का दान या त्याग करना अथवा कौन से कार्य हमारे लिए लाभदायक होगें और कौन सी चीजों के दान/त्याग अथवा कार्यों से हमें हानि का सामना करना पडेगा. इसकी जानकारी निम्नानुसार है.

जो ग्रह जन्मकुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, उनसे सम्बन्धित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए.

सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिँह राशि में होने पर अपनी स्वराशि का होता है.

अत: आपकी जन्मकुंडली में उक्त किसी राशि में हो तो:-

* लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें.

* गुड, आटा, गेहूँ, ताँबा आदि किसी को न दें.

* खानपान में नमक का सेवन कम करें. मीठे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए.

चन्द्र वृष राशि में उच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है. यदि आपकी जन्मकुंडली में ऎसी स्थिति में हो तो :-

* दूध, चावल, चाँदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें.

* माता अथवा मातातुल्य किसी स्त्री का कभी भूल से भी दिल न दुखायें अन्यथा मानसिक तनाव,   

  अनिद्रा एवं किसी मिथ्या आरोप का भाजन बनना पडेगा.

* किसी नल, टयूबवेल, कुआँ, तालाब अथवा प्याऊ निर्माण में कभी आर्थिक रूप से सहयोग न करें.

मंगल
मेष या वृश्चिक राशि में हो तो स्वराशि का तथा मकर राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--* मसूर की दाल, मिष्ठान अथवा अन्य किसी मीठे खाद्य पदार्थ का दान नहीं करना चाहिए.

* घर आये किसी मेहमान को कभी सौंफ खाने को न दें अन्यथा वह व्यक्ति कभी किसी अवसर पर आपके खिलाफ ही कडुवे वचनों का प्रयोग करेगा.

* किसी भी प्रकार का बासी भोजन (अधिक समय पूर्व पकाया हुआ) न तो स्वयं खायें और न ही किसी अन्य को खाने के लिए दें.


बुध मिथुन राशि में तो स्वगृही तथा कन्या राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में बुध उपरोक्त वर्णित किसी स्थिति में है तो :--* हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए.

* साबुत मूँग, पैन-पैन्सिल, पुस्तकें, मिट्टी का घडा, मशरूम आदि का दान न करें अन्यथा सदैव रोजगार और धन सम्बन्धी समस्यायें बनी रहेंगी.

* न तो घर में मछलियाँ पालें और न ही मछलियों को कभी दाना डालें.

बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में :--

* पीले रंग के पदार्थों का दान वर्जित है.

* सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुएं आदि का दान नहीं करना चाहिए. अन्यथा "घर का जोगी जोगडा, आन गाँव का सिद्ध" जैसी हालात होने लगेगी अर्थात मान-सम्मान में कमी रहेगी.

* घर में कभी कोई लतादार पौधा न लगायें.



शुक्र
जब जन्मपत्रिका में वृष या तुला राशि में हो स्वराशि तथा मीन राशि में हो तो उच्च भाव का होता है. अत ऎसी स्थिति में:--

* ऎसे व्यक्ति को श्वेत रंग के सुगन्धित पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यक्ति के भौतिक सुखों में न्यूनता पैदा होने लगती है.

* नवीन वस्त्र, फैशनेबल वस्तुएं, कास्मेटिक या अन्य सौन्दर्य वर्धक सामग्री, सुगन्धित द्रव्य, दही, मिश्री, मक्खन, शुद्ध घी, इलायची आदि का दान न करें अन्यथा अकस्मात हानि का सामना करना पडता है.


शनि
यदि मकर या कुम्भ राशि में हो तो स्वगृही होता है तथा तुलाराशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी दशा में :--

* काले रंग के पदार्थों का दान न करें.

* लोहा, लकडी और फर्नीचर, तेल या तैलीय सामग्री, बिल्डिंग मैटीरियल आदि का दान/त्याग न करें.


* भैंस अथवा काले रंग की गाय, काला कुत्ता आदि न पालें.

राहु यदि कन्या राशि में हो तो स्वराशि का तथा वृष (ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं मिथुन (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--

* नीले, भूरे रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए.

* मोरपंख, नीले वस्त्र, कोयला, जौं अथवा जौं से निर्मित पदार्थ आदि का दान किसी को न करें अन्यथा ऋण का भार चढने लगेगा.

* अन्न का कभी भूल से भी अनादर न करें और न ही भोजन करने के पश्चात थाली में झूठन छोडें.


केतु
यदि मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा वृश्चिक (ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं धनु (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में केतु उपरोक्त स्थिति में है तो :--

* घर में कभी पक्षी न पालें अन्यथा धन व्यर्थ के कामों में बर्बाद होता रहेगा.


* भूरे, चित्र-विचित्र रंग के वस्त्र, कम्बल, तिल या तिल से निर्मित पदार्थ आदि का दान नहीं करना चाहिए.

* नंगी आँखों से कभी सूर्य/चन्द्रग्रहण न देंखें अन्यथा नेत्र ज्योति मंद पड जाएगी अथवा अन्य किसी प्रकार का नेत्र सम्बन्धी विकार उत्पन होने लगेगा.


मकान की लग्न कुंडली

जिस प्रकार व्यक्ति पर ग्रह-गोचर की स्थिति का प्रभाव पड़ता है, उसी तरह मकान की कुंडली को भी ग्रह प्रभावित करते हैं। मकान की प्रतिकूल ग्रह स्थिति होने पर ग्रह शांति कराने से लाभ संभव है।


जिस प्रकार व्यक्ति की जन्म कुंडली होती है, उसी तरह मकान की भी जन्म कुंडली बनती है। भवन की जन्म कुंडली दो प्रकार की होती है। एक गृहारंभ के समय की तथा दूसरी गृह प्रवेश के समय की। जो संबंध शरीर और आत्मा का है अथवा जो कंप्यूटर की भाषा में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का है, वही गृहारंभ कुंडली और गृह प्रवेश की कुंडली का है।

भौगोलिक भूभाग का नाम देश है जो मूर्त होता है। अपने देश के प्रति जुड़ा रहना, वहां की नागरिकता होना यही राष्ट्रीयता है। इसका आधार राष्ट्र है। शरीर का ढांचा जो दिखाई देता है, वह मूर्त है। लेकिन चेतन धर्मा आत्मा अमूर्त है। कंप्यूटर में जो कुछ ढांचा दिखाई देता है, वह हार्डवेयर है तथा जो कार्यों को गति देता है, वह अमूर्त है- सॉफ्टवेयर कहलाता है। भवन के विषय में भी यही बात चरितार्थ होती है। कहावत है पुरूष मकान बनाता है और महिला उसे आशियाना [निवास] बनाती है।

जिस समय भवन की आधारशिला रखी जाती है, उस समय की लग्न कुंडली ही भवन की जन्म कुंडली है। उस कुंडली के अष्टम भाव से उस भवन की आयु का निर्णय किया जाता है। यदि उस कुंडली के अष्टम से मंगल का संबंध है तो अग्नि भय से भवन नष्ट होना संभव है। इसी प्रकार यदि अष्टम भाव से शुक्र चंद्र का संबंध हो और ये ग्रह निर्बल हों तो अधिक वर्षा के कारण मकान को क्षति होना संभव है। यदि अष्टम भाव पर शनि की दृष्टि हो तो तूफान के कारण मकान को क्षति होगी। अष्टम भाव से राहु का संबंध मकान पर अतृप्त आत्मा के प्रभाव की ओर संकेत करता है। अर्थात घर में पितर दोष होता है। कुंडली में पराक्रम भाव [तृतीय स्थान] धर्म भाव [नवम स्थान] एवं लाभ भाव [एकादश भाव] से सौम्य ग्रहों का संबंध मकान की सुख-समृद्धि कारक होने का संकेत है। संतान भाव [पंचम स्थान] और नवम भाव का सौम्य ग्रहों से संबंध वंशवृद्धि का सूचक है। भवन की कुंडली में केंद्र [1-4-7-10] त्रिकोण [5-9] एवं तृतीय एकादश भाव में से किसी भाव में बृहस्पति का होना मकान को सौभाग्यशाली बनाता है।

मकान के गृह प्रवेश के लग्न का अपना महžव है। लग्न, मकान में रहने वालों का जीवन कैसा समृद्धिशाली होगा, इस ओर संकेत करता है। यदि गृह प्रवेश कुंडली के लग्न का स्वामी अथवा दशम भाव का स्वामी छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो मकान का स्वामी अपने मकान का उपयोग नहीं कर पाता है या तो मकान किराए पर चलता है अथवा मकान मालिक के द्वारा मकान विक्रय कर दिया जाता है। यदि मंगल की दृष्टि लग्न पर हो अथवा मंगल का चतुर्थ भाव से संबंध हो तो गृह प्रवेश के पश्चात भी मकान में और निर्माण कार्य अतिशीघ्र कराया जाता है। यदि चतुर्थ भाव का संबंध शुक्र से हो तो गृह प्रवेश के थोड़े से ही अंतराल के पश्चात मकान मालिक को विशेष प्रकार के [अधिक सुविधायुक्त] वाहन का सुख प्राप्त होता है। गृह प्रवेश कुंडली में यदि बृहस्पति केंद्र अथवा त्रिकोण में हो तो गृह प्रवेश के पश्चात तेरह मास में उस घर में विवाह संपन्न होता है। यदि गृह प्रवेश लग्न से षष्ठ, अष्टम अथवा व्यय भाव में मकान मालिक का जन्म लग्न अथवा जन्म राशि हो तो क्रमश: विवाद-शत्रुता, लड़ाई-झगड़ा, शारीरिक कष्ट एवं आर्थिक संकट से मकान मालिक को गुजरना पड़ता है। गृह प्रवेश लग्न से अष्टम अथवा द्वादश भाव में राहु की स्थिति मकान में रहने वालों को पितर बाधा से पीडि़त करती है। जिस प्रकार व्यक्ति पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, उसी प्रकार मकान की कुंडली पर भी पाप ग्रहों का प्रभाव पड़ता है। ऎसी स्थिति में वास्तु शांति या ग्रह शांति कराने से लाभ होता है।



Tuesday, August 7, 2012

आपके इष्ट देव कौन हैं?


शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।

जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-

-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।
-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
-मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।

जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे- 
रविवार- विष्णु।                
सोमवार- शिवजी।            
मंगलवार- हनुमानजी
बुधवार- गणेशजी।           
गुरूवार- शिवजी              
शुक्रवार- देवी।                 
शनिवार- भैरवजी।

राशि के आधार पर : पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें।                           
वृष: गणेशजी।
मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।                                         
कर्क: हनुमानजी।
सिंह: शिवजी।                                                                
कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली।
तुला: भैरव, हनुमानजी, काली।                                          
वृश्चिक: शिवजी।
धनु: हनुमानजी।                                                             
मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कुंभ: गणेशजी।                                                              
मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।

जन्म कुंडली से : जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं। 

ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव।
सूर्य: विष्णु।                                                                    
चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा। 
मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।                                          
बुध- गणेश, विष्णु। 
गुरू- शिव।                                                                      
शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती। 
शनि- भैरव, काली।

रत्न कौन सा धारण किया जाये?


रत्नों से संबंधित गलत धारणाएं
दुनिया भर में लोगों के द्वारा रत्न धारण करने का प्रचलन बहुत पुराना है तथा प्राचीन समयों से ही दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोग इनके प्रभाव के बारे में जानने अथवा न जानने के बावज़ूद भी इन्हें धारण करते रहे हैं। आज के युग में भी रत्न धारण करने का प्रचलन बहुत जोरों पर है तथा भारत जैसे देशों में जहां इन्हें ज्योतिष के प्रभावशाली उपायों और यंत्रों की तरह प्रयोग किया जाता है वहीं पर पश्चिमी देशों में रत्नों का प्रयोग अधिकतर आभूषणों की तरह किया जाता है। वहां के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के रत्नों की सुंदरता से मोहित होकर इनके प्रभाव जाने बिना ही इन्हें धारण कर लेते हैं। किन्तु भारत में रत्नों को अधिकतर ज्योतिष के उपाय के तौर पर तथा ज्योतिषियों के परामर्श के अनुसार ही धारण किया जाता है। किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के अनुसार उसके लिए उपयुक्त रत्न चुनने को लेकर दुनिया भर के ज्योतिषियों में अलग-अलग तरह के मत एवम धारणाएं प्रचलित हैं। आइए इन धारणाओं के बारे में तथा इनकी सत्यता एवम सार्थकता के बारे में चर्चा करते हैं।
सबसे पहले पश्चिमी देशों में प्रचलित धारणा के बारे में चर्चा करते हैं जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति की सूर्य राशि को देखकर उसके लिए उपयुक्त रत्न निर्धारित किए जाते हैं। इस धारणा के अनुसार एक ही सूर्य राशि वाले लोगों के लिए एक जैसे रत्न ही उपयुक्त होते हैं जो कि व्यवहारिकता की दृष्टि से बिल्कुल भी ठीक नहीं है। सूर्य एक राशि में लगभग एक मास तक स्थित रहते हैं तथा इस धारणा के अनुसार किसी एक मास विशेष में जन्में लोगों के लिए शुभ तथा अशुभ ग्रह समान ही होते हैं। इसका मतलब यह निकलता है कि प्रत्येक वर्ष किसी माह विशेष में जन्में लोगों के लिए शुभ या अशुभ फलदायी ग्रह एक जैसे ही होते हैं जो कि बिल्कुल भी व्यवहारिक नहीं है क्योंकि कुंडलियों में ग्रहों का स्वभाव तो आम तौर पर एक घंटे के लिए भी एक जैसा नहीं रहता फिर एक महीना तो बहुत लंबा समय है। इसलिए मेरे विचार में इस धारणा के अनुसार रत्न धारण नहीं करने चाहिएं।
इस धारणा से आगे निकली एक संशोधित धारणा के अनुसार किसी भी एक तिथि विशेष को जन्में लोगों को एक जैसे रत्न ही धारण करने चाहिएं। पहली धारणा की तरह इस धारणा के मूल में भी वही त्रुटी है। किसी भी एक दिन विशेष में दुनिया भर में कम से कम हज़ारों अलग-अलग प्रकार की किस्मत और ग्रहों वाले लोग जन्म लेते हैं तथा उन सबकी किस्मत तथा उनके लिए उपयुक्त रत्नों को एक जैसा मानना मेरे विचार से सर्वथा अनुचित है।
पश्चिमी देशों में प्रचलित कुछ धारणाओं पर चर्चा करने के पश्चात आइए अब भारतीय ज्योतिष में किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त रत्न निर्धारित करने को लेकर प्रचलित कुछ धारणाओं पर चर्चा करते हैं। सबसे पहले बात करते हैं ज्योतिषियों के एक बहुत बड़े वर्ग की जिनका यह मत है कि किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली में लग्न भाव में जो राशि स्थित है जो उस व्यक्ति का लग्न अथवा लग्न राशि  कहलाती है, उस राशि के स्वामी का रत्न कुंडली धारक के लिए सबसे उपयुक्त रहेगा। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में लग्न भाव यानि कि पहले भाव में मेष राशि स्थित है तो ऐसे व्यक्ति को मेष राशि के स्वामी अर्थात मंगल ग्रह का रत्न लाल मूंगा धारण करने से बहुत लाभ होगा। इन ज्योतिषियों की यह धारणा है कि किसी भी व्यक्ति की कुंडली में उसका लग्नेश अर्थात लग्न भाव में स्थित राशि का स्वामी ग्रह उस व्यक्ति के लिए सदा ही शुभ फलदायी होता है। यह धारणा भी तथ्यों तथा व्यवहारिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती तथा मेरे निजी अनुभव के अनुसार लगभग 50 से 60 प्रतिशत लोगों के लिए उनके लग्नेश का रत्न उपयुक्त नहीं होता तथा इसे धारण करने की स्थिति में अधिकतर यह कुंडली धारक का बहुत नुकसान कर देता है। इसलिए केवल इस धारणा के अनुसार उपयुक्त रत्न का निर्धारण उचित नहीं है।
ज्योतिषियों में प्रचलित एक और धारणा के अनुसार कुंडली धारक को उसकी कुंडली के अनुसार उसके वर्तमान समय में चल रही महादशा तथा अंतरदशा के स्वामी ग्रहों के रत्न धारण करने का परामर्श दिया जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के अनुसार उसके वर्तमान समय में शनि ग्रह की महादशा तथा बुध ग्रह की अंतरदशा चल रही है तो ज्योतिषियों का यह वर्ग इस व्यक्ति को शनि तथा बुध ग्रह के रत्न धारण करने का परामर्श देगा जिससे इनकी धारणा के अनुसार उस व्यक्ति को ग्रहों की इन दशाओं से लाभ प्राप्त होंगे। यह मत लाभकारी होने के साथ-साथ अति विनाशकारी भी हो सकता है। किसी भी शुभ या अशुभ फलदायी ग्रह का बल अपनी महादशा तथा अंतरदशा में बढ़ जाता है तथा किसी कुंडली विशेष में उस ग्रह द्वारा बनाए गए अच्छे या बुरे योग इस समय सबसे अधिक लाभ या हानि प्रदान करते हैं। अपनी दशाओं में चल रहे ग्रह अगर कुंडली धारक के लिए सकारात्मक हैं तो इनके रत्न धारण करने से इनके शुभ फलों में और वृद्दि हो जाती है, किन्तु यदि यह ग्रह कुंडली धारक के लिए नकारात्मक हैं तो इनके रत्न धारण करने से इनके अशुभ फलों में कई गुणा तक वृद्धि हो जाती है तथा ऐसी स्थिति में ये ग्रह कुंडली धारक को बहुत भारी तथा भयंकर नुकसान पहुंचा सकते हैं। मेरे पास अपनी कुंडली के विषय में परामर्श प्राप्त करने आए ऐसे ही एक व्यक्ति की उदाहरण मैं यहां पर दे रहा हूं।
यह सज्जन बहुत पीड़ित स्थिति में मेरे पास आए थे। इनकी कुंडली के अनुसार मंगल इनके लग्नेश थे तथा मेरे पास आने के समय इनकी कुंडली के अनुसार मंगल की महादशा चल रही थी। इन सज्जन ने अपने दायें हाथ की कनिष्का उंगली में लाल मूंगा धारण किया हुआ था। इनकी कुंडली का अध्ययन करने पर मैने देखा कि मंगल इनकी कुंडली में लग्नेश होने के बावजूद भी सबसे अधिक अशुभ फलदायी ग्रह थे तथा उपर से मगल की महादशा और इन सज्जन के हाथ में मंगल का रत्न, परिणाम तो भंयकर होने ही थे। इन सज्जन से पूछने पर इन्होने बताया कि जब से मंगल महाराज की महादशा इनकी कुंडली में शुरु हुई थी, इनके व्वयसाय में बहुत हानि हो रही थी तथा और भी कई तरह की परेशानियां आ रहीं थीं। फिर इन सज्जन ने किसी ज्योतिषि के परामर्श पर इन मुसीबतों से राहत पाने के लिए मंगल ग्रह का रत्न लाल मूंगा धारण कर लिया। मैने इन सज्ज्न को यह बताया कि आपकी कुंडली के अनुसार मंगल ग्रह का यह रत्न आपके लिए बिल्कुल भी शुभ नहीं है तथा यह रत्न आपको इस चल रहे समय के अनुसार किसी भारी नुकसान या विपत्ति में डाल सकता है। मेरे यह कहने पर इन सज्जन ने बताया कि यह रत्न इन्होंने लगभग 3 मास पूर्व धारण किया था तथा इसे धारण करने के दो मास पश्चात ही धन प्राप्ति के उद्देश्य से किसी आपराधिक संस्था ने इनका अपहरण कर लिया था तथा कितने ही दिन उनकी प्रताड़ना सहन करने के बाद इनके परिवार वालों ने किसी सम्पत्ति को गिरवी रखकर उस संस्था द्वारा मांगी गई धन राशि चुका कर इन्हें रिहा करवाया था। अब यह सज्जन भारी कर्जे के नीचे दबे थे तथा कैद के दौरान मिली प्रताड़ना के कारण इनका मानसिक संतुलन भी कुछ हद तक बिगड़ गया था।
मुख्य विषय पर वापिस आते हुए, ज्योतिषियों का एक और वर्ग किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त रत्न निर्धारित करने के लिए उपर बताई गई सभी धारणाओं से कहीं अधिक विनाशकारी धारणा में विश्वास रखता है। ज्योतिषियों का यह वर्ग मानता है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कुंडली के अनुसार केवल अशुभ फल प्रदान करने वाले ग्रहों के रत्न ही धारण करने चाहिएं। ज्योतिषियों के इस वर्ग का मानना है कि नकारात्मक ग्रहों के रत्न धारण करने से ये ग्रह सकारात्मक हो जाते हैं तथा कुंडली धारक को शुभ फल प्रदान करना शुरू कर देते हैं। क्योंकि मैं रत्नों की कार्यप्रणाली से संबंधित तथ्यों पर अपने पिछ्ले लेखों में विस्तारपूर्वक प्रकाश डाल चुका हूं, इसलिए यहां पर मैं अपने पाठकों को यही परामर्श दूंगा कि यदि आप में से किसी भी पाठक का संयोग ऐसे किसी ज्योतिषि से हो जाए जो आपको यह परामर्श दे कि आप अपनी कुंडली में अशुभ फल प्रदान करने वाले ग्रहों के रत्न धारण करें तो शीघ्र से शीघ्र ऐसे ज्योतिषि महाराज के स्थान से चले जाएं तथा भविष्य में फिर कभी इनके पास रत्न धारण करने संबंधी परामर्श प्राप्त करने न जाएं।
तब किन ग्रहों के रत्न पहने जाएँ?
सामान्यत: रत्नों के बारे में भ्रांति होती है जैसे विवाह न हो रहा हो तो पुखराज पहन लें, मांगलिक हो तो मूँगा पहन लें, गुस्सा आता हो तो मोती पहन लें। मगर कौन सा रत्न कब पहना जाए इसके लिए कुंडली का सूक्ष्म निरीक्षण जरूरी होता है। लग्न कुंडली, नवमांश, ग्रहों का बलाबल, दशा-महादशाएँ आदि सभी का अध्ययन करने के बाद ही रत्न पहनने की सलाह दी जाती है। यूँ ही रत्न पहन लेना नुकसानदायक हो सकता है।
मोती डिप्रेशन भी दे सकता है, मूँगा रक्तचाप गड़बड़ा सकता है और पुखराज अहंकार बढ़ा सकता है, पेट गड़बड़ कर सकता है।
सामान्यत: लग्न कुंडली के अनुसार कारक ग्रहों के (लग्न, पंचम, नवम ) रत्न पहने जा सकते हैं जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी होकर पाप प्रभाव में हो, अस्त हो या श‍त्रु क्षेत्री हो उन्हें प्रबल बनाने के लिए भी उनके रत्न पहनना प्रभाव देता है।
रत्न पहनने के लिए दशा-महादशाओं का अध्ययन भी जरूरी है। केंद्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (१, ५, ९) के स्वामी की ग्रह महादशा में उस ग्रह का रत्न पहनने से अधिक लाभ मिलता है।
3, 6, 8, 12 के स्वामी ग्रहों के रत्न नहीं पहनने चाहिए। इनको शांत रखने के लिए दान-मंत्र जाप का सहारा लेना चाहिए। रत्न निर्धारित करने के बाद उन्हें पहनने का भी विशेष तरीका होता है। रत्न अँगूठी या लॉकेट के रूप में निर्धारित धातु (सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल) में बनाए जाते हैं।
उस ग्रह के लिए निहित वार वाले दिन शुभ घड़ी में रत्न पहना जाता है। इसके पहले रत्न को दो दिन कच्चे दूध में भिगोकर रखें। शुभ घड़ी में उस ग्रह का मंत्र जाप करके रत्न को सिद्ध करें। (ये जाप 21 हजार से 1 लाख तक हो सकते हैं) तत्पश्चात इष्ट देव का स्मरण कर रत्न को धूप-दीप दिया तो उसे प्रसन्न मन से धारण करें। इस विधि से रत्न धारण करने से ही वह पूर्ण फल देता है। मंत्र जाप के लिए भी रत्न सिद्धि के लिए किसी ज्ञानी की मदद भी ली जा सकती है।
शनि और राहु के रत्न कुंडली के सूक्ष्म निरीक्षण के बाद ही पहनना चाहिए अन्यथा इनसे भयंकर नुकसान भी हो सकता है।
सार यह निकला जा सकता है कि रत्न केवल और केवल उसी ग्रह के लिए धारण करना चाहिए जो आपकी जन्म कुंडली में सकारात्मक अर्थात शुभ फलदायी हो रत्न केवल ऐसे ज्योतिषी के परामर्श पर ही धारण करने चाहिएं जो आपकी कुंडली का सही अध्ययन करने के बाद यह निर्णय लेने में सक्षम हो कि आपकी कुंडली के अनुसार आपके लिए शुभ फल प्रदान करने वाले ग्रह कौन से हैं तथा उनमें से किस ग्रह का रत्न धारण करना आपके लिए लाभदायक होगा।
नोट:- यह लेख जन कल्याण की भावना से किन्हीं महानुभावों ने प्रकाशित किये थे, उसी भावना का सम्मान करते हुए ब्लॉग पढ़ने वालों के लिए मैनें इसका अपने ब्लॉग में पुनः प्रकाशन किया है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इससे लाभ उठा सकें 

Thursday, May 17, 2012

शनि के विशिष्ट योग

  • यदि शनि लग्न में स्वगृही हो, मार्गी हो तो उसके शत्रु दैवी विपत्तियों से स्वतः ही नष्ट हो जाता है।
  • लग्न में यदि शनि वक्री हो तो जातक हत्यारा हो सकता है, पकड़ा नहीं जाता लेकिन गुरु एवं शुभ ग्रहों कि दृष्टि हो तो हत्या नहीं करता।
  • मृत्यु का असली करक ग्रह शनि होता है। मृत्यु से पहले शनि के हाथ जरूर लगते हैं तभी मृत्यु होती है।
  • यदि  शनि वायु राशि में होता है तो ज़हर से मृत्यु होती है।
  • यदि  शनि अग्नि राशि में होता है तो भी ज़हर से मृत्यु होती है।
  • यदि  शनि पृथ्वी राशि में होता है तो मारपीट से मृत्यु होती है।
  •  यदि  शनि जल राशि में होता है तो औषधि के विपरीत परिणाम से मृत्यु होती है।
  • अष्टम भाव में गोचर में जब शनि आता है और शून्य अंश पार कर जाता है तो वृद्ध महिला या पुरुष से अपार धन दिलवाता है।
  • यदि  शनि वायु ३, ७, ११ मिथुन, तुला, कुम्भ का शनि छठे भाव में हो तो जातक सदैव रोगी रहता है।
  • यदि  जीवन में शनि की दशा चौथे की आ जाए तो जीवन बड़ा दुःख, दरिद्र, आपत्ति बंधन योग ये सब होते हैं। स्त्रियों के लिए आठवाँ महीना बड़ा ख़राब होता है।
  •  षड्वर्ग में यदि शनि को तीन से अधिक वोट मिलते हैं तो शनि शुभ होता है।
  • शुभ  शनि शारीरिक क्षमता को छोड़कर सब सुख देता है परन्तु जिन-जिन अंगों को देखता है उनको कष्ट देता है।
  • कुंभ लग्न वाले जातको का शनि छठे घर में गोचर में यदि कर्क का होता है तो जातक को रोग देता है परन्तु जब षडवर्ग निर्बल होगा तब अत्यधिक रोग देगा और शनि का संबंध ६, ८, १२ से होगा तब भी।
  • षडवर्ग में जातक का जो अंग निर्बल है उसकी निर्बलता या दुर्बलता समाप्त करना कठिन कार्य है जैसे दिल में सुराख, सफ़ेद दाग, गंजापन, नपुंसकता एवं अंगों का टेढ़ापन आदि।
  • शनि  छठे भाव में जातक को रोग मुक्त नहीं होने देता ।
  • शनि  अष्टम भाव में झगड़े, झंझट, फसाद करवाता है, बिना कारण अनेक उत्पात उत्पन्न कराता है।
  • बारहवें  का शनि सब धन को नष्ट कराकर शव यात्राएं, जेल यात्राएं, निर्धनता आदि योग देता है।पहले ६ वर्ष बहुत दुःखदायी होते हैं, दूसरे ६ वर्ष में बहुत उन्नति करता है और आखिरी के ६ वर्ष में सब कुछ नष्ट करा देता है।
  • ११वे भाव में नीच का शनि बेईमानी से धन इकट्ठा करवाता है और पता नहीं लगने देता कि कितनी  बेईमानी की है। बुध भी ११वे भाव में बेईमानी करवाता है।
  • यदि  मंगल शनि को देख ले तो बेईमानी नहीं करवाता।
  • ११वे भाव में शनि जो बेईमानी करवाता है वह बुध की महादशा में प्रकट हो जाती है।
  • शनि  का किसी प्रकार बुध से संबंध हो जाए तो बेईमानी से धन अर्जित करवाता है।